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Tuesday, 3 June 2014

...नू ० की आत्मकथा ...... 2

   ..नू० की आत्मकथा ...... 2  ..क्रमशः  
                   किसी जवान औरत की ज़बान से अपने नहाने का या जनाबत (सम्भोगोपरान्त ) के गुसुल (नहाना) का तरीका बयान करना या अम्ली तौर (वास्तविकता) पर दिखाना क्या समाज में गंदे ख्यालात की बुनियाद डालना नहीं है ? जब आएशा की उम्र 18 साल की थी तो रसूल-ए-पाक का 63 साल की उम्र में निधन हुआ । इस तरह की हदीसों पर गंदे जिन्सी ख्यालात वाले मौलानाओं ने मज़हब को इस्तेमाल करके अपनी गंदी सोच पर कामयाबी हासिल करने का ज़रिया बना रखा है, जो उनका साहस बढ़ा देते हैं और कुछ घरों में बच्चों को भयानक जिन्सी खतरे से गुज़रना पड़ता है। औरत कभी बच्ची नहीं हो सकती, जब आदरणीय औरत से जिन्सी बयानात जायज़ है और उस पर अल्लाह रसूल का नाम देकर पाक साबित किया गया तो मौलानाओं का क्या कसूर ! वह तो अल्लाह के रहनुमा हैं । मैं विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि ये सब मनगढ़न्त किस्से जो रसूलेपाक या उनकी बीवियों के नाम से बयान किये गये हैं, इनमें कोई सच्चाई नहीं है ।
रसूले पाक ने छ:साला लड़की आएशा से निकाह किया था और इस निकाह को सच्चा साबित करने के लिए किताबुल हैज़ और किताबुल गुसुल में आएशा की ज़बान से तरह-तरह के जिन्सी (यौनिक) बयानात फर्माये गये । उदाहरणस्वरूप -
            बुखारी पार्ट 1 किताब सौम बॉब 1207 हदीस 1807
आएशा से रवायत (उल्लेख) है कि हज़रत मोहम्मद मेरा बोसा (चुम्बन) लेते और मुबाशरत (सम्भोग) करते और आप रोज़ादार होते, मगर बात यह है कि वह तुम सबसे ज्यादा अपनी ख्वाहिश पर अख्तियार (अधिकार) रखते थे।
            बुखारी पार्ट 1 किताब सौम बॉब 1208 हदीस 1808
आएशा से रवायत है - रसूल अपनी कुछ बीवियों का बोसा लेते और आप रोज़ेदार(उपवास) होते, फिर हँस दी ।
            बुखारी पार्ट 1 किताब सौम बॉब 1209 हदीस 1810
आएशा ने कहा कि रसूल अल्लाह को नहाने की हाजत (आवश्यकता) होती, एहतलाम (स्वप्नदोष) से नहीं बल्कि       जिमाअ (सम्भोग) से और सुबह हो जाती आप नहाते और रोज़ा रखते।
            बुखारी पार्ट 1 किताब गुसुल बॉब 176 हदीस 247
आएशा का एक रज़ाई भाई ( दूध पिलाने वाली माँ का बेटा) उनके पास गये और उनसे रसूल अल्लाह के जनाबत ( सम्भोग के बाद की हालत) के गुसुल का तरीका पुछा । आएशा ने पानी से भरा बर्तन मॅगवाया, फिर       उन्होंने गुसुल किया और अपने सिर पर पानी बहाया । आएशा और हमारे बीच सिर्फ एक पर्दा था ।
            बुखारी पार्ट 1 किताब गुसुल बॉब 182 हदीस 259
आएशा से रवायत है कि वह रसूल अल्लाह दोनों मिलकर जनाबत (सम्भोगोत्तर अवस्था) की हालत में एक बर्तन से नहाते ।

बुखारी पार्ट 1 किताब गुसुल बॉब 162 हदीस 227
आएशा से रवायत है कि वह रसूल अल्लाह के कपड़े पर से मणि (वीर्य) को धो डालती, फिर आप नमाज़ के लिए निकलते और पानी के धब्बे आपके कपड़े पर होते ।
            शादी के लिए इस्लाम में हर उम्र की औरत मर्दों के लिए जायज़ है तो क्यों नहीं औरत को यह इजाज़त दी जाती कि वे अपने से तीस, चालीस साला छोटे उम्र के मर्द से शादी कर सकें ? जब वह ऐसा करना चाहे, तब उससे कहा जाता है कि यह तुम्हारे बेटे के बराबर है । यह कानून मर्दों पर लागू क्यों नही होता ?
            हम बहिनों के लिए स्कूल की पढ़ाई की कोई अहमियत नहीं थी । हमारा समाज़ हम औरतों को ऊँची तालीम हासिल करने का सपना नहीं दिखातासिर्फ अरबी हरूफ (अक्षर) की पहचान और कुर-आन शरीफ की आयतों (पंक्तियाँ) को बग़ैर समझ कर रटना ही मुकद्दस (उत्तम) समझा जाता है। ख़ास करके औरतों के लिए दुनियाई तालीम से बढ़कर घर-गृहस्थी के कामकाज, मर्दों की ख़िदमत और बे-शुमार पाबन्दियाँ होती हैं, हमारी चाहत, हमारी ज़रूरत सब के लिए बे-मतलब की है, ज़रूरत या चाहत रखने की उम्मीद भी हम औरतों को नहीं दी गयी । जो हमें मिलता उसी में हमें गुज़ारा करने की तालीम बचपन से ही दी जाती है । हमारे सपने और चाहत भी धर्म के हाथों कैद हैं, हमें सपना देखने की भी इजाज़त नहीं, क्योंकि हमारी मुकद्दस किताब बुखारी और मुस्लिम में हमें मनहूस कहा गया है । हर औरत किसी भी मज़हब की क्यों न हो, इस कैद से आज़ाद नहीं है ।
            बुखारी पार्ट किताब जेहाद वलसिर बॉब 92 हदीस 123
सहल-बीन-साद सआदि से रवायत (उल्लेख) है- सुना रसूल अल्लाह से कि आप फर्माते थे तीन चीजों में नहुसत       (मनहूस) होती है, घर, घोड़े और औरत में ।
            मुस्लिम पार्ट 5 किताब सलाम बॉब बदफाल (दूराचारी) और नेक और नहुसत का बयान हदीस 34
अब्दुला-बीन उमर से रवायत है - कहा रसूल अल्लाह ने कि नहुसत तीन चीजों में होती है, घर में, घोड़े में और औरत में ।
            क्लास 4 में अव्वल आने के बाद जब स्कूल से मैं घर वापस आयी और सबको इस बात का पता चला तो अब्बु ने कहा कि "पढ़कर क्या होगा" मैंने सुना था कि हमारे  रसूल अल्लाह ने मुसलमानों को फर्माया " तालीम हासिल करने के लिए अगर चीन भी जाना पड़े तो जाओ " तो यह फर्मान क्या सिर्फ मर्दों के लिए था, और हम औरतें मनहूस होने की वजह से चीन नहीं जा सकतीं या पढ़ नहीं सकती ?
            इस बीच बाजी शायदा के महीने का दिन शुरू हो गया, उसके हर चलन पर पाबन्दी लग गई । कुर-आन शरीफ छू नहीं सकती, नमाज़ पढ़ नहीं सकती, दुपट्टा सिर से कंधे पर आ नहीं सकता, ये कौन सी बीमारी बाजी शायदा के ऊपर अल्लाहताला ने डाल दी,
 यह सोचकर मेरा छोटा सा ज़ेहन बहुत परेशान था। पुछने पर हमसे " कोई खास" बात छिपाई जाती, बाजी शायदा भी इस सवाल से शरमा कर मुंह घूमा लेती और मेरे दिमाग में सवालों की लहर आती-जाती कि यह कौन सी बीमारी है, जिससे औरत कुर-आन छू नहीं सकती, नमाज़ पढ़ नहीं सकती, क्या कुर-आन एक औरत के छूने से नापाक हो जाता है ? कुर-आन के साथ महीनों के दिनों का क्या ताल्लूक ? कुर-आन के सूर: बकर की आयत 222 में महीनों के दिनों में औरत को नापाक (अपवित्र) कहा गया, लेकिन ताज्जुब की बात है कि कुछ हदीसें बिल्कुल इसके विपरीत गवाही देती हैं ।
            बुखारी पार्ट 1 किताबुल हैज़ बॉब 204 हदीस 289
आएशा से रवायत है कि हैज़ (मासिक क्रिया) की हालत में मैं रसूल अल्लाह के सिर में कंघी कर दिया करती ।
            बुखारी पार्ट 1 किताबुल हैज़ बॉब 205 हदीस 291
आएशा से रवायत है कि हैज़ की हालत में रसूल अल्लाह उनकी गोद में तकिया लगाकर कुर-आन शरीफ़ तिलावत (पढ़ना) करते ।
            बुखारी पार्ट 1 किताबुल हैज़ बॉब 207 हदीस 294
आएशा से रवायत है कि जब उनका हैज़ ज़ोरों पर होता तो रसूल अल्लाह आज़ार (कपड़ा) बॉधने का हुक्म देते, फिर उनसे मुबाशरत (सम्भोग) करते ।
            बुखारी पार्ट 1 किताबुल हैज़ बॉब 209
हैज़ वाली औरत एक आयत पढ़े तो कोई बुराई नहीं है और इब्न-अब्बास ने कहा कि जुनुब (सम्भोग के बाद की अवस्था) अगर कुर-आन पढ़े तो कोई बुराई नहीं है । हुकुम-बीन अतीबा ने कहा कि मैं जनाबत (संभोग के बाद की अपवित्रता) की हालत में जानवर ज़बह करता हूँ ।
            मज़हब ने कुदरत को नापाक करार दिया। बाजी शायद अचानक जवान हो गयी । जिस सीने का दूध पी कर एक इन्सान बड़ा होता है, उस सीने को छिपाने के लिए कपड़े के ऊपर कपड़ा और उसके ऊपर एक और कपड़ा डालकर मर्दों से छिपाने की तालीम ज़ोर-शोर से उसे दी गयी। हम औरतों का जिस्म मर्दों को इतना प्यारा (आकर्षक) है कि हमारे हाथ-पैर भी नज़र नहीं आने चाहिए, जैसे कि मर्द एक बहसी ज़ानवर है, औरत का ज़िस्म का हिस्सा नज़र आने से ही वह उसपर टूट पड़ेगा। अम्मी के साथ बाहर जाते वक्त बाजी शायदा को भी मोज़ा, दास्ताना और बुर्का पहनने का हुक्म मिला । मुझे हैरानगी होती थी कि बाजी शायदा को ऐसा क्या हो गया कि उसके जिस्म को ढाकने का सिलसिला शुरू हो गया। हर दूसरे महीने अब्बु जमात (धार्मिक प्रचार हेतु) में चले जाते और उनकी ग़ैर मौजूदगी में भाईजान रेडियो का वैल्यूम थोड़ा बढ़ा दिया करते, उन्हें पता था कि मुझे रेडियो सुनना पसन्द  है, लेकिन सामने जाकर हमें गाना सुनने की इजाज़त नहीं थी ।
            अब्बु और भाईजान के आफिस जाने के बाद जब कभी मैं अम्मी के कहने पर भाईजान के कमरे की सफाई करने जाती तो वहाँ मुझे छोटे-छोटे सिगरेट के जले हुए टुकड़े मिलते थे । मेरा ज़ेहन उसके ज़ायके (स्वाद) और फायदे के बारे में सोचता, फिर एक दिन घर के कोने में जलता हुआ सिगरेट का टुकड़ा देखकर मुझे तजसूस (अन्वेषण) हुआ कि मैं भी सिगरेट फूँक कर देखूँ और जैसे ही मैंने जला हुआ टुकड़ा मुंह से लगाया, धुएं की असर से मुझे ज़ोर की खॉसी आ गयी और आँख से आँसू गिरने लगे । मुझे उसमें स्वाद तो लगा ही नहीं, ऊपर से तकलीफ के एहसास ने मुझे सोच में डाल दिया कि भाईजान को इसके पीने की क्या वजह है ? खॉसी की आवाज़ सुनते ही अम्मी कमरे में आ गयी और मेरे हाथ में जलता हुआ सिगरेट का टुकड़ा देखकर सामने पड़े हुए झाड़ू से मुझे बे-इन्तिहा पीटने लगी । मैं रोती रही और ज़ेहन में सवालों की लहर उठती रही कि जब सिगरेट पीना इतनी बुरी बात है तो अम्मी भाईजान को क्यों नहीं डॉटती या मारती, क्या वह पैसा कमाने में अब्बु की मदद करते हैं इसलिए या वह मर्द हैं इसलिए ?
          उनको सब कुछ जायज़ है! रोज़े के दिनों में भी भाईजान के कमरे से हमें सिगरेट का टुकड़ा मिलता था । शायद अब्बु को भाईजान की इस आदत का पता था, इसलिए भाईजान का कमरा बन्द होने पर अब्बु बग़ैर खटखटाए कुछ देर उनके कमरे के सामने खड़े रहकर चले जाते । घर में भाईजान की मनमानी दिन-पर-दिन बढ़ने लगी और इसकी वजह थी थोड़े-थोड़े दिनों बाद अब्बु का जमात (धार्मिक प्रचार) में चले जाना । अब्बु के जमात में चले जाने के बाद अम्मी अपने मायके वाले को घर में खाने व रहने के लिए बुलाती थी, खाला (मॉसी) के पास बैठकर अपने दिल का बोझ कम करती । उनके जाने के बाद फिर वही घर-गृहस्थी और मज़हब उन्हें अपना कैदी बना लेता था ।
            बाजी शायद धीरे-धीरे जवान होने लगी, खाना पकाना और घर-गृहस्थी के कामों में और भी माहिर हो गयी । बाजी शायदा की मदद की वजह से अम्मी को भी थोड़ी फुर्सत मिल जाती, कभी-कभी वो अपने बालों को कंघी करने के बाद उसको खूबसूरत तरीके से बॉधती तो मुझे बड़ा अच्छा लगता । बाजी शायदा की मदद ने अम्मी को अपने बारे में सोचने का मौका दिया।
            भाई परवेज़ ने जब दसवीं क्लास पास की तो अब्बु ने उन्हें तोहफे में साइकिल ला दी । परवेज़ भाई भी भाई रियाज़ की हर बात नकल किया करते, दो-चार बार फेल होने के बाद दसवीं पास होने पर जब उन्हें तोहफा मिला तो मुझे भी उम्मीद थी किसी तोहफे की, मगर मेरी उम्मीद यह भूल जाती थी कि मैं एक औरत हूँ ।
            हमारे घर की एक नौकरानी थी नूरी जो मुझ से एक या दो साल बड़ी थी, उसकी उम्र का अन्दाज़ा मुझे नहीं था । मैं सोचती थी कि ग़रीबों के उम्र की गिनती नहीं होती । घर के तमाम भारी कामों की ज़िम्मेदारी उस पर थी, काम के साथ-साथ भाई परवेज़ का बग़ैर मतलब के नूरी को अपने कमरे में बुलाना और किसी काम के बहाने उसे छूने की कोशिश करना, मुझे अपने मौलाना की याद दिलाती थी ।
            एक दिन अम्मी मुझे भाई परवेज़ और छोटी बहिन नूसरत को छोड़कर बाकी भाई-बहिनों के साथ ख़ाला के घर चली गयी । दोपहर के वक्त जब मैं खाना खाकर लेटी तो अचानक भाई परवेज़ के कमरे से मुझे शोर की आवाज़ सुनाई दी । मेरा तजस्सूस (जिज्ञासा) मुझे ढकेलते हुए भाई परवेज़ के कमरे तक ले गया । अन्दर से नूरी की इन्कार की आवाज़ ने मुझे दरवाज़ा खट-खटाने पर मजबूर कर दिया। दरवाज़ा खुलते ही नूरी रोते हुए भागकर नीचे आँगन में चली गयी। भाई परवेज़ मुझे गुस्से से घूरने लगे और मैं डर के वहाँ से हट गयी । जब मैंने नूरी से पुछा - क्या हुआ ? जवाब में नूरी के आँसू हम औरतों की कमज़ोरी की दास्तान सुनाते रहे। थोड़ी देर बाद भाई परवेज़ ने मुझे पास बुलाकर धमकी दी कि "अगर यह बात किसी को बतायी तो मारकर हाथ-पैर तोड़ दूँगा"। शाम को अम्मी आयी और मैंने सारी बात अम्मी को बता दी । अम्मी ने नूरी की माँ को बुला भेजा और उसके हाथ में कुछ रूपया देकर उसे निकाल दिया । उस वाकिया के बाद भाई परवेज़ ने मुझसे बातचीत बन्द कर दी और जब भी मौका मिलता तो उनकी गालियों का सिलसिला हमारी तहज़ीब को शर्मिन्दा करता और मेरा दिल मुझे ही कसूरवार समझने पर मजबूर कर देता । हर हाल में हमारे समाज में औरत ही कसूरवार ठहरायी जाती है। ताज्जूब की बात है कि भाई परवेज़ को किसी ने भी एक लब्ज़ नहीं कहा।
            बुखारी पार्ट 2 किताबुल मगाजी बॉब 531 हदीस 1474
            अब्दुला-बीन बरिदा से रवायत है कि रसूल अल्लाह ने अलि को ख़ालिद-बीन वलिद के पास भेजा कि लूट के माल का पाँचवा हिस्सा उनसे ले आये । मैं उन लोगों में था, जिसने अलि को बुरा समझा । उन्होंने वहाँ गुसुल किया एक लौंडी
( दासी) से सोहबत (यौन सम्भोग) करके । मैंने ख़ालिद से कहा - तुम देखते हो अलि ने क्या किया ? जब हम रसूल अल्लाह के पास वापस आये तो यह किस्सा बयान फर्माया । रसूल अल्लाह ने फर्माया - बारिदा क्या तुम अलि से दुश्मनी रखते हो - मैंने कहा- जी हाँ ! रसूल अल्लाह ने कहा - अलि से दुश्मनी मत रख । उनका खम्स (लूटे हुए माल में हिस्सेदारी) में इससे ज्यादा हिस्सा है ।
              मुता इमाम मालिक किताब रेहन बॉब 14 लौंडियों की औलाद हदीस 34/35
अब्दुला-बीन उमर से रवायत है कि उमर ने फर्माया - क्या हाल है लोगों का, जिमाअ (सम्भोग) करते हैं अपनी लौंडियों से फिर उनसे जुदा हो जाते हैं, इस ख्याल से कि लड़का पैदा हो तो हमारा न कहलाये । पहले तो सोहबत (सम्भोग) करते मज़े उड़ा लेते हैं, फिर बे-ताल्लुकी बयान करते हैं। अब से मेरे पास जो लौंडी आयेगी उसके मौला (मालीक) को इकरार होगा उससे जिमाअ करने का तो मैं इस लड़के को मौला से मिला दूँगा यानी उससे नसब (वारिस) साबित करूँगा( अगर वह कहा करे कि मैंने इन्ज़ाल (ब्रिाजपात) के वक्त अज़ल (मणि बाहर निकालना) कर लिया था यानी ज़कर (लिंग) को शर्मगाह (यौनांग) से बाहर निकाल कर मन्ज़िल (ब्रिाजपात) हुआ था तो मेरा लड़का कहाँ से आया ) तुमको अख्तियार है चाहे अज़ल करो या न करो ।
            इन हदीसों के माध्यम से यह पता चलता है कि लौंडी (कृत दासी) के साथ सोहबत (सम्भोग) करना जायज़ है और उनसे पैदा हुई औलादों से पीछा छुड़ाने का भी ज़िक्र किया गया है और इस बात पर एतराज़ भी किया गया ! क्या लूटना और शादी बग़ैर लूटी हुई औरत के साथ जिन्सी ताल्लुकात कायम करना इस्लामी तालीम है ? क्या अल्लाह ने मुसलमानों के लिए दूसरों को लूटना जायज़ फर्माया है ? किसी ने मुझ से कहा था कि यह सब जंग के दौरान हुआ करता था, क्या जंग के वक्त मुसलमान अपने ईमान और इन्सानियत से गिर कर अपना किरदार अदा करते हैं ? क्या जंग के दौरान औरत के जज्बात की मुसलमानों के सामने कोई अहमियत नहीं ? यही काम अगर दूसरे लोग मुसलमानों के साथ करें और उसे कानूनी तौर पर सही ठहराये तो मुसलमानों को कैसा लगेगा?
            मुसलमान होने के नाते इस बात को सोच-सोच कर मेरे रूंगटे खड़े हो जाते थे । नूरी की ग़रीबी ने उसे भाई परवेज़ का जुल्म बर्दाश्त करने पर मजबूर किया था । सुना था इस्लाम में शादी के बग़ैर जिस्मानी ताल्लुकात को ज़िना (अवैध सम्भोग ) कहा जाता है और ऐसा करने वाले लोगों को पत्थरों से मार डालने की सज़ा देने का हुक्म है । कुर-आन शरीफ़ सूर: निसा की आयत 3 और सूर: एहज़ाब की आयत 50 में कहा गया है " कहा गया है कि मर्दों के लिए कनिज़ें (कृतदासी) हलाल है । मेरे ख्याल से यह सिर्फ शादी के लिए हलाल है, क्योंकि उस जमाने में कृतदासियों से शादी करने की रस्म नहीं थी। इस आयत के ज़रिये गरीब, लाचार औरतों से मुसलमान मर्दों की बे-झिझक शादी करवाने की प्रचेष्टा की गई है ।" क्या लूटी हुई औरत के साथ बग़ैर शादी जिन्सी ताल्लुकात ज़िना नहीं है ?
            नमाज़ भी अदा करें, मुंह से हर वक्त अल्लाह का नाम भी लें और एक ग़रीब, मजबूर, लाचार औरत के साथ उसकी मर्ज़ी के खिलाफ जिन्सी ताल्लुकात कायम करने की कोशिश, ये सारे काम एक साथ करने वाले भाई परवेज़ के चाल-चलन से नहीं लगता था कि उनको अपने किये पर शर्मिन्दगी है और ताज्जुब की बात है कि अम्मी ने भी अपने बेटे की करतूतों को छिपाने की चाहत में एक औरत की मजबूरी को नहीं समझा और खुद की कमजोरी की वजह से भाई परवेज़ को भी कुछ न कह सकी । उन्होंने भी नूरी की माँ को रूपया देते वक्त अपने आँसूओं के सहारे अपनी कमज़ोरी की याद को ताज़ा किया । इस्लाम में अगर किसी औरत की इस्मतदरी (बलात्कार) हो तो औरत को ही चार गवाह लाने का कानून है, अगर चार गवाह न लाये तो उस औरत को ही कानूनी तौर पर बदचलन होने की सज़ा भुगतनी पड़ती है ।
             कुर-आन सूर: निसा आयत 15
 तुम्हारी औरतों में से जो बे-हायई का काम करें, उन पर  अपने लिये चार गवाह तलब करो, अगर वह गवाही       दें तो उन औरतों को घरों में कैद रखो, यहाँ तक कि मौत उनकी उमरे पूरी करे ।                                                        अल्लाह  के दरबार में सज़ा-जज़ा एक सा है, लेकिन बे-हया औरत के लिए चार गवाह और मर्दों की बे-हयाई पर कोई गवाह नहीं और क्या बे-हयाई औरत अकेले करेगी, क्या उसके बुरे काम में मर्द शिरकत (सम्मिलित) नहीं करता और मर्द के बग़ैर बे-हयाई कैसे मुमकिन है ? सवाल यह आता है जब किसी औरत की इस्मतदरी होती है तब क्या औरत चार आदमी को बुलाकर दिखायेगी कि मेरी इस्मतदरी हो रही है ? या इस्मतदरी करने वाला मर्द चार आदमियों को बुलाकर इस्मतदरी करेगा ? नूरी जैसी कितनी औरतों को आँसुओं के सहारे अपने ग़म को धोना पड़ता है, उसका कोई जवाब हमारे इस्लाम में नही हैं । शायद इसी डर से हम औरतों को खुला घूमने की इजाज़त नहीं है। बुर्का, पर्दा या कैद कोई भी चीज़ औरत की इज्ज़त को बचा नहीं सकती । औरत की इज्ज़त सिर्फ कानून के तहत ही हिफाज़त में रह सकती है और औरतों की आपस की इकाई और मज़बूती ही उन्हें हिफाज़त (सुरक्षा) दे सकती है।
            कुर-आन सूर: नूर आयत 2
ज़नाकार (अवैध सम्भोगकारी) मर्द और औरत में से हर एक को सौ कोड़े लगाओ, उन पर अल्लाह की शैरियत की हद (मुस्लिम कानूनी सीमा) जारी करते हुए तुम्हें हरगिज़ तरस न खाना चाहिए, अगर तुम अल्लाह और कयामत के दिन पर ईमान रखते हो । उनकी सज़ा के वक्त मोमिनों (मुसलमान) की एक जमात(दल) मौजूद होनी चाहिए ।
            कुर-आन की आयतों में बद-कार औरत और मर्द की सज़ा बराबर है, लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि बद-कार मर्द के लिए कोई गवाही की ज़रूरत नहीं होती । इस्मतदारी की गई औरत के लिए भी चार गवाही तलब की जाती है और इस्मतदारी करने वाले मर्द को आसानी से इस कानून के ज़रिए छुटकारा मिल जाता है । यह दोहरा पहलू है, जिस पर सिर्फ औरत ही कुर्बान होती है ।
            मैंने अपने लिए एक किताबी दुनिया बसाई थी । पाँचवीं क्लास से ही मैं भाई परवेज़ की किताबें पढ़ती थी, बाजी शायदा  की मदद से घर के कामकाज की ज़िम्मेदारी मुझ पर कम थी, वह मुझे कोई काम करने नहीं देती । अम्मी अगर कोई काम कहती तो बाजी शायदा इस काम को अपने ज़िम्मे लेकर मुझे पढ़ने के लिए भेज देती । उनकी मदद से मेरी किताबों की चाहत और मालूमात बढ़ने लगी । स्कूल की किताबों के अलावा अब्बु की आलमारी से मज़हबी किताबें भी निकालकर पढ़ती थी । बाजी शायदा की यह अदा मुझे बहुत पसन्द थी और महसूस करती थी बाजी शायदा की मजबूरी, जिसकी वजह से उनकी पढ़ाई ख़त्म हुई । स्कूल से रिज़ल्ट घर लेकर आने पर सबसे ज्यादा खुशी बाजी को होती और वह मेरी पसन्द का खाना पका कर मुझे खिलाती । पहले हम भाई-बहिन अलग-अलग कुर-आन शरीफ़ पढ़ते थे, लेकिन बाजी की शिकायत पर अम्मी ने हम बहिन-भाइयों को एक साथ बैठाना शुरू कर दिया । मौलाना अपने हरकतों से बाज़ आ गया । इस बीच हमारे घर में टेलिफोन आया । शुरू में घंटी की आवाज़ सुनते ही हम भाई-बहिन टेलिफोन उठाने भागते । मैं अगर पहले उठा लेती तो अम्मी की डाँट सुननी पड़ती कि भाई को क्यों नहीं उठाने दिया । टेलिफोन पर भी मर्दों की हुकुमत, घर की सारी चीज़ों पर सिर्फ मर्दों का अख्तियार होता है और इन चीज़ों के साथ-साथ औरतों के दिल पर भी मर्दों का अख्तियार है ।
            कुछ हदीसें ऐसी भी हैं -
            तर्मज़ी पार्ट 1 बॉब दूध पिलाने का बयान बॉब शौहर के हक के बयान में जो औरत पर है-

अब्बु हुरेरा से रवायत है कि रसूल अल्लाह ने फर्माया कि अगर मैं हुकुम करता किसी को किसी का सजदा (सिर झूकाना) करने का तो हुकुम करता औरत को कि वह अपने शौहर को सजदा करे । रवायत (उल्लेख) है तलब-इब्न अलि से कि फर्माया रसूल अल्लाह ने कि जिस वक्त बुलाये कोई आदमी अपनी बीबी को जिमाअ       (सम्भोग) के वास्ते तो फोरन हाज़िर हो, अगर वह तंदूर पर रोटी पकाती हो तो भी ।
क्रमशः .....

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