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“गीता” : एक ‘मानवीय ग्रंथ’ … एक ‘समग्र जीवन दर्शन’ … व ‘मानव समाज की अप्रतिम धरोहर’

            "गीता” का शाब्दिक अर्थ केवल गीत अर्थात् जो गाया जा सके से लिया जाता है । किन्तु आतंरिक रूप से इसका अर्थ है कि जिस...

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Thursday, 14 December 2017

“गीता” : एक ‘मानवीय ग्रंथ’ … एक ‘समग्र जीवन दर्शन’ … व ‘मानव समाज की अप्रतिम धरोहर’

           


"गीता” का शाब्दिक अर्थ केवल गीत अर्थात् जो गाया जा सके से लिया जाता है । किन्तु आतंरिक रूप से इसका अर्थ है कि जिसने अपने गीत को पा लिया है, स्वयं के छन्द को जान लिया है, स्वच्छंद हो गया है । माना जाता है कि पूर्व अध्यात्म की यात्रा पर ध्यान केन्द्रित करता है और पश्चिम विज्ञान की । किन्तु सत्यता इससे भी गूढ़ है । गीता के द्वारा मनुष्य अध्यात्म और विज्ञान, दोनों ही की पराकाष्ठा को प्राप्त कर लेता है ।

‘गीता’ किसी विशेष धर्म या संप्रदाय की पुस्तक नहीं है ।अपितु यह एक एक जीवंत ग्रन्थ है। जिसका दृष्टिकोण विश्चजनीन है| ज्ञान-यज्ञ का यह ग्रन्थ मानव-मात्र के हित के लक्ष्य से प्रेरित है। आज ‘योग’ जिस तरह पतंजलि के सूत्रों के कारण,भारत और हिन्दू धर्म की परिधि में सीमित न रहकर सम्पूर्ण संसार में ग्राह्य हो गया है, उसी तरह ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ भी अपने देश-काल को लाँघकर सम्पूर्ण विश्व की वैचारिक संपत्ति बन गई है । अध्यात्म और कर्म अथवा निवृत्ति एवम् प्रवृत्ति के द्वंद को समाहित करनेवाली यह कृति मानव-जीवन की चरितार्थता की खोज करती है । चतुर्दिक व्याप्त संघर्ष और दिग्भ्रम के वातावरण में इसकी उपयोगिता एक औषधि की तरह है।
महाभारत के अंत में एक विशेष प्रसंग आता है जहाँ अर्जुन कृष्ण से पुनः गीता सुनाने को कहते हैं, क्योंकि जो ज्ञान दिया गया था, अर्जुन को उसकी विस्मृति हो गई थी । तब कृष्ण कहते हैं-
‘‘न शक्यं तन्मया भूयस्तथा वक्तुमषेशत: ।
परं हि ब्रह्म कथितं योग युक्तेन तन्मया ॥
(महा/अश्‍वमेधिकपर्व/अनुगीता/अध्याय १६)
अर्थात् वह उपदेश, उसी रूप में दोहराना मेरे वश में नहीं; क्योंकि उस समय, योगयुक्त होकर मैंने उस ब्रह्मविद्या का वर्णन किया था|
इस वक्तव्य से स्पष्ट होता है कि गीता का सम्पूर्ण ज्ञान ध्यान की उच्च अवस्था में प्रदान किया गया था । अतः ध्यान के द्वारा प्राप्त गीता का ज्ञान मानव कल्याण के लिए ही उत्पन्न हुआ है ।

कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में विषादग्रस्त अर्जुन को मोह और अवसाद से मुक्त किया था। आज भी ‘महाभारत’ चल रहा है । लोग किंकर्तव्य विमूढ़ हैं । वे कर्म और उद्देश्य से कटकर निरर्थक विचारों के ऊहापोह में डूब गए हैं । ऐसे संशयग्रस्त समय में ‘गीता’ मार्गदर्शिका के रूप में सामने है । अनिर्णय में झूलनेवाले का व्यक्तित्व खंडित हो जाता है । मानसिक दृष्टि से टूटे हुए लोग समाज, देश और संसार का कल्याण नहीं कर सकते हैं । ‘गीता’ उन भग्नचित व्यक्तियों का उपचार करने में समर्थ है।

‘महाभारत’ का ‘अन्धायुग’ अभी समाप्त नहीं हुआ है । सत्तासीन जन धृतराष्ट्र की तरह बेचारे हैं।वे केवल निष्क्रिय बुद्धिजीवी संजय से ‘कुरुक्षेत्र’ की कथा पूछते हैं।नारी-शक्ति के नेत्रों पर गांधारी की पट्टी बँधी हुई है।अनेक झंडे उड़ रहे हैं।वाहनों की विपुलता है।विविध शंखध्वनियाँ गूँज रही हैं।गांडीव का गौरव गल रहा है।अर्जुन अवसन्न है। द्वापर का यह दृश्य सर्वत्र देखा जा सकता है।मनुष्यता को मार्ग नहीं मिल रहा है।ऐसी स्थिति में ‘गीता’ के संदेशों की प्रासंगिकता सभी देशों में अनुभूत ही रही है।

‘गीता’ आकारतः छोटी पुस्तक है, किन्तु उसकी लपेट में सम्पूर्ण त्रिलोक और त्रिकाल है। जिस तरह कृष्ण की विभूतियॉं सर्वत्र फैली हुई हैं और उनके विराट रूप में सब-कुछ समाविष्ट है उसी तरह ‘गीता’ विविध विचारों के बीच संतुलन के उस सेतु की प्रतीति कराती है, जिस पर सभी रंगों, नस्लों, और राष्ट्रों के लोंगों को चलने की स्वतंत्रता है।

‘गीता’ जहाँ एक ओर काव्य प्रतीत होती है वहीँ दूसरी ओर समाज के यथार्थ को संबोधित भी करती है | सभी के प्रश्नों की उत्तर-कुंजिका है यह । प्रश्न चाहे निजी हो, सत्ता का हो, विज्ञान का हो, आधुनिकता का हो, श्रद्धा व विशवास का हो अथवा अध्यात्म के रस से परिपूर्ण हो- उत्तर गीता में दृष्टव्य है । इसी कारण से यह ग्रन्थ किसी कवि के द्वारा लिखी गई निजी संपत्ति नहीं है अपितु मानव सभ्यता की सम्पति होती है । जिस तरह शेक्सपियर केवल इंगलैण्ड के नहीं हैं और तुलसीदास पर हिन्दी का ही हक़ नहीं है उसी तरह ‘व्यास’ एवम् ‘गीता’ को हम केवल संस्कृत तथा भारत से जोड़ने का अपराध नहीं कर सकते हैं । विश्व की साझी विरासत के रूप में ‘गीता’ की महत्ता अक्षुण्ण है । अध्यात्म के फलक पर लोक-शिक्षण की इस रचना में उपनिषदों का पोषक दुग्ध संचित है । इस वैचारिक आहार पर हिन्दू,जैन,बौद्ध, यहूदी, मुस्लिम, ईसाई, सिख आदि सभी समुदायों का अधिकार है।इसका काव्यत्व सबके लिए आधारक और तोषप्रद है। निश्चय ही पूरी मानवता इससे प्रेरणा ले सकती है।

अल्प शब्दों में कहें तो ‘गीता’ एक “मानवीय-ग्रन्थ” है और एक सार्वजनीन “समग्र मानवीय जीवन-दर्शन” भी है।

यद्यपि “गीता” की व्यापकता, प्रभाव व संस्कार मानव जीवन में असीमित व अनन्त है ।”गीता” की सार्वभौमिकता व सर्वव्याप्तता को ध्यान में रख आज एक सीमित परिचर्चा निम्नांकित विषयों पर की जा सकती है।
राष्ट्रिय / सामाजिक / वैयक्तिक जीवन के विभिन्न पहलुओ पर चंद निम्न श्लोक पूर्ण मार्ग दर्शन करते है जो हर स्तर के प्रबंधन की सम्पूर्ण कुंजी है.
Geeta is a management gospel covering every aspect of life, be it national level, society level or individual level. It gives the direction to handle various aspects of life and provides guidelines for every individual in respect of his duties and rights.

1. Good Governance and social setup
सुसाषन वैयक्तिक लक्ष्य और सामाजिक व्यवस्था – गीता श्लोक 3.21
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥३- २१॥

2 . Duties of state towards law and order for the benefit of society
समाज विधायक निति और उसका उद्देश्य
गीता श्लोक 4.8
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥

3 . Self-development and its role in social order
नागरिक जीवन का चरमोत्कर्ष एवं सामाजिक व्यवस्था में उसका योगदान – गीता 6.5
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥६- ५॥

4. Doctrine of right to act and concept of freewill
स्वतन्त्र समाज में वैयक्तिक अधिकार – गीता 2.47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥२- ४७॥
5. Philosophy of detachment in life as attachment leads to unrest
तृष्णा एवं लालसा से सामाजिक अव्यवस्था व असहिष्णुता का जन्म – गीता 2.62
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥२- ६२॥
6.– Fallacy in change of religion – clear guideline
धर्मं परिवर्तन एक अनावश्यक व अवनति का मार्ग – गीता 3.35
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥३- ३५॥

7. Law of co-existence and concept of brotherhood – Live and let live
वसुधैव कुटुम्बकम का सिद्धांत – गीता 6. 30
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६- ३०॥

8. No place for ill will in society
भारतीय सामाजिक व्यवस्था ईर्ष्या व द्वेष का स्थान नहीं – गीता 5.3
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥५- ३॥

9. Ideal living order for individuals
आदर्श जीवन व्यवस्था – गीता 2.38
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥२- ३८॥

आई आई एम से लेकर दूसरे मैनेजमेंट स्कूल्स तक में गीता को प्रबंधन की किताब के रुप में पहचान मिली है। गीता दुनिया के उन चंद ग्रंथों में शुमार है जो आज भी सबसे ज्यादा पढ़े जा रहे हैं और जीवन के हर पहलू को गीता से जोड़कर व्याख्या की जा रही है। कुरुक्षेत्र में युद्ध के मुहाने पर खड़ी कौरवों और पांडवों की सेना के बीच भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया वो गीता माना गया है।
आखिर गीता में ऐसा क्या है जो उसे इतना पढ़ा जाता है। इसके 18 अध्यायों के करीब 700 श्लोकों में हर उस समस्या का समाधान है जो कभी ना कभी हर इंसान के सामने आती है। आज हम आपको गीता के कुछ चुनिंदा प्रबंधन सूत्रों से रू-ब-रू होते हैं-

श्लोक-
योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय। सिद्धय-सिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।
हे धनंजय (अर्जुन)। कर्म न करने का आग्रह त्यागकर, यश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर योगयुक्त होकर, कर्म कर, (क्योंकि) समत्व को ही योग कहते हैं।
मैनेजमेंट सूत्र – धर्म का अर्थ होता है कर्तव्य। धर्म के नाम पर हम अक्सर सिर्फ कर्मकांड, पूजा-पाठ, तीर्थ-मंदिरों तक सीमित रह जाते हैं। हमारे ग्रंथों ने कर्तव्य को ही धर्म कहा है। भगवान कहते हैं कि अपने कर्तव्य को पूरा करने में कभी यश-अपयश और हानि-लाभ का विचार नहीं करना चाहिए। बुद्धि को सिर्फ अपने कर्तव्य यानी धर्म पर टिकाकर काम करना चाहिए। इससे परिणाम बेहतर मिलेंगे और मन में शांति का वास होगा। मन में शांति होगी तो परमात्मा से आपका योग आसानी से होगा। आज का युवा अपने कर्तव्यों में फायदे और नुकसान का नापतौल पहले करता है, फिर उस कर्तव्य को पूरा करने के बारे में सोचता है। उस काम से तात्कालिक नुकसान देखने पर कई बार उसे टाल देते हैं और बाद में उससे ज्यादा हानि उठाते हैं।

श्लोक-
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कुत: सुखम्।।
योगरहित पुरुष में निश्चय करने की बुद्धि नहीं होती और उसके मन में भावना भी नहीं होती। ऐसे भावनारहित पुरुष को शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहीं, उसे सुख कहां से मिलेगा।
मैनेजमेंट सूत्र – हर मनुष्य की इच्छा होती है कि उसे सुख प्राप्त हो, इसके लिए वह भटकता रहता है, लेकिन सुख का मूल तो उसके अपने मन में स्थित होता है। जिस मनुष्य का मन इंद्रियों यानी धन, वासना, आलस्य आदि में लिप्त है, उसके मन में भावना ( आत्मज्ञान) नहीं होती। और जिस मनुष्य के मन में भावना नहीं होती, उसे किसी भी प्रकार से शांति नहीं मिलती और जिसके मन में शांति न हो, उसे सुख कहां से प्राप्त होगा। अत: सुख प्राप्त करने के लिए मन पर नियंत्रण होना बहुत आवश्यक है।

श्लोक-
विहाय कामान् य: कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:।
निर्ममो निरहंकार स शांतिमधिगच्छति।।
जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर ममता रहित और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है, उसे ही शांति प्राप्त होती है।
मैनेजमेंट सूत्र – यहां भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा। हम जो भी कर्म करते हैं, उसके साथ अपने अपेक्षित परिणाम को साथ में चिपका देते हैं। अपनी पसंद के परिणाम की इच्छा हमें कमजोर कर देती है। वो ना हो तो व्यक्ति का मन और ज्यादा अशांत हो जाता है। मन से ममता अथवा अहंकार आदि भावों को मिटाकर तन्मयता से अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा। तभी मनुष्य को शांति प्राप्त होगी।

श्लोक-
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।।
कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है।
मैनेजमेंट सूत्र – बुरे परिणामों के डर से अगर ये सोच लें कि हम कुछ नहीं करेंगे, तो ये हमारी मूर्खता है। खाली बैठे रहना भी एक तरह का कर्म ही है, जिसका परिणाम हमारी आर्थिक हानि, अपयश और समय की हानि के रुप में मिलता है। सारे जीव प्रकृति यानी परमात्मा के अधीन हैं, वो हमसे अपने अनुसार कर्म करवा ही लेगी। और उसका परिणाम भी मिलेगा ही। इसलिए कभी भी कर्म के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए, अपनी क्षमता और विवेक के आधार पर हमें निरंतर कर्म करते रहना चाहिए।

श्लोक-
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण:।।
तू शास्त्रों में बताए गए अपने धर्म के अनुसार कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।
मैनेजमेंट सूत्र- श्रीकृष्ण अर्जुन को माध्यम से मनुष्यों को समझाते हैं कि हर मनुष्य को अपने-अपने धर्म के अनुसार कर्म करना चाहिए जैसे- विद्यार्थी का धर्म है विद्या प्राप्त करना, सैनिक का कर्म है देश की रक्षा करना। जो लोग कर्म नहीं करते, उनसे श्रेष्ठ वे लोग होते हैं जो अपने धर्म के अनुसार कर्म करते हैं, क्योंकि बिना कर्म किए तो शरीर का पालन-पोषण करना भी संभव नहीं है। जिस व्यक्ति का जो कर्तव्य तय है, उसे वो पूरा करना ही चाहिए।

श्लोक-
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, सामान्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं। श्रेष्ठ पुरुष जिस कर्म को करता है, उसी को आदर्श मानकर लोग उसका अनुसरण करते हैं।
मैनेजमेंट सूत्र- यहां भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि श्रेष्ठ पुरुष को सदैव अपने पद व गरिमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि वह जिस प्रकार का व्यवहार करेगा, सामान्य मनुष्य भी उसी की नकल करेंगे। जो कार्य श्रेष्ठ पुरुष करेगा, सामान्यजन उसी को अपना आदर्श मानेंगे। उदाहरण के तौर पर अगर किसी संस्थान में उच्च अधिकार पूरी मेहनत और निष्ठा से काम करते हैं तो वहां के दूसरे कर्मचारी भी वैसे ही काम करेंगे, लेकिन अगर उच्च अधिकारी काम को टालने लगेंगे तो कर्मचारी उनसे भी ज्यादा आलसी हो जाएंगे।

श्लोक-
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्म संगिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्।।
ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे किंतु स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित हुआ और सब कर्मों को अच्छी प्रकार करता हुआ उनसे भी वैसे ही करावे।
मैनेजमेंट सूत्र – ये प्रतिस्पर्धा का दौर है, यहां हर कोई आगे निकलना चाहता है। ऐसे में अक्सर संस्थानों में ये होता है कि कुछ चतुर लोग अपना काम तो पूरा कर लेते हैं, लेकिन अपने साथी को उसी काम को टालने के लिए प्रोत्साहित करते हैं या काम के प्रति उसके मन में लापरवाही का भाव भर देते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति वही होता है जो अपने काम से दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है। संस्थान में उसी का भविष्य सबसे ज्यादा उज्जवल भी होता है।

श्लोक-
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।।
हे अर्जुन। जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता है, उसी के अनुरूप मैं उसे फल प्रदान करता हूं। सभी लोग सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
मैनेजमेंट सूत्र- इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि संसार में जो मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है, दूसरे भी उसी प्रकार का व्यवहार उसके साथ करते हैं। उदाहरण के तौर पर जो लोग भगवान का स्मरण मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो किसी अन्य इच्छा से प्रभु का स्मरण करते हैं, उनकी वह इच्छाएं भी प्रभु कृपा से पूर्ण हो जाती है। कंस ने सदैव भगवान को मृत्यु के रूप में स्मरण किया। इसलिए भगवान ने उसे मृत्यु प्रदान की। हमें परमात्मा को वैसे ही याद करना चाहिए जिस रुप में हम उसे पाना चाहते हैं।

श्लोक-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।
मैनेजमेंट सूत्र- भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन से कहना चाहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो आप पूर्ण निष्ठा से साथ वह कर्म नहीं कर पाओगे। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकार अपना काम करते रहो। फल देना, न देना व कितना देना ये सभी बातें परमात्मा पर छोड़ दो क्योंकि परमात्मा ही सभी का पालनकर्ता है।

19/11/2015
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Tuesday, 12 December 2017

अतिवाद की जड़ में - सामाजिक , आर्थिक विषमता

आज नक्सलवाद सह माओवाद देश के विकास की धारा को अवरुद्ध कर खड़ा है। देश में एक बड़े भू-भाग में इस माओवाद के कारण विकास योजनाएँ ठप्प है। फिर उन क्षेत्रों में विकास के नाम पर राजनेता-प्रशासन एवं अतिवादि माओवादियों का संगठित तंत्र लूट मचाये हुए है। इसकी मूल समस्या विकास ही नहीं, सामाजिक-आर्थिक विषमता हैं। स्वाभाविक रूप से सोचना होगा। जिस जमीन पर हम और हमारे पुरखे रहते आये, जिस पर कृषि करते आयें, जीविकोपार्जन के लिए जिस भूमि का उपयोग करते आये। वह जमीन आज हमारे नाम पर बंदोबस्त है। जो आगे हमारी पीढ़ी को भी उपलब्ध रहेगी। वहीँ पर वनवासी जो पीढ़ी दर पीढ़ी जंगल में बसते रहे। जंगल ही उनका जीविकोपार्जन का साधन रहा पर आज भी उनके मकान के लिए भी जमीन बंदोबस्त नहीं हुई। उनके जीविकोपार्जन के लिये जंगल की जमीन और सम्पदा दोनों से वंचित कर दिया गया। जब भी कोई बड़ा उद्योग खड़ा करने के नाम पर, खनन के नाम पर वनवासियों को विस्थापित तो कर दिया जाता है, पर दशकों बाद भी विस्थापन की समस्या का समाधान हमारा तंत्र नहीं कर पाता है। हजारों लाखों वनवासी आज विस्थापन के मार से जूझ रहे हैं। उनको पुर्नवास आज कई दशकों बाद भी नहीं हो पाया। केवल सरकारी फाइलों में समस्या इस टेबल से उस टेबल घूमती रही। जिस सर्वे ने हमारी उपयोग की जमीन को हमारें नाम पर बंदोबस्त किया। क्या वही सर्वे उन वनवासियों के वास व जीविकोपार्जन की लिए पीढ़ी दर पीढ़ी उनके उपयोग में आती रही जंगल की जमीन को उनके नाम बंदोबस्त कर सकता था ? इसमें उन वनवासियों का क्या दोष ? यह कौन सा न्याय है कि जिस वन सम्पदा के प्रभाव से हमारी सड़के कंक्रीट की बन रही है, हमारे शहर के पुल और फ्लाई ओवर लाखों टन लोहा लगा के खड़े हो रहे हैं।हमारी इमारते उसी वन सम्पदा के लोहा, कंकड़, रेत से चमचमा रही हैं। इन सारी सुख सम्पदा की उपलब्धता वही जंगल वन व पहाड़ है। क्या इस चकाचौंध की दुनिया व अपनी उजड़ी जिंदगी को देखकर उन वनवासियों के मान में यादे कोई विक्षोभ पैदा होता है तो इसका कारण सामाजिक-आर्थिक विषमता को पोषण करनेवाली हमारी नीतियाँ है। जो नक्सलवाद, माओवाद व अतिवाद का कारण बन रही है। शहरी-मैदानी भाग में रहनेवाले लोगों, आधुनिक जीवन जीने वाले लोगों से अलग-अलग रहना आदिवासियों के जीवन का एक अनूठा पहलू है | अपने इसी स्वभाव के कारण वे अपने जातीय-सांस्कृतिक गुण को कायम रख सके हैं। प्राकृतिक वातावरण विशेषतः जंगल से इनका अन्योंन्याश्रय संबंध है परन्तु भारत में उपनिवेशवाद की स्थापना के बाद वनवासियों को राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक रूप से आधुनिक समाज से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई। इस मिश्रण ने न केवल उनकी शांत और स्वच्छंद जीवन शैली को बाधित किया बल्कि वर्तमान वनवासी समाज में गरीबी, बेरोजगारी आदि को भी जन्म दिया जो जनजातियों के जीवन में शोषण का भी कारण बना। ये समस्याएँ वनवासी समाज के पारंपरिक जीवन शैली में क्षय और जनजातीय समुदायों के अस्मिता, स्वत व पहचान खो देने का कारण बनी। वनवासियों के मानवाधिकारों, जीवन मूल्यों संबंधी मुद्दों के विश्लेषण की शुरुआत हम भूमि विभाजन से कर सकते हैं। संचार और विकास हेतु सरकारें एवं अन्य संस्थाओं द्वारा वनवासी भूमि का अधिग्रहण तथा भूमि कानून में त्रुटी की वजह से वनवासी भूमि का विभाजन हो गया और ये अपनी सम्पदा खो बैठे। भूमि आधिपत्य की यह नई प्रणाली वनवासियों के समाजिक-आर्थिक ढांचे को जड़ से बदल दिया और गैर जनजातीय लोगों का जनजातीय क्षेत्रों में अतिक्रमण होने लगा।
वनवासियों के अस्मिता व स्वत का दूसरा अहम् मुद्दा है जंगल के साथ उनका अन्योन्याश्रय संबंध। पारंपरिक रूप से जंगल और वन-भूमि ही जनजातीय लोगों का आश्रय था और जीविकोपार्जन का माध्यम भी। धीरे-धीरे प्राकृतिक संसाधन के नाम पर जंगल का रख-रखाव सरकार ने अपने हाथों में ले लिया और जनजातीय तथा सरकार के बीच लगातार एक तनाव का माहौल बनता गया। सरकार ने इस बात की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया कि जंगल जनजातियों की सामाजिक प्रथा और रीति-रिवाज का केंद्र बिंदु रहा है।
वन क्षेत्र पर अपना अधिकार खोने के बाद जनजातियों की जीविका, संसाधन छिन गई और वे गरीबी, भूखमरी तथा आश्रय विहीनता की ओर धकेल दिये गये। यह मात्र दो उदाहरणों से पूर्ण स्पष्ट है कि जहाँ तेंदू पत्ता जंगल में उपलब्ध होता है। जिसका एक बहुत बड़ा बाजार सदियों से है। उस पत्ते को तोड़ने की नीलामी सरकार करने लगी। बड़े-बड़े टेंडर होने लगे। ठीकेदार तेंदू पता आज उन्ही वनवासियों से तुडवाता है। अर्थात् अब वे इस कार्य में एक मजदूर बन के रह गये | जबकि वह पत्ता गैर नीलामी किये हुए वनवासियों से भी खरीदा जा सकता था | जंगल के सूखे पेड़ व गिरे पेड़ के लकड़ियों से वनवासी अपना रहने लायक मकान बनाता था और बड़े ही आनंद से रहता था। पर आज वन संरक्षण के नाम पर सूखे-गिरे पेड़ की लकड़ियों का स्वामित्व अब वन विभाग का हो गया। अब वे अपने मकान बनाकर रहने के लिए अपने नीज के संसाधन से भी वंचित हो गये। आज वन विभाग इन लकड़ियों को एकत्रित कर शहर के आधुनिक लोगों के उपयोग के लिए नीलामी करता है। स्वाभाविक है अपने अधिकार को खो देने व दूसरों के हाथों जाते देख आक्रोश तो होगा ही | जनजातिय समाज पहले भोजन के लिये खेती करते थे, लेकिन अब उसी जमीन में गैर जनजातीय लोगों द्वारा पैसे के लिए अनाज उगाने लगे। जो वनवासियों से छिनकर गैर जनजातियों को नया बंदोबस्त कर दिया गया।
जिन मुद्दों पर नक्सलवाद आंदोलन आज से चार दशक पहले प्रारंभ हुआ था, वे मुद्दे यानि जमीन का अधिकार, भूख का मर्म, वेदना व दर्द आज भी जिन्दा है। उससे भी बड़ी बात उन वनवासियों की जीवन शैली जो आधुनिक जीवन शैली से बहुत ही अलग स्वच्छंद है उसे एक सिरे से नकार देना। जबकि यही जनजातीय समाज शेष समाज से आगे बढकर अठारहवीं सदी के मध्य में ही हमारी जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए व हमारी स्वतंत्रता के लिए सिद्धू-कानू, विरसा मुंडा, तिलका झाँसी, दशरथ मांझी, गंगानारायण सिंह, ताना भगत आदि वीर योद्धाओं ने परतंत्रता की बेडी तोड़ देने के लिए उनके नेतृत्व में वृहद सतत आंदोलन तथा दिशा दिया। ये आंदोलन भारत में कंपनी राज के प्रारंभ से 1776 से ही शुरू हो गये थे। जिस समाज ने देश व समाज के लिए बलिदान देने की परंपरा में अग्र पंक्ति में खड़ा हुआ। वही आज हिंसा व अतिवाद के रास्ते पर चला गया। यह एक विचारणीय विषय है। इसकी जड़ में सामाजिक विषमता है। यह सामाजिक विषमता ही एक पुरे समाज को आर्थिक विषमता की ओर धकेल दिया। जिसका लाभ अलगाववादी सत्तालोलुप विदेशी विचारों से प्रभावित माओवादी लाभ उठाकर उसे अपने हथियार के रूप में प्रयोग कर रहे है। ध्यान रहे कि माओवादी आन्दोलन का नेतृत्व वनवासी नहीं हैं। बल्कि इस माओवादी अतिवादी का हथियार यन्त्र बन गया है। यह भी सर्वविदित है कि माओवादी आन्दोलन कोई व्यवस्था परिवर्तन का आंदोलन नहीं है। यह विशुद्ध रूप से सत्ता प्राप्ति का हिंसक अतिवादी आक्रमण है। यह हमारे लोकतंत्र व संस्कृति दोनों पर सीधा आक्रमण है। आज आवश्यकता है इस आक्रमण के हथियार – जो वनवासी, दलित व कमजोर वर्ग बन गया है, इसका निराकरण इस भ्रमित व ठगे गये हथियार रूपी वनवासी, दलित, व कमजोर समाज की सामाजिक विषमता को दूर कर ही किया जा सकता है।
शोषण और भ्रष्टाचार में लिप्त हमारी पतित व्यवस्थाओं के विरोधस्वरूप उत्पन्न विद्रोहपूर्ण विचारधारा से प्रारम्भ होकर एक जन-आन्दोलन के रूप में विकसित होते हुये आतंक के पर्याय बने नक्सलवाद ने बंगाल से लेकर सम्पूर्ण भारत में आज अपने पैर पसार लिये हैं। इस लम्बी यात्रा के बीच इस विद्रोह के जनक कानू सान्याल ने विकृतावस्था को प्राप्त हुयी अपनी विचारधारा के हश्र से निराश होकर आत्महत्या भी कर ली। यह कटु सत्य है कि भ्रष्टव्यवस्था और पतित नैतिकमूल्यों के प्रतिकार से अस्तित्व में आये नक्सलवाद को आज भी वास्तविक पोषण हमारी व्यवस्था द्वारा ही मिल रहा है। व्यवस्था, जिसमें हम सबकी भागीदारी है …सरकार की भी और समाज की भी। कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि हमारी व्यवस्था की रुचि नक्सलवाद को समाप्त करने के स्थान पर उसे बनाये रखने में ही अधिक है। यही कारण है कि किसी भी स्तर पर जन असंतोष और बढ़ती विषमताओं पर अंकुश लगाने के लिये कोई सार्थक प्रयास नहीं किये जा रहे हैं।
व्यवस्थायें आंकड़ों से चल रही हैं और आंकड़े कागज पर होते हैं। ज़ाहिर है कि हक़ीक़त भी ज़मीन पर नहीं कागज पर है। लूटमार के निर्लज्ज आखेट में हम सबने अपना-अपना नक्सलवाद विकसित कर लिया है। पूरे राष्ट्र की व्यवस्था में भ्रष्टाचार का वायरस एड्स का रूप ले चुका है। भ्रष्टाचार की खुली प्रतियोगिता में एक भृत्य से लेकर हमारा सम्पूर्ण नीतिनिर्धारक तंत्र और विधानसभा एवं संसद के माननीय महोदय तक सभी अपनी-अपनी सक्रिय भागीदारी पूरी ईमानदारी से निभा रहे हैं। जब थैलियों के मुंह खुलते हैं तो बाकी सबके मुंह बन्द हो जाते हैं। थैलियों से सम्पन्न लोग अच्छी-खासी प्रतिभाओं को पीछे छोड़कर मेडिकल कॉलेज में दाख़िले से लेकर लोकसेवा आयोग की प्रतिष्ठापूर्ण प्रतियोगिताओं में भी अपना वर्चस्व बना लेते हैं | …वह भी सारी व्यवस्था को अंगूठा दिखाते हुये। सड़कें बनती हैं तो पहली वर्षा में बह जाती हैं, भवन बनते हैं तो अधिग्रहण के पहले ही खण्डहर होने की सूचना देने लगते हैं। खनिज और वनसम्पदा से भरपूर बस्तर जैसे क्षेत्र सरकारी अधिकारियों और व्यापारियों की चारागाह बन चुके हैं। सम्पन्न बस्तर आज भी लंगोटी लगाये खड़ा है। आतंकपूर्ण माओवाद पनपने के लिये इतने कारण पर्याप्त नहीं हैं क्या?
नक्सलियों ने अब माओवाद का नक़ाब ओढ़ लिया है, उन्हें सत्ता चाहिए, वह भी हिंसा से। पर विचारणीय यह भी है कि लोकतंत्र का नक़ाब ओढ़कर देश में होने वाले चुनाव भी तो हिंसा से ही जीते जा रहे हैं। कहीं मतदान स्थल पर आक्रमण करके, कहीं मतदान दल को नज़रबन्द करके, कहीं मतदाता को डरा-धमका कर, तो कहीं उसे शराब और पैसे बाँटकर। भ्रष्टाचार के आरोपी नेताओं को दिखावे के लिये टिकट नहीं दी जाती। किंतु उनकी पत्नियों को टिकट देकर पति के अपराध का पुरस्कार प्रदान कर दिया जाता है। शातिर अपराधी पत्नियों की आड़ में राज चला रहे हैं। कोई सज्जन व्यक्ति आज सत्ता में क्यों नहीं आना चाहता, यह देश के समक्ष एक विराट प्रश्न है। नक्सलवाद केवल कुछ क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि पूरे देश में फैल चुका है। किसी भी प्रकार की हिंसा करके या दूसरों के अधिकार के अपहरण से कुछ भी पाने का प्रयास करने वाला हर व्यक्ति मानसिक रूप से नक्सलीआतंकवादी है | क्योंकि ऐसे ही लोग उग्रवाद के अघोषित जनक होते हैं।
नक्सलियों से भी अधिक हिंसक और निर्मम तो हमारा तंत्र है | जिसमें बैठा हर व्यक्ति जनता को जीने न देने की कसम खाये बैठा है। इस तंत्र द्वारा की गयी हिंसायें बहुआयामी होती हैं। प्राण भर नहीं जाते इसलिये दिखायी नहीं पड़तीं। निर्मम और अमानवीय शोषण की अनवरत श्रंखला पर चढ़कर वैभव एवं सत्ता पाने वाले भी तो हिंसा ही करते हैं। हमारे ही बीच का कोई साधारण सा या कोई ग़रीब किंतु तिकड़मी व्यक्ति चुनाव में अनाप-शनाप पैसा खर्च करके चुनाव जीतता है। जीतने के कुछ ही वर्षों बाद कई नगरों और महानगरों में फैली करोड़ों की सम्पत्ति का मालिक बन जाता है। यह सर्वविदित होकर भी रहस्य ही बना रहता है कि उस ग़रीब के पास चुनाव में पानी की तरह बहाने के लिये इतना धन आख़िर आता कहाँ से है? जब उंगली उठती है तो निर्धन से अनायास ही सम्पन्न बना वह व्यक्ति चीखने-चिल्लाने लगता है कि सवर्णों को एक ग़रीब और दलित का सत्ता में आना बर्दाश्त नहीं हो पा रहा है। क्या यह ग़ुस्ताख़ी भी दोहरी हिंसा नहीं? निर्लज्जता की सारी सीमायें तो तब टूट जाती हैं जब वह करोड़पति-अरबपति बनने के बाद भी स्वयं को ग़रीब, दलित और आदिवासी ही घोषित करता रहता है।
भारत में सभी समर्थों की केवल एक ही जाति और एक ही धर्म है। इसे भी समझने की आवश्यकता है। यह एक ऐसा नक्सलवाद है जिससे होने वाली हिंसा से मृत्यु एक बारगी न होकर तिल-तिल कर अंतहीन दुःखों को सहते हुये होती है। पूरे देश में व्याप्त इन अत्याचारों का समुचित निदान किये बिना नक्सलवाद के उन्मूलन की कल्पना भी बेमानी है।
भारत में नक्सलवाद ,परिवर्तित माओवाद – अतिवाद के पीछे भी केवल सत्ता की ही आदिम भूख ही छिपी हुयी है। मानव समाज विकास की किसी भी स्थिति में क्यों न रहा हो, वह अपने प्रभुत्व और सत्ता के लिये हिंसायें करता रहा है। किंतु इस सबके बाद भी “सत्ता के लिये हिंसा” को किसी मान्य सिद्धांत का प्रशस्तिपत्र नहीं दिया जा सकता। सत्ताधारियों की अरक्त हिंसा ही नक्सलियों की रक्तहिंसा की जननी है। हमारी राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक नीतियाँ इन्हें पोषण देती हैं। यदि हमारी व्यवस्थायें सबको जीने एवं विकास करने का समान तथा उनके जीवन शैली वह स्मिता-अस्तित्व की रक्षा का समान अवसर प्रदान कर दें, तो नक्सली या किसी भी उग्रवादी हिंसा को पोषण मिलना बन्द हो जायेगा और ये विचारधारायें दम तोड़ देंगी।
सभ्यमानव समाज तो आत्मशासित होना चाहिये, जहाँ किसी शासन की आवश्यकता ही न हो। हो पायेगा ऐसा? सम्भवतः अभी तो नहीं। आरक्षण के बटते कटोरों, राजनीतिक भ्रष्टाचार, बौद्धिक विकास हेतु अनुर्वरक स्थितियाँ, सरकारी नौकरियों तथा पदोन्नतियों की खुलेआम निर्लज्ज ख़रीद-फ़रोख़्त, त्रुटिपूर्ण कृषिनीतियाँ, कुटीर उद्योगों की हत्या एवं असंतुलित आर्थिक उदारीकरण आदि ऐसे पोषक तत्व हैं, जो नक्सलवाद को मरने नहीं देंगे, कम से कम अभी तो नहीं।
तमाम सरकारी व्यवस्थाएं, भारी भरकम बजट, पुलिस और सेना के जवानों की मौत, रेल संचालन पर नक्सली नियंत्रण से उत्पन्न आर्थिक क्षति, स्थानीय बाज़ारों एवं आवागमन पर यदा-कदा लगने वाले नक्सली कर्फ़्यू से आम जनता को होने वाली अनेक प्रकार की क्षतियों और बड़े-बड़े रणनीतिकारों की मंहगी बैठकों के बाद भी नक्सली समस्या में निरंतर होती जा रही वृद्धि एक राष्ट्रीय चिंता का विषय है।
भारत में नक्सलवाद के कारण :-
1- अनधिकृत भौतिक महत्वाकांक्षाओं के अनियंत्रित ज्वार :- महत्वाकांक्षी होने में कोई दोष नहीं पर बिना श्रम के या कम से कम श्रम में अधिकतम लाभ लेने की प्रवृत्ति ही सारी विषमताओं का कारण है। सारा उद्योग जगत इसी विषमता की प्राणवायु से फलफूल रहा है। आर्थिक विषमता से उत्पन्न विपन्नता की पीड़ा वर्गसंघर्ष की जनक है।
2- मौलिक अधिकारों के हनन पर नियंत्रण का अभाव :- अनियंत्रित महत्वाकाक्षाओं के ज्वार ने आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर डाका डालने की प्रवृत्ति में असीमित वृद्धि की है। नक्सलियों द्वारा जिस वर्गसंघर्ष की बात की जा रही है उसमें समर्थ और असमर्थ ही मुख्य घटक हैं, दलित या आदिवासी जैसे शब्द तो केवल भोले-भाले लोगों को बरगलाने के लिये हैं। समर्थ होने की होड़ में हर कोई शामिल है। मनुष्य की इस आदिम लोलुपता पर अंकुश लगाने के लिये वर्तमान में हमारे पास कोई वैधानिक उपाय नहीं है। मौलिक अधिकारों के हनन में नक्सलवादी भी अब पीछे नहीं रहे, शायद इसी कारण कानू सान्याल को आत्महत्या करनी पड़ी।
3- शोषण की पराकाष्ठायें :- सामान्यतः आम मनुष्य सहनशील प्रवृत्ति का होता है, वह हिंसक तभी होता है जब शोषण की सारी सीमायें पार हो चुकी होती हैं। नक्सलियों के लिये शोषण की पराकाष्ठायें पोषण का काम करती हैं। शोषितों को एकजुट करने और व्यवस्था के विरुद्ध हिंसक विद्रोह करने के लिये अपने समर्थक बनाना नक्सलियों के लिये बहुत आसान हो जाता है।
4- सामाजिक विषमता :- सामाजिक विषमता ही वर्गसंघर्ष की जननी है। आज़ादी के बाद भी इस विषमता में कोई कमी नहीं आयी। नक्सलियों के लिये यह एक बड़ा मानसिक हथियार है।
5- जनहित की योजनाओं की मृगमरीचिका :- शासन की जनहित के लिए बनने वाली योजनाओं के निर्माण एवं उनके क्रियान्वयन में गंभीरता, निष्ठा व पारदर्शिता का अभाव रहता है जिससे वंचितों को भड़काने और नक्सलियों की नयी पौध तैयार करने के लिये इन माओवादियों को अच्छा बहाना मिल जाता है।
6- राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव :- आमजनता को अब यह समझ में आने लगा है कि सत्ताधीशों में न तो सामाजिक विषमतायें समाप्त करने, न भ्रष्टाचार को प्रश्रय देना बन्द करने और न ही नक्सली समस्या के उन्मूलन के प्रति लेश भी राजनीतिक इच्छाशक्ति है। आर्थिक घोटालों के ज्वार ने नक्सलियों को देश में कुछ भी करने की मानसिक स्वतंत्रता प्रदान कर दी है।
7- लचीली कानून व्यवस्था, विलम्बित न्याय एवं कड़े कानून का अभाव :- अपराधियों के प्रति कड़े कानून के अभाव, विलम्ब से प्राप्त होने वाले न्याय से उत्पन्न जनअसंतोष एवं हमारी लचीली कानून व्यवस्था ने नक्सलियों के हौसले बुलन्द किये हैं।
8- आजीविकापरक शिक्षा का अभाव एवं महंगी शिक्षा :- रोजगारोन्मुखी शिक्षा के अभाव, उद्योग में परिवर्तित होती जा रही शिक्षा के कारण आमजनता के लिये महंगी और दुर्लभ हुयी शिक्षा, अनियंत्रित मशीनीकरण और कुटीर उद्योंगो के अभाव में आजीविका के दुर्लभ होते जा रहे साधनों से नक्सली बनने की प्रेरणा इस समस्या का एक बड़ा नया कारण है।
9- स्थानीय लोगों में प्रतिकार की असमर्थता :-निर्धनता, शैक्षणिक पिछड़ेपन, राष्ट्रीयभावना के अभाव, नैतिक उत्तरदायित्व के प्रति उदासीनता और पुलिस संरक्षण के अभाव में स्थानीय लोग नक्सली हिंसाओं का सशक्त विरोध नहीं कर पाते जिसके कारण नक्सली और भी निरंकुश होते जा रहे हैं।
10- पर्वतीय दुर्गमता का भौगोलिक संरक्षण :- देश के जिन भी राज्यों में भौगोलिक दुर्गमता के कारण आवागमन के साधन विकसित नहीं हो सके वहाँ की स्थिति का लाभ उठाते हुये नक्सलियों ने अपना आतंक स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली है और अब वे इस अनुकूलन को बनाये रखने के लिये आवागमन के साधनों के विकास में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। यद्यपि, अब तो उनका बौद्धिक तंत्र नगरों और महानगरों में भी अपनी पैठ बना चुका है।
11- पड़ोसी देशों के उग्रवाद को भारत में प्रवेश की सुगमता :- विदेशों से आयातित उग्रविचारधारा को भारत में प्रवेश करने से रोकने के लिये सरकार के पास राजनैतिक और कूटनीतिक उपायों का अभाव है जिसके कारण विचार और हथियार दोनो ही भारत में सुगमता से प्रवेश पाने में सफल रहते हैं।
नक्सलवाद की समस्या का समाधान :-
जन असंतोष के कारणों पर नियंत्रण और विकास के समान अवसरों की उपलब्धता की सुनिश्चितता के साथ-साथ कड़ी दण्ड प्रक्रिया नक्सली समस्या के उन्मूलन का मूल है। अधोलिखित उपायों पर ईमानदारी से किये गये प्रयास नक्सलवाद की समस्या के स्थायी उन्मूलन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
1- नक्सली समस्या के उन्मूलन के प्रति दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का विकास – क्योंकि बिना दृढ़ संकल्प के किसी भी उपलब्धि की आशा नहीं की जा सकती।
2- आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के उपायों से विकास के समान अवसरों की उपलब्धता की सुनिश्चितता।
3- शासकीय योजनाओं का समुचित क्रियान्वयन एवं उनमें पारदर्शिता की सुनिश्चितता – जिससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके।
4- समुचित एवं सहयोगपूर्ण कानून व्यवस्था- जिससे स्थानीय लोग नक्सलवादियों का प्रतिकार कर सकें और उन्हें जीवनोपयोगी आवश्यक चीजें उपलब्ध न कराने के लिये साहस जुटा सकें।
5- कानून व न्याय व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर बल – जिससे लोगों को सहज और समय पर न्याय मिलने की सुनिश्चितता हो सके।
6- आजीविकापरक एवं सर्वोपलब्ध शिक्षा की व्यवस्था – जिससे सामाजिक विषमताओं पर अंकुश लग सके।
7- कुटीर उद्योगों को पुनर्जीवित करने के समुचित प्रयास – जिससे वर्गभेद की सीमायें नियंत्रित की जा सकें।
8- राष्ट्र के विकास की मुख्यधारा में नक्सलियों को लाने और उनके पुनर्व्यवस्थापन के लिये रोजगारपरक विशेष पैकेज की व्यवस्था।
9- चीन और पाकिस्तान से नक्सलियों को प्राप्त होने वाले हर प्रकार के सहयोग को रोकने के लिये दृढ़ राजनीतिक और सफल कूटनीतिक उपायों पर गम्भीरतापूर्वक चिंतन और तद्विषयक प्रयासों का वास्तविक क्रियान्वयन।
16 अगस्त 2016
राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच की स्मारिका “राष्ट्र सुरक्षा कुम्भ” में प्रकाशितIMG_0067
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Saturday, 9 December 2017

विस्मृति

शब्द
जो बिछड़े थे किसी मोड़ पे
पंख लगा कर उड़ गये
शब्द जो साथ चले थे मेरे
वो थक गये... ठहर गये
शब्दों का होना अखरता है अब
शब्द राह तो रहे
पर मंज़िल न हुये
शब्दों को
लड़ना पसंद है...
मरना पसंद है
पर साथ जीना पसंद नही
कितने भोले हैं ये मेरे
शब्द
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यथार्थ का अंतर्मन

सिर पर मोरध्वज
अधरों पर मुरली
नंदलाल के मथुरा गमन पर
कान्हा की
एक हल्की सी मुस्कराहट पर
गोपियों के समूह से अलग
निमग्न हो खड़ी
राधा स्थिर चित हो
बोल पड़ी
" सुनो
जब तुम मुझे मुग्ध भाव से
देखते हो ना
मैं बिना श्रृंगार के ही
सुंदर हो जाती हूँ
मेरे जीवन में जितना
साथ है तुम्हारा है
बस
उतना ही हिस्सा जिया है मैंने

कि
जितनी तुम्हारे साथ चली
बस उतनी ही बही हूँ मैं
कि
जितनी बार तुम्हें देखा है
उतनी ही बार प्रेम किया है
तुमसे मैनें... "

एक लम्बी उच्छ्वास के साथ
राधा मनन कर रही
" तुम्हारा मेरा सम्बंध
इतना सा ही है
तुम मौन रहो
मै सुनती रहूँ
तुम विरक्त रहो
मै जुड़ती रहूँ
तुम सत्य उधेड़ो
मै स्वप्न बुनूँ
विपरीत किंतु साथ "

फिर तो
एक गहरी साँस भर
राधा फुट पड़ी
" हमारा रिश्ता
एक गहरी खाई पे
चरमराता हुआ
लटकता सा
एक पुल है
जिससे पार होना
नामुमकिन
खाई का भरना
असंभव
उम्मीद का दामन थामे
इसपार हम
उसपार तुम "
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Tuesday, 5 December 2017

एक वध और

अपनी भूख मिटाने के लिए
बाँस की कोपलों में
कुछ कीड़ों ने छेद कर दिये
उन छेदों से जब जब
हवा गुजरती
कोपलों का रोना सुनाई देता
उन कीड़ों को तो पता ही नहीं
बंशी बनाने के उपक्रम में
कि वे संगीत के सर्जन में
हस्तक्षेप कर रहे हैं

सम्यक विचारों को विस्तार दो
कहते ही चेहरा विदीर्ण हो उठता
नजरें नीचे झुका तिरछे देख
तुम्हारे होंठ फड़फड़ा जाते हैं
एक बध और
क्या यह अन्तिम है ?
इसके बाद
मेरी सोच काँप उठती है
मेरे विचार कुण्ठित हो उठते हैं
मैं वापस लेता हूँ
नहीं चाहिये तुम्हारा यह सहयोग
तुम्हारा यह साथ सहकर्म
जो केवल कुंठा व ईर्ष्या से
अपने को सिद्ध कर सकता है
एक अयोग्य, निरा शून्य
नहीं चाहिये वह विश्वास
जिसकी चरम परिणति
तुम्हारी द्वेष, जलन, ईर्ष्या हो
जहाँ कर्म, सामर्थ्य और पुरुषार्थ की
हत्या हो

मैं
अधिक सहिष्णु हूँ अपनी आस्था में
मैं
अधिक तपी हूँ अपने अकर्मों में
मैं
अधिक धार्मिक हूँ अपनी नास्तिकता में
मैं
अधिक सरल हूँ अपनी कठोरता में
मैं
अधिक उदार हूँ अपनी उदासी में
मैं
अधिक मुक्त हूँ अपनी अकेलेपन में
नहीं चाहिये तुम्हारी शोहरत, जो
लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, चाटुकारिता
दलाली के रंग से तुम पाये हो
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Wednesday, 29 November 2017

"दलितवाद" सामाजिक बिखराव की एक प्रवंचना

पीड़ित - वंचित वर्ग को परिभाषित, सम्बोधित करने का अभिप्राय यह नहीं कि हम इतिहास के अतीत पक्ष को ही केवल देखें। बल्कि उसकी उस निरन्तरता को प्रकाशित उजगारित करना होगा जो नूतन सामाजिक समग्रता की ओर उन्मुख हो रहा है। पीड़ित वंचित समाज के लिए उलाहनापूर्ण सम्बोधन " दलित " शब्द को वर्गीकृत, विशेषीकृत करने के स्थान पर हमें आम पीड़ित - वंचित जन की पीड़ाओं के साथ जुड़ना होगा। समय की आवाज़ उनके सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचे में घुल मिल जाने की है।न कि उन्हें पृथक, विशेषीकृत - वर्गीकृत करने की है। वर्तमान राजनीति और उसके द्वारा देय सुविधा आरक्षण मात्र पीड़ित - वंचित समाज को विशेषीकृत वर्ग बनाने का एक लोक लुभावना  षडयंत्र भर है।

यह सत्य भी है और कोई सन्देह भी नहीं कि कालान्तर में पीड़ित - वंचित वर्ग को सामाजिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से अपमान, उपेक्षा, पीछड़ापन, उत्पीड़न, प्रताड़ना, शोषण का शिकार होना पड़ा। यह भी सच है कि इस उपेक्षा, अपमान और प्रताड़ना के लिए क्षेत्रानुसार समाज के कुछ वर्ग विशेष के लोग ही दोषी हों। किन्तु सम्पूर्ण सनातन समाज को इसके लिए दोषी ठहराना एक अतिवादी सोच व निष्कर्ष है। सनातन समाज को देश, काल और परिवेश में सतत होने वाले युगान्तकारी परिवर्तनों - बदलावों को अनदेखा करके अत्याचारी और शोषक मान लेना, स्थायी सामाजिक विखराव का रेखांकन कर मात्र सत्ता के लिए अपनी राजनैतिक रोटी सेकना है। जो कुछ दल व राजनेता कर रहे हैं। जिनको भारत, भारतीयता व भारत की आत्मा से कोई सरोकार नहीं है।

सनातन स्वभाव सम्पूर्ण जड़ और चेतन में एक ही परामत्व तत्व का दर्शन करता है। कुछ तथाकथित अपवादों को छोड़कर हमारे वेदों, उपनिषदों, पुराणों, अरण्य शास्त्रों और अन्यान्य धर्म ग्रंथों में व्यापक मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा है। हम सनातनी विद्या, विनय और करुणा से सम्पन्न पक्षी, चींटी, गाय, हाथी, व्राह्मण और चाण्डाल में एक ही आत्मा का दर्शन करते हैं। वही एकत्व का दर्शन करने वाला पंडित कहलाया।

पीड़ित - वंचित वर्गों में धर्म को लेकर तथाकथित दलित राजनीति के पुरोधाओं ने बहुत सारा सन्देह, भ्रम और पूर्वाग्रह उत्पन्न किये। जो तार्किक होते हुए भी नकारात्मक थी। " होइहि सोई जो राम रचि राखा " इस नियतिवाद, कर्मफलवाद, भाग्यवाद से बाहर निकलना होगा, जो आज अपनी परिस्थितियों, सामाजिक जड़ता और आर्थिक - राहनीतिक सता को बदलने का प्रयत्न नहीं कर पा रही है।
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Monday, 27 November 2017

" The Militant Nationalism in India " by Bimal Bihari Majumdar

" The Militant Nationalism in India " by Bimal Bihari Majumdar

Inspiration from the Gita, the Chandi and the Vedanta
                As most of the members of the Dhaka Anushilan Samiti and the Barisal Party were conservative Hindus and were also influenced by Hindu revivalism, it was quite natural for them to look to Hindu sacred texts such as the Gita, the Chandi, and the Vedanta for inspiration and guidance in their life and death struggle against the colonial rtule in the country.According to the Vedanta, the jivatma (individual soul) forms part or is the expression of the paramatma (supreme soul or God). The Vedantist seeks the godhead within himself in order that he may attain moksha or spiritual salvation. C.R.Das, who was Aurobindo‘s counsel in the Maniktala case, argued that according to Aurobindo and in terms of the Vedanta, India was not a mere geographical expression but a manifestation of the divinity; India could only grow by getting hold of what was best and divine within himself; freedom was to India what spiritual salvation was to the individual. (36) ―Our attitude is a political Vedantism. India, free, one and indivisible is the divine realization to which we move—emancipation our aim‖, wrote Aurobindo applying the Vedanta in politics. The militant nationalists of Bengal, it must be remembered, primarily came from the bhadralok class, who were generally a peaceable and law-abiding people, and who had only a few years before the commencement of the Swadeshi Movement entirely declined to respond to revolutionary appeals, which becomes evident from the confession of Barindra Ghosh. To infuse the ideas of violence among such a people must have required extraordinary methods on the part of the leaders of the secret societies. Perhaps the most important Hindu philosophical treatise which came to justify violent actions including the undertaking of political murders was the teachings of the Bhagavad Gita or Lord‘s Song of the Mahabharat epic recited by Sri Krishna, the incarnation of the Preserver of the World, before the great battle of Kurukshetra.

The Gita provided a new orientation to the militant nationalists in the field of action. It came to be regarded as a scripture of Karmayoga, a gospel of work. Because of its constant exhortation for karma or action, it was deemed suitable for breaking the stupor that had overtaken India. The Gita exhorted the fighter to get into action for the protection of the weak and the oppressed and the maintenance of right and justice in the world. To shrink from such a duty was a sign of sheer weakness.The militant nationalists preached the ideal of nishkama karma i.e. everyone must do his duty without caring for the result, as taught in the Gita. The recurrent exhortations of Sri Krishna to Arjuna was ―Fight and overthrow thy opponents...Give up the result of all thy work to me and with a heart full of spirituality and free from craving, free from all selfish desires, Fight‖. Nothing could be more reassuring to the Bengal revolutionaries than the teaching of the Gita: ―Whosoever has his temperament purged from egotism, whosoever suffers not his soul to receive the impress of the deed, though he slays the whole world, yet he slays not and is not bound by his action‖. The leaders of the revolutionary movement in Bengal tried to instill this lesson into the hearts of their followers.Another teaching of the Gita which greatly inspired the militant nationalists and which they sought to preach among their followers was, ―killed you will obtain heaven; victorious, you will enjoy the earth‖. Through the above quoted passage of the Gita, the militant nationalists propagated the idea of self-sacrifice which was the surest way to spiritual enlightenment or attainment of heaven. (39)The militant nationalists also preached the ideal of „nimitta matra‟, as taught in the Gita, meaning that men were only instruments in the hands of God, who really pre-ordained the things that would take place. Sri Krishna‘s exhortation to Arjuna to be a mere instrument in killing the enemies as they had been killed in reality already by himself seemed to absolve the revolutionaries of the responsibility of murder. As Aurobindo explained in a clearly contrived speech on the Gita:  ̳Those men whom you shrink from slaying are already slain....The teaching of the Gita....delivers you from all possibility of sin‘.
The leaders of the Dhaka Anushilan Samiti used the tenets of the Gita to influence the young initiates and to strengthen their minds for the purpose of organizing violent actions. The teachings of the Gita provided the ideological basis for the commitment of violent action by the members of Samiti. The ―Set of Rules of Membership‖ of the Dhaka Anushilan Samiti which was produced as an exhibit during the trial of the Barisal Conspiracy Case, specially ordered the daily reading of the Gita. The British Prime Minister, Mr.Ramsay Macdonald, who studied the subject of Indian nationalism in his book ―The Awakening of India‖, has made an incisive analysis as regards the message of the Gita, and the way it was used to further the cause of the revolutionary organizations. Therefore it would not be inappropriate to quote him extensively. Mr.Macdonald observed, ―Before one tries to understand the extremist movement of whatever degree, one cannot do better than assimilate the spirit of the Bhagwat Gita, the most moving and haunting of all the sacred books of India. In its slokas, glowing with a divine light, the Indian discovers the way of self-sacrifice. It is the gospel of action, of action stern and terrible, done by the body and the passions, while the possessing soul is at peace in the presence of the Eternal. It is the divine manual of how duty is to be done with no thought of consequences, except that it is the will and thought of the Eternal. Bathed in this ocean of self-surrender, and ever filled with the music of the Divine voice, The Indians heart beats with ecstasy, and he goes forth to do his work. There is no limit of the vernacular press, no uncontrollable Amrita Bazar Patrika or Bande Mataram so dangerous, so seditious as the  ̳Song of the Blessed One‘.‖ Mr.Macdonald further goes on to observe, ―The Indian Assassin quotes his Bhagwat Gita just as the Scottish Covenanter quoted his Old Testament, but the Bhagwat Gita is more cruel in the devotion and self-sacrifice it requires than the most awful of the Old Testament passages which have been brooded over by the austere fanatics of our own history. It is this inspiration, dazzling human reason into blindness, that leads astray the youths who have cast constitutionalism to the four winds, and have entered upon the dark ways of assassination, hoping thereby to reach emancipation.The analysis of Mr.Macdonald, regarding the message of the Gita which was used to justify violent revolutionary action seems to be correct. The influence of the teachings of the Gita was quite profound on the youthful minds of the members of the Dhaka Anushilan Samiti. The particular case of Girindra Mohan Das illustrates this. In the evidence given by Girindra‘s mother in the court which was accepted to be true by the Sessions Judge, she mentioned that Girindra made her listen to the Gita and asked her to bid him goodbye as she had other sons, that he would not marry and that one day she would suddenly hear that he was dead. The mental make-up of Girindra Das as a member of a revolutionary society gets revealed from the following observation of the Sessions Judge who was trying the case:- ―Girindra was thoroughly in earnest in his belief in the cause of the Samiti, of that there can be no doubt. His mind had fed for some months on the literature and dogmas of the revolutionary party, and it is clear from what he told his mother that he had pictured himself as a hero dying for the salvation of his country.‖ The teachings of the Gita provided a powerful source of inspiration to the members of the Barisal Party as well. Thus Arun Chandra Guha informs us that the philosophy of nishkama karma and nimitta matra as taught in the Gita, became a guiding principle of the militant nationalists of the group. (43) The use of Hindu religion and the teachings of the Gita were also used by the leaders of the Barisal Party to recruit new members to the group. The conversion of Manoranjan Gupta (who went on to become one of the foremost leaders of the Barisal Party and then assumed the leadership of the combined Jugantar revolutionary group as well) as a member of the Barisal Party highlights the importance of religion to serve political ends. In his autobiography Manoranjan Gupta mentioned that inspite of the efforts made by his bosom friend Hiralal Dasgupta to enlist him as a member to the revolutionary cause, he did not agree because he felt that the violent acts committed by the revolutionaries were against the teachings of the Hindu religion. But after he was introduced to Satish Chandra Mukherjee by one of his friends, the conversations which he had with the latter changed his conception of the revolutionary movement. Satish Mukherjee mentioned to him that actions which were committed without the desire of its results which was taught by the Gita, always had the sanction of religion; and since the actions committed by a person for the liberation of his country were done in the same spirit, it similarly had the sanction of religion. Thus it was only when the authority of the Gita was invoked to justify revolutionary action, then Gupta mentioned, that he accepted the membership of the Barisal Party. (44) It must be mentioned here that at the time of his initiation into the Barisal Party, he was a youth of 19 years and was a student of the First Arts Class in a local college. Thus in this instance of conversion also appeals were made to the religious fervour and idealism of the youth.The teachings of the Gita, taken literally, were an excellent training for those who were embarking on a desperate enterprise in which their lives might, at any moment, be forfeited. The teachings of the Gita, which the militant nationalists imbibed, enhanced their power of tolerance to police oppression as well. The militant nationalists sought to make a practical application of the teachings of the Gita. It became a more formidable weapon than the bomb in their hands. It prepared them psychologically, for political murders which were interpreted as designed by God‘s will and this assured them of salvation through death in God‘s service.Another religious book which found a prominent place in the revolutionary literature was the Markandeya Chandi. The latter is a sacred religious text of the Hindus, Chandi being another name of Goddess Durga who protects her devotees from all sorts of evil by destroying their enemies. The work relates how the gods, driven from heaven by the asuras (demons), created with all their powers Goddess Kali or Chandika or Adya Shakti (primordial energy), to destroy the asuras. In the light of the Vedanta, freedom meant national self-realisation. In the light of the Chandi, the national struggle was interpreted as signifying the latent energy of the nation and its struggle against the forces of evil. Just as all the millions of gods had energized Kali, so would the millions of Indians make a mighty shakti (power) of India. The importance and the necessity of shakti worship to arouse the dormant masses of the nation and make them participate in the struggle to end the colonial rule, was explained by Bepin Chandra Pal quite elaborately. On 6th June 1907, in an article in the New India, B.C.Pal wrote, ―Sakti worship had been a part of our religion from time immemorial...the masses must be initiated in the mysteries of Sakti worship...I cannot conceive of a better symbol of Sakti in our present condition than the symbol of Kali, not conceived of a supernatural deity, but simply as the symbol of cosmic evolution on the one side and of race consciousness on the other...I do not feel any hesitation to recommend the Kali symbol to those of my countrymen to whom it may really appeal as an inspiration for the cultivation of Sakti (power)...Kali is thus an excellent symbol of Shakti both in its natural and national aspects. Sakti is never manifested except in and through conflict...And we need this worship today more than we did in the past. All strength seems to have gone out of the nation...our people must realize that the highest good can only reach out itself in the world through bitter struggles; and the symbol of Kali may well be utilized now to arouse the dormant energies of the nation and to lead it on to realize its highest destiny through conflicts and struggles...I would therefore recommend the organization of Kali Puja in every important village every moon-day. It cannot be the ordinary Kali Puja...Rakshakali is the Kali which protects from evil. It would not be a bad thing if we could organize public Rakshakali Puja at the present juncture where large crowds could be collected. It would put courage into drooping hearts. It would impart a religious meaning and significance to our national movement...And thus these ceremonials would strengthen the determination of our people on the one hand and simultaneously demoralize those who are trying to repress them on the other‖. There is no doubt that shakti worship in the form of Goddess Kali became an important part of the religious rituals of the Dhaka Anushilan Samiti. The worship of Kali inspired and galvanized the members of the Samiti into action. Thus we are informed by Jogesh Chandra Chatterjee, a member of the Dhaka Anushilan Samiti, that before the members of the Samiti went to commit a dacoity, they used to make offerings to the Goddess Kali and carried the offered prasad and flowers with them as a sign of the Mother‘s blessings in their performance of the sacred duty to free the motherland from alien bondage. In fact, Goddess Kali became the most favourite deity of the Bengal revolutionaries. They used to take the most solemn vows before her image. The instance of Girindra Mohan Das‘ enlistment as a member of the Dhaka Anushilan Samiti has already been referred to. The militant nationalists also used to refer to their violent acts as  ̳Mayer Lila‟ viz. the playful wish of the Mother.
Another aspect of the Chandi provided powerful inspiration to the militant nationalists. This was the belief in the victory of good over evil. In the book called Kabya Kusum (Poetical Blossoms) 1908 (1315 B.E.),, the author Dinesh Chandra Sengupta, who appears to have been the recognized poet of the movement, makes an invocation to Kali, and wrote, ―Devils are committing oppression on us...Come O Mother Bhairabi...the earth oppressed by demons, is calling you in a pathetic tone...India is one vast crematorium and demons are responsible...Come you merciful one, taking up the sword to destroy the wicked devils‖. Here the British Government was compared with the demons or devils.That the teachings of the Chandi and the Gita provided inspiration to the Yugantar group of revolutionaries as well becomes apparent when one goes through the book Bartaman Rananiti (The Science of Modern Warfare; published in October 1907) written and published by Abinash Chandra Bhattacharya, a member of the group. In this book the author, not only reduces the teachings of the Chandi and the Gita to one great command  ̳destroy‘ but also discussed the practical steps to be taken for accomplishing the work of destruction. The author described destruction as a form of creation which was natural. Therefore, war was also natural and imperative when every means of preventing oppression was of no avail. It was for this reason that Sri Krishna acted as charioteer of Arjuna at the battle of Kurukshetra and for this reason the incarnation of Kali as ―Kali holding two swords to destroy the Mlechhas‖ had passed into a saying of the Shastras.  ̳Karma‘ or action was the means of salvation and the wealth of man. In India, the representative of  ̳Karma‘ was Durga, having ten arms holding ten kinds of weapons, possessing infinite power, and She was the mother of creation. Strength of arms was needed to establish a virtuous kingdom or dharmarajya after demolishing the vicious one. Thus this article upheld the philosophy of the Gita and the stories of the Chandi in order to appeal to the religious sentiments of the militant nationalists, so that the latter would be fired with religious enthusiasm in undertaking violent actions.The Chandi and the Bartaman Rananiti profoundly influenced the members of the Dhaka Anushilan Samiti as well. This is illustrated when one considers the deposition of the approver Rajani Das during the trial of the Barisal Conspiracy Case. Rajani was a youth of 18 when he was converted to the cause of the revolutionary movement and was employed as an apprentice mohurrir. He was a simple village boy who had studied at a village school up to the upper primary standard. In his deposition before the court, Rajani mentions that he was introduced to Fega Roy (Fega Roy was a member of the Dhaka Anushilan Samiti, and was a resident of a village called Kusangal in the Bakarganj district, and in his youth at that point of time, he was considered to be the most active revolutionary by the district authorities). Fega asked Rajani what was his object in life. Rajani said that he wished to get on in life. Fega asked him if he did not wish to uphold the Hindu religion, and Rajani said he did. Fega then said that for the purpose of upholding the Hindu religion it was necessary to establish a Hindu kingdom. This sort of conversation passed between Fega and Rajani on two or three occasions, and one day Fega asked Rajani if he would join a Samiti that had for its purpose the establishment of Hindu rule and the expulsion of the British from India. Rajani then agreed to join the society.The deposition of Rajani Das goes on to show that by the establishment of Hindu kingdom or rastra, what appealed to him was the establishment of a dharmarajya or a kingdom based on righteousness. It has already been illustrated earlier (in the case of the approver Girindra Mohan Das) that the members of the Dhaka Anushilan Samiti in order to recruit the educated youth first of all provided them with literature of national liberation movements which inflamed their desire of independence and also gave them the Hindu sacred texts, most importantly the Gita, the Chandi, and the Vedanta to study. The stories of the Chandi inspired the youth that just as the Goddess Kali destroyed the demons who had driven away the Gods from heaven, and re-instated the Gods in heaven, and thus established the righteous rule of the Gods in place of the unrighteous rule of the demons; it was now up to the youth of the country to seek the blessings of the Mother and destroy the unrighteous British rule and supplant it by establishing a dharmarajya. The deposition of Rajani Das thus goes on to illustrate that he was quite seriously influenced by the Chandi. Das, it must be remembered, agreed to join the Dhaka Anushilan Samiti, only when the possibility of the establishment of a Hindu rastra based on dharma (righteousness) was placed before him. It seems that Rajani was also influenced by the teachings of the Gita as well. A verse from the latter assures India that whenever there is decline of dharma, God will incarnate Himself to protect the righteous and chastise the unrighteous.That the militant nationalists of the Dhaka Anushilan Samiti drew inspiration from the Chandi and the Gita also becomes clear after a perusal of the  ̳District Organization Scheme‘ of the Samiti, referred earlier. The latter was related with the methods of recruitment of school boys by masters imbued with the ―idea‖ (the idea was that all members of the Samiti were to keep in their minds that they were bringing about a revolution with the object of establishing righteousness) into schools all over the country and by the institution of selected students in all schools. The Samiti‘s object of establishing righteousness, which was made a major basis of the recruitment of new members to the Samiti, of course meant the establishment of a dharmarajya, after the unrighteous rule of the British was brought to an end, and the rastra based on dharma which checked all arbitrary power. It was the selected students who after being imbued with the ―idea‖ were to influence and preach the same among other fellow-students, and in this way it was ensured by the leaders of the Samiti, that the membership of the latter would also increase. Hence it can be seen that the rank and file of the Samiti were influenced by the Chandi and the Gita, as all of them believed in the establishment of a dharmarajya after the expulsion of the unrighteous rule of the British. Like the members of the Dhaka Anushilan Samiti, as we come to know from Arun Chandra Guha, the Chandi provided an important source of inspiration to the members of the Barisal Party as well.Inspiration from the writings of Bankimchandra Chattopadhyay and Swami Vivekananda.The writings of Bankimchandra Chattopadhyay (1838-94), Bengal‘s most influential writer in the nineteenth century, had a great impact upon the militant nationalists of Bengal. Unable to make up his mind about British rule, Bankimchandra looked at it with mixed feelings. In an essay  ̳Bangadeser Krisak‟ he not only rejected the  ̳drain‘ theory but believed that due to colonial rule, trade between Britain and India had increased which in turn had led to an expansion of agricultural activity in India. (52) But later in his life he admitted the drain theory. (53) In another essay  ̳Amar Man‟ in Kamalakanter Daftar we find him reviling the Western craze for material wealth which was invading India.
However, the western idea of nationalism received his praise.   On the whole he regarded the English as „unnata shatru‟ (advanced or resourceful enemies). The concluding lines of his novel Anandamath (1882) shows that Bankim, alive as he was to the regenerating influence of British rule, was not preaching permanent loyalty to it: the sannyasi (monk) rebels against the Muslim Nawab, accepted the Raj only as a stop-gap for Hindu rule; the rebel leader Satyananda agreed to be under the British till the Hindus were rich again in strength and knowledge. No wonder therefore the book was a source of inspiration to the militant nationalists in Bengal.Bankim was a cultural nationalist and one of the creators of modern Bengali prose:  ̳he gave us a means‘ wrote Aurobindo,  ̳by which the soul of Bengal could express itself to itself‘. (58) To Bankim a nation existed in its history. Thus he regretted the absence of a history of Bengal:  ̳The Bengalis aspire after greatness—alas, they have no historical memory. Bengal must have its own history or the Bengalis will never be great‘. So he set about to lend nationalism not only its own language but also a heroic past to look back on with pride. His historical romances conjured up an age of Hindu chivalry.The Bande Mataram song of Anandamath gave the militant nationalists of Bengal, a vision of the motherland as a Goddess and a song to sing her praise. It hugely inspired Aurobindo. In his essay on Bankim, he says, ―It is not till the motherland reveals herself to the eye of the mind as something more than a sketch of earth or a mass of individuals, it is not till she takes shape as a great divine and maternal power in a form of beauty that can dominate the mind and seize the heart, that these petty fears and hopes vanish in the all-absorbing passion for the Mother and her service and the patriotism that works miracles and saves a doomed nation, is born‖. The concept of the divinity of the Motherland provided by Bankim in the Anandadamath inspired the militant nationalists so much so that they in turn preached the concept. It is quite clear from the speeches and writings of Aurobindo that he looked upon India as a living and pulsating spiritual entity, and revered her as the Goddess incarnate who, for centuries, had cradled and nourished her children and who was suffering utterly from the oppression of the British Government.Anandamath also made Aurobindo and the Bengal Extremists and militant nationalists reckon that Bankim‘s nationalism was essentially religious, Hindu in orientation. This inspired the former and consequently they also came to regard their nationalism to be a  ̳religious‘ movement. This was so because the Bengal Extremists and militant nationalists considered the nationalist movement a  ̳religion‘ that is, an endeavour whose paramount importance demanded dedication and sacrifice.From Bankim the militant nationalists in Bengal came to know that the subjection of India could be explained in terms of culture. The crucial cultural attribute which, according to Bankim, stands out as the major reason for India‘s subjection was the Hindu attitude towards power. Bankim explained that the Europeans were devotees of power. That was the key to their advancement. The Hindus were negligent towards power, and that was the key to their downfall. Power, or a lack of it, is a social phenomenon; power results from the application on physical strength of four elements: enterprise, solidarity, courage and perseverance. Bankim believed that the Bengali Hindus as a people had always lacked these elements, which was the reason that they were a subject and powerless people. However, he explained that power was a cultural attribute, it can be acquired by the cultivation of appropriate national-cultural values.The colonial state was founded on a superiority of force; this original superiority of force was the product of a superior culture which shaped and directed the British national project in the world. To match and overcome that superiority, Bankim believed, Indian society would have to undergo a similar transformation. And the key to that transformation must lie in a regeneration of national culture embodying, in fact, an unrivalled combination of material and spiritual values. To Bankim, therefore, the remedy for cultural backwardness lay in a total regeneration of national culture, or as he preferred to call it, the national religion. He believed that what was needed above all for a national regeneration in India was the re-establishment of a harmonious unity of religion and politics, harmony between a comprehensive ethical ideal and the practice of power.For the purpose of regeneration of the national culture, Bankim devised the concept of anushilan or practice. Anushilan, he said, was a  ̳system of culture‘, more complete and more perfect than the Western concept of culture as propounded by Auguste Comte and Matthew Arnold. The Western concept was fundamentally agnostic, and hence incomplete. Anusilan was based on the concept of bhakti which, in turn, implied the unity of knowledge and duty. There were three kinds of knowledge: knowledge of the world, of the self and of God. Knowledge of the world consisted of mathematics, astronomy, physics, and chemistry, and these one would have to learn from the West. Knowledge of the self meant biology and sociology, and these too one would have to learn from the West. Finally, knowledge of God, and in this field the Hindu sastra contained the greatest human achievements—the Upanisad, the darsana, the Purana, the itihasa, but principally the Gita. But mere knowledge would not create bhakti; for that, knowledge would have to be united with a sense of duty. Duty meant the performance of acts without the expectation of reward. To eat is duty; so is the defence of one‘s country. These acts had to be performed because they should be performed, not because they might produce beneficial results. This non-possessive, non-utilitarian concept of duty was to be the core of the national-cultural ideal which Bankim called the jatiya dharma or national religion.The national-cultural ideal which Bankim placed before his countrymen thus retained what was thought to be distinctively Indian, while subsuming what was valuable in the culture of the West. The aim was to produce the complete and perfect man—learned, wise, agile, religious and refined—a better man than the merely efficient and prosperous Westerner. In the character of Sri Krishna, Bankim found this ideal man. In Krsihnacharitra, Bankim discusses the rival claims of the Buddha, Christ and Krishna as ideal characters. It is true, he says, that Krishna‘s life does not show the same concern for redeeming the fallen as do the lives of Jesus or Gautama. But the latter were men whose sole occupation was the preaching of religion—a most noble occupation, and Gautama and Jesus both revealed themselves in that occupation as great human beings. But their lives could hardy serve as complete ideals for all men, because the truly ideal character must retain its ideal quality for all men of all occupations. Krishna himself was householder, diplomat, warrior, law-giver, saint and preacher; as such, he represents a complete human ideal for all people. (65) The national-cultural ideal thus must resemble the character of the ideal man—Krishna.In the field of politics, Bankim believed, the cultural ideal must be based on a judicious combination of force and mercy. The two are opposed in their consequences. A show of mercy to all offenders would ultimately lead to the destruction of social life. On the other hand, a society based entirely on force would reduce human life to a state on unmitigated bestiality. Modern Europe, Bankim believed, had hardly succeeded in finding the right balance between the two. The politics of modern Europe had overwhelmed its religion, which is why it has turned into a battlefield of violent forces wholly dedicated to the amoral pursuit of worldy goods. In the Udyogaparva of the Mahabharata, however, Krishna raises precisely this question: the right combination of force and mercy. Faced with the dilemma, the strong prefer a solution based on force and the weak appeal for mercy. But what is the answer for one who is both powerful and compassionate? That would be the ideal answer, and Krishna provides it in the Udyogaparva. Bankim‘s interpretation of these passages in the Mahabharata strongly emphasizes a concept of duty which embodies what Bankim regards as a rational as well as an ethical philosophy of power and constitutive of the national-cultural ideal. One element here is the notion of moral right. Krishna says,  ̳I will not desire a paradise given to the pursuit of immoral pleasures. But at the same time, I will not relinquish to the swindler a single grain of wheat of what is morally due to me. If I do so, I may not harm myself too much, but I will be guilty of the sin of adopting a path that will bring ruin upon society‘. Another element consists of the notions of rightful self-defence and just war. Bankim says,  ̳It is moral to wage war in defence of myself and of others. To shy away from doing so is grave immorality. We, the people of Bengal, are bearing the consequences of our immorality for seven hundred years‘.
The third element is the concept of ahimsa or non-violence, but it is a concept entirely consistent with the ideas of moral right, self-defence and just war. Ahimsa does not enjoin one to abhor violence at all times and under all circumstances. Many instances can be given when conscious violence is the only protection to life. Thus Bankim says,  ̳When a tiger prepares to spring upon me, I must pull the trigger as quickly as possible because if I do not destroy it, it will destroy me. There are situations where violence is moral. The main consideration here is the following: the supreme moral duty is to refrain from violence except when it is demanded by dharma (in this context this means patriotism). To use violence to prevent one who does violence is not immoral; on the contrary, it is the highest moral duty‘.The fourth important element in the concept of duty is the principle of control over senses. Bankim is very careful here to distinguish this principle from both asceticism and puritanism. The philosophy of dharma (national-cultural ideal) is not an ascetic philosophy. It does not advocate the renunciation of sensual pleasure. It is a worldly philosophy which makes it a duty to achieve control over the senses. On the other hand unlike puritanism, it does not set up a moral ideal as a result of which human life is constantly torn by an unnatural, and irreconcilable, opposition between sensual pleasure and spiritual salvation. Puritanism is opposed to sensual pleasure; the dharma (religious philosophy) of the Gita advocates neither desire nor abhorrence. Thus Bankim‘s concept of the national-cultural ideal combined a rational theory of power with a non-possessive spirituality. It was the virtues of the cultural ideal, which Bankim wanted his countrymen to imbibe through anusilan. By imbibing these qualities, he believed that a national culture would be created which would be able to match and overcome the superior culture of the British rulers. Bankim‘s exhortations did not fall on deaf ears. The militant nationalists of Bengal were profoundly influenced by the national- cultural project as propounded by Bankim. They made it a supreme task to imbibe the qualities which lay inherent in the cultural ideal as preached by Bankim.Thus the notion of moral right was invoked by the militant nationalists in the context of colonial rule in the country. Their nationalism was not of an European type, they did not aspire political liberty for the sake of political self-assertion or aggrandizement, but they aspired for it because it was their moral right to live as free men, which the British rule denied to them. As the latter had established their rule over India by force, the notion of rightful self-defence and just war was invoked by the militant nationalists as well to wage a war against the former which was moral and imperative to end the perennial subservience of the Indian people to foreign rule. The militant nationalists believed that if they shrank from this just war it would be grave immorality. Invoking the notion of ahimsa in the colonial context, the militant nationalists believed that to use violence against the organized oppression of the colonial state would not be immoral, on the contrary it was their highest moral duty.Bankim‘s injunctions regarding physical and moral discipline in patriotic work were also followed by the leaders of the revolutionary societies in Bengal. In an essay entitled Dharmatattva: Anushilan, Bankim explained that man has certain faculties, the proper anusilan or practice of which is a religious duty. The physical faculty comes first, for, among other things, a weak man can neither protect himself nor defend his country. Everyone should therefore practice wrestling, riding, swimming, and even learn the use of firearms in disregard of the Arms Act. One must not eat more than he needs and must also conquer sensual desires. The members of the Dhaka Anushilan Samiti, meticulously tried to live up to the anusilan ideal; the Samiti at Dhaka acquired a half-military, half-monastic character. All members of the Samiti (including the Samiti in Bakarganj) were required to make strenuous physical and mental efforts to prepare themselves for patriotic work. They had to be able to bear fatigue, exposure, and privations in food and sleep and to develop strength through celdiaries in which they were to note their daily progress in the conquest of various vices. (73) Similarly the members of the Barisal Party were also required to cultivate moral and physical virtues. Arun Chandra Guha informs us, that physical culture including wrestling, lathi, sword play and boxing formed the preliminary training for physical fitness for the young recruits of the society. The latter were asked to go alone to the cremation or burial ground at midnight, particularly on amabashya (new moon) night, so that they might conquer fear. They were also asked to nurse patients suffering from cholera which was a highly contagious disease. During epidemics when the entire population remained terror-stricken due the outbreak of cholera, the young members of the Barisal Party nursed and took care of the patients which involved great personal risk as well. Such acts also helped to develop courage among the members of the group.A vow of austerity and celibacy was also compulsory for the members. Bare feet, bare body, no combing of hair, washing their own clothes, austere but strength-giving food like gram soaked in water and nuts were recommended for the members. To control one‘s sensual desires some stringent practices were also undertaken. The members were made to take sweets like rasagolla and rabri in the mouth for a few minutes and then spit them out. The married young men were enjoined to live apart from their wives. The whole idea behind such practices was that the members of the group would be above fear, above sensual desires, above any desire for luxury and comfort; at the same time they had to be physically strong and persevering in the discharge of their duties undertaken on behalf of the group. The militant nationalists of Bakarganj like the members of other secret societies in Bengal practiced the qualities which were prescribed by Bankim in the creation of the national-cultural ideal. By anushilan or cultivation of the moral and physical virtues, as propounded by Bankim, they tried to reach near the national-cultural ideal of the complete and perfect man as much as possible (of course, it must be admitted that perhaps only a few could imbibe the virtues in character as Krishna possessed). They did so, as they believed that it would re-equip them culturally to overcome the superior culture of the British rulers, which would eventually enable the people of the nation toibacThey had to follow a rigorous daily routine and keep achieve liberation from foreign rule. So impressed were the leaders of the Calcutta and Dhaka Anushilan Samiti by the national-cultural project of Anushilan, that they named their organizations Anushilan Samiti. The militant nationalist movement in Bengal thus came to be characterized by the development of moral as well as physical prowess. The moral tone of the oaths of the Dhaka Anushilan Samiti was also influenced by the Anandamath vow: in particular, the Pratham Bishesh Pratijna (First Special Vow), which bound the oath taker in the name of God to avoid sexual indulgence and imprecated a solemn curse on him if he failed to keep the vow. After Bankim came Swami Vivekananda (1863-1902). There were two basic referrents in Vivekananda‘s thought and action. Spirituality and its cultural expression, religion, were the primary concerns of his personal life and his mission abroad. Patriotic fervour rooted in strong nationalist sentiments was the second source of his inspiration. His love for his country contained a unique feature—a genuine sense of identity with the poverty-stricken and oppressed masses, and indignation at the injustice heaped down the centuries on the real builders of human civilization. Neglect of the masses he condemned as a national sin. The awakening of the masses was therefore, considered by him as the essential ingredient for the regeneration of India.The programme for national regeneration with which Vivekananda charged his disciples focussed almost entirely on the poor and the illiterate. In feeding the poor, healing the sick and educating the ignorant ( ̳ignorant‘ in the metaphysical sense as well) work would shed its element of self-interest and become a sacrifice to God. More important than feeding or healing, however, was awakening in man the awareness of his true stature— dharma dana. The plan was to open their eyes through education. He went to the USA in the hope of raising funds for this purpose. A band of dedicated monks, would use these funds to serve his  ̳God, the poor‘ of all races. With maps, globes and magic lanterns they were to go out among the lowliest, the pariahs and the chandalas, and remove their ignorance. The monks of his mission would go from village to village, bringing religion to the door of the masses, impressing upon the minds of even the chandalas that they, too, had the same right to religion as the Brahmins and the same freedom of judgement, for in all dwell the One Absolute. Evidently he expected the masses to stand on their own feet and claim their own once their eyes were opened.Vivekananda believed that a few political concessions (put forward by the political organzations) granted by the Government would not bring political salvation to India. It was when the masses were well-educated, well-fed and well-cared for, and their support enlisted for the national cause, only then the efforts of the political organizations would come to fruition. Vivekananda tried to propagate the love for one‘s own countrymen in his singular way: He spoke of love as the gate to all the secrets of the Universe. The love of the people, that is the starving millions of India must be so intense as to make the patriot sleepless. He asks. ―Has it gone into your blood, coursing through your veins, becoming consonant with your heart beats? Has it made you almost mad? Are you seized with that one idea of the misery, of ruin, and have you forgotten all about your name, fame, your wives, your children, your property, even your own bodies? Have you done that? That is the first step to become a patriot, the very first step‖. The militant nationalists in Bengal were greatly inspired by Vivekananda‘s call for renunciation in the cause of the motherland.Indian society, Vivekananda affirmed, was the cradle of his child-hood, the pleasure garden of his youth and the refuge of his old age. The clod of Indian earth was his very heaven. ―That is the only God that is awake, our own race—everywhere his hands, everywhere his feet, everywhere his years, he covers everything‖. The service of man, he preached was the highest form of religion. To the patriot, he raised the most pertinent question: ―If you cannot worship your brother man, the manifested God, how can you worship a God who is unmanifested?‖ The Extremists and militant nationalists drank deeply of this love and resolved on self-sacrifice.Vivekananda was not a political revolutionary himself but he was a maker of many revolutionaries. Many of his exhortations especially that of imparting strength to the Indians, particularly to the young men of Bengal, seems to indicate that he was bent upon politically galvanizing the country. The message of the Upanishad was interpreted by him in an entirely new way. While explaining the Vedanta in its application to Indian life, he wrote: ―Everything that can weaken us as a race we have had for the last thousand years. It seems as if during that period national life had this one end in view--how to make us weaker and weaker till we have become real earth-worms, crawling at the feet of every one who dares to put his foot on us. Therefore, my friends, as one of your blood, as one that lives and dies with you, let me tell that you that we want strength, strength and every time strength. And the Upanishads are the great mine of strength. Therein lies strength enough to invigorate the whole world; the whole world can be vivified, made strong, energised through them. They will call with trumpet voice upon the weak, the miserable, and the downtrodden of all races, all creeds, and all sects to stand on their own feet and be free. Freedom, physical freedom, mental freedom and spiritual freedom are the watchwords of the Upanishads‖.
Though Vivekananda does not explicitly mention political freedom, any discerning reader is sure to find it included in the comprehensive term,  ̳physical freedom‘.Vivekananda drew upon the Vedantic doctrine of maya or illusion to instill courage and strength into the hearts of Indians. He initiated them into the secret of conquering fear by repeating the words, ―I have no fear of death: I never hunger nor thirst. I am it! I am it‖. He assured his countrymen that ―mountain high though the difficulties appear, terrible and gloomy though all things seem, they are but Maya, Fear not, it is banished. Crush it, and it vanishes. Stamp upon it, and it dies. Be not afraid‖. To a disciple he wrote: ―My child, what I want is muscles of iron and nerves of steel, inside which dwells a mind of the same material as that of which the thunder-bolt is made‖. (81) Swamiji‘s advice to become fearless had immense effect on the militant nationalists in Bengal. He said: ―The earth is enjoyed by heroes—this is the unfailing truth. Be a hero. Always say I have no fear. Tell this to everybody. Have no fear. Fear is death, fear is sin, fear is hell, fear is unrighteousness, fear is wrong life‖. The Upanishadic description of God as abhih or fearless were repeatedly used by Vivekananda in his lectures to enthuse the young men of the country. Thus in Calcutta in 1897, he said, ―Young men arise, for the time is propitious. We have to become abhih...for your country needs this tremendous sacrifice‘. Therefore, he quoted the Upanishads, ―Arise, awake, and stop not till the desired end is reached‖. The  ̳desired end‘, according to the Upanishads, was spiritual salvation. However, it is doubtful whether Vivekananda meant spiritual salvation. The militant nationalists of Bengal responded enthusiastically to this clarion call of Vivekananda. A Jugantar leaflet of 1910 repeated the latter thus:  ̳Be not afraid. The most sublime word of the Vedanta is Abhih, i.e., Be fearless. Fear is death‘: The way Hindu messianism became a major basis in the radicalization of politics in Bengal during the first decade of the twentieth century has been mentioned earlier. The chief exponent of Hindu messianism in the 1890‘s, was Swami Vivekananda. His concern for the poor in India made him travel to the West in the hope of raising funds. During his first visit to the USA in the autumn of 1893, while delivering lectures on Hindu philosophy, he became aware of the spiritual inferiority of the American people. Gradually he became convinced that the West was in need of India‘s religious inheritance. His preachings from this period onwards came to centre exclusively on Vedanta. He believed that Vedanta was India‘s gift to the world and he purveyed it to the vigorous western nations to help them reach out towards a new fulfillment, for they alone had the strength and vitality needed for a spiritual quest. He stayed on for years to preach the gospel of Vedanta as the basis of a universal religion. The spiritual liberation of the West, he hoped, would lead to a new dawn for mankind. But the liberation was also to be a spiritual conquest—of the West by India. It would earn for his country the status of a revered teacher and material assistance of western nations, the latter leading to an escape from poverty. The plan was not only to raise funds, but also to restructure the relationship of dominance and subjection. It almost appears as if Vivekananda projected his personal experience in the USA—the enthusiastic reception, the gathering of disciples, the many friendships and eager hospitality—into a global possibility. By a singular act of transference he conceived for India—his country, his people as he described her—the role of a spiritual guide to the West. He had acquired for himself a large following of western men and women. If a citizen of a conquered nation could come to be treated like a God, the cultural inheritance which had produced this transformation could lead to similar results for the country as a whole. Independence, it was implied, could follow from the redefined relationship.That the mission of spiritual conquest of the West by India, influenced the Extremists and militant nationalists of Bengal quite profoundly has been mentioned earlier. It was the Swadeshi Movement in Bengal which saw the Bengali bhadralok take the first plunge in an anti-colonial agitation. This Movement indicated a radical change in the consciousness of the colonized intelligentsia in general. The myths that had so long upheld the supremacy of the British in their minds, including that of the mantra of civilization, were now seriously challenged. English racial arrogance and discrimination were now clearly diagnosed as a bane of foreign rule. Thus many bhadralok now became mentally ready to contend for political sovereignty with the British. The intelligentsia, at least a substantial section of them, were now inspired by a vision of independence, something which had been scarcely present before with any such intensity. This strong desire for freedom was accentuated by the phenomenon of Extremism which has been described in Chapter 1.The anti-Partition agitation gave Extremist leaders Bepin Chandra Pal and Aurobindo Ghosh the opportunity to turn the ideal of political independence into reality. In the process of political radicalization however, Hindu messianism played a significant role The Extremists, by applying the spirit of advaita to politics made it radical. They invoked the message of the Vedanta and applied it to their politics. As the message of the Vedanta is this: that every man has within himself, in his own soul, as the very root and realization of his own being, the spirit of God; and as God is eternally free, self-realized, so Extremist leaders like Bipin Chandra Pal felt convinced that every man is eternally free, self-realized. Freedom is man‘s birth right. Similarly, Aurobindo Ghose observed in the Bande Mataram, ―According to Hindu philosophy, self-knowledge and self- realisation are the end of all religion. It is difficult to see how the greatest aim of human existence can be fulfilled, if influences from outside disorganize us and stifle our growth‖. Indians were deprived of an essential means of assimilating themselves to the universal. India could play her messianic role, so important for the spiritual health of the world, only if she first freed herself from political bondage. ―India must have Swaraj in order to live for the world, not as a slave for the material and political benefit of a single purse-proud selfish nation, but as a free people for the spiritual and intellectual benefit of the human race... She has always existed for the humanity and not for herself that she must be great‖. Such sentiments became commonplace with the militant nationalist in Bengal; and the way they influenced the young members of the Anushilan Samiti has been mentioned earlier.The influence of the speeches and writings of Swami Vivekananda on the militant nationalists of Bengal was quite profound. Thus Bhupendranath Dutta, observed, ―it is a truism to say that there is a correlation between Swamiji‘s appeals to his young countrymen and the intensity of revolutionary urge in the mind of the young men of later generation. Since the foundation of the Revolutionary Party in Bengal, in which Swamiji‘s British disciple Sister Nivedita took at first an active part and was a member of the Executive Committee, his works, along with the writings and life of Mazzini as well as the life of Garibaldi, in Bengalee, were the mainspring of inspiration to the youthful mind of India. In every gymnasium, i.e., exercise-club of the Revolutionary Party of Bengal, his work entitled  ̳From Colombo to Almorah‘ was read. From 1902 to 1930 there was no better seller in the market than Swamiji‘s books‘‘. Dutta, an important revolutionary leader, also preached a sort of neo-Vedantism, like that preached by Swami Vivekananda. In an editorial article in the Sandhya he wrote, ―First free the mother from her bondage, then seek your own deliverance‖. He also talked about the God-appointed mission of Swaraj. Addressing the British rulers, he wrote, ―Our power is more than human. It is divine. We have heard the voice telling us that the period of India‘s suffering is about to close‖. What he implied by this idea was that the work of achieving Swaraj was duly ordained by God. The Sedition Committee also noted the influence of the writings of Vivekananda on the militant nationalists of Bengal, and observed thus, ―for their own initiates the conspirators devised a remarkable series of text-books. The Bhagavad Gita, the writings of Vivekananda, the lives of Mazzini and Garibaldi were part of the course‖.A particular poem written by Vivekananda known as Kali the Mother, also came to influence Aurobindo and other militant nationalists of Bengal. In this poem Vivekananda exhorts his countrymen to accept Goddess Kali as Divine Mother and embrace death as her caress in the cause of the country. He wrote: Who dares misery love, And hug the form of Death, Dance in destruction‘s dance, To him the Mother comes.  The same message was expressed in prose first by Nivedita and then by Aurobindo. Nivedita‘s book on Kali the Mother (1900) quoted the poem by Vivekananda. Nivedita repeats the voice of the Mother thus:  ̳Arise, My child‘, Kali says,  ̳and go forth a man!... fear not. Forget not that I,... the holder of victory, am thy mother...Ask nothing. Seek nothing. Plan nothing. Let my will flow through thee... Ask not plans. Need the arrow any plan when it is loosed from the bow? ...Pass from a palace to plunge into the ocean of terror...Meet fate with a smile‘. (91) That Vivekananda influenced Aurobindo via Nivedita is apparent from what Aurobindo wrote in 1908:  ̳The Mother asks us for no schemes, no plans, no methods...She asks for our hearts, our lives, nothing less, nothing more‘.
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Thursday, 9 November 2017

हाइफा मुक्ति - आनंद कुमार, पटना

हमारा इतिहास लिखने वाले लुगदी उपन्यासकारों ने चूँकि कई तथ्य पहले ही छुपा रखे हैं इसलिए भारतीय सेना के कारनामे को छुपाना भी आसान हो गया | पहले विश्व युद्ध के दौरान कई भारतीय सिपाही भी लड़े थे और उनका इतिहास नागरिकों को कभी आजादी के बाद बताया ही नहीं गया | इसी वजह से लोगों को ये नहीं पता है कि इसराइली हैफा(Haifa) शहर को इस्लामिक ऑट्टोमन खलीफा के चंगुल से छुड़ाने वाले सैनिक भारतीय घुड़सवार थे |

फिफ्टीन्थ इम्पीरियल सर्विस कैवलरी ब्रिगेड के सैनिक 1918 में इसराइल के हैफा शहर को छुड़ाने के लिए लड़े थे | इनमें से कई वहीँ वीरगति को प्राप्त हुए और करीब 900 को वहीँ दफनाया गया है | सौ साल पहले हुई इस लड़ाई में 400 साल की इस्लामिक हुकूमत से हैफा को छुटकारा मिल गया, वो तुर्की हुक्मरानों से आजाद हुआ | हर साल 23 सितम्बर को भारत और इसराइल दोनों में हैफा दिवस मनाया जाता है | मुझे पता नहीं कि भारत में कितने लोगों ने कभी हैफा दिवस का नाम सुना होगा |

इसलिए हम वहां आ जाते हैं जो आपका सुना, आपके लिए जाना पहचाना है | आपने तीन मूर्ती भवन का नाम शायद सुना होगा | पहले प्रधानमंत्री नेहरु का आवास होने के कारण, और अब संग्रहालय और पुस्तकालय होने के कारण ये प्रसिद्ध है | वहां से गुजरती सड़क भी इसी नाम से जानी जाती है | सन 1924 में यहाँ उस तीन मूर्ती का अनावरण हुआ था, जिन तीन मूर्तियों के कारण इसका नाम पड़ा | ग़लतफ़हमी में कुछ लोग “तीन मूर्ती” कहने पर गाँधी जी के तीन बन्दर समझ लेते हैं |

पीतल की बनी ये तीन मूर्तियाँ हैदराबाद, जोधपुर और मैसूर रियासतों के घुड़सवार सैनिकों का प्रतीक हैं जो मिलकर पंद्रहवीं इम्पीरियल सर्विस कैवलरी ब्रिगेड के रूप में लादे थे | बाद में जब भारत आजाद हुआ तो ये 61वीं कैवलरी नाम से जाने जाने लगे | आज 61वीं कैवलरी दुनिया की इकलौती काम करती घुड़सवार सैन्य टुकड़ी है | जब 8 मार्च, 1924 को वाइसरॉय रीडिंग के समय इस प्रतिमा का अनावरण हुआ था तो इसकी सुरक्षा में 19 किंग जॉर्ज फिफ्थ ओन लैंसर्स तैनात था और गार्ड ऑफ़ ऑनर 2/13 फ्रंटियर फोर्सेज रायफल्स ने दी थी | ये दोनों बंटवारे में पाकिस्तान को दे दिए गए |

ये स्टाम्प की तस्वीर इन्टरनेट से जुटाई है, मेरे पास ये फिलहाल नहीं, क्योंकि कोई परिचित फिलहाल इसराइल में नहीं है | भारतीय डाक ने कभी इन घुड़सवार सैनिकों पर कोई डाक टिकट निकाले हों ऐसा याद नहीं आता | अगले साल भारतीय सैनिकों के इसराइल के हैफा में दर्ज करवाए इस कारनामे को सौ साल हो जायेंगे | सवाल ये है कि क्या भारत भी अपने सैनिकों को याद करेगा ?
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Monday, 6 November 2017

विशुद्ध माओवाद

अभी पुष्पा को कालेज आये चार ही दिन हुए थे कि उसकी मुलाक़ात एक क्रांतिकारी से हो गयी. लम्बी कद का एक सांवला सा लौंडा… ब्रांडेड जीन्स पर फटा हुआ कुरता पहने क्रान्ति की बोझ में इतना दबा था कि उसे दूर से देखने पर ही यकीन हो जाता था ..इसे नहाये मात्र सात दिन हुये हैं….. .बराबर उसके शरीर से क्रांति की गन्ध आती रहती थी… लाल गमछे के साथ झोला लटकाये सिगरेट फूंक कर क्रांति कर ही रहा था तब तक….पुष्पा ने कहा…”नमस्ते भैया….“हुंह ये संघी हिप्पोक्रेसी.” ..काहे का भइया और काहे का नमस्ते? ..हम इसी के खिलाफ तो लड़ रहे हैं… प्रगतिशीलता की लड़ाई… ये घीसे पीटे संस्कार… ये मानसिक गुलामी के सिवाय कुछ नहीं….. आज से सिर्फ लाल सलाम साथी कहना.पुष्पा ने सकुचाते हुए पूछा.. “आप क्या करते हैं .. क्रांतिकारी ने कहा..”हम क्रांति करते हैं…. जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ते हैं.. शोषितों वंचितों की आवाज उठाते हैं..क्या तुम मेरे साथ क्रांति करोगी? पुष्पा ने सर झुकाया और धीरे से कहा…. “नहीं मैं यहाँ पढ़ने आई हूँ… कितने अरमानों से मेरे किसान पिता ने मुझे यहाँ भेजा है.. पढ़ लिखकर कुछ बन जाऊं तो समाज सेवा मेरा भी सपना है…..”.क्रांतिकारी ने सिगरेट जलाई और बेतरतीब दाढ़ी को खुजाते हुए कहा… .यही बात मार्क्स सोचे होते… लेनिन और माओ सोचे होते…. कामरेड चे ग्वेरा….? बोलो?तुमने पाश की वो कविता पढ़ी है…“सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शान्ति से भर जाना”तुम ज़िंदा हो पुष्पा. मुर्दा मत बनों…. क्रांति को तुम्हारी जरूरत है…. लो ये सिगरेट पियो….”पुष्पा ने कहा…”सिगरेट से क्रांति कैसे होगी..?क्रांतिकारी ने कहा..”याद करो माओ और चे को वो सिगरेट पीते थे… और जब लड़का पी सकता है तो लड़की क्यों नहीं…. हम इसी की तो लड़ाई लड़ रहे हैं… यही तो साम्यवाद है.”और सुनो कल हमारे प्रखर नेता कामरेड फलाना आ रहे हैं…. हम उनका भाषण सुनेंगे.. और अपने आदिवासी साथियों के विद्रोह को मजबूत करेंगे… लाल सलाम. चे. माओ ....लेनिन..”पुष्पा ने कहा… “लेकिन ये तो सरासर अन्याय है… कामरेड फलाना के लड़के तो अमेरिका में पढ़ते हैं… वो एसी कमरे में बिसलेरी पीते हुए जल जंगल जमीन पर लेक्चर देते हैं… और वो चाहतें हैं कि कुछ लोग अपना सब कुछ छोड़कर माओवादी बन जाएँ और बन्दूक के बल पर दिल्ली पर अपना अधिकार कर लें… ये क्या पागलपन है.. उनके अपने लड़के क्यों नहीं लड़ते ये लड़ाई. हमें क्यों लड़ा रहे.? क्या यही क्रांति है”?क्रांतिकारी को गुस्सा आया… उसने कहा.. “तुम पागल हो.. जाहिल लड़की.. तुम्हें ये सब बिलकुल समझ नहीं आएगा… तुमने न अभी दास कैपिटल पढ़ा है न कम्युनिस्ट मैनूफेस्टो… न तुम अभी साम्यवाद को ठीक से जानती हो न पूंजीवाद को…”पुष्पा ने प्रतिवाद करते हुए कहा….”लेकिन इतना जरूर जानती हूँ कामरेड कि मार्क्सवाद शुद्ध विचार नहीं है.. इसमें मैन्यूफैक्चरिंग फॉल्ट है.यह हीगल के द्वन्दवाद, इंग्लैण्ड के पूँजीवाद और फ्रांस के समाजवाद का मिला जुला रायता है….. जो न ही भारतीय हित में है न भारतीय जन मानस से मैच करता है..क्रांतिकारी ने तीसरी सिगरेट जलाई… और हंसते हुए कहा… “ये बुर्जुआ हिप्पोक्रेसी.. तुम कुछ नहीं जानती… छोड़ो… तुम्हें अभी और पढ़ने की जरूरत है… कल आओ हम फैज़ को गाएंगे…. “बोल के लब आजाद हैं तेरे’पाश को गुनगुनाएंगे.. हम क्रांति करेंगे…. “आई विल फाइट कामरेड” “हम लड़ेंगे साथी.. उदास मौसम के खिलाफ”
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Saturday, 4 November 2017

सद्यः स्याह

मैंने देखा चाँद
कहाँ बताओ ?

अंधकार की गहरी खायी
भद्रजन की गहरी साजिश
लोक व्यवस्था पूरी अन्धी
राज्य व्यवस्था यों ही बहरी
फिर भी कहते युग बदला है
कहाँ बताओ ?

नंगे बदन जो दौड़ लगाये
रोगों से है जिसका रिश्ता
खाली पेट खड़ी मजबूरी
खोज रही हर दिन मजदूरी
युवकों का ये हाल चला है
या परिवर्तन का दौर चला है
कहाँ बताओ ?

बँटवारे में पायी आजादी
पहले बँटवारा फिर आज़ादी
पायी आजादी या बँटवारा
शेष घिरा है खंडित नारों में
फुटपाथों की कथा वही है
दीन हीन की व्यथा वही है
बँटवारे की इतने सालों में
किसका कितना भला हुआ है
कहाँ बताओ ?

गाँव पगडंडियाँ सुनी सुनी
शहर सड़कें भीड़ से बोझिल
बीच गाँव में रोये सियार
बीच शहर में खुले बार
कैसा सगुण गाँव शहर का
कहाँ बताओ ?
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