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Sunday, 1 June 2014

नूरीन की आत्मकथा

नूरीन की आत्मकथा .....धारावाहिक 

----- भोला 
                   =========भूमिका =====
                  भूमिका

            "नूरीन" एक काल्पनिक चरित्र है । टूकड़े-टूकड़े तजुरबों को समेट कर इसकी कल्पना की गयी है । हमारे समाज में धर्म के नाम पर या किसी भी कारण घूमा-फिराकर नारी का ही शोषण किया जाता है और यही वजह है  कि तजुर्बों को नारी का रूप दिया गया ।
            हजरत मोहम्मद की मृत्यु के बहुत साल बाद "हदीसें" लिखी गयी और ठीक इसी तरह हिन्दुओं के पुराण भी अलग-अलग लोगों के द्वारा लिखे गये हैं। आज वक्त आ गया है कि इन सारी किताबों के विषय पर चर्चा किया जाये ।
            नूरीन के ज़रिए मैं धर्म के पालनहार लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ और कब तक अपने आपको धर्म के पालनहार समझने वाले लोग धर्म के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनायेंगे ? धार्मिक किताबों को लोग समझकर नहीं पढ़ते और मेरे ख्याल से यही वजह है " धार्मिक अंधेपन की ।
            धार्मिक किताबों में सबसे ज्यादा कुर-आन शरीफ पढ़ा जाता है, लेकिन हमारे देश के लोग उसे अरबी ज़बान में पढ़ने को पूण्य समझते हैं और हमारे देश के कुछ लोग संस्कृत के मंत्रों को पढ़ने से पूण्य समझते हैं । ये दोनों ज़बानें हमारी देश की आम भाषा से कोषो दूर है। किसी धर्म को छोटा या बड़ा दिखाना मेरा मकसद नहीं है, मैं चाहता हूँ कि हमारा समाज कु-संस्कार से मुक्ति पाये ।
            सारे धर्म कु-संस्कार से प्रभावित हैं, मगर आश्चर्य की बात है कि हर सम्प्रदाय अपने आपको सच्चा और दूसरों को गलत समझता है और इसी बात ने मुझे नूरीन की कल्पना करने पर उत्साहित किया ।
            धार्मिक किताबों के अध्ययन् में मुझे बहुत सारी बातें ऐसी नज़र आयी जो सच्चाई से बहुत दूर है।
            सर्वशक्तिमान से मैं प्रार्थना करता हूँ कि हमारे देश के लोग मेरे उद्देश्य को अपने विवेक द्वारा विचार करें ।
            उपन्यास के आधार पर विचार करते हुए "नूरीन" की भाषा-शैली उर्दू की तरह रखी गयी है ।
                                                           
            प्रार्थना

            यह उपन्यास मैं उन लोगों को अर्पण करता हूँ जो धर्मीय कु-संस्कार के शिकार हैं । मैं ईश्वर/अल्लाह से प्रार्थना करता हूँ कि मानवजाति को कु-संस्कार से मुक्त करें और अपना स्वरूप दर्शन दे, नारीजाति को शक्ति प्रदान करें और मानवजाति का ह्मदय सुख-शान्ति और प्रेम से भर दे ।
            मैं भाषा का पंडित नहीं हूँ, भाषा में यदि कोई गलती हो तो मेरा हार्दिक निवेदन है कि मुझे माँफ कर दें।

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