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Sunday, 1 June 2014

नूरीन की आत्मकथा ....1

नूरीन की आत्मकथा .....धारावाहिक (१)

-----भोला 
नूरीन 
इस्लाम की बुनियाद पर हिन्दुस्तान के मुसलमानों ने अपने मज़हब की हिफाज़त और इस्लामी (अरबी) तहज़ीब (संस्कृति) को अपने समाज में लागू करने के लिए सन् 1947 में लाखों की तादाद में इन्सानी जानो-माल की कुर्बानी के बदले में दुनिया के नक्शे पर पाकिस्तान नाम की इस्लामी हिस्सेदारी कायम की और एक नये वतन की बुनियाद पड़ी। बड़े-बड़े अल्फाज़ (वक्तब्य) और सियासी फैसले (राजनैतिक सिद्धांत) मुआशी (अर्थनैतिक) उतार-चढ़ाव और मज़हब के नाम पर सरहद की लकीरें, शरियत या जमहुरियत (लोकतांत्रिक गणतंत्र) और राजनेताओं के बड़े-बड़े वायदे कोई भी हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की  औरतों को हिफ़ाज़त और इज्ज़त नहीं दिला सके, बल्कि बदले में उन्हें मिली ज़िल्लत और लापरवाही । सरहद की लकीरें जितनी भी मज़बूत क्यों न हों, दोनों मुल्कों की औरतों की हालत एक सी है।
            नूरीन की आत्मकथा-
            ""मैं एक इन्सान हूँ, कुदरत, समाज और मज़हब ने हमें औरत का ख़िताब (उपाधि) दिया, होश सम्भालते ही पता चला कि मैं मुसलमान हूँ । मुसलमान होने के नाते औरत के लिए मज़हब ने जो तहज़ीब और तौर-तरीके मुकर्र (नियुक्त) किये, उन्हें बचपन से ही रौशनास (परिचित) करवाये गये।
            पाकिस्तान का शहर "लायलपुर " (फैसलाबाद) में मेरी पैदाइश हुई, भाई-बहिनों में मेरा चौथा नम्बर था, सबसे बड़े भाई रियाज़, भाई परवेज़, बाजी शायदा, उसके बाद मैं नूरीन और मेरे बाद वसीम, फैयाज़ और नुसरत । चार भाई और तीन बहिनों के साथ खेल-कूद और बे-फिक्री का बचपन गुज़ारने के बजाय बन्दीशें (पाबन्दियाँ) और तज़ुरबेदार ज़िन्दगी मिली, मज़हबी अनुशासन पहाड़ बन कर हमारे बचपने को कब उचाट ले गये, हमें खुद ही पता नहीं चला। बचपन से ही भयानक शक्ल वाले मौलाना से ना-समझने वाली अरबी ज़ुबान में कुर-आन शरीफ रटने की तालीम दी गई, माँ-बाप की ज़बरदस्ती और मौलाना की भयानक शख्सियत (चरित्र) और छड़ी की मार के डर ने हमें पाँच साल की उम्र में ही अरबी अल्फाज़ (अक्षर) और कुर-आन की आयतों को हिफ़्ज (कण्ठस्थ) करने पर मजबूर किया । इस छोटी सी उम्र में ही हम बच्चों को मुसलमान बनाने के ज़बरदस्त सिलसिले ने हमारी बचकाना सोच को सिमटा कर एक नुक्ते पर लाकर खड़ा कर दिया था। हमें क्या पढ़ाया जाता, उसका मतलब समझ में नहीं आता था, सिर्फ एक खौफ़ हमें मज़हबी किताबों की आयतों को याद करवाते। मौलाना की वह लालची हाथ जो मेरे और बाजी शायदा के हर नाज़ूक हिस्सों को लागातार छूने और दबाने की कोशिश एक अजीब सी घूटन के माहौल ने हमारी ज़हनी तरक्की को एक अनदेखी जंजीर से बाँध दिया था ।
        कराँची में वालीद साहिब ने एक कोठी ख़रीदी और हम सब लायलपुर से कराँची बेहतर ज़िन्दगी और ज्यादा रोज़गार की उम्मीद में आ गये । कराँची में दुनियावी तालीम के लिए मुझे स्कूल भेजा गया और इस तरह मेरी नई ज़िन्दगी का आग़ाज़  (प्रारम्भ) हुआ ।
            मेरी बड़ी बहिन शायदा, छोटी बहिन नुसरत के साथ हम तीनों को लड़कियों के स्कूल में दाखिल करवाया गया और तीनों भाई परवेज़, वसीम, फैयाज़ को लड़कों के स्कूल में। सबसे बड़े भाई रियाज़ लायलपुर में वालीद साहिब के साथ करोबार में शरीक (शामिल) थे और घर में उनकी ज्यादा अहमियत थी, शायद इसकी वजह घर की आमदनी में उनका हाथ बटाना और घर का पहला बड़ा बेटा होना था । ताज्जुब की बात थी कि बाजी शायदा की अहमियत बड़ी बेटी होने के नाते भाई रियाज़ के बराबर नहीं थी।
           भाई रियाज़ की आदत थी रेडियो में फिल्मी गाने सुनना और यही शौक मुझे भी था, लेकिन मुझे इजाज़त नहीं थी, क्योंकि हमें यह बताया गया था कि मज़हबे इस्लाम में गाना सुनना हराम है । औरत होने की वजह से यह कानून सख्ती से मेरे ऊपर लागू किया गया और छिप-छिप कर भी सुनने की इजाज़त नहीं थी और ऐसा करते हुए पकड़े जाने पर अम्मी की डाँट सुननी पड़ती और कभी-कभी मार भी । भाई रियाज़ भी मुसलमान और मैं भी मुसलमान, फिर दोनों के लिए अलग-अलग कानून क्यों ? और जिन फ़नकारों के गाने रेडियों में आते थे, वह भी मुसलमान ही थे और पाकिस्तान रेडियो भी इस्लामी मुल्क में ही था, तो क्या यह सिर्फ मर्दों के लिए, और अगर हराम है, तो हर मुसलमान के लिए यह कानून क्यों नहीं लागू हुआ ? कुछ हदीसें रसूल (हज़रत मोहम्मद) की बीबी आएशा (रसूल की सबसे छोटी नौ साला बीबी ) का गाना सुनने पर रसूल की इजाज़त बयान करती है ।
            बुखारी पार्ट 1 किताब इदीन बॉब 624 हदीस 935
रवायत (उल्लेख) है आएशा से कि अब्बु बकर (रसूल के शिष्य) उनके पास आये, मीना (मीना का मेला) के दिनों       में, वहाँ दो लड़कियाँ डफ (डफली) बजाकर बास की लड़ाई के शेर (गाथायें) गा रही थी और रसूल अल्लाह अपना कपड़ा ताने पड़े थे, अब्बु बकर ने उन लड़कियों को झिड़का तब रसूल अल्लाह ने अपना मुंह खोला और फर्माया कि अब्बु बकर जाने दो यह ईद के दिन हैं । आएशा से रवायत है कि मैं रसूल अल्लाह की आड़ में थी और हब्शियों (अफ्रीकी नस्ल के लोग) की कसरत देख रही थी, वह मस्जिद में हथियारों से खेल रहे थे। उमर (रसूल के शिष्य) ने उनको डाँटा तो रसूल ने फर्माया - जाने दो और उन लोगों से कहा कि तुम लोग बे-फिक्र खेलो ।
            मुस्लिम पार्ट 2 बॉब नमाज़ इदीन का बयान हदीस 8
मुसलमानों की माँ आएशा के घर रसूल अल्लाह आये तो देखा कि दो लड़कियाँ गा रही थी बास की लड़ाई का।       रसूल अल्लाह बिछौने पर लेट गये और मुंह ढाँप लिया, अब्बु     बकर आये और मुझे झिड़का कि शैतान की तान      रसूल अल्लाह के पास, रसूल अल्लाह ने उनको देखा और फर्माया कि उनको छोड़ दो और गाने दो । रसूल अल्लाह के पास      हब्शी खेलते थे अपने तीरों से कि उमर आये और कंकीड़ी की तरफ झूके कि उनको मारे,     रसूल अल्लाह ने फर्माया ए उमर ! उनको खेलने दो । ईद का दिन था हब्शी अपनी ढालों और नेज़ों (भाला) से खेलते थे, मैंने (आएशा) रसूल अल्लाह से ख्वाहिश ज़ाहिर की उसे देखने की तो रसूल अल्लाह ने मुझे अपने ाीछे खड़ा कर लिया और   मेरा रूख़्सार (गाल) आपके रूख्सार पर था और रसूल अल्लाह फर्माते- ऐ औलादे अर्फदा (एक सम्प्रदाय) की, तुम अपने खेल में मशगुल रहो ।
जब रसूल अल्लाह ने गाना सुनने पर कोई रोक नहीं लगाई, यहाँ तक कि अपने सहाबा को भी मना करने पर रोका, तब गाना बजाना हराम या उसे सुनना गुनाह है, इस बात की बुनियाद कितनी सच्चाई की हक रखती है, वह मुझे नहीं पता था, मगर उस वक्त डर-डर के  छिप-छिप कर भाई रियाज़ के कमरे से रेडियो की आती हुई गाने की आवाज़ मेरे दिल को अच्छी लगती थी और मैं यह समझती हूँ कि अल्लाह के ये सारी कुदरत (प्रकृति) का मकसद इन्सान को तसल्ली पहुँचाना है।
            भाई रियाज़ और वालिद साहिब (पिता) के घर लौटने के बाद उनकी खिदमत में अम्मी और बाजी शायदा मसरूफ़ हो जाती और हम बाकी भाई-बहिन चुपचाप बैठ जाते थे। अब्बु और बड़े भाई के खाना खाने के बाद बारी आती थी बाकी तीनों भाइयों की, उसके बाद हम तीन बहिनों के साथ अम्मी की और आखिरी में काम वाली की । बचपन से ही भाइयों के साथ बैठकर खाना खाने का दिल करता, लेकिन कभी-कभी किसी त्योहार में ही यह अरमान पूरा होता था ।
      औरत अन्त में खायेगी या मर्दों के साथ बैठकर नहीं खा सकती, यह रस्म न जाने इस्लाम के किस कानून में है, यह मुझे पता नहीं है, लेकिन एक हदीस है ।
            मूता ईमाम मालिक बॉब 31 खाने-पीने की हदीस 114 पेंज 652    
सवाल हुआ ईमाम मालिक से कि अगर औरत ग़ैर-मेहरम (पर-पुरूष) मर्द या अपने गुलाम के साथ खाना खाये तो कैसा हो - उन्होंने जवाब दिया कुछ बुराई नहीं है, जबकि ऐसी सूरत हो जो उस औरत के लिए बेहतर हो और यह कि उस जगह और लोग भी हों और कहा कि औरत कभी अपने शौहर के साथ खाती है और कभी ग़ैर के साथ, जिसको शौहर खाना खिलाया करता है ।
            हमारे समाज में बचपन से ही औरतों को मर्दों के खाना खाने के बाद बचे-खुचे खाना खाने की तालीम (शिक्षा) मिलती है, जिससे इनकी सेहत कमजोर होने के साथ-साथ तरह-तरह की बीमारियों के शिकार भी हो जाती हैं । आखिर क्यों औरत ही कुर्बानी दे। अच्छी खूराक पर भी औरतों का हक नहीं, यह कैसा इन्साफ ?
            कराँची में अरबी तालीम के लिए दूसरा मौलाना रखा गया । यहाँपर भी वही दहशत बरसती हुई शक्ल, लाल आँखें और बढ़ते हुए लालची हाथ बार-बार बाजी शायदा को छूने की कोशिश करते। मैं समझती थी कि ये भी तालीम का एक हिस्सा है । हम मुसलमान हैं, यह तो मैं जानती थी, लेकिन समझती नहीं थी । हमें नमाज़ की तालीम दी गई और सख्ती के साथ नमाज़ पढ़ने की ताकीद (आवश्यक) की गई । भाई रियाज़ नमाज़ नहीं पढ़ते थे, क्योंकि वह आफिस के कामों में मसरूफ़ रहते और उनकी मेहनत से घर में पैसे आते थे । ईद-बकरा-ईद में सब भाइयों के साथ वालिद साहिब मस्जिद में नमाज़ पढ़ने जाते, अम्मी और हम बहिनें घर में ही ना-समझने वाली ज़ुबान में नये कपड़ों के साथ नमाज़ पढ़ते थे । नमाज़ पढ़ने के बाद अम्मी मेहमानों की ख़ातिरदारी में लग जाती । मुख्तलिफ़ किस्म (विभिन्न प्रकार) के पकवान पकते, जिनकी तैयारी एक दिन पहले से ही रातभर जाग कर होती थी । मेरा काम था अम्मी और बाजी शायदा का हाथ बॅटाना । अब्बू के साथ मस्जिद जाने की ख्वाहिश और भाइयों की तरह बाहर घूम कर खुशियाँ मनाने की हसरत कभी पूरी नहीं हुई, क्योंकि मैं छ: साला औरत थी । शायद ऐसी ख्वाहिश (इच्छा) अम्मी के दिल में भी होती होगी। आखिरकार हम औरतों की खुशियाँ नये कपड़ों के साथ घर की चारदीवारी में ही दफ़न हो जाती थी । नमाज़ नहीं पढ़ने वाले के घरों को जलाने का हुक्म है, यहाँतक कि उनपर और भी सख्ती करने का हुक्म दिया गया है, लेकिन कुर-आन शरीफ की सूर:(अध्याय) बकर और सूर: काफरून में साफ और सीधे तौर पर कहा गया है कि "" दीन के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं"" तो फिर ये हदीसें किस बुनियाद पर सख्ती का हुक्म करती हैं । इन हदीसों पर ग़ौर करें -
            बुखारी पार्ट 1 बॉब 419 हदीस 614
रवायत (उल्लेख) है अब्बू हुरेरा से फर्माया रसूल अल्लाह ने कसम उस ख़ुदा की जिसके       हाथ में मेरी जान है, मैंने इरादा किया हुकुम दूँ लकड़ियाँ जमा की जाये, फिर नमाज़ का हुकुम दूँ उसकी अज़ान (नमाज़ के लिए पुकारना) दी जाये, फिर एक शख्स से कह दूँ वह लोगों को नमाज़ पढ़ाये और मैं उनको पीछे छोड़कर उन लोगों के पास जाऊँ और उनके घरों को जला दूँ जो जमात
( नमाज़ के लिए इकट्ठा होना) में हाज़िर नहीं होते ।
            बुखारी पार्ट 1 बॉब 424 हदीस 623
रवायत है अब्बू हुरेरा से फर्माया रसूल अल्लाह ने मुनाफिकों (बहुमुख) पर कोई नमाज़ सुबह व ईशा (रात/दिन)       की नमाज़ से ज्यादा भारी नहीं और अगर लोग जानते जो सवाब (पूण्य) इन नमाज़ों में हैं,चल नहीं सकते तो घूटने के बल घसीटते हुए आते और मैंने इरादा किया कि मुअज्ज़न (नमाज़ के लिए पुकारने वाला) से कहूँ, वो तकबीर      (अज़ान) कहे और एक शख्स को इमाम बना दूँ, जो लोगों को नमाज़ पढ़ाये और मैं आग की चिंगारियाँ लेकर उन लोगों को जला दूँ जो अभी तक नमाज़ के लिए नहीं निकलें ।
         मेरे ख्याल से अल्लाहताला ने अपनी ज़िम्मेदारी किसी पर नहीं थोपी और रसूल अल्लाह भी अल्लाह के असूलों (आदर्शों) को पूरी तरह से जानते थे और यही वजह है कि यह हदीस रसूल की नहीं हो सकती, क्योंकि उन्होंने कोई भी काम अल्लाह के असूल के खिलाफ नहीं किया और अल्लाह किसी की इबादत (प्रार्थना) का मोहताज नहीं है ।
            धीरे-धीरे सारे इस्लामी रस्म-व-रिवाज मैं सीखती गयी, नमाज़ पढ़ना, दुपट्टा ओढना, मर्दों से दूरी बरकरार रखना, ना समझने वाली ज़बान अरबी में कुर-आन शरीफ पढ़ना और साथ-साथ स्कूल की पढ़ाई भी । स्कूल में भी टीचर हमेशा हमें औरतों के तौर-तरीकों के बारे में तालीम देती, जैसे कि घर में अम्मी की तर्बियत (शिक्षा) थी । "नीची आवाज़ में बात करो, धीरे चलो, ज़ोर से मत हंसों, खिड़की से बाहर मत झांकों, दुपट्टा करो, इस तरह से बैठो, उस तरह से बैठो वगैरह-वगैरह। घर की तरह स्कूल में भी ये बातें सुन-सुन कर एक आदत सी पड़ गई थी ।
            कुर-आन सूर: नूर आयत 31
मुसलमान औरतों से कहो कि वह अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी अस्मत (इज्ज़त) में फर्क न आने दे और अपनी ज़िनत (बनाव-श्रृंगार) को ज़ाहिर न करे, सिवाय उसके जो ज़ाहिर है और अपने अराइश (बनाव-श्रृंगार) को किसी के सामने ज़ाहिर न करे ।
            एक इन्सान को औरत बनाने के पीछे धर्म की कोई न कोई कहानी जरूर सुनने को मिलती थी। कभी-कभी बीबी फ़ातिमा (हजरत मोहम्मद की बेटी) तो कभी बीबी आएशा की, ताज्जुब की बात है कि छोटी सी उम्र में ही मेरे ज़ेहन में सवाल आता था कि इस्लाम के तमाम कानून कहानियों के बुनियाद पर क्यों है, इन्सान की ज़रूरत के मुताबिक क्यों नहीं । क्यों खुले दिल से हँस नहीं पाती, क्यों हमें बाहर मैदान में खेलने की इजाज़त नहीं मिलती, क्यों अब्बु के साथ ईद की नमाज़ में जाने की इजाज़त नहीं, क्यों हमें भाइयों की तरह खुला घूमने की आज़ादी नहीं थी ?
            भाई-बहिनों में स्कूल की पढ़ाई में सबसे ज़ेहीन (बुद्धिमान) मैं थी और स्कूल की पढ़ाई शुरू से ही मुझे अच्छी लगती और सही भी । भाइयों का दो-दो साल फेल होने के बाद पास होने की खुशी मेरे क्लास में फस्र्ट आने से बहुत ज्यादा अब्बु-अम्मी के पास अहमियत थी, और मेरा फस्र्ट आना उनकी नज़र में कोई अहमियत नहीं रखता था । धीरे-धीरे छ: साल की उम्र पूरी करके मैंने सातवें साल में कदम रखा । लोग कहते हैं कि हमारे इस्लाम में जन्मदिन नहीं मनाना चाहिए, लेकिन ताज्जुब की बात है कि रसूलेपाक के जन्मदिन में मिठाइयाँ बनाकर बॅटती हैं और ईद-मिलादुन-नबीं (रसूल के जन्मदिन का त्योहार) के नाम पर जन्मदिन भी मनाया जाता है ।
            कुर-आन सूर: एहकाफ आयत 9
आप कह दीजिए कि मैं कोई बिल्कुल अनोखा पैग़म्बर नहीं, न मुझे यह मालूम है कि मेरे साथ और तुम्हारे साथ क्या किया जायेगा । मैं तो सिर्फ उसकी पैरवी करता हूँ जो मेरी तरफ वहीं (देववाणी) होती है और मैं तो सिर्फ साफ डर सुनाने वाला हूँ ।
कुर-आन शरीफ में बहुत सारी आयतें हैं, जो साबित करती हैं कि जज़ा (पुरस्कार) और सज़ा (दण्ड) हर इन्सान के लिए बराबर है ।
            आठ साल की उम्र में ही मुझे पूरा कुर-आन शरीफ पढ़ना सिखा दिया गया और साथ-साथ इस्लाम के वह सारे तौर-तरीके भी, जो एक औरत को नेक होने का दर्जा देते हैं और इस नेक खिताब (उपाधि) ने आठ साला नूरीन की काबिलियत (योग्यता) और अरमानों को पिंजड़े में बन्द कर दिया।

बाजी शायदा जब पाँचवी क्लास में फेल हो गई तो अब्बु का हुक्म (आदेश) आया कि और पढ़ने की ज़रूरत नहीं है । अम्मी का साथ देते-देते बाजी शायदा बच्ची से कब औरत बन गई, उसे खुद पता नहीं चला । घर की बड़ी बेटी होने की वजह से घर की सारी ज़िम्मेदारी उन्होंने अपने कंधों पर उठा ली । अम्मी की बीमारी या ग़ैर-मौजूदगी में यह ज़िम्मेदारी वह बखूबी सम्भाल लेती थी। एक तरफ मौलाना की कुर-आन शरीफ सिखाने के बहाने गन्दी हरकतें और अब्बु की गरजती हुई रौबदार आवाज़ आज भी मेरी याद ताज़ा करती है । जब अम्मी ने मौलाना की गन्दी हरकतों के बारे में शिकायत की तो अब्बु ने अम्मी को डाँटते हुए कहा कि कोई मौलाना ऐसा नहीं कर सकता । शायद अब्बु ने मर्दों की हरकत को छिपा कर मज़हब का एहतराम (सम्मान) किया । मौलाना की ग़न्दी हरकतें भी बढ़ने लगीं । अम्मी का बाहर जाना कम हो गया और साथ-साथ हमारा भी । अम्मी ने बाजी के साथ-साथ हमें भी पर्दा करने की ताकीद (उपदेश) की। ग़ैर मर्दों के सामने जाने की इजाज़त हमें नहीं थी, सिर्फ मौलाना साहब के पास हमें जाने की इजाज़त थी, क्योंकि वह अल्लाह के रहनूमा थे । लम्बी दाढ़ी, गन्दी शक्ल, मुंह से पान वाले थूक के साथ-साथ निकलता हुआ अल्लाह का कलाम और मासूम औरत की तरफ बढ़ते हुए गन्दे हाथ। अल्लाह का रहनूमा कभी भी ग़ैर मर्द नहीं होता ।
            कुर-आन शरीफ की आयत 33/6 में फर्माया कि रसूल की बीवियाँ मुसलमान मर्दों की माँ के बराबर हैं तो 55 साला मौलाना के लिए हम बेटियों के बराबर क्यों नही हो सकतीं ? सुना है इस्लाम में मुंहबोला रिश्ता जायज़ नहीं है और यह कुर-आन की आयत 33/4 से भी साबित होता है। अल्लाह का इन्साफ हर किसी के लिए एक सा है तो अल्लाह के कानून सिखाने वाले मौलाना किस हक की बुनियाद पर एक बच्ची लड़की की तरफ जिन्सी (यौनी) नज़र रखते हैं ?

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