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हाइफा मुक्ति - आनंद कुमार, पटना

हमारा इतिहास लिखने वाले लुगदी उपन्यासकारों ने चूँकि कई तथ्य पहले ही छुपा रखे हैं इसलिए भारतीय सेना के कारनामे को छुपाना भी आसान हो गया | पह...

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Thursday, 9 November 2017

हाइफा मुक्ति - आनंद कुमार, पटना

हमारा इतिहास लिखने वाले लुगदी उपन्यासकारों ने चूँकि कई तथ्य पहले ही छुपा रखे हैं इसलिए भारतीय सेना के कारनामे को छुपाना भी आसान हो गया | पहले विश्व युद्ध के दौरान कई भारतीय सिपाही भी लड़े थे और उनका इतिहास नागरिकों को कभी आजादी के बाद बताया ही नहीं गया | इसी वजह से लोगों को ये नहीं पता है कि इसराइली हैफा(Haifa) शहर को इस्लामिक ऑट्टोमन खलीफा के चंगुल से छुड़ाने वाले सैनिक भारतीय घुड़सवार थे |

फिफ्टीन्थ इम्पीरियल सर्विस कैवलरी ब्रिगेड के सैनिक 1918 में इसराइल के हैफा शहर को छुड़ाने के लिए लड़े थे | इनमें से कई वहीँ वीरगति को प्राप्त हुए और करीब 900 को वहीँ दफनाया गया है | सौ साल पहले हुई इस लड़ाई में 400 साल की इस्लामिक हुकूमत से हैफा को छुटकारा मिल गया, वो तुर्की हुक्मरानों से आजाद हुआ | हर साल 23 सितम्बर को भारत और इसराइल दोनों में हैफा दिवस मनाया जाता है | मुझे पता नहीं कि भारत में कितने लोगों ने कभी हैफा दिवस का नाम सुना होगा |

इसलिए हम वहां आ जाते हैं जो आपका सुना, आपके लिए जाना पहचाना है | आपने तीन मूर्ती भवन का नाम शायद सुना होगा | पहले प्रधानमंत्री नेहरु का आवास होने के कारण, और अब संग्रहालय और पुस्तकालय होने के कारण ये प्रसिद्ध है | वहां से गुजरती सड़क भी इसी नाम से जानी जाती है | सन 1924 में यहाँ उस तीन मूर्ती का अनावरण हुआ था, जिन तीन मूर्तियों के कारण इसका नाम पड़ा | ग़लतफ़हमी में कुछ लोग “तीन मूर्ती” कहने पर गाँधी जी के तीन बन्दर समझ लेते हैं |

पीतल की बनी ये तीन मूर्तियाँ हैदराबाद, जोधपुर और मैसूर रियासतों के घुड़सवार सैनिकों का प्रतीक हैं जो मिलकर पंद्रहवीं इम्पीरियल सर्विस कैवलरी ब्रिगेड के रूप में लादे थे | बाद में जब भारत आजाद हुआ तो ये 61वीं कैवलरी नाम से जाने जाने लगे | आज 61वीं कैवलरी दुनिया की इकलौती काम करती घुड़सवार सैन्य टुकड़ी है | जब 8 मार्च, 1924 को वाइसरॉय रीडिंग के समय इस प्रतिमा का अनावरण हुआ था तो इसकी सुरक्षा में 19 किंग जॉर्ज फिफ्थ ओन लैंसर्स तैनात था और गार्ड ऑफ़ ऑनर 2/13 फ्रंटियर फोर्सेज रायफल्स ने दी थी | ये दोनों बंटवारे में पाकिस्तान को दे दिए गए |

ये स्टाम्प की तस्वीर इन्टरनेट से जुटाई है, मेरे पास ये फिलहाल नहीं, क्योंकि कोई परिचित फिलहाल इसराइल में नहीं है | भारतीय डाक ने कभी इन घुड़सवार सैनिकों पर कोई डाक टिकट निकाले हों ऐसा याद नहीं आता | अगले साल भारतीय सैनिकों के इसराइल के हैफा में दर्ज करवाए इस कारनामे को सौ साल हो जायेंगे | सवाल ये है कि क्या भारत भी अपने सैनिकों को याद करेगा ?
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Monday, 6 November 2017

विशुद्ध माओवाद

अभी पुष्पा को कालेज आये चार ही दिन हुए थे कि उसकी मुलाक़ात एक क्रांतिकारी से हो गयी. लम्बी कद का एक सांवला सा लौंडा… ब्रांडेड जीन्स पर फटा हुआ कुरता पहने क्रान्ति की बोझ में इतना दबा था कि उसे दूर से देखने पर ही यकीन हो जाता था ..इसे नहाये मात्र सात दिन हुये हैं….. .बराबर उसके शरीर से क्रांति की गन्ध आती रहती थी… लाल गमछे के साथ झोला लटकाये सिगरेट फूंक कर क्रांति कर ही रहा था तब तक….पुष्पा ने कहा…”नमस्ते भैया….“हुंह ये संघी हिप्पोक्रेसी.” ..काहे का भइया और काहे का नमस्ते? ..हम इसी के खिलाफ तो लड़ रहे हैं… प्रगतिशीलता की लड़ाई… ये घीसे पीटे संस्कार… ये मानसिक गुलामी के सिवाय कुछ नहीं….. आज से सिर्फ लाल सलाम साथी कहना.पुष्पा ने सकुचाते हुए पूछा.. “आप क्या करते हैं .. क्रांतिकारी ने कहा..”हम क्रांति करते हैं…. जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ते हैं.. शोषितों वंचितों की आवाज उठाते हैं..क्या तुम मेरे साथ क्रांति करोगी? पुष्पा ने सर झुकाया और धीरे से कहा…. “नहीं मैं यहाँ पढ़ने आई हूँ… कितने अरमानों से मेरे किसान पिता ने मुझे यहाँ भेजा है.. पढ़ लिखकर कुछ बन जाऊं तो समाज सेवा मेरा भी सपना है…..”.क्रांतिकारी ने सिगरेट जलाई और बेतरतीब दाढ़ी को खुजाते हुए कहा… .यही बात मार्क्स सोचे होते… लेनिन और माओ सोचे होते…. कामरेड चे ग्वेरा….? बोलो?तुमने पाश की वो कविता पढ़ी है…“सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शान्ति से भर जाना”तुम ज़िंदा हो पुष्पा. मुर्दा मत बनों…. क्रांति को तुम्हारी जरूरत है…. लो ये सिगरेट पियो….”पुष्पा ने कहा…”सिगरेट से क्रांति कैसे होगी..?क्रांतिकारी ने कहा..”याद करो माओ और चे को वो सिगरेट पीते थे… और जब लड़का पी सकता है तो लड़की क्यों नहीं…. हम इसी की तो लड़ाई लड़ रहे हैं… यही तो साम्यवाद है.”और सुनो कल हमारे प्रखर नेता कामरेड फलाना आ रहे हैं…. हम उनका भाषण सुनेंगे.. और अपने आदिवासी साथियों के विद्रोह को मजबूत करेंगे… लाल सलाम. चे. माओ ....लेनिन..”पुष्पा ने कहा… “लेकिन ये तो सरासर अन्याय है… कामरेड फलाना के लड़के तो अमेरिका में पढ़ते हैं… वो एसी कमरे में बिसलेरी पीते हुए जल जंगल जमीन पर लेक्चर देते हैं… और वो चाहतें हैं कि कुछ लोग अपना सब कुछ छोड़कर माओवादी बन जाएँ और बन्दूक के बल पर दिल्ली पर अपना अधिकार कर लें… ये क्या पागलपन है.. उनके अपने लड़के क्यों नहीं लड़ते ये लड़ाई. हमें क्यों लड़ा रहे.? क्या यही क्रांति है”?क्रांतिकारी को गुस्सा आया… उसने कहा.. “तुम पागल हो.. जाहिल लड़की.. तुम्हें ये सब बिलकुल समझ नहीं आएगा… तुमने न अभी दास कैपिटल पढ़ा है न कम्युनिस्ट मैनूफेस्टो… न तुम अभी साम्यवाद को ठीक से जानती हो न पूंजीवाद को…”पुष्पा ने प्रतिवाद करते हुए कहा….”लेकिन इतना जरूर जानती हूँ कामरेड कि मार्क्सवाद शुद्ध विचार नहीं है.. इसमें मैन्यूफैक्चरिंग फॉल्ट है.यह हीगल के द्वन्दवाद, इंग्लैण्ड के पूँजीवाद और फ्रांस के समाजवाद का मिला जुला रायता है….. जो न ही भारतीय हित में है न भारतीय जन मानस से मैच करता है..क्रांतिकारी ने तीसरी सिगरेट जलाई… और हंसते हुए कहा… “ये बुर्जुआ हिप्पोक्रेसी.. तुम कुछ नहीं जानती… छोड़ो… तुम्हें अभी और पढ़ने की जरूरत है… कल आओ हम फैज़ को गाएंगे…. “बोल के लब आजाद हैं तेरे’पाश को गुनगुनाएंगे.. हम क्रांति करेंगे…. “आई विल फाइट कामरेड” “हम लड़ेंगे साथी.. उदास मौसम के खिलाफ”
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Saturday, 4 November 2017

सद्यः स्याह

मैंने देखा चाँद
कहाँ बताओ ?

अंधकार की गहरी खायी
भद्रजन की गहरी साजिश
लोक व्यवस्था पूरी अन्धी
राज्य व्यवस्था यों ही बहरी
फिर भी कहते युग बदला है
कहाँ बताओ ?

नंगे बदन जो दौड़ लगाये
रोगों से है जिसका रिश्ता
खाली पेट खड़ी मजबूरी
खोज रही हर दिन मजदूरी
युवकों का ये हाल चला है
या परिवर्तन का दौर चला है
कहाँ बताओ ?

बँटवारे में पायी आजादी
पहले बँटवारा फिर आज़ादी
पायी आजादी या बँटवारा
शेष घिरा है खंडित नारों में
फुटपाथों की कथा वही है
दीन हीन की व्यथा वही है
बँटवारे की इतने सालों में
किसका कितना भला हुआ है
कहाँ बताओ ?

गाँव पगडंडियाँ सुनी सुनी
शहर सड़कें भीड़ से बोझिल
बीच गाँव में रोये सियार
बीच शहर में खुले बार
कैसा सगुण गाँव शहर का
कहाँ बताओ ?
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Thursday, 2 November 2017

एकान्त

जो आनन्द
अकेले जीने में है
वो
भरी भीड़ में नहीं
जो खुशी खुद से
बतियाने में है
वो और कहीं नहीं

अपनी ही कहानियाँ
नहीं खत्म होती
औरों की बात क्या करें
अजनबी गलियों के मुसाफिरों से
हम कितनी बात करें

जो भी हो
खुद से खुद का
लिखना अच्छा लगता है
क्या इतना काफी नही
क्या फर्क पड़ता है
हमारी कोई पहचान
है या नही
थोड़ा ही आनन्द सही
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Monday, 30 October 2017

समीक्षा

दौड़ लगाते सोच
जिसकी प्रतिछवि
मन में उठते भाव की
वे तरंगें ही हैं जैसे
लड़ रही बाज़ से
एक स्याह भूरी चिड़िया
अपने रक्त की उजास में
जिसकी परछाई
एक उफनती नदी है

मैं दूरी से नहीं
देरी से डरता हूँ
जो घटित होना चाहता है
और सिर्फ स्मृति में नहीं
इस उधेड़बुन में कि
पहल कौन करेगा

जो सोच है
जो भाव है
मर जाते हैं
साहस की कमी से
कई बार तो मरते हैं
मौसम की उमस से
या अत्यधिक नमी से
जो शब्द, भाव, सोच
जो मरते नहीं ठंड या
ताप की प्रचंड दहक से
वे मर जाते हैं
मौसम की अतिवृष्टि से

अहर्निश लम्बी
बात सोच के बाद
हम लौटना चाहते हैं
अपने अपने खेलों में
जहाँ दिन में
किये जाने वाले
सभी काम
अपनी पूर्ण सूची के साथ
उजाले के सङ्ग टँगे हैं

जब कि
कच्चे सूत सा जीवन
खंजर सम्भाल तराशता
दूर बैठा वक़्त
पास बैठे ईश्वर से
मनुहार कर रहा होता
इस बार मेरे बीच में
मत आना
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Thursday, 26 October 2017

यात्रा - अकेला से एकांगी की

ये जीवन
और कुछ नहीं
वस्तुतः
अकेलेपन से
एकांत की ओर
एक ऐसी यात्रा है
जिसमें
रास्ता भी हम हैं
राही भी हम हैं
और मंज़िल भी
हम ही हैं

इस जीवन के सफर में
इसके गतियुक्त रिश्ते में
न जाने कितने लोग
हमसफर बन जाते हैं
पर मंज़िल पर पहुंचकर
एक बार ठहर जाता
यह जीवन भी
साथ ही काल भी
ठहर जाता है
अपनी ही गति से
स्तब्ध हो आँखें
खुली की खुली
रह जाती, फिर से
अकेले हो जाते हैं हम

एक छोटी सी
कश्ती में चल
पार उतरना है
धीरे-धीरे खेना
बस दरिया को
जगाना नहीं है

जीवन में वो यादें
जो अकेले में आती
वे यादें ही कहाँ ?
याद वो है जो
महफ़िल में आये और
अकेला कर जाये
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Sunday, 22 October 2017

हमारी एकता का संकट

आज बार-बार यह अवाज उठाया जाता है कि पिछड़ा - वंचित वर्ग की समस्या एक सामाजिक समस्या है और इसका समाधान राजनीतिक नहीं है। पर इतना भी सत्य है कि जब तक पिछड़ा वंचित वर्गों के हाथों में राजनीतिक सत्ता नहीं आती, उनकी समस्या का समाधान नहीं हो साकता है।
              तुर्कों, मुग़लों और अंग्रेज़ों के हाथ से निकलकर राजनीतिक सत्ता ऐसे लोगों के हाथ में गयी, जिनका हमारे सामाजिक जीवन में आर्थिक, सामाजिक एवं  भद्रलोक ( सभ्य) होने का प्रभुत्व रहा। इसप्रकार के स्वराज्य का स्वरूप उन्हीं भुतकाल के विगत अत्याचार और अन्याय की याद दिलाएगा। अतः यह आवश्यक  है कि इन्हें भी सभी के साथ साथ राजनीतिक सत्ता में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले। इसका यह क़तई अर्थ नहीं कि इनका नेतृत्व पूर्वाग्रह से ग्रसित व दूषित बना रहे।
         डा लोहिया की सामाजिक न्याय की यह गूँज, जिसकी प्रतिध्वनि उनके जीवनकाल में ही सुनायी पड़ने लगी थी। वह 70 के दशक के बाद भारत के राजनीतिक - सामाजिक परिवर्तन के रूप में उभर कर सामने आया।
           पर इसका अर्थ यह नहीं कि हम योग्यता, प्रवीणता, ज्ञान-विज्ञान, रोज़गार एवं उद्योग तथा संस्थागत विकास में आरक्षण की बात करें। योग्य, कुशल, प्रवीण एवं ज्ञानी को पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। हम ज्ञान - विज्ञान और रोज़गार के क्षेत्र में योग्य बनने का सभी को अवसर प्रदान करें। शिक्षा एवं स्वास्थ्य सभी को निःशुल्क प्राप्त होना चाहिए। इसका पर्याय आरक्षण व सामाजिक स्थिति नहीं हो सकता है। योग्यता व प्रवीणता का  रोज़गार, ज्ञान - विज्ञान के क्षेत्र में वंचित होना एक सामाजिक राष्ट्रीय महापाप की कृति होगी, बल्कि इससे निकली प्रतिक्रिया की प्रतिध्वनि समाज में कटुता और वैमनस्य को जन्म देगा।
       इसप्रकार बिखराव और अपनी ही कुंठाओं में घुटता समाज राष्ट्रीय एकता के लिए महाघातक सिद्ध होगा। जो आगे चलकर समाज राष्ट्र के सामने अनेक जटिल समस्याओं को खड़ा करने में सदा तत्पर और सक्षम रहेगा।
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जीवन का चलन

रिक्शेवाले को बुलाया
वो कुछ
लंगड़ाता हुआ आया
मैंने पूछा
पैर में चोट है
कैसे चलाओगे ?
वो कहता है
बाबू जी
रिक्शा पैर से नहीं
पेट से चलता है

उठाना खुद ही पड़ता है
थका हारा बदन अपना
जब तक साँस चलती है
कोई काँधा नहीं देता

पल पल सरकता जीवन
बंजर सी भावभूमि पर
जाने कितने
आस के
बीज
बो गया....

बड़े यत्न से संभाला था
एक क़तरा सपनों का
आँखें खुली
और
वह
खो गया....

निरंतर भागती राहों में
कितनी ही स्मृतियों को
बड़ी कुशलता से
समय
धीरे धीरे
धो गया....

ये ऐसा ही चलन है
कभी दर्द उभरा
तो कभी हिय में
चुपके से
वह
सो गया....

जीवन की अभिव्यक्ति जो
बरस कर मिट गया
पर विशिष्ट
जीवन की कहानी है
बादल
बिछड़ा जो आसमान से
तो धरा का
हो गया....!!

ज़िंदगी की
भागदौड़ व कशमकश में
अक्सर बामुश्किल
मिल तो जाती है
हमें ज़िंदगी
पर ज़िंदगी को हम
चाहकर भी
कभी कभी
मिल नही पाते

मूंगफली के ढेर से
सबसे ज्यादा
खांचो वाली मोटी
मूंगफली उठाते है
फोड़ने के बाद जब
पुच्ची निकलती है
तो कितना दुख होता है
यही होता है
जीवन के साथ
जो जीवन जीने की
और जीवित होने की
एक सरल अभिव्यक्ति है
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Friday, 20 October 2017

यादें

यादों का क्या है
किसी भी पल
ज़हन के द्वार
खटखटा देती हैं
न सोचती
समझती
विचारती
न ही संकोच करती हैं
बिन बुलाए मेहमां सी
देहलीज़ पर
पग धर देती हैं

बड़ी बिगड़ैल हो गयी हैं
ये यादें
देर रात को
टहलने निकलती हैं
यादें कुछ ऐसी हैं, जैसे
कहानी की नायिका
हर अंक में चली जाती है
अन्त को एकाकी छोड़कर
अपनी विवशताओं के साथ
जहाँ नायक
दुखान्त सहानुभूति को लिखता है
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Wednesday, 18 October 2017

तन्हा जीवन

दीवाली की खुशियाँ
तो एक पक्ष है
जीवन का होना
और चलना भी
एक पक्ष है
खुद को यादों से
परहेज कर के
खुद को खुद में
जीना होता है

जब बूंदे कुछ गिरी कि
ख्याल भी भीग गये
बड़ी भीड़ हो गयी है
जमाने की नजरों में
इसलिए आजकल
अकेले ही रहना ठीक है

बहुत सँजो कर रखी चीज
वक़्त पर नहीं मिलती
जीवन को कभी तो
खुला छोड़ दे जीने के लिए
बहने दें कुछ
जख्मों के दर्द को
जब लफ्जों का
जेहन भी घुटता हो
जो महसूस होता
वो बयाँ कर दें
जब लफ्जों की
कलाबाजी न होती
जीवन का जो
एहसास होता
तब वहीं लेखनी
उठ चल पड़ती है

पानी के बुलबुलों सा है
ये जीवन सतरंगी
पर बस पल भर ही
जो एहसास जीना होता
कभी कभी वे ही
उकेरे जाते हैं
आईना लेकर
जो भी आये
बस उनका
जमीर देखेगें
सब हैं तन्हा
सभी में खालीपन
तो किस किस की
फिर पीर देखेगें

जहन में एक नाराजगी भी
पर खफा किसी से नहीं
दूर होते जाता है जो
यादों में ठहर जाता है
गुजरते जीवन में थमा हुआ
कोई क्षण जीना भी सिखाता
बहुत पसंद है महँगे तोहफे
पर अगली बार कुछ यों
जरा सा वक़्त कोई लाये

एक होकर भी
सबका बने रहना
बहुत मुश्किल है
चाँद होना
ऐ चाँद
तू भी तन्हा
खुद भी तन्हा
आ जरा गप कर लें
ईधर जीवन ठहरा हुआ है
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Saturday, 14 October 2017

भारतीय नवजागरण - राष्ट्रीय चेतना का प्रवाह

प्रत्येक समाज, क्षेत्र की अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियाँ होती है। परिस्थितियाँ-घटनायें और जन सामान्य की चितवृति की पारस्परिक टकराहट से समाज में आधारभूत बदलाव आते रहते हैं। जब देश पर बाह्य, यवन-तुर्क आक्रमण हुए तब इन आक्रमणों से जन सामान्य एवं समाज की सांस्कृतिक पहचान धुँधलाने लगा। उस काल खण्ड में स्पष्ट रूप से सामाजिक चेतना की वृत्ति में ईश्वर का कहीं न कहीं स्थान किसी न किसी रूप में जैन सामान्य में व्याप्त रहा। जिसे भारतीय साहित्य में भक्तिकाल के नाम से जाना गया। इस सांस्कृतिक पहचान को भक्तिकालीन कवियों ने ज्ञानमार्ग, प्रेममार्ग और भक्ति पूरक साहित्य के माध्यम से व्यक्त किया। जो जन सामान्य की चितवृति और तत्कालीन परिवेश की टकराहट का यह सहज स्वाभाविक परिणाम था।

समाज में वैज्ञानिक तकनिकी और विकास तथा शिक्षा के फलस्वरूप अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं एवं व्यवहारों की विवेक सम्मत मूल्याँकन की शुरुआत की। आज का भारतीय नवजागरण सामाजिक-राजनैतिक खायी के वैचारिक पुनर्मूल्यांकन का वैचारिक साक्ष्य है। यह सत्य है कि एक ओर सम्पन्न, सक्षम सामाजिक-राजनैतिक वर्ग सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक तीनों मोर्चों पर लड़ने के लिए समाज में झूठी विषमता, अस्पृश्यता, पिछड़ापन का खोखला, क्षद्म नारा देकर समाज और राष्ट्र को तोड़ने, विभाजित करने का कुत्सित प्रयास कर अपनी स्वार्थ सिद्धि कर रहा है। वहीं दूसरी ओर पीड़ित जन अपनी पहचान और अधिकार के लिए मानवीय मूल्यों को पुनः परिभाषित करने का कार्य कर रहा है।

महात्मा ज्योति फूले और बाबा साहब अम्बेडकर इन पीड़ित जनों का सफल नेतृत्व प्रदान किया।उन्होंने महसूस किया कि हम अपनी सांस्कृतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना को अक्षुण रखते हुए अपनी पहचान को प्राप्त करने का  सफल संघर्ष कर सकते हैं। इसलिए अपनी पहचान की लड़ाई लड़ते हुए भी भारतीय मानस व जन मानस से कभी भी विलग नहीं हुए। उन्होंने पीड़ित समाज में एक नयी ऊर्जा भारी। जो राष्ट्रीय पहचान के साथ व्यक्ति की पहचान और अधिकार को स्पष्ट दिशा दिया। भारतीय नवजागरण के सकारात्मक परिणामों एवं स्वतंत्रता पश्चात संवैधानिक तथा विधि-व्यवस्थाओं के चलते आज मानवीय-समानता, सामाजिक-समन्वय तथा सामाजिक-न्याय , राष्ट्रीय-एकता और राष्ट्रीय जनभाव की अक्षुणता की अनुगूँज सर्वत्र चहुँ दिश सुनाई देने लगी है। " एक राष्ट्र - एक जन - एक मूल्य " यह विचार फैल रहा है। जिसे महात्मा फूले व बाबा साहब अम्बेडकर ने अपनी कृति से सदा सर्वथा चरितार्थ किया। इसी के साथ सामाजिक परिस्थितियाँ भी बदल रही हैं। समता, स्वतंत्रता,बंधुत्व और न्याय जैसी मानवीय मूल्यों का बोध समाज के अंदर एक क्रांति के रूप में, वर्तमान के युगधर्म के रूप में दिखायी पड़ रहा है। फलस्वरूप राष्ट्र - समाज - व्यक्ति के जीवन में एक क्रांतिकारी परिवर्तन की धारा चल पड़ी है।
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