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क्षेत्रीय सुरक्षा , शांति और सहयोग की प्रबल संभावना – चीथड़ों में लिपटी पाकिस्तान की राष्ट्रीयत

“ क्षेत्रीय सुरक्षा , शांति और सहयोग की प्रबल संभावना – चीथड़ों में लिपटी पाकिस्तान की राष्ट्रीयत ा “ —गोलोक विहारी राय पिछले कुछ वर्षों...

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Thursday, 28 December 2017

संवेदना से परे चौकाचौंध

एक वे भी दिन थे
जब कभी
हर शाम मेरे गाँव में
अंडी के तेल के दिये
छोटी सी ढिबरी या
लालटेनें जला करती थी
पर बिजली से
आज रौशन है, कहीं अँधेरा
दिखता नहीं
मगर लोंगों के चेहरे
जितने स्पष्ट थे तब
उस खाँसती बूढ़ी दादी का
डंडे टेककर चलते
बड़े बुजुर्गों का
आज न शिकन दिखती है
न आँखों के अन्दर का
एहसास
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Friday, 22 December 2017

सर्दियों की रात

सुबह या शाम
रेत के सिंदूरी टीले पे
उतरने लगीं कोमल बूँदें
पर्वतों के पार
उभरी उजली सी मुस्कान
दूर कहीं पानी मे लिया विश्राम
थक के सूरज के अश्व ने
मुंडेर लौटते
पंखेरुओं की हर्षित ध्वनि
खींच लाई
धुएँ की लकीर गगन में
चूल्हे पे उबलते भात ने
खुदबुदा के कहा
सर्दियों की संध्या में
ये तपिश सुहावनी है
ठंडी होती बोरसी की आग
खोरने पर बोल पड़ी
पुष की रात में
मेरी जलन भी
जीवन दायिनी है
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Saturday, 9 December 2017

विस्मृति

शब्द
जो बिछड़े थे किसी मोड़ पे
पंख लगा कर उड़ गये
शब्द जो साथ चले थे मेरे
वो थक गये... ठहर गये
शब्दों का होना अखरता है अब
शब्द राह तो रहे
पर मंज़िल न हुये
शब्दों को
लड़ना पसंद है...
मरना पसंद है
पर साथ जीना पसंद नही
कितने भोले हैं ये मेरे
शब्द
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यथार्थ का अंतर्मन

सिर पर मोरध्वज
अधरों पर मुरली
नंदलाल के मथुरा गमन पर
कान्हा की
एक हल्की सी मुस्कराहट पर
गोपियों के समूह से अलग
निमग्न हो खड़ी
राधा स्थिर चित हो
बोल पड़ी
" सुनो
जब तुम मुझे मुग्ध भाव से
देखते हो ना
मैं बिना श्रृंगार के ही
सुंदर हो जाती हूँ
मेरे जीवन में जितना
साथ है तुम्हारा है
बस
उतना ही हिस्सा जिया है मैंने

कि
जितनी तुम्हारे साथ चली
बस उतनी ही बही हूँ मैं
कि
जितनी बार तुम्हें देखा है
उतनी ही बार प्रेम किया है
तुमसे मैनें... "

एक लम्बी उच्छ्वास के साथ
राधा मनन कर रही
" तुम्हारा मेरा सम्बंध
इतना सा ही है
तुम मौन रहो
मै सुनती रहूँ
तुम विरक्त रहो
मै जुड़ती रहूँ
तुम सत्य उधेड़ो
मै स्वप्न बुनूँ
विपरीत किंतु साथ "

फिर तो
एक गहरी साँस भर
राधा फुट पड़ी
" हमारा रिश्ता
एक गहरी खाई पे
चरमराता हुआ
लटकता सा
एक पुल है
जिससे पार होना
नामुमकिन
खाई का भरना
असंभव
उम्मीद का दामन थामे
इसपार हम
उसपार तुम "
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Tuesday, 5 December 2017

एक वध और

अपनी भूख मिटाने के लिए
बाँस की कोपलों में
कुछ कीड़ों ने छेद कर दिये
उन छेदों से जब जब
हवा गुजरती
कोपलों का रोना सुनाई देता
उन कीड़ों को तो पता ही नहीं
बंशी बनाने के उपक्रम में
कि वे संगीत के सर्जन में
हस्तक्षेप कर रहे हैं

सम्यक विचारों को विस्तार दो
कहते ही चेहरा विदीर्ण हो उठता
नजरें नीचे झुका तिरछे देख
तुम्हारे होंठ फड़फड़ा जाते हैं
एक बध और
क्या यह अन्तिम है ?
इसके बाद
मेरी सोच काँप उठती है
मेरे विचार कुण्ठित हो उठते हैं
मैं वापस लेता हूँ
नहीं चाहिये तुम्हारा यह सहयोग
तुम्हारा यह साथ सहकर्म
जो केवल कुंठा व ईर्ष्या से
अपने को सिद्ध कर सकता है
एक अयोग्य, निरा शून्य
नहीं चाहिये वह विश्वास
जिसकी चरम परिणति
तुम्हारी द्वेष, जलन, ईर्ष्या हो
जहाँ कर्म, सामर्थ्य और पुरुषार्थ की
हत्या हो

मैं
अधिक सहिष्णु हूँ अपनी आस्था में
मैं
अधिक तपी हूँ अपने अकर्मों में
मैं
अधिक धार्मिक हूँ अपनी नास्तिकता में
मैं
अधिक सरल हूँ अपनी कठोरता में
मैं
अधिक उदार हूँ अपनी उदासी में
मैं
अधिक मुक्त हूँ अपनी अकेलेपन में
नहीं चाहिये तुम्हारी शोहरत, जो
लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, चाटुकारिता
दलाली के रंग से तुम पाये हो
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Saturday, 4 November 2017

सद्यः स्याह

मैंने देखा चाँद
कहाँ बताओ ?

अंधकार की गहरी खायी
भद्रजन की गहरी साजिश
लोक व्यवस्था पूरी अन्धी
राज्य व्यवस्था यों ही बहरी
फिर भी कहते युग बदला है
कहाँ बताओ ?

नंगे बदन जो दौड़ लगाये
रोगों से है जिसका रिश्ता
खाली पेट खड़ी मजबूरी
खोज रही हर दिन मजदूरी
युवकों का ये हाल चला है
या परिवर्तन का दौर चला है
कहाँ बताओ ?

बँटवारे में पायी आजादी
पहले बँटवारा फिर आज़ादी
पायी आजादी या बँटवारा
शेष घिरा है खंडित नारों में
फुटपाथों की कथा वही है
दीन हीन की व्यथा वही है
बँटवारे की इतने सालों में
किसका कितना भला हुआ है
कहाँ बताओ ?

गाँव पगडंडियाँ सुनी सुनी
शहर सड़कें भीड़ से बोझिल
बीच गाँव में रोये सियार
बीच शहर में खुले बार
कैसा सगुण गाँव शहर का
कहाँ बताओ ?
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Thursday, 2 November 2017

एकान्त

जो आनन्द
अकेले जीने में है
वो
भरी भीड़ में नहीं
जो खुशी खुद से
बतियाने में है
वो और कहीं नहीं

अपनी ही कहानियाँ
नहीं खत्म होती
औरों की बात क्या करें
अजनबी गलियों के मुसाफिरों से
हम कितनी बात करें

जो भी हो
खुद से खुद का
लिखना अच्छा लगता है
क्या इतना काफी नही
क्या फर्क पड़ता है
हमारी कोई पहचान
है या नही
थोड़ा ही आनन्द सही
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Monday, 30 October 2017

समीक्षा

दौड़ लगाते सोच
जिसकी प्रतिछवि
मन में उठते भाव की
वे तरंगें ही हैं जैसे
लड़ रही बाज़ से
एक स्याह भूरी चिड़िया
अपने रक्त की उजास में
जिसकी परछाई
एक उफनती नदी है

मैं दूरी से नहीं
देरी से डरता हूँ
जो घटित होना चाहता है
और सिर्फ स्मृति में नहीं
इस उधेड़बुन में कि
पहल कौन करेगा

जो सोच है
जो भाव है
मर जाते हैं
साहस की कमी से
कई बार तो मरते हैं
मौसम की उमस से
या अत्यधिक नमी से
जो शब्द, भाव, सोच
जो मरते नहीं ठंड या
ताप की प्रचंड दहक से
वे मर जाते हैं
मौसम की अतिवृष्टि से

अहर्निश लम्बी
बात सोच के बाद
हम लौटना चाहते हैं
अपने अपने खेलों में
जहाँ दिन में
किये जाने वाले
सभी काम
अपनी पूर्ण सूची के साथ
उजाले के सङ्ग टँगे हैं

जब कि
कच्चे सूत सा जीवन
खंजर सम्भाल तराशता
दूर बैठा वक़्त
पास बैठे ईश्वर से
मनुहार कर रहा होता
इस बार मेरे बीच में
मत आना
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Thursday, 26 October 2017

यात्रा - अकेला से एकांगी की

ये जीवन
और कुछ नहीं
वस्तुतः
अकेलेपन से
एकांत की ओर
एक ऐसी यात्रा है
जिसमें
रास्ता भी हम हैं
राही भी हम हैं
और मंज़िल भी
हम ही हैं

इस जीवन के सफर में
इसके गतियुक्त रिश्ते में
न जाने कितने लोग
हमसफर बन जाते हैं
पर मंज़िल पर पहुंचकर
एक बार ठहर जाता
यह जीवन भी
साथ ही काल भी
ठहर जाता है
अपनी ही गति से
स्तब्ध हो आँखें
खुली की खुली
रह जाती, फिर से
अकेले हो जाते हैं हम

एक छोटी सी
कश्ती में चल
पार उतरना है
धीरे-धीरे खेना
बस दरिया को
जगाना नहीं है

जीवन में वो यादें
जो अकेले में आती
वे यादें ही कहाँ ?
याद वो है जो
महफ़िल में आये और
अकेला कर जाये
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Sunday, 22 October 2017

जीवन का चलन

रिक्शेवाले को बुलाया
वो कुछ
लंगड़ाता हुआ आया
मैंने पूछा
पैर में चोट है
कैसे चलाओगे ?
वो कहता है
बाबू जी
रिक्शा पैर से नहीं
पेट से चलता है

उठाना खुद ही पड़ता है
थका हारा बदन अपना
जब तक साँस चलती है
कोई काँधा नहीं देता

पल पल सरकता जीवन
बंजर सी भावभूमि पर
जाने कितने
आस के
बीज
बो गया....

बड़े यत्न से संभाला था
एक क़तरा सपनों का
आँखें खुली
और
वह
खो गया....

निरंतर भागती राहों में
कितनी ही स्मृतियों को
बड़ी कुशलता से
समय
धीरे धीरे
धो गया....

ये ऐसा ही चलन है
कभी दर्द उभरा
तो कभी हिय में
चुपके से
वह
सो गया....

जीवन की अभिव्यक्ति जो
बरस कर मिट गया
पर विशिष्ट
जीवन की कहानी है
बादल
बिछड़ा जो आसमान से
तो धरा का
हो गया....!!

ज़िंदगी की
भागदौड़ व कशमकश में
अक्सर बामुश्किल
मिल तो जाती है
हमें ज़िंदगी
पर ज़िंदगी को हम
चाहकर भी
कभी कभी
मिल नही पाते

मूंगफली के ढेर से
सबसे ज्यादा
खांचो वाली मोटी
मूंगफली उठाते है
फोड़ने के बाद जब
पुच्ची निकलती है
तो कितना दुख होता है
यही होता है
जीवन के साथ
जो जीवन जीने की
और जीवित होने की
एक सरल अभिव्यक्ति है
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Friday, 20 October 2017

यादें

यादों का क्या है
किसी भी पल
ज़हन के द्वार
खटखटा देती हैं
न सोचती
समझती
विचारती
न ही संकोच करती हैं
बिन बुलाए मेहमां सी
देहलीज़ पर
पग धर देती हैं

बड़ी बिगड़ैल हो गयी हैं
ये यादें
देर रात को
टहलने निकलती हैं
यादें कुछ ऐसी हैं, जैसे
कहानी की नायिका
हर अंक में चली जाती है
अन्त को एकाकी छोड़कर
अपनी विवशताओं के साथ
जहाँ नायक
दुखान्त सहानुभूति को लिखता है
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Wednesday, 18 October 2017

तन्हा जीवन

दीवाली की खुशियाँ
तो एक पक्ष है
जीवन का होना
और चलना भी
एक पक्ष है
खुद को यादों से
परहेज कर के
खुद को खुद में
जीना होता है

जब बूंदे कुछ गिरी कि
ख्याल भी भीग गये
बड़ी भीड़ हो गयी है
जमाने की नजरों में
इसलिए आजकल
अकेले ही रहना ठीक है

बहुत सँजो कर रखी चीज
वक़्त पर नहीं मिलती
जीवन को कभी तो
खुला छोड़ दे जीने के लिए
बहने दें कुछ
जख्मों के दर्द को
जब लफ्जों का
जेहन भी घुटता हो
जो महसूस होता
वो बयाँ कर दें
जब लफ्जों की
कलाबाजी न होती
जीवन का जो
एहसास होता
तब वहीं लेखनी
उठ चल पड़ती है

पानी के बुलबुलों सा है
ये जीवन सतरंगी
पर बस पल भर ही
जो एहसास जीना होता
कभी कभी वे ही
उकेरे जाते हैं
आईना लेकर
जो भी आये
बस उनका
जमीर देखेगें
सब हैं तन्हा
सभी में खालीपन
तो किस किस की
फिर पीर देखेगें

जहन में एक नाराजगी भी
पर खफा किसी से नहीं
दूर होते जाता है जो
यादों में ठहर जाता है
गुजरते जीवन में थमा हुआ
कोई क्षण जीना भी सिखाता
बहुत पसंद है महँगे तोहफे
पर अगली बार कुछ यों
जरा सा वक़्त कोई लाये

एक होकर भी
सबका बने रहना
बहुत मुश्किल है
चाँद होना
ऐ चाँद
तू भी तन्हा
खुद भी तन्हा
आ जरा गप कर लें
ईधर जीवन ठहरा हुआ है
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Friday, 13 October 2017

त्रिविध प्रदूषण

त्रिविध प्रदूषण

आज महागौरी सर्वसिद्धिदात्री
महाष्टिमी, कालरात्रि
निशा आराधना
प्रकाश की लालसा
नव ज्योतिपुंज का आविर्भाव
आज महागौरी सर्वसिद्धिदात्री
महाष्टिमी, कालरात्रि
निशा आराधना
प्रकाश की लालसा
नव ज्योतिपुंज का आविर्भाव
आनेवाली विजयादशमी
जलेगा रावण, पर
पर वातावरण का ठहराव
सामने खड़ा प्रदूषण
दैविक, दैहिक, भौतिक
बर्फ से ढ़का पहाड़
पहाड़ से ढ़का
दुख का पहाड़
संवेदनाओं के पिघलते
हिमनद, और
जीते हैं हम
पहाड़ की व्यथा
नदी पूर्णतः शान्त थी
आज यों ही कुछ
उदास थी
सोई थी पानी में
एक दर्पण सदृश
जिस पर पड़े थे
बादल के वस्त्र
आज महागौरी, सिद्धिदात्री
कालाष्टमी निशापूजा को भी
उसको जगाया नहीं
दबे पाँव लौट आया
वापस हो
शब्द मेरे
मुखर होते हैं
दबी हुई संवेदनाओं को
आकृति देने को
उसी समय एक
“मौन”
उपजता है मन में
जो मौन होता है
अंतहीन
समाधि सा
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छटपटाहट

छटपटाहट

जिंदगी में चलते चलते
हम कहाँ आगये
हर दिन
अजीब मुसीबतों संग
लड़ते लड़ते तंग आगये
अक्सर ऐसा होता है
दिमाग अशान्त होता है
दिल लाख चाहे
खुश होना फिर भी
उदासियों का ही
बसेरा होता है
उदासियाँ अकसर
मौन कर देती हैं
खुशियां चीख चीख कर
अपना अहसास करवाती हैं
व्यवस्था सम्बन्धों की
बेड़ियों में जो हम हैं
आज़ादी कुछ यों ही
छटपटाती है
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चंचल मन

चंचल मन

मन को कहाँ
सीमाओं का पता है
ये तो बस
भागने में लगा है
कभी शून्य में
शून्य हो जाता है
तो कभी ब्रह्मांड
नापने को चला है
जो प्रश्न समय लेते हैं
उभरने में
वे कई नये प्रश्न भी
खड़ा कर देते हैं
जो स्मृतियों में
शेष रह जाता है
वो भी क्या गंगा
में बह जाते हैं
वह पतझड़ ही क्या
जो बीता याद न दिलाये
वह सावन ही क्या
जो मन को भिगो न पाए
कुछ ऐसा भी है
आखिर तक कहानी का
हिस्सा न बन पाया
ऐसा पात्र ही क्या
स्वयं की कहानी में
अजनबी बन जाता है
या इतना भी अह्म
चरित्र क्या निभाया कि
उसमें से बाहर हो न सका
एक सीमा के अन्दर
मन को जो मिल गया
वह मुकाम नहीं
जो छू गया
वो चाँद नहीं
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मौन का होना

मौन का होना

एक ही जीवन में
बारम्बार मृत्यु होती है
हर एक प्रसंग की
अनेकों व्याख्या होती है
एक सुख के पीछे
सौ दुख आ जाते हैं
एक सूरज से करोड़ों
दिन रात सृजित होते हैं
एक शून्य कई अंकों की
गणना बदल देता है
एक कुविचार सौकड़ों को
भटका देता है
एक सत्य हजारों झूठ पर
भारी पड़ जाता है
एक संवाद बहुत
विवाद खड़ा कर देता
एक मन सौ अन्तर्द्वन्द की
रणभूमि बन जाता
एक निराशा अनेकों
सफलताओं की जननी होती
एक विषय की बहुल
परिभाषाएं हो जाती
जब मन की व्याख्या
परिधि से बाहर निकल
विचरण करता नभ में तो
कभी लोष्ठित हो
धरातल के नीचे
समा जाता है अतः
सबसे सार्थक संवाद
मौन ही होता है
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