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Tuesday, 16 May 2017

अरब का इतिहास : अभिजीत

अरब का इतिहास : अभिजीत
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अभिजीत

एशिया महादेश के दक्षिण-पश्चिम में बसे जमीन के एक बड़े टुकड़े को हम अरब प्रायद्वीप नाम से जानतें हैं. अरब नाम की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई मान्यतायें हैं. एक मान्यता कहती है कि सीरिया की प्राचीन भाषा के एक शब्द 'अरबत' से यह नाम निःसृत है.'अरबत' शब्द का मतलब होता था मरुभूमि. अरबी भाषा में यही शब्द'रबबत'नाम से नाम आता है जिसका अर्थ है बलुआ भूमि. कुछ मान्यतायें ये भी कहतीं हैं कि संस्कृत के शब्द 'अर्व' से अपभ्रंश होकर यह शब्द बना है. एक मान्यता कहती है कि इसे ब्रह्मा पुत्र भृगु के दूसरे पुत्र महर्षि च्यवन के पुत्र और्व मुनि ने बसाया था, जिनके नाम पर इसका नाम पड़ा. महाभारत के आदि-पर्व में और्व मुनि का कुछ आख्यान मिलता है. यह भूमि भी हिन्द की तरह तीन तरफ से समंदर से घिरा है. पश्चिम की ओर लाल सागर है, जिसके उस तरफ मिस्र और सूडान बसे हुए हैं, पूरब की ओर से इसे फारस और अम्मान की खाड़ी ने घेर रखा है. इसके पूर्वी किनारे पर संयुक्त अरब अमीरात बसा है. फारस की खाड़ी के उस तरफ ईरान हैं जहाँ से अफगानिस्तान के रास्ते भारतीय उपमहाद्वीप का सड़क मार्ग मिलता है. दक्षिण की ओर से हिन्द महासागर, यमन और ओमान ने इसे घेरा हुआ है, इसके उत्तर में ईराक और जॉर्डन की सीमा लगती है तथा उधर के काफी हिस्से को रेगिस्तान ने घेरा हुआ है. इजरायल और फिलीस्तीन इसके उत्तर में अवस्थित हैं. तीन ओर से समुद्रों से घिरे होने के कारण इसे जजीरातुल-अरब कहतें हैं. यह विश्व का सबसे बड़ा प्रायद्वीप है जिसकी कुल लंबाई लगभग डेढ़ हज़ार मील और चौड़ाई तेरह सौ मील है. पूरे अरब में नदी कहीं भी नहीं है, कई जगह छोटे-छोटे नाले हैं, जिनमें बरसात का पानी बहता है. कर्क रेखा अरब से होकर गुजरती है. यह पूरा भूभाग लगभग रेगिस्तानी है, सिर्फ तायफ़ जैसे एकाध जगहों पर कुछ खेती हुआ करती है, दक्षिण अरब में कुछ नखलिस्तान मिलतें हैं. यमन की तरफ कहीं-कहीं गेहूँ की खेती होती है और जौ ऊपजाया जाता है. फल और सब्जियों के लिये पूरा अरब तायफ़ और लैय्या पर निर्भर है. केवल खजूर है जो पूरे अरब में होती है इसलिये खजूर को अरब की पहचान मानी जाती है, वहां के झंडे पर भी खजूर को स्थान दिया गया है. दुनिया में सबसे अधिक अलग-अलग किस्म की खजूरें अरब में पैदा होती हैं. वहां का भौगोलिक विभाजन अरब को आठ हिस्सों में तकसीम करता है. हिजाज, यमन, हज़रमूत, महरा, बहरीन, नज्द, अहकाफ और अम्मान. अल-हिजाज अरब के पश्चिमी हिस्से में बसा है. मक्का, मदीना, तायफ़, खैबर, उहद, हुनैन, ग़दीरे-ख़ुम और तबूक जैसे इस्लामिक महत्त्व के कई शहर इसी हिस्से में बसे हैं. तायफ की आबोहवा बाकी अरब की तुलना में काफी पसंदीदा मानी जाती है. यहाँ मेवे खूब मिलतें हैं, अरब में इसे जमीन पर स्वर्ग कहा जाता है. हिजाज की सीमायें लाल सागर से छूती हैं. जेद्दाह बंदरगाह भी अरब के इसी हिस्से में है. अरब की प्राचीन जातियों और उनके नगरों के अवशेष इसी हिस्से में मिलतें हैं. कुछ लोगों का ये भी मत है कि दरअसल अरब का मूल नाम हिजाज ही है. अल्ताफ-हुसैन हाली की रचनाओं में ये दिखता भी है, जब वो इस्लाम को दीने-हिजाजी कहते हुए लिखतें हैं, वो दीने-हिजाजी का बेबाक बेड़ा......हिजाज से पूरब की ओर का हिस्सा नज्द कहलाता है जहाँ से इस्लाम का बहाबी मत आरम्भ हुआ था. नज्द का मतलब है ऊँचाई वाली जमीन. करीब 12 लाख वर्गमील में फैले अरब भूमि का लगभग सारा हिस्सा शुष्क पठार और रेगिस्तानी इलाकों से भरा हुआ है. 5 लाख वर्गमील भूमि लगभग मानव-शून्य है. मिट्टी की संरचना के आधार पर अरब भूमि को तीन भागों में तक्सीम किया गया है. उत्तरी अरब सफ़ेद रेत से आच्छादित है, जो नुफूद कहलाता है फिर नूफूद से लेकर सूदूर दक्षिण तक का भाग अल-दहना, अल-धना या अल-रब्बुल-खाली नाम से मशहूर है. ये पूरा क्षेत्र लाल रेत से पटा है जो लगभग ढ़ाई लाख वर्गमील में विस्तारित है. तीसरा हिस्सा भूरे और शुष्क पठारों का इलाका है जिसे अल-हरा कहा जाता है. पूरे अरब में वर्ष भर गर्म हवायें चलतीं रहतीं हैं, ये हवायें लू की शक्ल में होतीं हैं. अरब के कई इलाकों में तो ऐसी लू चलती हैं जिसका एक थपेड़ा भी किसी की जान ले सकता है. अरब इन मौत देने वाली हवाओं को बादे-समूम या जुहैरिया हवा कहतें हैं. हिजाज के इलाके में तीन-तीन, चार-चार साल तक पानी नहीं बरसता. तहामा के इलाके में जब लू के थपेरे चलतें हैं तब ऊंट अपने चारों पैरों को जोड़ कर उसके अंदर अपने मालिक को छुपा लेता है. हिजाज के जुनूबी हिस्से में तहामा का इलाका है. उस इलाके में लगभग हर समय रेतीली आंधी चलती रहती है, इसलिये आतंकी इन इलाकों में अपने ट्रेनिंग कैम्प चलातें हैं ताकि दूसरे देश की निगाहों से बचे रह सके.
अरब में इंसान दो रूपों में आबाद रहे. एक वर्ग बद्दू या देहाती था जो मुख्यतया खेती और पशुपालन से अपनी जीविका चलाता था और दूसरा वर्ग व्यापारी और संभ्रांत था जिसके व्यापारिक रिश्ते दुनिया भर में थे. जिनके अंदर राजनैतिक चेतना थी. ऐसा नहीं है कि अरब के अंदर का यह इंसानी विभाजन इस्लाम के आने के बाद खत्म हो गया. बद्दू अरब आज भी वहां पाये जातें हैं. बद्दू अस्थिर जीवन जीने के आदी थे, आज यहाँ तो कल वहां. उत्तरी अरब में बद्दू अधिक थे और दक्षिण अरब में शहरी. अरब के दोनों श्रेणियों के लोगों में कई बात कॉमन थी और वो ये कि ये लोग अपने वंश, रक्त और कबीले को लेकर बड़े अभिमानी थे. उनके नाम इसकी पुष्टि करते हैं, किसी अरब से उसका नाम पूछिए तो अपने पीछे के कई पूर्वजों का नाम वो झटके में बता देता था. जैसे अली बिन अबू तालिब बिन अब्दुल मुतल्लिब बिन हाशिम बिन अब्दे-मुनाफ. उनके अंदर अपने अतीत गौरव को पहचानने का बोध इतना था कि वो मानते थे कि उनके सिवा दुनिया में और कोई नहीं है जिसके पास अपने पूर्वजों को लेकर ऐसी शानदार जानकारी और गौरव-बोध हो. अरब के इन दोनों श्रेणियों के लोगों में एक बात और कॉमन थी वो थी न हम किसी को अपने अधीन करेंगे और न किसी के अधीन रखेंगे. इसलिये इस्लाम पूर्व अरब में जो जंगे होतीं थी उसका आधार सिर्फ और सिर्फ वंश-गौरव को ऊँचा रखना था. यानि वो लूटेरे नहीं थी, जंग को जीविकोपार्जन और साम्राज्य-विस्तार का साधन नहीं मानते थे.

"हदीसें कहतीं हैं कि इस्लाम पूर्व अरब में 1700 से अधिक युद्ध लडे गये पर इनमें एक भी पानी के लिये नहीं था, ये हैरतनाक इसलिये है क्योंकि पानी रेगिस्तान के लिये अमूल्य संपदा मानी जाती है".

तीसरी बात कॉमन थी कि ये सब ऊंट के ऊपर सबसे ज्यादा निर्भर थे. चाहे वो बद्दू हो या शहरी अरब, हरेक खुद को अहल-अल-जमल यानि ऊँटों वाले कहलाना पसंद करता था. आर्थिक सम्पन्नता का आधार ऊंट ही थे. ऊँटों के अलग-अलग नस्लों के गुणों, कमियों और विशेषताओं पर हर अरब महारत रखता था. ऊँट इनके लिये सबसे मुफीद जानवर इसलिये भी था क्योंकि अरब को सबसे अधिक लाभ इनसे ही पहुँचता था. ये ऊंटनी का दूध पीते थे, उससे सवारी का काम लेते थे, उसका मांस खाते थे, उसके खाल से कपड़े और तम्बू बनाते थे, उसकी मेगनी को ईंधन रूप में इस्तेमाल करते थे, उसके मूत्र का प्रयोग दवा के रूप में करते थे और कई बार पानी का अभाव होने पर उसे मारकर उसके अंदर का पानी इस्तेमाल करते थे. दूसरे पशुओं में इनकी निर्भरता घोड़े पर थी, घोड़ों से इनकी मुहब्बत इतनी थी कि पानी की अनुपलब्धता की स्थिति में ये खुद प्यासे रखकर भी अपने घोड़ों को पानी पिला देते थे.

अरबों के संबंध में दो बात हैरान करने वाली है कि प्राचीन काल में अरबी सम्पूर्ण प्रायद्वीप की भाषा नहीं थी, बल्कि अरबी केवल वहां के बद्दू बोलते थे जो अरब के उत्तरी भाग में आबाद थे, दक्षिण अरब की भाषा हिमारती थी जो अब लुप्तप्राय है. दूसरी हैरान करने वाली बात ये है कि उन अरबों में से कोई भी खुद को आदम का वंशज नहीं मानता था. ये अवधारणा वहां बाद में इस्लाम ने डाली. इस्लामी तारीख लिखने वाले अरब के इतिहास को हजरत इब्राहीम और उनके बड़े बेटे इस्माइल से आरम्भ करते हैं, जबकि अरब की तारीख कहीं दूर से आरंभ होती है. अरब में कुछ मूल निवासी आबाद थे तो कई बार बाहर से आकर भी वहां लोग आबाद होते रहे. वैसे तारीख में अरबों की तीन किस्में मानी जाती है. एक अरब कहलातें हैं, अलअरब-उल-बायदा, दूसरें हैं अलअरब-उल-आरेबा और तीसरें हैं अल-अरब-उल-मुस्तारबा. अरब लोगों की तीन श्रेणियों में विभाजन का एक बड़ा आधार अरबी भाषा भी है. अरबी भाषा के बारे में एक बड़ी गलतफहमी है कि ये केवल मुसलमानों की भाषा है जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है. इस्लाम के साथ इसका संबध मात्र इतना ही है कि कुरान जिस भाषा में उतरा था वो अरबी थी. अरबी संसार की प्राचीनतम भाषाओँ में एक मानी जाती है. सेमेटिक मजहब की भाषाओँ में यह हिब्रू के समकक्ष है. भविष्य पुराण की माने तो नोहा (नूह) के जमाने में भगवान बिष्णु ने भाषा को सहज करने की दृष्टि से एक मलेच्छ भाषा को जन्म दिया था और उसे नोहा (नूह) को सिखाया था, इस भाषा को हिब्रू कहा गया जो दायें से बाईं ओर लिखी जाती है. 'ही' मतलब हरि और ब्रू मतलब बोला गया यानि जो भाषा हरि के द्वारा बोली गई वो हिब्रू कहलाई.

इस्लाम के अहमदिया फिरके के संस्थापक की मान्यता थी कि अरबी भाषा सामी परिवार की दूसरी भाषाओं यथा इब्रानी, आरामी, सबाई, आशूरी, फिनीकी आदि भाषाओँ की जननी है पर उनके दावों को भाषा-विज्ञानियों की सहमति नहीं मिली. भाषा-वैज्ञानिकों के अनुसार अरबी इन भाषाओँ की माँ नहीं बल्कि बहनें हैं क्योंकि अरबी भाषा के बहुत से शब्द तथा व्याकरण के नियम अन्य सामी भाषाओँ से साम्यता रखतें है. कुछ मान्यता ये भी है कि अरबी संस्कृत से जन्मी है. इसके प्रमाण में अरबी के कई शब्द गिनाये जाते हैं जो मूल संस्कृत से निकले हैं. अरबी का संदल शब्द संस्कृत के चन्दन से, तनबूल शब्द ताम्बूल से, करनफल शब्द कर्णफूल से, कर्फास शब्द कर्पास से, नर्जिल शब्द नारिकेल से जन्मे है. कुरान में भी कई शब्द हैं जो संस्कृत से निकले हैं, जैसे कुरआन की सूरह अद-दहर् की 17वीं आयत में आता है- ‘व युस्क़ौ न फ़ीहा कअसन का न मिज़ाजुहा जंजबीला’ अर्थात् और वहां उनको ऐसा जाम पिलाया जायेगा जिसमें सोंठ की मिलावट होगी. इस आयत में अदरक के लिये प्रयुक्त अरबी शब्द है ‘जजंबील’ जिसकी उत्पत्ति संस्कृत शब्द श्रृंगवेर् से हुई है. इसी तरह कुरान की एक आयत में आता है, इन्नल अब्रा र लफ़ी नई म अ़लल अराइकि यन्जु़रुन तअरिफु फ़ी वुजूहिहिम ऩज्रतन्नईम युस्कौ़ न मिर्रहीकि़म मख़्तूम खि़तामुहू मिस्क यानि ‘और उन्हें खालिस शराब पिलाई जा रही होगी जो मुहरबंद होगी, मुहर उसकी मुश्क की होगी, बढ़-चढ़ कर अभिलाषा करने वालों को इसकी अभिलाषा करनी चाहिये.' कस्तूरी को संस्कृत में ‘मुश्क’ कहा जाता है और इसी का अरबीकृत रुप मिस्क है जो जन्नत की नेअमत के रुप में इस आयत में बयान हुआ है. संस्कृत के और शब्द भी कुरान में मिलतें हैं, जैसे, पवित्र कुरआन की एक आयत में आता है- ‘इन्नल अब्रा र यश्रबू न मिन कअसिन कान मिज़ाजुहा काफ़ूरा ।’ ‘बेशक नेक लोग ऐसे जाम से पियेंगें जिसमें काफूर की मिलावट होगी।’ (सूरह अद्-दहर, आयत-5) उपरोक्त आयत में प्रयुक्त ‘काफूर’ शब्द मूल संस्कृत शब्द ‘कर्पूर’ का ही अरबीकृत रुप हैं.

अरब को जो लोग भी झटके में जाहिल कह देतें हैं उन्हें मालूम ही नहीं है कि इस्लाम पूर्व अरब के लोग साहित्य की दृष्टि से कितने ऊँचे थे. अपने भाषा पर उन्हें इतना गुरूर था कि अपने आगे वो शेष विश्व को मूक और गूंगा कहते थे. मक्का में उकाज नाम के जगह पर अरब के तमाम कवि और साहित्यकार इकट्ठे होते थे, उनके बीच काव्य और शेरो-शायरी की प्रतियोगितायें होतीं थी और विजेता के काव्य को मृग-छाले या स्वर्ण-पत्र पर अंकित कर काबे की दीवार में लगाया जाता था. जो उस काव्य-प्रतियोगिता में विजयी होता था उसे उसके कबीले वाले सर-आँखों पर बिठा लेते थे, महिलायें उनकी बलायें लेतीं थीं. ये भाषाविद युद्ध के लिए शौर्य गीत लिखते थे तो ईश्वर की आराधना के पद भी उनके कलम से निकलते थे.
कुरान अरबी भाषा में है महज इसलिये अरबी भाषा से हमारा ताअल्लुक नहीं ऐसी सोच गलत है. इस्लाम पूर्व के कवियों की रचनाओं में महादेव, वेद और भारत भूमि की स्तुति के पद मिलतें हैं. प्राचीन अरबी काव्य-ग्रन्थ सेररूल-ओकुल में अंदर ऐसे कई पद मिलतें हैं. इसी काव्य-संग्रह में अरबी कवि लबी-बिन-ए-अरबतब-बिन-तुर्फा की लिखी महादेव स्तुति मिलती है. दिल्ली के बिरला मंदिर की यज्ञशाला में वो आज भी प्रस्तर पर लिखा हुआ मिलेगा. लबी बिन ए अख़्तब बिन ए तुर्फ़ा की भगवान शिव के लिये लिखी गई स्तुति गूगल पर सहजता से उपलब्ध है. इसी काव्य-संग्रह में उमर-बिन-हशशाम की लिखी कविता भी मौजूद है जो मुहम्मद साहब के समकालीन थे. उमर-बिन-हशशाम अरब के प्राचीन धर्म को बचाने की जंग में बलिदान हुए. इस काव्य-संग्रह में जिन दूसरे कवियों और शायरों की रचनाएं हैं उनके नाम हैं, इम्र-उल-क़ैस, जुहैर, अंतरा, अलकमा, तरफ़ह, लबीद, अम्र-बिन-कुलसूम, अंतरह, नाबिग़्हा, हिम्माद उल राबिया, हारिस बिन हिलिज्ज़ा आदि. इस्लाम के आगमन के पूर्व अरबी भाषा में कई पुराणों का अनुवाद भी हुआ था. अरबी में अनुदित अति-प्राचीन भागवत पुराण का मिलना इसकी पुष्टि करता है. इसका अर्थ ये है कि अरबी लोग अनुवाद की कला में भी महारत रखते थे. अरब में ये खासियत थी कि वहां हर उम्र के लोग शायरी करते थे. काव्य में कसीदाकारी, वीर-रस की कवितायें, ताने देतीं हुई रचनाएं, तुकबंदी करती शायरी ये सब उनकी विशेषतायें थीं. अरब सबसे अधिक सम्मान अपने कवियों और शायरों का करते थे, उनका सम्मान इतना अधिक था कि वो अपने कबीले के लिये परामर्शदाता, मार्गदर्शक, अभिभावक और प्रतिनिधि माने जाते थे.
अरबी की भाषाई श्रेष्ठता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि कुरान कई स्थानों पर अरब वालों को भाषाई शास्त्रार्थ की चुनौती देता दिखता है. अकेला भाषा ही वो आधार है जो इस्लाम पूर्व अरब को जाहिल कहने की सारी गुंजाईशें खत्म कर देता है. अल-दावी का काव्य-संग्रह अल-मुफ़द्दलिआत' 120 मधुर गीतों का संकलन है, अल-दावी की कई रचनाएं काबा की दीवारों पर सुशोभित थीं. किताबुल-अगानी नाम के काव्य-संग्रह में अरब की गौरवशाली वंश परम्परा का वर्णन मिलता है. वहां के अन्य बड़े कवियों में एक नाम अंतरा इब्ने-शद्दार अल अबू का भी है जो शौर्य-गीत रचा करते थे. अरब के ऊपर एक आरोप महिला-विरोधी होने का भी है. जबकि उस समय के बड़े कवियों में कुछ महिलायें भी थीं जिनमें सबसे बड़ा नाम कीर्ति खनसा का है, उसके भाई की निर्मम हत्या कर दी गई थी जिसके बाद उसने अपने दर्द को काव्य रूप में लिखा था. काव्य की मर्सिया विधा ने अरब भूमि से जन्म लिया था. अरब के बारे में एक गलत धारणा डाली गई है कि ये सारे लोग इब्राहीम के बेटे इस्माईल के वंशज हैं. ये अवधारणा सही नहीं है. अरबों का वजूद इस धरती में हजरत नूह (नोहा) से भी काफी पहले का है पर कुछ लोगों के अनुसार अरब में जो आबादी सबसे पहले बसी थी वो नूह के बेटे हाम की औलादों में थी तो दूसरी मान्यता मूल अरबों को नूह के दूसरे बेटे साम की औलाद मानती है.

अरबों की तीन किस्मों में जिन बायदा अरबों का जिक्र पहले किया था ये वो लोग थे जो मूल (original) अरब थे. इनका इतिहास सबसे प्राचीन है और ये अरबी भाषा के जनक माने जातें हैं पर ये वो लोग थे जो आंधी-तूफ़ान, बाढ़, महामारी वगैरह के चलते नष्ट हो गये. इन अरबों में अब कोई भी बाकी नहीं बचा है. इन अरबों से जुड़ी निशानियाँ यशरिब (मदीना) से खैबर और मद्यन के रास्ते में तथा यमन वगैरह में आज भी पाई जाती हैं. बायदा अरबों में पहला नाम आता है आद जाति का. ये जाति लगभग 2500-3000 ईसा पूर्व नष्ट हुई थी और यमन के पास हजरमौत नाम की जगह पर और कुछ ओमान के पास आबाद थी. ये लोग बड़े शक्तिशाली हुआ करते थे, कहतें हैं कि अरब के सर्वप्रथम बादशाह आद जाति से हुए थे, इनका रूतबा आस-पास के तमाम इलाकों में था. आद लोग मूर्तिपूजक और बहुदेववादी थे तथा मुख्यतया तीन तरह की देवियों की उपासना किया करतें थे जिनके नाम समदा, समूदा तथा हरा था. 'आद' इस वंश के मुखिया का नाम था. कुछ मान्यता इन्हें भगवान श्रीकृष्ण से संबद्ध करते हुए कहती हैं कि ये यदुवंश के उन बचे लोगों में से थे जो यादवी संग्राम के दौरान द्वारिका के जलमग्न होने से पूर्व वहां से निकल गये थे. इन लोगों में हूद नाम के सुधारक भेजे जाने का वर्णन मिलता है, हूद को कुछ लोग नूह के बेटे साम का पोता मानतें हैं. हूद के बारे में कहा जाता है कि उनकी कब्र आज भी हजरमौत में मौजूद है, उस जगह पर अब बड़ा मेला लगता है. आद लोगों का एक नाम इरम भी था, इन लोगों ने कई बड़े और भव्य नगर बसाये थे. इब्रानी लोग आद लोगों को रशम कहा करते थे, इब्रानी में रशम का अर्थ है पत्थरों में रहने वाले. आज भी मद्यन इलाके के पहाड़ों में इनके द्वारा बनाये गुफाओं का निशान मिलता है, उन गुफाओं में आरामी और समुदी भाषा में लिखे कई अभिलेख मिले हैं जिन्हें पढ़ने की कोशिश जारी है. एक प्रचंड तूफान में ये जाति नष्ट हुई. कुछ विद्वान ये भी मानतें हैं कि महाभारत युद्ध के पश्चात् हुए विस्थापन ने कई लोगों को अरब और उसके निकटवर्ती प्रदेशों में आबाद कर दिया था. शाम देश (सीरिया) भगवान कृष्ण के नाम श्याम से साम्यता रखता है.
बायदा अरबों में एक नाम समूद जाति का भी है. समूद या समुद्र जाति का वर्णन सबसे पहले अरस्तू आयर बतलीमूस की किताबों में मिलता है, ये लोग हिजाज और तबूक के दरमियान आबाद थे और भवन निर्माण में बड़ी कुशलता रखते थे तथा बड़े कुशल समुद्री व्यापारी थे. सालेह या फल्ज़ नाम के व्यक्ति को इनका सुधारक माना जाता है. सालेह भी नूह-वंशी थे और उनके दादा समूद के नाम पर उनकी जाति का ये नाम था. इनका काल इब्राहीम से 300 से 500 साल पहले का है. सालेह को तौरात में फल्ज़ नाम से बुलाया गया है और उत्पत्ति ग्रन्थ में उनका वर्णन आता है. कुरान इस जाति को मूसा से पहले का बताता है. ये जाति पहाड़ों में मकान बनाकर रहा करती थी और बहुदेवतावादी थी. मूर्तिपूजक भी थी क्योंकि इनके द्वारा बनाये घरों के जो निशान मिले हैं उसमें मूर्ति और देवी-देवताओं की दीवारों पर उकेरी गई तस्वीरें मिली है. इस कड़ी में कौमे-लूत का नाम भी शामिल है जो ओमान के इलाके में आबाद थे, ये जाति भी एक प्राकृतिक आपदा के चलते विनष्ट हुई थी. इसके अलावा अबैल, अमालका, तसम, जदीस जैसी कौमें भी वहां आबाद और विनष्ट होतीं रहीं.
अरब की दूसरी किस्म आरेबा (True Arabs) कहलातीं हैं. इन्हें कहतान की औलाद माना जाता है और कहतानी कहकर भी बुलाया जाता है. इन आरेबा अरबों के बारे में कहा जाता है कि इनमें से कुछ लोग पूरब की ओर काबुल के पास (यानि तब के हिन्द) से भी आये. इनमें से एक का नाम था यारब था. ये लोग कहतान के वंशज थे और सूर्य पूजक थे, इनके वंश में हुए एक शासक का नाम था अब्दुस शम्स (यानि सूर्य का दास). इन बायदा अरबों का काल प्राचीन अरब के लिये स्वर्ण-युग था क्योंकि ये लोग मक्के के दक्षिणी इलाके से निकलकर बेबीलोन, सीरिया और मिस्र तक गये और अपनी संस्कृति का विस्तार किया. बाबिल से ही हम्बूराबी का नाम जुड़ा हुआ है जिसके न्याय-व्यवस्था के बारे में हमलोग इतिहास की किताबों में पढतें हैं. हजरमौत के इलाके से लेकर खलीज-फारस के दरम्यानी इलाके समृद्ध अरब की गवाह थी. ये लोग जलयात्रा में दक्षता रखते थे. इनका निवास यमन के इलाके में भी था. बायदा अरबों के विनाश के बाद इनके बारे में कहा जाता है कि ये मूल अरब थे. लाल सागर से लेकर फारस की खाड़ी के बीच आबाद कई अरबों का आज भी ये दावा है कि वो आरेबा अरब यानि मूल अरब हैं. यमन वगैरह में आज भी कहतान नाम आम है. इस्लामी किताबों के अध्ययन से भी मालूम होता है कि कहतान कबीले के लोग आज भी वजूद में हैं. कयामत से जुड़ी पेशीनगोईयों में कहतान का जिक्र कई दफा आता है. हदीसें कहतीं हैं कि याजुज और माजुज के खातमे के बाद ईसा अपनी हुकूमत कायम करेंगे और फिर उनकी वफात हो जाएगी और मुसलमान उनकी नमाजे-जनाज़ा अदा करेंगे और उनको रसूल के पहलू में दफ़न करेंगे. फिर यमन के कबीले "कहतान" से एक शख्स जिसका नाम जहजाह होगा, खलीफा बनेगा और अद्ल-इन्साफ के साथ हुकूमत करेगा. कहतान कबीले का जिक्र बुखारी और मुस्लिम शरीफ में भी आया है. हजरत अबू हुरैरा से रिवायत एक हदीस में आता है, नबी ने फरमाया कि क़यामत तब तक कायम नहीं हो सकती जब तक यमन के कबीले कहतान से ऐसा शख्स जाहिर न हो जो लोगों को अपने लकड़ी से हांकेगा. यमन का कबीला जुरहम इन्हीं लोगों में आता है.
आरेबा और मुस्तारेबा को सम्मिलित रूप से अरब-बाकिया भी कहा जाता है. अरब की इस तीसरी किस्म मुस्तारेबा और आरेबा में एक मूल अंतर ये है कि जहाँ आरेबा अरबों की मूल जुबान अरबी थी वहीँ मुआतारेबा वो थे जिन्होनें आरेबा लोगों से अरबी जुबान सीखी. मुस्तारेबा मूल अरब नहीं थे. बल्कि ये बाहरी लोग थे जिन्होनें अरबियत की अपनाया था. रोचक बात ये है कि पैगम्बरे-इस्लाम भी इन्हीं मुस्तारेबा अरब में से हैं, यानि पूर्वज परंपरा से वो मूल अरब नहीं थे.
भारत में जो लोग मैकाले द्वारा गढ़े गये आर्य-द्रविड़ के झूठे सिद्धांत का आड़ लेकर यहाँ के हिन्दुओं पर हमले करते हुए उनका ये कहकर मजाक उड़ातें हैं कि तुम्हारा हिन्द से क्या ताअल्लुक ? तुम सब तो बाहरी लोग हो, उन सब लोगों के लिये मुस्तारेबा-अरब का ये सत्य मुंहतोड़ जबाब है.
अरबों की तीसरी किस्म मुस्तारेबा के बारे में समझने के लिये हमें यहूदी इतिहास कथाओं में जाना होगा क्योंकि ये कड़ी वहीँ जाकर जुड़ती है. इब्राहीम से इसका ताअल्लुक है, ये इब्राहीम वहीँ हैं जिनसे हर सेमेटिक मजहब वाला अपना संबंध जोड़ता है और उनको अपना पितृ-पुरुष मानता है. इब्राहीम के बारे में जानने के तीन जरिये हैं, एक है तौरात जिसके पहले अध्याय यानि उत्पत्ति ग्रंथ में उनका बड़ा विशद वर्णन आया है. दूसरा है कुरान, हदीसें और इस्लाम से संबद्ध और दूसरी किताबें और तीसरी है भविष्य पुराण जिनमें उनका 'अविराम' नाम से वर्णन मिलता है. तौरात और इस्लामी ग्रंथों में इब्राहीम का जो वर्णन है उसमें बहुत ज्यादा विभेद है. उदाहरण के लिये तौरात में इब्राहीम के पिता का नाम तेरह (तारा) आया है तो वहीं कुरान कहता हैं कि उनके पिता का नाम आज़र था परन्तु कुरान से यह बात साबित है कि इब्राहीम जिस शहर में पैदा हुए थे वो प्रकृति पूजक और मूर्ति में ईश्वर देखने वाले लोग थे. उनके लोग चाँद और नक्षत्र की पूजा करते थे. तौरात और इस्लामी ग्रंथों के अनुसार इब्राहीम इराक के शहर उर में पैदा हुए थे जबकि दूसरी मान्यता कहती है कि वो पैदा तो इराक में ही हुए थे पर शहर का नाम कोशा था न कि उर. उनकी पैदाइश में बारे में कहा जाता है कि वो ईसा से करीबन 2000 साल पहले पैदा हुए थे. इब्राहीम का पहला निकाह सारा नाम की लड़की से हुआ था जो उनकी चचाजाद बहन थी. तौरात कहती है कि दमिश्क के पास के एक शहर हारान से वो अपने पिता की मृत्यु के पश्चात निकल गये और कनान देश में जाकर बस गये. वहां उनके साथ उनके भाई हारान का बेटा यानि उनका भतीजा लूत भी था. फिर वहां से अब्राहम (इब्राहीम) मिस्र चले गये. सारा की खूबसूरती पर लट्टू होकर वहां के बादशाह ने सारा का अपहरण कर लिया पर इब्राहीम ने उससे ये कहकर कि 'ये मेरी बहन है' किसी तरह मुक्त कराया. मिस्र से कनान लौटते हुए इब्राहीम और सारा ने एक लौंडी भी साथ लिया जिसका नाम हाज़रा था. विवाह के अनेक वर्ष के पश्चात् भी जब सारा से इब्राहीम की कोई औलाद नहीं हुई थी तो औलाद के लालच में सारा ने इब्राहीम से कहा कि तू उस लौंडी के पास जा, संभव है कि मेरा घर उसके द्वारा बस जाये. फिर इब्राहीम को हाज़रा से इस्माइल नाम का पुत्र हुआ.
ये कथा मुस्लिम और यहूदी के बीच झगड़े की सबसे बड़ी वजह है. इसका कारण ये है कि इब्राहीम और हाजरा के ताअल्लुक को लेकर यहूदी ग्रन्थ तौरात और इस्लामी ग्रंथों में बड़ा जबरदस्त मतभेद है. तौरात में ऐसा कोई वर्णन नहीं है कि इब्राहीम ने हाजरा से निकाह किया था जबकि इब्ने-हजर जैसे इस्लामी विद्वान कहतें हैं कि हाजरा लौंडी नहीं थी बल्कि मिस्र के राजा के बेटी थी और उनका इब्राहीम के साथ निकाह हुआ था. बाद में बीबी सारा से भी इब्राहीम को एक औलाद हुई जिसका नाम इसहाक था. अब झगड़ा ये है कि पूरा अरब जगत इस्माइल को अबू अरब यानि अरबों के पितामह के रूप में जानता है और पूरी उम्मते-मुस्लिमा खुद को इस्माइल वंशी कहता है और इधर यहूदी जगत खुद को इसहाक वंशी मानतें हैं. अब अपने ग्रन्थ के आधार पर यहूदी इस्माइल वंशियों को ये कहते हुए हेय समझतें हैं कि जरखरीद दासी से पैदा हुई औलाद के वंशज सम्मान के लायक कैसे हो सकतें हैं जबकि इधर मुस्लिम दावा इसके बरअक्स है.
अब्राहम के संबंध में दो बातें बड़ी मशहूर है. एक ये कि ये नाम हिन्दुओं के त्रिदेवों में एक ब्रह्मा के नाम हिब्रू रूपांतरण है. ऐसा कहने वालों का तर्क है कि अब्राहम का मूल नाम अब्राम था जो बाद में यहोवा के साथ वाचा बाँधने के कारण अब्राहम हो गया. तौरात के उत्पत्ति ग्रन्थ के अनुसार अब्रहाम का अर्थ है 'कई कौमों का बाप'. भारतीय परंपरा में भी ब्रह्मा को सभी देवताओं, दानवों और मानवों का पितामह माना जाता है. अब्राहम को ही अरबी में इब्राहीम कहा गया है. ब्रह्मा और अब्राहम में साम्यता ढूँढने वालों का एक तर्क ये भी है कि कुरान में इब्राहीम के बारे में आता है कि सबसे पहले उन्हें ही सहीफे (किताब) दिए गये थे और इसी तरह भारतीय परंपरा में भी ये माना जाता है भगवान विष्णु की प्रेरणा से सरस्वती ने सर्वप्रथम ब्रह्मा जी को सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान कराया. साम्यता ढूँढने वालों का तर्क ये भी कि ब्रह्मा की पत्नी सावित्री और अब्राहम की पत्नी सारा के नाम में भी समानता है, वो ये भी कहतें हैं कि ब्रह्मा के मानस पुत्र अंगिरस ही उनके बेटे इसहाक थे. अब्राहम के जुड़ी दूसरी महत्वपूर्ण, रोचक और हैरान करने वाली बात है कि उनकी कथा और हमारे यहाँ के भक्त प्रहलाद की कथा में काफी कुछ साम्यता है. प्रहलाद का अपने पिता हिरण्यकश्यप के साथ ईश्वर की अवधारणा को लेकर मतभेद था और इब्राहीम की कथा में भी ऐसा ही कुछ है. प्रहलाद के ऊपर उसके पिता यानि उस वक़्त के शासक हिरण्यकश्यप ने बड़े अत्याचार किये थे, उनको जीवित ही अग्नि में झोंक दिया था, ऐसा ही इब्राहीम के साथ भी उस वक़्त के बादशाह नमरूद ने भी किया. इब्राहीम को भी आग में डाला गया था पर दोनों ही ईश्वर की कृपा से बचा लिए गये. नमरूद और हिरण्यकश्यप दोनों का अंत ईश्वर के दंड के परिणामस्वरुप हुआ था.

तौरात के उत्पत्ति ग्रन्थ से हमें जो जानकारी मिलती है उसके अनुसार जब हाजरा हामिला हुई थी तबसे ही दोनों सौतनों में झगड़े होने लगे थे. सारा इब्राहीम के पास शिकायत लेकर पहुँच गई कि अब चूँकि ये लौंडी गर्भ से है और मैं नहीं हूँ, इसलिये वो मुझे हकीर (कमतर) समझती है. इसपर इब्राहीम ने सारा से कहा, वो तेरी लौंडी है उसपर तेरा हक़ है, तू उसके साथ जो चाहे कर. उसके बाद सारा उसके ऊपर सख्ती दिखाने लगी जिससे आजिज आकर हाजरा घर छोड़ कर भाई गई. फिर किसी फ़रिश्ते के समझाने के बाद वो वापस सारा के पास आ गई और उसे इस्माइल नाम का पुत्र हुआ. इब्राहीम जब पिता बने उनकी उम्र छियासी साल की थी. जब इब्राहीम सौ साल के हुए तो उनका खुदा के साथ संवाद हुआ और उन्हें और उनकी बूढ़ी पत्नी सारा को एक औलाद की खुशखबरी दी गई. फिर इब्राहीम को सारा से इसहाक नाम का एक और पुत्र हुआ. जब सारा भी औलाद वाली हो गई तो दोनों सौतनों में फिर से क्लेश बढ़ गया और सारा ने इब्राहीम से साफ़ कह दीजिये कि इस लौंडी के बेटे को मैं तेरा वारिस नहीं बनने दूँगी. सारा के दबाब में इब्राहीम ने अपनी लौंडी और उससे हुए बच्चे इस्माइल को घर से निकाल दिया. घर से निकालते वक्त इब्राहीम ने उन्हें बस कुछ रोटी और पानी का मश्क ही दिया. बेचारी हाजिरा अपने बेटे को लेकर बियाबान में भटकने लगी. जब रोटी और पानी दोनों खत्म हो गये तो वो अपने बेटे को एक झाड़ी के पास रखकर वहां से दूर जाकर बैठ गई ताकि पानी के अभाव में बेटे को तड़प-तड़प कर मरते हुये न देख सके. फिर कोई फ़रिश्ता आता है और उसे एक कुआँ दिखाता है है जिससे दोनों की जान बचती है, बाईबल के अनुसार हाजिरा और इस्माइल जहाँ आबाद हुए थे वो फारान का बंजर, बियाबान और रेगिस्तानी इलाका था. इस्माइल और हाजिरा को लेकर इस्लामिक और यहूदी मान्यताओं में बड़ा फ़र्क है पर तमाम अंतरों के बाबजूद एक बात दोनों में समान है कि इब्राहीम ने अपने बच्चे और बीबी को घर से निकाल दिया था और वो भी उनके राशन-पानी और सुरक्षा का इंतज़ाम किये बिना. उन दोनों को बियाबान रेगिस्तान में खूंखार जंगली जानवरों के बीच भूखा-प्यासा छोड़ दिया गया.
इस्माइल और हाजिरा के बारे में इस्लामिक मान्यता क्या है इसकी चर्चा आगे होगी पर एक बात यहाँ तवज्जो-तलब है और वो ये कि अपने अतीत में इब्राहीम द्वारा अपने बच्चे और बीबी/लौंडी के परित्याग का इतिहास रखने वाले जब राम द्वारा सीता के परित्याग पर प्रश्न उठाते हैं तो बड़ी हैरत होती है वो भी तब जबकि राम ने सीता को किसी रेगिस्तान में नहीं बल्कि ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में छोड़ा था.
सामी मजहबों के आदि पुरुष इब्राहीम द्वारा अपनी बीबी/लौंडी हाजरा को घर से निकालने को लेकर तौरात और इस्लामी ग्रंथों में बड़ा मतभेद है. यहूदी मान्यता कहती है कि जब इब्राहीम के बड़े बेटे इस्माइल तेरह साल के थे तब उन्हें माँ समेत घर-निकाला दिया गया था पर इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार जिस समय इब्राहीम ने अपनी बीबी/लौंडी हाजरा को घर से निकाला था उस समय उनके बेटे दूध पीते बच्चे थे. कुरान के सूरह इब्राहीम और बुखारी शरीफ के किताबुल-अंबिया में इसका वर्णन विस्तार से आया है. जब इब्राहीम हाजरा और इस्माइल को छोड़ कर जा रहे थे वो हाजरा उनके पीछे दौड़ती हुई आई और बड़े कातर स्वर में अपने पति से कहा, मेरे पास बस थोड़ी सी रोटी है, पानी खत्म होने वाला है, साथ में दूध पीता बच्चा है और सामने ये चटियल मैदान और पहाड़ों से घिरी हुई वादी है, जंगली जानवर चारों ओर घूम रहें हैं और आप हमें छोड़कर वापस जा रहें हैं? इब्राहीम ऊंटनी पर सवाल होकर लौट रहे थे, उन्होंनें पत्नी के सवाल पर मौन धारण कर लिया. निराश हाजरा वापस लौट आयीं और इब्राहीम उन्हें छोड़कर वहां से चले गये. इब्राहीम ने अपनी बीबी/लौंडी हाजरा तथा अपने दूध पीते बच्चे इस्माइल को जिस जगह पर छोड़ा था उसको लेकर भी यहूदी और इस्लामिक मान्यता में बड़ा मतभेद है. तौरात कहती है कि हाजरा और इस्माइल को फारान के पहाड़ों में छोड़ा गया था. यहूदी और ईसाई विद्वानों के अनुसार फारान का इलाका सीना के रेगिस्तान के पास है. इधर कुरान कहता है कि इब्राहीम ने अपनी बीबी/लौंडी हाजरा और इस्माइल को काबे के पास यानि मक्के में बसाया था. चूँकि मुस्लिम जगत ये मानता हैं कि हाजरा और इस्माइल को इब्राहीम ने मक्के में छोड़ा था इसलिये हम आलेख माला को इसी मान्यता पर आगे बढायेंगें. जब रात हुई तो बीबी हाजरा बड़ी परेशान हुईं क्योंकि पास में न खाने को कुछ था न पीने को. जंगली जानवरों की ओर से लगातार हमले का खतरा बना हुआ था और उन जानवरों की आवाजों से बच्चा डर कर न सो रहा था न ही हाजरा को सोने दे रहा था. सुबह हुई तो भूख और प्यास से दोनों की हालत खराब. अब हाजरा के पास बचा सारा पानी खत्म हो गया और उनका दूध-पीता बच्चा इस्माईल प्यास से तड़पने लगा. माँ उठ खड़ी हुई, चारों ओर देखा. कहीं से भी पानी मिलने की गुंजाईश न देख कर वो पास के एक पहाड़ सफा पर चढ़ गईं पर वहां पानी न मिला तो वो एक वादी में उतर गईं और भागती हुई वहां से एक दूसरी पहाड़ी मरवा पर चढ़ गई ताकि वहां कोई पानी का सोता मिल सके मगर पानी वहां भी न था. इस क्रम में उन्होंने सात बार दोनों पहाड़ी के दरम्यान चक्कर लगा लिये. (आज भी जब मुस्लिम जब हज करने जातें हैं तो हाजरा के इन्हीं चक्करों की याद में सात दफ़ा सफा और मरवा पहाड़ी के बीच चक्कर लगातें हैं) मुस्लिम कथाएं कहतीं हैं कि बुरी तरह थक के जब हाजरा मरवा पहाड़ी से उतर रहीं थीं तो उन्हें अपने बेटे के पैरों के पास पानी का एक चश्मा बहता नज़र आया जिसे एक फ़रिश्ते जिब्रील ने अपने परों (पंखों) से खोदा था. ये पानी ही आज आबे-जमजम नाम से मशहूर है. हर हाजी इसका सेवन जरूर करता है.

(पानी वाली कथा में भी इस्लामिक और यहूदी मान्यता में विभेद है. तौरात के अनुसार मश्क का पानी ख़त्म होने के बाद जब हाजरा बैरसबा के इलाके में भटक रही थी तब उसने देखा कि उसका बच्चा प्यास से तड़प रहा है तब उसने अपने बेटे को किसी झाड़ी के किनारे डाल दिया और खुद वहां से दूर चली गई ताकि प्यास से तड़प-तड़प कर अपने बच्चे को मरता हुआ न देख सके. वो बेचारी वहां दहाड़े मार-मार का रो रही थी तभी एक फ़रिश्ता प्रकट हो गया और उसने दोनों को एक कुआँ दिखाया. हाजरा ने बेटे को पानी पिलाया और वहीं उसकी परवरिश शुरू कर दी).

पानी मिला तो फिर दोनों माँ-बेटे वहीं आबाद हो गये. इसी क्रम में यमन से निकला जुरहम नाम का एक कबीला पानी की तलाश में भटक रहा था. जब ये कबीला मक्के के पास पहुँचा तो उन्होंनें वहां कुछ पक्षी उड़ते देखे. रेगिस्तानी इलाकों में पक्षियों के उड़ने का अर्थ है कि आसपास कहीं पानी मौजूद है. वो लोग बड़े अचम्भित हुए कि इन इलाकों में तो कभी कोई जल-स्रोत नहीं था फिर अचानक ये परिंदे यहाँ कैसे उड़ रहे हैं और फिर वो उन पक्षियों की निशानदेही करते हुए उस जगह तक पहुँच गये जहाँ जमजम का कुआँ जाहिर हुआ था. वहां पहुँचे तो देखा कि वहां एक बूढी महिला अपने एक बेटे के साथ हैं. वो वहां आयें और आकर हाजरा से कहा कि हमारा ये कबीला यमन से चला है, कई महीनों से पानी की तलाश में निकला हुआ है. अब हमारी हालत पस्त है इसलिये अगर आप हमें अनुमति दें तो हम यहाँ आबाद हो जायें. हाजरा ने उनको ये कहते हुए जमजम के पास आबाद होने की इजाजत दी कि पानी पर मिल्कियत आपलोगों की नहीं बल्कि मेरी, मेरे बेटे की और हमारी आने वाली नस्ल की होगा और पानी इस्तेमाल करने के एवज में आप हमें कुछ मुआवजा भी देंगे. जो लोग इस्लाम पूर्व अरब को जाहिल कहतें हैं, उपरोक्त घटना उनके झूठे दावों का मुंहतोड़ जबाब है. जुरहम कबीले में सैकड़ों लोग रहे होंगें और इधर एक अकेली बूढी औरत अपने छोटे बेटे के साथ थी. जुरहम कबीले वाले चाहते तो उन्हें वहां से मारकर भगा देते और पानी पर कब्ज़ा कर लेते पर इसके विपरीत उन्होंने जो सभ्य आचरण प्रदर्शित किया उसकी मिसाल अन्यत्र मिलनी मुश्किल है. खैर, जुरहम कबीला वहां आबाद हुआ फिर उसी कबीले के एक लड़की के साथ इस्माइल का विवाह हुआ. बाद में इस्माइल ने जब दूसरा विवाह किया तो उसके लिये भी उन्होंने जुरहम कबीले से ही लड़की ली. यानि इस्माइल की दोनों ही पत्नियाँ यमन के कबीले जुरहम से थी. इस्लामिक इतिहासकार तबरी ने अपने इतिहास ग्रन्थ तारीखे-तबरी में बताया है कि इस्माइल की दूसरी पत्नी जुरहम कबीले के सरदार मजाज़-बिन-अम्र की बेटी थी जिससे उन्हें 12 बेटे हुए थी. इन्हीं के बारह बेटों से जो खानदान आगे बढ़ा वो मुस्तारेबा-अरब कहलाये. इसी वंश में पैगम्बरे-इस्लाम मुहम्मद साहब भी पैदा हुये. यानि आप इस्माइल वंशी होने के चलते मुस्तारेबा-अरब थे. मुस्तारेबा का अर्थ है कि वो लोग जो मूल अरब नहीं थे और जिन्होनें दूसरों के संसर्ग से अरबी सीखी. उपरोक्त तथ्य हम हिन्दुस्तान के लोगों के लिये इसलिये तवज्जो-तलब है क्योंकि यहाँ हम हिन्दुओं के पूर्वजों के बारे में बड़ा शोर बरपा किया जाता है कि तुम लोग तो भारत के मूल निवासी हो हीं नहीं क्योंकि तेरे पूर्वज तो कहीं कैश्पियन सागर या मध्य-पूर्व से आने वाले प्रवासी थे जिन्होंने यहाँ कब्ज़ा कर लिया था. आर्य-द्रविड़ मिथक के पर्दाफ़ाश करने वाले लोग इस जानकारी का समुचित उपयोग कर सकतें हैं.

~ अभिजीत
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Wednesday, 3 May 2017

ट्रिपल तलाक मुद्दे पर समाज में झूठ फैलाकर लोगों को गुमराह कर रहा है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड: प्रो. मोहम्‍मद शब्‍बीर

ट्रिपल तलाक मुद्दे पर समाज में झूठ फैलाकर लोगों को गुमराह कर रहा है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड: प्रो. मोहम्‍मद शब्‍बीर 


फोरम फॉर अवेयरनेस ऑफ नेशनल सिक्योरिटी (दिल्ली चैप्टर) की ओर से 24 अप्रैल, 2017 को कृष्ण मेनन भवन, भगवान दास रोड (सुप्रीम कोर्ट) में ट्रिपल तलाक, श्री राम जन्‍मभूमि मंदिर और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर दोहरे मापदंड को लेकर एक सेमिनार का आयोजन किया गया।
इस सेमिनार को संबोधित करते हुए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति और विधि विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. मोहम्मद शब्बीर ने ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर प्रमुखता से अपनी राय रखी। उन्‍होंने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर इस मसले को लेकर समाज में झूठ फैलाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि बोर्ड ट्रिपल तलाक का झूठ के सहारे बचाव कर रहा है ताकि महिलाओं का शोषण जारी रहे।
ट्रिपल तलाक पर पूरे देश में छिड़ी बहस के बीच प्रो. शब्बीर ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर कई सवाल खड़े किए। उन्होंने बोर्ड पर समाज में झूठ फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि बोर्ड तीन तलाक के झूठ के सहारे मुस्लिम महिलाओं पर हो रहे अत्याचार का बचाव कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि वह मुस्लिम महिलाओं पर होने वाले अत्याचार को जारी रखने के ख्याल से ऐसा कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में ट्रिपल तलाक मसले पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से पेश किए गए हलफनामे को प्रो. शब्बीर ने गुमराह करने वाला बताया। उन्‍होंने कहा कि बोर्ड का हलफनामा गुमराह और कुरान के खिलाफ है। पाकिस्तान व दूसरे कई मुस्लिम देशों में तलाक व हलाला पर पाबंदी है। मुस्लिम पर्सनल बोर्ड को इन मुस्लिम देशों से सीख लेनी चाहिए और तीन तलाक मसले पर कानून बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखना चाहिए। प्रो. शब्बीर ने कहा कि शाफई, मालकी व हंबली स्कूल ऑफ थॉट में तीन तलाक मान्य नहीं है। शियाओं में भी तीन तलाक मान्य नहीं है। उन्होंने कहा कि ट्रिपल तलाक पर रोक के लिए पाकिस्तान में फैमिली ऑर्डिनेंस एक्ट पारित हुआ। ट्रिपल तलाक और हलाला पर रोक लगी। कोर्ट के मार्फत ही तलाक मान्य होते हैं ना कि तीन बार तलाक कह देने से तलाक हो जाता है। उन्होंने कहा कि तीन तलाक सुन्नी स्कूल ऑफ थॉट में जायज है।
उन्‍होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान, ट्यूनीशिया, मोरक्को, ईरान और मिस्र जैसे एक दर्जन से ज्यादा इस्लामी देशों ने एक साथ तीन तलाक का रेगुलेशन किया है। अगर इस्लामिक देश कानून बनाकर तीन तलाक को रेगुलेट कर सकते हैं और इसे शरिया के खिलाफ नहीं पाया गया है, तो यह भारत में कैसे गलत हो सकता है, जो धर्मनिरपेक्ष देश है।
उन्‍होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समाज में कोई अच्छा संदेश नहीं दे सकता है, क्योंकि उसके पास तर्क के नाम पर झूठ के सिवाय कुछ नहीं है। इसका प्रमुख कारण यह है कि उसके पास तर्क के आधार पर बचाव करने के लिए कुछ है ही नहीं। उन्‍होंने कहा कि कुरान में तलाक की व्‍याख्‍या पूरी तरह दी गई है। इस्‍लाम में नितांत जरूरी होने पर ही तलाक की इजाजत की बात कही गई है। इसके पीछे के कारणों का विस्‍तार से इसमें उल्‍लेख किया गया है। उन्‍होंने कहा कि अल्‍लाह की नजरों में भी तलाक को सबसे घृणास्‍पद चीज माना गया है। कुरान में तलाक को लेकर वर्णित कुछ बिंदुओं के आधार पर इस निष्‍कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि जायज कारणों के आधार पर ही तलाक दिया जाना चाहिए। इसे अंजाम देने से पहले सुलह की कई प्रयास होने चाहिए। यदि ये सारे प्रयास विफल हो जाते हैं, तभी इसे अमल में लाना चाहिए। विदेशों में बैठकर कहीं से तीन तलाक कह देना, ऐसा किसी नियम का इसमें उल्‍लेख नहीं है। ट्रिपल तलाक को मुस्लिमों के प्रमुख वर्ग के द्वारा भी पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। इन हालातों में कोई भी मुस्लिम महिला अपने पति के आचरण से संतुष्‍ट नहीं हैं तो वह कानून का सहारा ले सकती है। अपनी धार्मिक आजादी को बचाए रखने का अब यह सही समय है। मुस्लिम समाज के भी बुद्धिजीवी लोग इस मसले को लेकर सामने आने लगे हैं।
प्रो. शब्‍बीर ने कहा कि अब यह ट्रिपल तलाक का मसला बहुत हो गया, इसका हल निकलना चाहिए। इसके लिए अब यह सही समय है। मुस्लिम वर्ग के नेता मौजूदा सरकार से संपर्क करें और इस विषय में संविधान के अनुसार उचित प्रावधान किए जाएं।
सेमिनार के दौरान राममंदिर निर्माण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी चर्चा की गई। सभी वक्ताओं ने एक सुर में सहमति से मंदिर निर्माण पर जोर दिया। साथ ही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर राष्ट्र विरोधी गतिविधियों की आलोचना की।
इस समारोह में माननीय श्री इंद्रेश कुमार जी (सदस्‍य, राष्‍ट्रीय कार्यकारी मंडल, राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ) बतौर मुख्‍य अतिथि मौजूद रहे।
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ट्रिपल तलाक जैसी बीमारी का इलाज अब बेहद जरूरी, इसे पूरी तरह खत्‍म किया जाए: शहनाज अफजल

ट्रिपल तलाक जैसी बीमारी का इलाज अब बेहद जरूरी, इसे पूरी तरह खत्‍म किया जाए: शहनाज अफजल 


फोरम फॉर अवेयरनेस ऑफ नेशनल सिक्योरिटी (दिल्ली चैप्टर) की ओर से 24 अप्रैल, 2017 को कृष्ण मेनन भवन, भगवान दास रोड (सुप्रीम कोर्ट) में ट्रिपल तलाक, श्री राम जन्‍मभूमि मंदिर और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर दोहरे मापदंड को लेकर एक सेमिनार का आयोजन किया गया।
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (आरआरएम) की शहनाज अफजल ने इस सेमिनार को संबोधित करते हुए ट्रिपल तलाक से मुस्लिम महिला को हो रही दुश्‍वारियों को लेकर जमकर प्रहार किए। उन्‍होंने कहा कि ट्रिपल तलाक पर आज पूरे देश में महसूस किया जा रहा है कि इसे जल्‍द खत्‍म किया जाए। ये सभी लोगों की चाहत है। इसकी पीड़ा हजारों मुस्लिम महिलाओं ने अब तक झेली हैं और मौजूदा समय में बड़ी तादाद में मुस्लिम महिलाएं इसे झेल रही हैं। शहनाज ने कहा कि इस बीमारी (ट्रिपल तलाक) का इलाज अब बेहद जरूरी है। वैसे भी महिलाएं अपनी आजादी विशेषकर धार्मिक आजादी के प्रति खासा जागरुक हो रही हैं। धार्मिक आजादी होनी चाहिए लेकिन महिलाओं की नैतिकता को ठेस पहुंचे तो ये गलत है।
शहनाज अफजल ने कहा कि तीन तलाक का मुद्दा इन दिनों लगातार चर्चा में है और इसकी जमकर खिलाफत शुरू हो गई है। कई इस्लामिक देशों में भी इस प्रथा पर प्रतिबंध है और अब भारत में भी इस प्रथा पर रोक के लिए अब आवाज बुलंद होने लगी है। लेकिन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस मामले में बेवजह अड़ा हुआ है। बोर्ड तीन तलाक के मुद्दे पर अनर्गल तर्क गढ़ रहा है। बोर्ड को मुस्लिम महिलाओं की दशा को लेकर झूठे तर्क गढ़ने की बजाय इस मुद्दे के निराकरण के लिए गंभीर प्रयास करने चाहिए। यदि बोर्ड की मंशा यही रहेगी तो मुस्लिम महिलाओं की स्थिति में सुधारीकरण के प्रयास को ठेस पहुंचेगी। धार्मिक आधार पर ट्रिपल तलाक को बेवजह तूल देने से इन महिलाओं की स्थिति और बदतर होगी। जबकि कुरान में भी तलाक को लेकर स्‍पष्‍ट व्‍याख्‍या है, तो ऐसे में क्‍यों नहीं बोर्ड को सदाशयता का परिचय देकर इस मामले में गंभीरता से चिंतन करना चाहिए। यदि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ट्रिपल तलाक को खत्म करने की बात से गुरेज करता है तो इसका समाधान कानून के जरिये होना जरूरी है।
उन्‍होंने बोर्ड पर जमकर निशाना साधा और कहा कि बोर्ड ने अपने दरवाजे ट्रिपल तलाक से पीडि़त मुस्लिम महिलाओं के लिए क्यों नहीं खोले?  यहां सवाल कुरान शरीफ में वर्णित किसी कानून के विरोध का नहीं है बल्कि इसका दंश झेल रही मुस्लिम महिलाओं के हक का है।
आज गांवों, शहरों में कई ऐसे परिवार हैं, जो इस बात को लेकर परेशान हैं कि वो अपनी तलाकशुदा बेटियों-बहनों का अब क्या करें? उनकी जिंदगियां बद से बदतर हो रही हैं और मुश्किल हालात के चलते उनका जीना दूभर हो गया है। ऐसे में मुस्लिम महिलाओं के हितों के आधार पर निश्चित ही कानून बनाए जाएं।
शहनाज अफजल ने यह भी कहा कि आज मैं इस विषय पर श्री इंद्रेश जी की हौसला-आफजाई के चलते ही कुछ कहने का साहस जुटा पाई हूं। उन्‍होंने सवालिया लहजे में कहा कि इस गंदी रवायत (ट्रिपल तलाक) को क्‍यों चलाया जा रहा है? यह अल्‍लाह-नबी को भी पसंद नहीं है। पूर्व की रवायत को आज के दौर में काफी बदल दिया गया है। उन्‍होंने उत्‍तर प्रदेश का हवाला देते हुए कहा कि यूपी में भारतीय जनता पार्टी ने ट्रिपल तलाक के मसले पर काफी गंभीरता के साथ स्‍टैंड लिया, चूंकि यह राज्‍य इससे सबसे ज्‍यादा प्रभावित है। ट्रिपल तलाक के सबसे अधिक मामले इसी राज्‍य से सामने आए हैं। झारखंड, मध्‍य प्रदेश समेत कई राज्‍यों में ट्रिपल तलाक से पीडि़त महिलाओं की संख्‍या में खासा इजाफा होता जा रहा है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में तीन तलाक का दंश झेलने वाली महिलाएं अब शासन-प्रसाशन को पत्र लिखकर मदद की गुहार लगा रही हैं। मुस्लिम महिलाएं अब खुलकर सामने आने लगी हैं और अपनी पीड़ा व्‍यक्‍त कर रही हैं। हालांकि, इससे पहले भी ये महिलाएं अपनी आवाज उठाती रही हैं, लेकिन इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। लेकिन अब ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर इन महिलाओं की बेबाक अभिव्‍यक्ति के चलते इसे मजबूती मिली है। इस जुल्‍म के खिलाफ मुस्लिम संगठनों ने कभी फतवा नहीं दिया। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कानून के अनुसार गलत काम करने वाले को तलाक देने के मामले में कभी सजा नहीं दी। और न ही इस मामले में कभी कोई अनुकरणीय उदाहरण प्रस्‍तुत किया। आज हालात यह हैं कि मुस्लिम महिलाएं अवसाद, तनाव में जी रही हैं।
उन्‍होंने कहा कि अब ये मामला कोर्ट पहुंच गया है और आगामी दिनों में इस पर ठोस निदान होने की हमें उम्‍मीद है। इस मामले का निदान कोर्ट के जरिये होना मुस्लिम महिलाओं के हक में साबित होगा। ट्रिपल तलाक नामक इस बीमारी का इलाज अब बेहद जरूरी हो गया है। मेरा यह मानना है कि ट्रिपल तलाक को पूरी तरह खत्‍म किया जाना चाहिए। अब ये समाजिक सुधार का समय है। साथ ही, पूरा न्‍याय तभी होगा, जब पीडि़त महिलाओं को संबंधित प्रोपर्टी का आधा हिस्‍सा दे दिया जाए ताकि वह अपना जीवन बिना किसी कठिनाई के गुजार सकें।

इस समारोह में माननीय श्री इंद्रेश कुमार जी (सदस्‍य, राष्‍ट्रीय कार्यकारी मंडल, राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ) बतौर मुख्‍य अतिथि मौजूद रहे।
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ट्रिपल तलाक से पीडि़त मुस्लिम महिलाओं तक न्‍याय पहुंचना जरूरी: : सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एमवाई इकबाल

ट्रिपल तलाक से पीडि़त मुस्लिम महिलाओं तक न्‍याय पहुंचना जरूरी: : सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एमवाई इकबाल


फोरम फॉर अवेयरनेस ऑफ नेशनल सिक्योरिटी (दिल्ली चैप्टर) की ओर से 24 अप्रैल, 2017 को कृष्ण मेनन भवन, भगवान दास रोड (सुप्रीम कोर्ट) में ट्रिपल तलाक, श्री राम जन्‍मभूमि मंदिर और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर दोहरे मापदंड को लेकर एक सेमिनार का आयोजन किया गया।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्‍यायाधीश एमवाई इकबाल ने समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि ट्रिपल तलाक एक ज्‍वलंत मुद्दा है और इस पर गंभीर चर्चा जरूरी है। ट्रिपल तलाक से पीडि़त मुस्लिम महिलाओं तक सामाजिक न्‍याय पहुंचना जरूरी है।

एमवाई इकबाल ने कहा कि तीन तलाक के नाम पर मुस्लिम महिलाओं का शोषण हो रहा है। तलाक के इस्तेमाल से महिलाओं के साथ उनके बच्चों के भविष्य को अंधेरे में डाल दिया जाता है। अधिकांश मामलों में गुजारे भत्ते और संपत्ति में से हक नहीं मिलता। यह मुस्लिम महिलाओं की दयनीय हालत के लिए जिम्मेदार है।

उन्‍होंने कहा कि ट्रिपल तलाक के खिलाफ मामला अब सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। कोर्ट के वृहद् पीठ के अधीन इस मामले में सुनवाई होनी है। ऐसे में इस मामले के शीर्ष कोर्ट में होने के चलते उन्‍होंने इसके प्रावधानों को लेकर कोई टिप्‍पणी करने से इनकार किया और कहा कि इस पर कोई प्रतिक्रिया देना अभी उचित नहीं होगा।

हालांकि, पूर्व जज ने यह जरूर कहा कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस मामले का विरोध कर रहे हैं। बोर्ड का यह कहना है कि ये उनका संवैधानिक अधिकार है और बाहरी तत्‍व इसमें हस्‍तक्षेप न करें। शरीयत और शरिया लॉ का हवाला देकर इसे वह जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि केंद्र सरकार ट्रिपल तलाक से पीडि़त मुस्लिम महिला का समर्थन कर रही है। प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि ट्रिपल तलाक से पीडि़त मुस्लिम महिलाओं तक सामाजिक न्‍याय पहुंचना जरूरी है। हालांकि, उन्‍होंने इशारों में यह कहने की जरूर कोशिश की कि ट्रिपल तलाक से महिलाओं के समानता सहित दूसरे अधिकारों का हनन होता है और इसमें सुधार जरूरी है।

अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता विषय पर उन्‍होंने कहा कि संविधान के तहत सभी को बोलने की आजादी है लेकिन इसकी एक मर्यादा और सीमा होनी चाहिए। उन्‍होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर राष्ट्र विरोधी गतिविधियों की आलोचना की और कहा कि देश की एकता, अखंडता को धार्मिक आधार पर नुकसान नहीं पहुंचने देना चाहिए।

इस समारोह में माननीय श्री इंद्रेश कुमार जी (सदस्‍य, राष्‍ट्रीय कार्यकारी मंडल, राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ) बतौर मुख्‍य अतिथि मौजूद रहे।
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मुस्लिम महिलाओं के साथ बड़ी ज्यादती और गुनाह है ट्रिपल तलाक, इसे समाप्‍त करना जरूरी: श्री इंद्रेश कुमार

मुस्लिम महिलाओं के साथ बड़ी ज्यादती और गुनाह है ट्रिपल तलाक, इसे समाप्‍त करना जरूरी: श्री इंद्रेश कुमार  


ट्रिपल तलाक, श्री राम जन्‍मभूमि मंदिर और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर दोहरे मापदंड को लेकर एक सेमिनार का आयोजन 24 अप्रैल, 2017 को कृष्‍ण मेनन भवन, भगवान दास रोड (सुप्रीम कोर्ट) किया गया, जिसमें माननीय श्री इंद्रेश कुमार जी (सदस्‍य, राष्‍ट्रीय कार्यकारी मंडल, राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ) बतौर मुख्‍य अतिथि मौजूद रहे।

श्री इंद्रेश कुमार ने समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि ट्रिपल तलाक मुस्लिम महिलाओं पर एक तरह का अत्याचार है और ये पाप के समान है। ट्रिपल तलाक हर तरीके से गुनाह है। देश व समाज के हित के मद्देनजर मुस्लिम समाज के सुधारीकरण के लिए जरूरी है कि इसे समाप्त किया जाए और हमने इसे समाप्त करने का संकल्प लिया है। मुस्लिम महिलाओं के साथ तलाक और ट्रिपल तलाक बहुत बड़ी ज्यादती है। ट्रिपल तलाक से मुस्लिम महिलाओं को हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति दिलवाने का अब सही मौका है। इस पाप और अत्याचार को हर हालत में समाप्त किया जाएगा।

कुरान शरीफ और हदीस के अनुसार तलाक खुदा को नापसंद है। कुरान शरीफ में भी तलाक एक गुनाह है। निकाह खुदा के घर में तय होते है और धरती पर सजाए और नवाजे जाते हैं। तलाक एक गुनाह है इसे नहीं करना चाहिए। मुस्लिम विद्वानों ने भी तलाक का विरोध किया है। ट्रिपल तलाक की इजाजत ना कुरान शरीफ देता है ना ही हदीस ने इसे सही माना हैं। ट्रिपल तलाक गैर इस्लामिक है, गैर कानूनी है और अमानवीय भी है। उन्‍होंने ट्रिपल तलाक को एक बुराई करार देते हुए इसे पैगम्बर साहब की शिक्षा के भी खिलाफ बताया और कहा कि तलाक एक बुराई है और पैगम्बर की शिक्षा भी इसे नकारती है। उन्‍होंने कहा कि तलाक कुरान में नापसंदीदा अमल है। जब तलाक होता है तो अर्श हिलता है। फिर भी यदि तलाक हो तो कुरान और हदीश की रोशनी में हो। गुस्‍से में आकर एक ही जगह तीन बार तलाक देना नाजायज है। खुदा को सबसे नापसंद चीजों में तलाक भी शामिल है। गुस्‍सा, जल्‍दबाजी, घृणा, नशे आदि में यदि तलाक कहा गया है तो यह अस्‍वीकार्य है। इतिहास को देखें तो यह साफ है कि किसी नबी-पैगम्‍बर ने अपनी बीवी को तलाक नहीं दिया।

बाद के कालखंड में कुरान और हदीश को अपनी सुविधानुसार व्‍याख्‍या कर मुस्लिम समाज के कुछ वर्ग ने शरिया को अपने अनुसार तैयार किया। इसके अनुसार, ट्रिपल तलाक को जानबूझकर स्‍वार्थवश अपनी सुविधा के अनुसार तैयार किया, जो पूरी तरह गैर इस्‍लामी और अनैतिक है। इस्‍लाम में जिनके दिमाग में शैतान था, उनके दिमाग की उपज है ट्रिपल तलाक और हलाला। इसे समाप्‍त किए जाने का मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड विरोध करता रहा है, लेकिन मेरा मानना है कि इस मुद्दे पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को मान्‍यता ही नहीं देना चाहिए।

 आज मुस्लिम समाज में इस मसले के निराकरण को लेकर हलचल मची है। आज जरूरत है सत्‍य और सही को समझने की। हम सभी का प्रयास यह होना चाहिए कि मुस्मिल समाज की महिलाओं पर होने वाले अत्‍याचारों से उन्‍हें निजात दिलाया जाए। भारत के लिए यह सुअवसर है कि देश को हिंसामुक्‍त और अत्‍याचार मुक्‍त बनाएं। हम सभी धर्मों का सम्‍मान करने वाले लोग हैं।

उन्‍होंने कहा, ‘इस संबंध में वह अब तक दर्जनों मुस्लिम देशों में समारोह को संबोधित कर चुका हूं, हजारों मुस्लिम बुद्धिजीवियों और इस समाज के लोगों के साथ वैचारिक विमर्श कर चुका हूं। अपने इस अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि इस्‍लाम की कट्टरता और हिंसा के खिलाफ एक सुधारवाद शुरू हो गई है। मुस्लिम समाज के बीच उकसावे व भड़काऊ कृत्‍य को अंजाम देने वालों को अब बदलना होगा। हमारी ये मुहिम व्‍यापक हो गई है।

श्री रामजन्‍मभूमि मंदिर मामले को लेकर इंद्रेश कुमार ने कहा कि अयोध्‍या में राममंदिर एक विवाद न होकर लोगों की भावनाओं का सवाल है। उन्‍होंने कहा कि बाबरी मस्जिद का निर्माण लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके किया गया है। इतिहास गवाह है कि आजतक मुस्लिम समुदाय ने कभी भी वहां नमाज अदा नहीं की। कुरान में भी यह बात स्‍पष्‍ट है कि किसी भी विवादित स्‍थान पर की गई इबादत को खुदा भी स्‍वीकार नहीं करता है। इस मामले में सत्‍य तो आखिर सत्‍य है, असत्‍य से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता है। मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड की ओर इशारा करते हुए उनहोंने फिर कहा कि वे कुराफात से बाज आएं और देश के मुसलमानों को भड़काने की बजाय प्‍यार व भाईचारा को बढ़ाएं। अब सवाल यह है कि लोगों को पाक मस्जिद की जरूरत है या फिर नापाक मस्जिद की। उन्‍होंने यह भी कहा कि समय, इतिहास व सत्‍य के साथ कभी समझौता नहीं किया जा सकता है। यह मुद्दा सुलझना है और इसे हल होने से कोई नहीं रोक सकता। अब तो कुछ मुस्लिम संगठन भी राम मंदिर के निर्माण के समर्थन में उतर आए हैं। एक दिन मंदिर बनेगा और पूरा देश इसे देखेगा। मानवता और राष्‍ट्र से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता है।

उन्‍होंने कहा कि हम अभिव्यक्ति की आजादी में भरोसा रखते हैं, पर यह सब कानूनी दायरे में होना चाहिए। देश में सभी लोगों को बोलने की आजादी है, लेकिन मारपीट, हिंसा, गलतबयानी की आजादी नहीं है। हर समस्या का समाधान संवाद से निकल सकता है। लेकिन समझने और समझाने के लिए हम तैयार नहीं हैं। इस देश को अब स्‍वाभिमान से जीने की आदत डालनी चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कट्टरता फैलाने वाले का विरोध न करना अपराध है, पाप है। जेएनयू, हैदराबाद यूनिवर्सिटी में घटी घटनाएं एंटी डेमोक्रेट, एंटी सेक्‍युलर और एंटी नेशनल है। ये कतई स्‍वीकार्य नहीं है।

 चीन ने भारत के अंदरुनी मामलों में दखल देकर दलाई लामा के अरुणाचल दौरे पर रोक लगाने की बात कही। चीन ने रिश्‍ते बिगड़ने की धमकी दी। चीन ने सुरक्षा परिषद में स्‍थायी सदस्‍यता का विरोध किया और पाक आतंकी मसूद अजहर का पक्ष लिया। भारत ने इसे हस्‍तक्षेप करार दिया। अब दोहरा रवैया नहीं चल सकता है। दोहरे मापदंड से न कानून चल सकता है और न समाज।

समारोह के अंत में उन्‍होंने कहा कि अब इस मिशन को वहां तक ले जाना है, जब तक भारत विश्‍व शक्ति न बने। हम विश्‍व शांति के पुरोधा हैं, मिलकर चलेंगे और मिलकर बनाएंगे।
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Wednesday, 23 March 2016

इस्लाम टुकड़े टुकड़े में

दुनिया के मुसलमान कितने पंथों में बंटे हैं?

- सलाहुद्दीन ज़ैन 

 
चरमपंथ और के जुड़ते रिश्तों से परेशान भारत में इस्लाम की बरेलवी विचारधारा के सूफियों और नुमाइंदों ने एक कांफ्रेंस कर कहा कि वो दहशतगर्दी के खिलाफ हैं। सिर्फ इतना ही नहीं बरेलवी समुदाय ने इसके लिए वहाबी विचारधारा को जिम्मेदार ठहराया।
 
इन आरोप-प्रत्यारोप के बीच सभी की दिलचस्पी इस बात में बढ़ गई है कि आखिर ये वहाबी विचारधारा क्या है। लोग जानना चाहते हैं कि मुस्लिम समाज कितने पंथों में बंटा है और वे किस तरह एक दूसरे से अलग हैं?
इस्लाम के सभी अनुयायी खुद को कहते हैं लेकिन इस्लामिक कानून (फ़िक़ह) और इस्लामिक इतिहास की अपनी-अपनी समझ के आधार पर मुसलमान कई पंथों में बंटे हैं। बड़े पैमाने पर या संप्रदाय के आधार पर देखा जाए तो मुसलमानों को दो हिस्सों-सुन्नी और शिया में बांटा जा सकता है। हालांकि शिया और सुन्नी भी कई फ़िरकों या पंथों में बंटे हुए हैं।
 
बात अगर शिया-सुन्नी की करें तो दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि अल्लाह एक है, मोहम्मद साहब उनके दूत हैं और कुरान आसमानी किताब यानी अल्लाह की भेजी हुई किताब है। लेकिन दोनों समुदाय में विश्वासों और पैगम्बर मोहम्मद की मौत के बाद उनके उत्तराधिकारी के मुद्दे पर गंभीर मतभेद हैं। इन दोनों के इस्लामिक कानून भी अलग-अलग हैं।
 
सुन्नी : सुन्नी या सुन्नत का मतलब उस तौर तरीके को अपनाना है जिस पर पैगम्बर मोहम्मद (570-632 ईसवी) ने खुद अमल किया हो और इसी हिसाब से वे सुन्नी कहलाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया के लगभग 80-85 प्रतिशत मुसलमान सुन्नी हैं जबकि 15 से 20 प्रतिशत के बीच शिया हैं।
 
सुन्नी मुसलमानों का मानना है कि पैगम्बर मोहम्मद के बाद उनके ससुर हजरत अबु-बकर (632-634 ईसवी) मुसलमानों के नए नेता बने, जिन्हें खलीफा कहा गया। इस तरह से अबु-बकर के बाद हज़रत उमर (634-644 ईसवी), हज़रत उस्मान (644-656 ईसवी) और हज़रत अली (656-661 ईसवी) मुसलमानों के नेता बने।
 
इन चारों को ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन यानी सही दिशा में चलने वाला कहा जाता है। इसके बाद से जो लोग आए, वो राजनीतिक रूप से तो मुसलमानों के नेता कहलाए लेकिन धार्मिक एतबार से उनकी अहमियत कोई ख़ास नहीं थी।
 
जहां तक इस्लामिक क़ानून की व्याख्या का सवाल है सुन्नी मुसलमान मुख्य रूप से चार समूह में बंटे हैं। हालांकि पांचवां समूह भी है जो इन चारों से ख़ुद को अलग कहता है। इन पांचों के विश्वास और आस्था में बहुत अंतर नहीं है, लेकिन इनका मानना है कि उनके इमाम या धार्मिक नेता ने इस्लाम की सही व्याख्या की है।
दरअसल सुन्नी इस्लाम में इस्लामी क़ानून के चार प्रमुख स्कूल हैं। आठवीं और नवीं सदी में लगभग 150 साल के अंदर चार प्रमुख धार्मिक नेता पैदा हुए। उन्होंने इस्लामिक क़ानून की व्याख्या की और फिर आगे चलकर उनके मानने वाले उस फ़िरक़े के समर्थक बन गए।
 
ये चार इमाम थे- इमाम अबू हनीफ़ा (699-767 ईसवी), इमाम शाफ़ई (767-820 ईसवी), इमाम हंबल (780-855 ईसवी) और इमाम मालिक (711-795 ईसवी)।
 
हनफ़ी : इमाम अबू हनीफ़ा के मानने वाले हनफ़ी कहलाते हैं। इस फ़िक़ह या इस्लामिक क़ानून के मानने वाले मुसलमान भी दो गुटों में बंटे हुए हैं। एक देवबंदी हैं तो दूसरे अपने आप को बरेलवी कहते हैं।
 
देवबंदी और बरेलवी : दोनों ही नाम उत्तर प्रदेश के दो ज़िलों, देवबंद और बरेली के नाम पर है। दरअसल 20वीं सदी के शुरू में दो धार्मिक नेता मौलाना अशरफ़ अली थानवी (1863-1943) और अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी (1856-1921) ने इस्लामिक क़ानून की अलग-अलग व्याख्या की।
 
अशरफ़ अली थानवी का संबंध दारुल-उलूम देवबंद मदरसा से था, जबकि आला हज़रत अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी का संबंध बरेली से था। मौलाना अब्दुल रशीद गंगोही और मौलाना क़ासिम ननोतवी ने 1866 में देवबंद मदरसे की बुनियाद रखी थी। देवबंदी विचारधारा को परवान चढ़ाने में मौलाना अब्दुल रशीद गंगोही, मौलाना क़ासिम ननोतवी और मौलाना अशरफ़ अली थानवी की अहम भूमिका रही है।
भारतीय उपमहाद्वीप यानी भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान में रहने वाले अधिकांश मुसलमानों का संबंध इन्हीं दो पंथों से है।
 
देवबंदी और बरेलवी विचारधारा के मानने वालों का दावा है कि क़ुरान और हदीस ही उनकी शरियत का मूल स्रोत है लेकिन इस पर अमल करने के लिए इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है। इसलिए शरीयत के तमाम क़ानून इमाम अबू हनीफ़ा के फ़िक़ह के अनुसार हैं।
 
वहीं बरेलवी विचारधारा के लोग आला हज़रत रज़ा ख़ान बरेलवी के बताए हुए तरीक़े को ज़्यादा सही मानते हैं। बरेली में आला हज़रत रज़ा ख़ान की मज़ार है जो बरेलवी विचारधारा के मानने वालों के लिए एक बड़ा केंद्र है। दोनों में कुछ ज़्यादा फ़र्क़ नहीं लेकिन कुछ चीज़ों में मतभेद हैं। जैसे बरेलवी इस बात को मानते हैं कि पैग़म्बर मोहम्मद सब कुछ जानते हैं, जो दिखता है वो भी और जो नहीं दिखता है वो भी। वह हर जगह मौजूद हैं और सब कुछ देख रहे हैं।
 
वहीं देवबंदी इसमें विश्वास नहीं रखते। देवबंदी अल्लाह के बाद नबी को दूसरे स्थान पर रखते हैं लेकिन उन्हें इंसान मानते हैं। बरेलवी सूफ़ी इस्लाम के अनुयायी हैं और उनके यहां सूफ़ी मज़ारों को काफ़ी महत्व प्राप्त है जबकि देवबंदियों के पास इन मज़ारों की बहुत अहमियत नहीं है, बल्कि वो इसका विरोध करते हैं।
 
मालिकी : इमाम अबू हनीफ़ा के बाद सुन्नियों के दूसरे इमाम, इमाम मालिक हैं जिनके मानने वाले एशिया में कम हैं। उनकी एक महत्वपूर्ण किताब 'इमाम मोत्ता' के नाम से प्रसिद्ध है। उनके अनुयायी उनके बताए नियमों को ही मानते हैं। ये समुदाय आमतौर पर मध्य पूर्व एशिया और उत्तरी अफ्रीका में पाए जाते हैं।
शाफ़ई : शाफ़ई इमाम मालिक के शिष्य हैं और सुन्नियों के तीसरे प्रमुख इमाम हैं। मुसलमानों का एक बड़ा तबक़ा उनके बताए रास्तों पर अमल करता है, जो ज्यादातर मध्य पूर्व एशिया और अफ्रीकी देशों में रहता है। आस्था के मामले में यह दूसरों से बहुत अलग नहीं है लेकिन इस्लामी तौर-तरीक़ों के आधार पर यह हनफ़ी फ़िक़ह से अलग है। उनके अनुयायी भी इस बात में विश्वास रखते हैं कि इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है।
 
हंबली : सऊदी अरब, क़तर, कुवैत, मध्य पूर्व और कई अफ्रीकी देशों में भी मुसलमान इमाम हंबल के फ़िक़ह पर ज्यादा अमल करते हैं और वे अपने आपको हंबली कहते हैं।
 
सऊदी अरब की सरकारी शरीयत इमाम हंबल के धार्मिक क़ानूनों पर आधारित है। उनके अनुयायियों का कहना है कि उनका बताया हुआ तरीक़ा हदीसों के अधिक करीब है। इन चारों इमामों को मानने वाले मुसलमानों का ये मानना है कि शरीयत का पालन करने के लिए अपने अपने इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है।
 
सल्फ़ी, वहाबी और अहले हदीस : सुन्नियों में एक समूह ऐसा भी है जो किसी एक ख़ास इमाम के अनुसरण की बात नहीं मानता और उसका कहना है कि शरीयत को समझने और उसका सही ढंग से पालन करने के लिए सीधे क़ुरान और हदीस (पैग़म्बर मोहम्मद के कहे हुए शब्द) का अध्ययन करना चाहिए। इसी समुदाय को सल्फ़ी और अहले-हदीस और वहाबी आदि के नाम से जाना जाता है।
 
यह संप्रदाय चारों इमामों के ज्ञान, उनके शोध अध्ययन और उनके साहित्य की क़द्र करता है। लेकिन उसका कहना है कि इन इमामों में से किसी एक का अनुसरण अनिवार्य नहीं है। उनकी जो बातें क़ुरान और हदीस के अनुसार हैं उस पर अमल तो सही है लेकिन किसी भी विवादास्पद चीज़ में अंतिम फ़ैसला क़ुरान और हदीस का मानना चाहिए।
 
सल्फ़ी समूह का कहना है कि वह ऐसे इस्लाम का प्रचार चाहता है जो पैग़म्बर मोहम्मद के समय में था। इस सोच को परवान चढ़ाने का सेहरा इब्ने तैमिया और मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब हुआ और उनके नाम पर ही यह समुदाय वहाबी नाम से भी जाना जाता है। मध्य पूर्व के अधिकांश इस्लामिक विद्वान उनकी विचारधारा से ज़्यादा प्रभावित हैं। इस समूह के बारे में एक बात बड़ी मशहूर है कि यह सांप्रदायिक तौर पर बेहद कट्टरपंथी और धार्मिक मामलों में बहुत कट्टर है। सऊदी अरब के मौजूदा शासक इसी विचारधारा को मानते हैं। अल-क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन भी सल्फ़ी विचाराधारा के समर्थक थे।
 
सुन्नी बोहरा : गुजरात, महाराष्ट्र और पाकिस्तान के सिंध प्रांत में मुसलमानों के कारोबारी समुदाय के एक समूह को बोहरा के नाम से जाना जाता है। बोहरा, शिया और सुन्नी दोनों होते हैं। सुन्नी बोहरा हनफ़ी इस्लामिक क़ानून पर अमल करते हैं जबकि सांस्कृतिक तौर पर दाऊदी बोहरा यानी शिया समुदाय के क़रीब हैं।
अहमदिया : हनफ़ी इस्लामिक क़ानून का पालन करने वाले मुसलमानों का एक समुदाय अपने आप को अहमदिया कहता है। इस समुदाय की स्थापना भारतीय पंजाब के क़ादियान में मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ने की थी। इस पंथ के अनुयायियों का मानना है कि मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ख़ुद नबी का ही एक अवतार थे।
 
उनके मुताबिक़ वे खुद कोई नई शरीयत नहीं लाए बल्कि पैग़म्बर मोहम्मद की शरीयत का ही पालन कर रहे हैं लेकिन वे नबी का दर्जा रखते हैं। मुसलमानों के लगभग सभी संप्रदाय इस बात पर सहमत हैं कि मोहम्मद साहब के बाद अल्लाह की तरफ़ से दुनिया में भेजे गए दूतों का सिलसिला ख़त्म हो गया है। लेकिन अहमदियों का मानना है कि मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ऐसे धर्म सुधारक थे जो नबी का दर्जा रखते हैं।
 
बस इसी बात पर मतभेद इतने गंभीर हैं कि मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग अहमदियों को मुसलमान ही नहीं मानता। हालांकि भारत, पाकिस्तान और ब्रिटेन में अहमदियों की अच्छी ख़ासी संख्या है। पाकिस्तान में अहमदियों पर हिंसक मामले ज़्यादा देखने को मिलते हैं। पाकिस्तान में तो आधिकारिक तौर पर अहमदियों को इस्लाम से ख़ारिज कर दिया गया है।
 
शिया : शिया मुसलमानों की धार्मिक आस्था और इस्लामिक क़ानून सुन्नियों से काफ़ी अलग है। वह पैग़म्बर मोहम्मद के बाद ख़लीफ़ा नहीं बल्कि इमाम नियुक्त किए जाने के समर्थक हैं। उनका मानना है कि पैग़म्बर मोहम्मद की मौत के बाद उनके असल उत्तारधिकारी उनके दामाद हज़रत अली थे। उनके अनुसार पैग़म्बर मोहम्मद भी अली को ही अपना वारिस घोषित कर चुके थे लेकिन धोखे से उनकी जगह हज़रत अबू-बकर को नेता चुन लिया गया।
 
शिया मुसलमान मोहम्मद के बाद बने पहले तीन ख़लीफ़ा को अपना नेता नहीं मानते बल्कि उन्हें ग़ासिब कहते हैं। ग़ासिब अरबी का शब्द है जिसका अर्थ हड़पने वाला होता है।
उनका विश्वास है कि जिस तरह अल्लाह ने मोहम्मद साहब को अपना पैग़म्बर बनाकर भेजा था उसी तरह से उनके दामाद अली को भी अल्लाह ने ही इमाम या नबी नियुक्त किया था और फिर इस तरह से उन्हीं की संतानों से इमाम होते रहे। आगे चलकर शिया भी कई हिस्सों में बंट गए।
 
इस्ना अशरी : सुन्नियों की तरह शियाओं में भी कई संप्रदाय हैं लेकिन सबसे बड़ा समूह इस्ना अशरी यानी बारह इमामों को मानने वाला समूह है। दुनिया के लगभग 75 प्रतिशत शिया इसी समूह से संबंध रखते हैं। इस्ना अशरी समुदाय का कलमा सुन्नियों के कलमे से भी अलग है।
 
उनके पहले इमाम हज़रत अली हैं और अंतिम यानी बारहवें इमाम ज़माना यानी इमाम महदी हैं। वो अल्लाह, क़ुरान और हदीस को मानते हैं, लेकिन केवल उन्हीं हदीसों को सही मानते हैं जो उनके इमामों के माध्यम से आए हैं।
 
क़ुरान के बाद अली के उपदेश पर आधारित किताब नहजुल बलाग़ा और अलकाफ़ि भी उनकी महत्वपूर्ण धार्मिक पुस्तक हैं। यह संप्रदाय इस्लामिक धार्मिक क़ानून के मुताबिक़ जाफ़रिया में विश्वास रखता है। ईरान, इराक़, भारत और पाकिस्तान सहित दुनिया के अधिकांश देशों में इस्ना अशरी शिया समुदाय का दबदबा है।
 
ज़ैदिया : शियाओं का दूसरा बड़ा सांप्रदायिक समूह ज़ैदिया है, जो बारह के बजाय केवल पांच इमामों में ही विश्वास रखता है। इसके चार पहले इमाम तो इस्ना अशरी शियों के ही हैं लेकिन पांचवें और अंतिम इमाम हुसैन (हज़रत अली के बेटे) के पोते ज़ैद बिन अली हैं जिसकी वजह से वह ज़ैदिया कहलाते हैं। उनके इस्लामिक़ क़ानून ज़ैद बिन अली की एक किताब 'मजमऊल फ़िक़ह' से लिए गए हैं। मध्य पूर्व के यमन में रहने वाले हौसी ज़ैदिया समुदाय के मुसलमान हैं।
 
इस्माइली शिया : शियों का यह समुदाय केवल सात इमामों को मानता है और उनके अंतिम इमाम मोहम्मद बिन इस्माइल हैं और इसी वजह से उन्हें इस्माइली कहा जाता है। इस्ना अशरी शियों से इनका विवाद इस बात पर हुआ कि इमाम जाफ़र सादिक़ के बाद उनके बड़े बेटे इस्माईल बिन जाफ़र इमाम होंगे या फिर दूसरे बेटे।
 
इस्ना अशरी समूह ने उनके दूसरे बेटे मूसा काज़िम को इमाम माना और यहीं से दो समूह बन गए। इस तरह इस्माइलियों ने अपना सातवां इमाम इस्माइल बिन जाफ़र को माना। उनकी फ़िक़ह और कुछ मान्यताएं भी इस्ना अशरी शियों से कुछ अलग है।
 
दाऊदी बोहरा : बोहरा का एक समूह, जो दाऊदी बोहरा कहलाता है, इस्माइली शिया फ़िक़ह को मानता है और इसी विश्वास पर क़ायम है। अंतर यह है कि दाऊदी बोहरा 21 इमामों को मानते हैं।
उनके अंतिम इमाम तैयब अबुल क़ासिम थे जिसके बाद आध्यात्मिक गुरुओं की परंपरा है। इन्हें दाई कहा जाता है और इस तुलना से 52वें दाई सैय्यदना बुरहानुद्दीन रब्बानी थे। 2014 में रब्बानी के निधन के बाद से उनके दो बेटों में उत्तराधिकार का झगड़ा हो गया और अब मामला अदालत में है।
 
बोहरा भारत के पश्चिमी क्षेत्र ख़ासकर गुजरात और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं जबकि पाकिस्तान और यमन में भी ये मौजूद हैं। यह एक सफल व्यापारी समुदाय है जिसका एक धड़ा सुन्नी भी है।
 
खोजा : खोजा गुजरात का एक व्यापारी समुदाय है जिसने कुछ सदी पहले इस्लाम स्वीकार किया था। इस समुदाय के लोग शिया और सुन्नी दोनों इस्लाम मानते हैं। ज़्यादातर खोजा इस्माइली शिया के धार्मिक क़ानून का पालन करते हैं लेकिन एक बड़ी संख्या में खोजा इस्ना अशरी शियाओं की भी है। लेकिन कुछ खोजे सुन्नी इस्लाम को भी मानते हैं। इस समुदाय का बड़ा वर्ग गुजरात और महाराष्ट्र में पाया जाता है। पूर्वी अफ्रीकी देशों में भी ये बसे हुए हैं।
 
नुसैरी : शियों का यह संप्रदाय सीरिया और मध्य पूर्व के विभिन्न क्षेत्रों में पाया जाता है। इसे अलावी के नाम से भी जाना जाता है। सीरिया में इसे मानने वाले ज़्यादातर शिया हैं और देश के राष्ट्रपति बशर अल असद का संबंध इसी समुदाय से है। इस समुदाय का मानना है कि अली वास्तव में भगवान के अवतार के रूप में दुनिया में आए थे। उनकी फ़िक़ह इस्ना अशरी में है लेकिन विश्वासों में मतभेद है। नुसैरी पुर्नजन्म में भी विश्वास रखते हैं और कुछ ईसाइयों की रस्में भी उनके धर्म का हिस्सा हैं। इन सबके अलावा भी इस्लाम में कई छोटे छोटे पंथ पाए जाते हैं।
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Monday, 29 February 2016

Why has South India’s Catholic Church re-inducted a convicted child molester priest? Isn’t it a moral travesty?

Child Sexual Abuse

Why has South India’s Catholic Church re-inducted a convicted child molester priest?Isn’t it a moral travesty?

Screen grab from a CNN intv
On August 24, 2005, the diocese of Crookton in Minnesota received an anonymous complaint stating that an Indian priest, Father Joseph Palanivel Jeyapaul, working at the church had sexually assaulted a minor.
A second victim later came forward. Another young girl who had wanted to become a nun had been sexually assaulted by Father Jeyapaul. The man hailing from Tamil Nadu rushed back to India and after almost a decade of legal wrangles, he was convicted by the Minnesota court and sentenced to a year in prison in 2015.
After serving a shorter prison term, Jeyapaul returned to India a few months ago. And in a move that has shocked child right activists in the state; the Roman Catholic Church of Southern India has now lifted the suspension against him.
He was sentenced a shorter term in jail based on a plea bargain, with the condition that he does not get back to ministerial duties or get in contact with children.
While the international media had first reported on the lifting of the suspension, the Ootacamund Diocese in Tamil Nadu confirmed to The News Minute that the church was not averse to allotting a role to Father Jeyapaul in the church ministry.
Sebastian Selvanathan, Spokesperson, Ooty Diocese told TNM, “He was released from the prison in USA through a court order. His case was then referred to the Doctrine of Faith in Rome. According to the direction from there, the suspension was lifted. He has not been given ministry now, if he is given, it will be given with certain restrictions.” Doctrine of Faith is a congregation of the Roman Curia.
Catholic Bishops' Conference of India refuses to comment
Father Gyanprakash Topno, spokesperson of the Catholic Bishops' Conference of India refused to comment on Ootacamund diocese' decision. "We cannot comment on the decision sitting here in Delhi. It is the decision taken by the Ootacamund diocese. They must have reinstated him keeping in mind various factors that we cannot at the moment question. As far as I know he is not been given a position as yet,” he said.
This is in clear contrast to the position taken by the Catholic Bishops' Conference of India in 2010.A plenary meeting of this apex body of catholic churches in India had then said that they would have a zero-tolerance policy to abuse of children in institutions run by the Church.
The church body had then said that “any clergy member accused of sexual abuse would be suspended from all priestly duties, and in extreme cases, the Church would consider defrocking the priest”.
When asked about the Child Protection Policy of the church, Father Gyanprakash Topno reiterated that the decision was by the Roman Catholic Church in South India, and they cannot comment. 
Vidya Reddy of - Tulir - Centre for the Prevention and Healing of Child Sexual Abuse (CPHCSA) calls it a case of mockery. “It is unfortunate that child protection is treated so trivially by the church that runs so many educational inst. If this is the way Jeyapaul is being dealt with, what is going to be the church’s response to all the cases in which Indian priests have been accused? It makes a mockery of the recent proclamation by the church that  they will look at child protection seriously,” she told TNM.
Attorney Jeff Anderson of St. Paul, Minnesota, who represented the girls in the case, criticized church authorities for lifting Jeyapaul's suspension, said, "The Vatican must be held accountable.... This is on them. This is on the pope," Anderson said.
While Peterson has spoken publicly about her case before in hopes that it would help others, Anderson said she was too upset to comment Saturday. "They're both quite upset, disturbed and feel deeply betrayed that they would have the audacity to consider even putting him back in ministry," Anderson said. "To use Megan's words, 'They'll never get it and I'm feeling re-victimized.'"
But why is the Ooty church backing Father Jeyapaul relentlessly?
In 2005, despite repeated letters from Bishop Victor Balke of the Minnesota church, the Ootacamund diocese failed to act against Jeyapaul. Bishop Balke, through several letters, clearly said that he believed Jeyapaul was guilty not just of sexual misconduct, but of financial misappropriation. The News Minute has these letters.
That’s not all. In spite of the complaints, Jeyapaul was made the secretary for the Diocesan Commission for Education in the Diocese of Ootacamund. It was only in 2006 when Archbishop Angelo Amato, secretary of Church Development Fund insisted that Jeyapaul was suspended from ministerial activities.
Statement of Megan Peterson during the case- "Father Jeyapaul then told me that it was a sin if I didn't cooperate. He raped me, both orally and vaginally.
After he was finished with me, he told me that I had to confess. I had always been taught how wrong it was to have pre-marital sex.  I felt as if I didn't have a choice. So I did as he asked. Most mornings before school or in the afternoons following class, he would continue to rape me while I was in the confessional.  Then he would give me penance."
Inputs by Divya Karthikeyan, Pheba Mathew and Sarayu Srinivasan.
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Thursday, 18 February 2016

Entire J&K including PoK is integral part of India: UK MP

SOURCE: PTI
A UK lawmaker Tuesday said that the entire state of Jammu and Kashmir, including parts “illegally controlled” by Pakistan, were integral part of India. “State of Jammu and Kashmir in totality is part of India an integral part of India and it needs to be reunited and should come under the dominion of India,” UK Member parliament and leader of ruling conservative party Robert John Blackman told reporters in Jammu during a meet the press function organized by the Press Club of Jammu.
Blackman said Pakistan must vacate the territory of Jammu and Kashmir “illegally occupied” by that country.
“The erstwhile ruler of Jammu and Kashmir had signed instrument of accession with India and given the control of the entire state of Jammu and Kashmir to India, it is Pakistan which illegally occupied its territory which it should hand back to India through negotiation,” he said.
Blackman said that as both the countries were nuclear power, so there was no question of both the nations for going on war for Kashmir, but Pakistan must itself vacate the territory and hand it over to India.
The lawmaker from the Harrow East constituency in England said that in the past Pakistan lobby had strong presence in the UK parliament but things have changed and people like him who are “friends of India” have been started speaking about India.
He said that the ties between India and the United Kingdom have grown stronger even since Prime Minister Narendra Modi took over the reins of power in India and his last year’s “historic visit” to UK has further strengthened the bond.
Invoking the Gujarat model of development he said that Prime Minister Narendra Modi has a vision to develop India as an economic and military power of the east and United Kingdom was ready to provide all possible support to India for attaining the goal.
He said Modi has been working tirelessly to take India to “greater heights”, he said.
He said India has been a victim of terrorism originating from Pakistani soil and it should take measures to rein in the “forces” that spread terrorism in countries like India.
Asked why UK does not declare Pakistan as a terrorist state, Blackman said he cannot speak on behalf of the UK government, but he was aware of the terrorist attacks that India faced and that originated from the Pakistani soil.
He said that UK government was aware of the terrorism being faced by India and it stands shoulder to shoulder with India to combat terrorism.
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Thursday, 11 February 2016

The Blockade is Over but Nepal's Young Madhesis are determined to keep thier Agitation alive

The blockade is over but Nepal's young Madhesis are determined to keep their agitation alive

An old demand that their Terai region should secede from the country is gaining new currency.
 
Photo Credit: Anumeha Yadav
Madhesi protestors have lifted the four-month blockade of the India-Nepal open international border at Birgunj. On February 5, the first trucks rolled across the Maitreyi bridge, which connects Raxaul in Bihar's East Champaran to Birgunj in Nepal, just 150 km away from the capital Kathmandu.
The agitation began in September, shortly after Nepal's parliament ratified the country's new Constitution, as Scroll.in reported earlier in thisseries. The Madhesis – a term for several communities living in Nepal's central and eastern plains who have close cultural and family ties to India – fear that the new statute will perpetuate the discrimination they have long faced. Kathmandu, however, accused India of imposing an unofficial blockade on the landlocked country, a charge denied by New Delhi.
The agitation caused an enormous shortage of fuel and essential goods in Nepal.
Since last weekend, the tents and bamboo poles blocking the Maitreyi bridge, the most visible symbols of the protest, have disappeared. What is left is the memory of the human cost – 55 civilians and seven policemen lost their lives in the agitation – and an over-arching question: How has the turmoil shaped the views of youth in towns like Birgunj, which were at the epicenter of the protests?
State brutality
On January 15, when negotiations between a coalition of Madhes-based parties and the three major Nepali political parties were still in progress in Kathmandu, protestors had for the first time since September allowed two-wheelers onto the Maitreyi bridge.
A few kilometers away, at the clock tower on a busy crossroads at the center of Birgunj town, a large crowd thronged an exhibition of photographs chronicling the agitation.
Chandan Gupta, a 19-year old student of business administration, was in the crowd. Gupta, clad in the signature t-shirt and jacket of the young, said he had taken part in several of the protests.
“This photograph shows a man impersonating Sushil Koirala [Nepal’s prime minister from February 2014-October 2015], wearing shoes around his neck because Koirala ratified a biased Constitution,” said Gupta, as he walked along the exhibits, pausing occasionally to point out photographs of special interest.
“This next one shows Newar women, a community from the hill region, supporting the Madhesi agitation... Here, a goat is dressed as current Prime Minister KP Oli, little children are leading it... Men, women, and children had formed a 1,100 kilometer-long human chain all along the plains from east to west, but Oli called us a swarm of flies for organising it.”
Gupta's family migrated to Birgunj 12 years ago from a village in the adjoining Bara district to set up a small hardware business. Though communities from Nepal's hills and plains had struggled together for a democratic Constitution, the hill communities – who had greater numbers in parliament – had ratified a Constitution inimical to Madhesi interests, he claimed.
This, he said, was in line with Nepal's history, throughout which Madhesis had been given “no rights to their civilisation” and were slightingly referred to as "Dhotis" and "Biharis", among other pejorative terms.
Gupta, who by then had been joined by some of his classmates, recalled that last September, Nepal Armed Police had fired at protestors marching towards this same clock tower. One of his friends fished out his mobile phone to show images of bullet-ridden bodies of protestors that had been circulated on WhatsApp. “The government was sending the army here dressed as policemen,” said Chandan.
Chandan's friend Harish believes there was an ethnic bias in how security personnel were deputed during the protests. “The government gave only sticks to Madhesi security personnel and put them on the frontline," he claimed. "The Pahadi security personnel stood behind, and fired at Madhesi protestors with powerful guns.”
Eleven people, including children, were killed when the police fired on protestors in Birgunj.
Eleven people, including children, were killed when the police fired on protestors in Birgunj.
Social and institutional polarisation
Mainstream Nepali publications provided little ground reportage of the protests, but young Madhesis living in Kathmandu and abroad have been publishing analysis and news on independent web platforms such as Madhesi Youth.
Local FM radio stations took sides. “The media in Kathmandu was speaking the official line, and Terai's local media became the voice of the movement,” said Suresh Bidari, a radio jockey with Narayani FM. Once the protests picked up steam, the radio station changed its format. Where once it focused on film music, it now began broadcasting interviews with protestors, farmers, and political activists through the day, he said.
Bidari, in his 20s, belongs to a community from the hilly regions; his family had moved to the Terai seven years back. Despite being a "Pahadi" he supports the Madhesi movement, though he does not agree with all of its demands.
“The Madhesis have been ruled for 250 years by people from the hills,” said Bidari. "They must be treated as equal citizens, and get full citizenship even if they have cross-border marriages." But he did not support seemankan, the demand that provincial boundaries be redrawn.
A key demand of the alliance of Madhes-based parties is that the plains be divided into no more than two provinces. The government for its part has proposed seven provinces, drawn such that in four of five provinces in the plains, areas with large Madhesi population have been merged into hill regions. Madhesi leaders have demanded that Jhapa, Morang and Sunsari districts in the east be included in a contiguous Madhes province, which will have access to water from the river Kosi in the east.
Said a young professional who did not wish to be named: “What will I, as a resident of Birgunj, get if we get a Jhapa district? Instead, it would be better if they asked for a hill district so we can access hydel power.”
Such sharp differences over issues, and over the question of who participated in the agitation and who did not, have polarised younger people. “For me, the main issue is that Madhesis face discrimination,” said Aashu Saraf, a 21-year old photojournalist and undergraduate student. “I don't support the demarcation demand and yet, since I have started speaking about the andolan actively on Facebook, my friends of several years from school and college have distanced themselves from me. I had never thought this would happen.”
Members of a band called Sanskriti jamming in a restaurant in Birgunj.
Members of a band called Sanskriti jamming in a restaurant in Birgunj.
'At least, we will live with dignity'
In peri-urban areas and villages, where most of the young protestors came from, there is a wider acceptance of the demand for demarcation and a willingness to continue the agitation in some form.
In Barjari, near Jaleswar in Mahottari district, the protests were so intense that Neha Jha, a student of commerce in class XI, could not attend school for nearly two months. On a January afternoon, she was returning after her final exams, walking down a path that led to her house in the village. “The demarcation issue is crucial because right now, the main Madhes province is between two rivers and we have access to neither of them,” she said. “This means farmers will get no water for irrigation. What will people do then? Already, Madhesis are denied jobs in government.”
Though she had stayed at home, her family members and neighbours had taken part in the protests, and Neha has vivid memories of the chaos. “The police were coming towards this path here in their vehicles, firing from inside, and people were running, and throwing stones at them.”
She recalled how Rohan Chaudhary, a secondary school student from her neighbourhood, was fatally shot in the chest while he was returning from private tuitions. Two days later, Rohan's grandfather Ganesh Chaudhary was shot in the head by the police when he went to the market to purchase things for Rohan's cremation.
“The police were oppressive,” Jha said. “Theandolankari set a police chowki on fire, they killed a policeman, setting him on fire – they also didn't do the right thing.”
Jha found the violence and the political impasse exasperating. “The government will not agree to demarcation, and leaders here won't agree to wait for more months,” she said. “If the Nepal government will not give us rights, then I think it will be alright for us to fight for a separate nation. Why fight again and again over demarcation? Even if more people die in a future agitation, at least we will live with dignity.”
The sentiment Neha Jha articulated had been already voiced ten years earlier by armed secessionist groups in the region. While the strength of these groups has ebbed over time, the demand for an independent Terai state has been raised repeatedly in recent years by Chandra Kant Raut, a computer scientist and political campaigner.
In 2014, the Nepalese government charged Raut with sedition and has arrested him twice. Last month, Raut's acquittal was upheld by Nepal's Supreme Court.
Secessionism as final solution?
Madhes-based parties have consistently argued that if their agitation for a separate province within Nepal fails, it will pave the way for more extreme secessionist demands, such as Raut's.
On a visit to Delhi recently, Raut argued that the failure of Madhes-based parties this January to get the Constitution amended as per their demands proved that Nepal’s parliamentary politics was “a step in the wrong direction”.
Raut said his plan is to hold fresh elections independently in every village in the Terai, elect a constituent assembly, and form an interim Terai government. “Till we do this, and till have our own army, Madhesis will never have control over their natural resources or the economy,” he said. “First and foremost, Madhesi youth have to fight for their freedom.”
Chandrakishore Jha, a political analyst and writer who lives in Birgunj, said the demand for a separate state is not feasible, and would only invite more state repression.
However, though Raut has been actively campaigning for a free Madhes only since a couple of years, his campaign has successfully reached a wide range of youth across social classes, and spanning the political spectrum. Rajat Pandey, a 16-year old studying in boarding school in Pithoragarh, Uttarakhand, who was on a visit to his home in Pipra village near Janakpur, said he regularly read Raut's Facebook page for updates, and that he backed the demand for an independent Terai state as “timely and legal.”
Chandan Gupta, the business administration student in Birgunj, said he had been deeply moved by Raut's speech at Birgunj's clock tower the day Raut was arrested in 2015. “Raut is a scientist and he has studied Madhesi history,” Gupta said. “He has been saying for two years that we will not get a fair Constitution, but these political parties did not pay any attention."
He added: "Dard bhara speech hai uska (His speeches are filled with emotion). The day he was at the clock tower to deliver a speech, hundreds of policemen came to arrest him but the students would not let them take him.”
Given the sense of alienation that prevails, some young people see Raut’s strategy as an inevitable option. “Madhesis were doing a peacefulGandhivaadi andolan, but the government heartlessly fired at them,” said Ram Lal Das, a 22-year old teacher from Duhabi panchayat in Dhausa district. “It is a cruel khaswaadi political regime. It does not consider the Madhesis its people.”
Ram Ratan Das, a 30-year old mason in Janakpur, said he had read out Raut's pamphlets on secessionism at political rallies at Madhwapura near his village. “We will fight in the current course till we are able,” said Das. “Otherwise, we will ask for a separate state. That will be like a surgery, the final treatment.”
Charred motorcycles lie at a chowk in Janakpur, where a curfew was imposed after three youth died in police firing on January 21.
Charred motorcycles lie at a chowk in Janakpur, where a curfew was imposed after three youth died in police firing on January 21.
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