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Friday, 25 May 2012

स्वतंत्र तिब्बत आन्दोलन -एक नयी राह,एक नया आयाम



स्वतंत्र तिब्बत आन्दोलन -एक नयी राह,एक नया आयाम
तिब्बत में बौद्ध भिक्षु चीन की दमनकारी शासन के खिलाफ स्वयं को अग्नि के हवाले कर रहें हैं।
17 अक्टूबर 2011 को 20 वर्षीय  तेजिन वान्ग्मो नामक भिक्षु पूर्वोत्तर तिब्बत के Mamae आश्रम,Ngaba में फ्री-तिब्बत का नारा देते हुए खुद को अग्नि में समर्पित कर दिया।2009के बाद तिब्बत में औसतन 20 वर्ष आयु के 32 युवकों ने चीनी दमनकारी शासन के विरोध में स्वतंत्र तिब्बत के उदघोष ,जयकारा के साथ खुद को आग में जला लिया।वांगमो जिसको जलने से मृत्यु हुई,ऐसा करने वाला पहला भिक्षु था।
A woman throws a white scarf over Tibetan Buddhist nun Palden Choetso as she burns on the street in Daofu, or Tawu in Tibetan, in this still image taken from video shot on November 3, 2011 and released to Reuters on November 22. The 35-year-old Tibetan Buddhist nun burned herself to death on the public street, the latest in a string of self-immolations to protest against 
बुद्धिष्टों का यह मानना है कि मानव के रुप में पुनर्जन्म अत्यन्त ही दुर्लभ है।परन्तु इसके साथ ही साथ तिब्बतियों की यह मान्यता एवं एवं विश्वास है कि आत्माघात करने से 500 पुनर्जन्म दूसरे रुपों में लेने के पश्चात फिर से मानव के रूप में पुनर्जन्म हो सकता है।इस विश्वास एवं वास्तविकता के बावजूद कि जो चेतनायुक्त जीवन और सभी संवेदनशील जीवन के सम्मान के लिए करुणा की मौलिक शिक्षा में शिक्षित हुए वे बौद्ध भिक्षु व भिक्षुनियाँ किरोसिन तेल शरीर पर डालकर स्वयं को आग के समर्पित कर अपने जीवन को बुझा दे रहें हैं।यह अत्यंत ही चिन्तनीय विषय है।जीवन न्योछावर करने की इस कृति का कारण तिब्बतियों की स्वतन्त्रता की इस आकाँक्षा को चीन के द्वारा नकारना ही नहीं बल्कि झुठलाना भी है। तेजिन वान्ग्मो की राह पर 19 वर्षीय नोरबू दमडुल जब अपने को अग्नि में समर्पित किया तो वह तिब्बत की आजादी के लिए एवं पूज्य दलाई लामा के तिब्बत लौटने का नारा लगातार बुलन्द करते रहा जब तक कि वह मुर्क्षित न हुआ। लेकिन बिजिंग  इस उत्कर्ष को समझने में विफल है।इन इन घटनाओं पर टिप्पणी करते हुए चीन में मानवाधिकार के निर्देशक (Director Human rights watch ) ,सोफी रिचर्डसन ने कहा कि "Ngaba जैसे क्षेत्रों में लगातार बढ़ते हुए तनाव को रोकने के लिए,मुक्त अभिब्यक्ति ,संघ,और तिब्बती मंठो में धार्मिक विश्वास के अधिकार में कटौती कर ,सुरक्षा मापदण्ड का खाका तैयार करना है।" Ngaba में स्थिति अत्यन्त ही खतरनाक एवं भयंकर बन चुकी थी।जो लगातार बनी हुई है।जहाँ तिब्बत की स्वन्त्रता के लिए स्वयं को बलिदान देना एक सहज एवं सामान्य सी घटना बन चुकी है।बीजिंग यहाँ विशेषतः अग्रणी सुरक्षा के नाम पर कड़े प्रबन्ध कर दिया है।सभी मठों को सुरक्षा अधिकारियों द्वारा बन्द कर दिया गया है।अनिवार्य नियमों के तहत भिक्षु और   भिक्षुणियों को हिरासत में ले लिया गया है।सरकारी परमिट प्राप्त मठवासियों को भी मंठों के प्रागंण से बाहर जाने पर रोक लगा दिया गया है।इन घटनाओं से पहले ही अगस्त 2011 में कीर्ति मठ का पानी और बिजली आपूर्ति बन्द कर दिया गया।तथा भिक्षुओं के रिश्तेदार और आगन्तुकों का मठ परिसर में प्रवेश प्रतिबन्धित कर दिया गया।Human rights watch की प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार Ngaba में बीजिंग सार्वजनिक सुरक्षा पर खर्च सिचुआन प्रान्त के अन्य counties के अपेक्षा 4 से 5 गुना खर्च कर रहा है।
सुरक्षा में सुधार करने की कोशिश के नाम पर चीन कीर्ति मठ के तीनों मुख्य प्रवेश द्वार पर एक सशस्त्र चौकी तैनात कर रखा है।इसके अलावे एक और सशस्त्र दल मठ के भीतर 20 कमरों वाला एक प्रकोष्ठ (अनुभाग)में रह रहा है।इस सुरक्षा योजना के तहत मंठों के क्षेत्र को 5 वर्गों,प्रत्येक वर्ग को 50 छोटे डिभिजन,जो  आसन्न सुरक्षा नियंत्रण के लिए छोटी-छोटी इकाइयोंइकाईयों में विभाजित है।जो भीक्षुओं के देशभक्ति शिक्षा एवं हड़ताल पर रोक के लिये एक बहुत ही कठोर अभियान के रूप में देखा जा रहा है।इस कठोर सुरक्षा तन्त्र के कारण अपनी स्वतन्त्रता की तीव्र वैचारिक अनुभूति रखने वाले तनावग्रस्त  2500 भिक्षु-भिक्षुणी आज अपने-अपने कक्षों (शयन-कक्ष) में वास्तविक रूप (पूर्णतया) में कैद हैं। इसके अलावे भी चीन एक वृहत्त एवं सूक्ष्म सुरक्षातंत्र मठवासी क्षेत्र में खड़ा कर रखा है।
इस यातना पूर्ण स्थिति में सुरक्षा अधिकारीयों द्वारा  आज उन भिक्षुओं से दबाव पूर्वक कहलवाया जाता है कि "मै दलाई लामा गुट का विरोधी हूँ।मै इस विभाजन का पक्षधर नहीं हूँ।मै कम्युनिष्ट पार्टी से प्यार करता हूँ।व मेरे उपर कम्युनिष्ट पार्टी की बड़ी असीम कृपा है।"
अन्तर राष्ट्रिय प्रेक्षकों द्वारा कीर्ति मठ के भिक्षुओं की स्वतन्त्रता की मांग समय-समय पर उठायी जाती रही है।जो बीजिंग के लिए एक लम्बी चिन्ता का विषय बन चूका है।बीजिंग इस तरह के सार्वजनिक विरोध का कठोरता पूर्वक प्रतिक्रिया देता आया है।जो चीनी छात्रों का 1989 में त्यान आमेन स्क्वायर पर विरोध के समय दमन में,या 2008 में तिब्बत और झिजियंग प्रान्त दोनों में लोकप्रिय विरोध के दमन में,या आज Ngaba में वर्तमान दमन के दौरान दिखायी पड़ता है।जो इन क्षेत्रों में शान्ति एवं सुरक्षा के नाम पर एक अस्थायी समाधान ही है।इन प्रदर्शनों एवं विरोधों के मूल कारण से मुंह का अर्थ है कि Ngaba में विरोध जारी रहेगा और स्वतन्त्रता के लिए बलिदान देने के लिए इच्क्षुक तिब्बतियों की संख्या में वृद्धि होना भी निश्चित रहेगा।चीन की सरकार को यह एहसास होना चाहिए कि तिब्बत में सशस्त्र सुरक्षा बलों की तैनाती में वृद्धि भी एक मुख्य कारण है,जिससे विशेष रूप से Ngaba में भिक्षुओं और पूर्व भिक्षुओं अपने को अग्नि के हवाले कर अपना बलिदान प्रदर्शित कर रहें हैं।छः दशकों से चला आ रहा इस अहिंसक आन्दोलन के करवायी के अन्तिम एवं बाध्यकारी रूप ही इस प्रकार के आत्मबलिदान का कारण हो सकता है।इसी प्रकार की एक घटना Damdul में 7 अक्टूबर 2011 को 20 वर्षीय Khaying और 18 वर्षीय Choephel के आत्मबलिदान के समय अग्नि से बाहर निकालकर चीनी लाल सैनिकों द्वारा बुरी तरह पीटा गया।जिनके विषय में आज तक उनकी चिकित्सीय अवस्था की सूचना Damdul के लोगों को नहीं है कि वे जीवित भी हैं या मरे।7 अक्टूबर 2011 की यह घटना अवश्य ही इस समस्या को गहरा दिया और आन्दोलन को तीव्र बना दिया।
विरोध प्रदर्शन का आत्मबलिदान का यह तरीका भले ही हताशा का भी हो सकता है,परन्तु बीजिंग बस,सडकों,और रेलवे के निर्माण से इस गुस्से को ठण्डा नहीं कर सकता है।जब Ngaba स्वतन्त्रता आन्दोलन की बहुत ही संकटपूर्ण चुनौतियों से जूझ रहा था,तब तिब्बत के किसान व गृहस्थ गृहस्वामी "फ्री-तिब्बत"के नारे के साथ अपनी बकरियाँ चराने जाते थे।इस प्रकार चीनी नेतृत्व को इस तथ्य का सामना करना ही होगा कि प्रतिरोध या तो जारी रहेगा या तिब्बतियों को उनके आत्मनिर्णय के क़ानूनी अधिकार देना ही पड़ेगा।
 यह 6 दशक पुराना तिब्बत मुक्ति का आन्दोलन 2008 से एक नये आयाम से जुड़ चुका है।हिमाल के शेरपा और भोट की केरुंग -कुन्ती के प्रति चाह और उसके आनन्द को भूल नहीं पाते हैं।और यह आनन्द तभी उनको प्राप्त हो पायेगा,जब तिब्बत की अपनी सार्वभौमिकता हो।और यही आनन्द हिमाल के शेरपा और भोट को 2008-2009 में स्वतंत्र-तिब्बत आन्दोलन को नैतिक समर्थन देने के लिए अभिभूत किया,प्रेरित किया।और सिमकोट से ताप्लेजुंग तक पूरे हिमाल का नैतिक समर्थन इसको प्राप्त हुआ।जिसमे सुख-दुःख का सम्पर्क मार्ग ग्याला,लम्जुंग और थाप्ले भन्जियांग रहा है।
इसका दूसरा कारण यह भी है कि 27 सितम्बर 2004 में पाँचथर के माओवादी PLGA के शिविर पर नेपाली सेना के अभियान में पकडे गये 27 लड़ाकुओं को भले ही चीन अपना नागरिक होने से इन्कार कर दिया,पर हिमाल के लोगों को यह पूर्णतः आभास हो गया कि वर्त्तमान नेपाल की अशान्ति एवं अस्थिरता में माओवादियों को चीन द्वारा ही सहयोग प्राप्त है।जिसके कारण हिमाल के लोगों के परिवार व कुटुम्ब के सदस्यों की हजारों की संख्या में हत्या हुई और सैकडों अभी तक लापता है।जो नेपाली माओवादियों द्वारा किया गया।जिसका प्रतिवाद तिब्बत की स्वतन्त्रता ही है।अतः आज तिब्बत की स्वतन्त्रता की आवाज की प्रेरणा पूज्य दलाई लामा एवं धर्मशाला के हाथों से बाहर निकलकर सिमकोट से ताप्लेजुंग के हिमाल के लोगों के साथ जुड़ चुकी है।
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Sunday, 13 May 2012

बुद्ध शीतयुद्ध के चपेट में-Buddha in the grip of Cold War



बुद्ध शीतयुद्ध के चपेट में
 हङ्कङ में मई के प्रथम सप्ताह में आयोजित किया गया तीसरा विश्व बौद्ध सम्मलेन में चीन के कम्युनिस्ट पार्टी के स्थायी समिति के सदस्य जिया  चिङलिनदिखाई पड़े।यह चीन के एक नया सांस्कृतिक रूपांतरण की शुरुवात या एक सोची समझी चाल,रणनीति है।
नौ सदस्यीय स्थायी समिति के शक्तिशाली नेता जिया बुद्ध की तीन मूर्तियों और खप्पर के अवशेष के सामने झुककर तीसरे विश्व बौद्ध सम्मलेन का उदघाटन किया, तथा अपना मंतव्य प्रगट किये।"वृहत सामाजिक सदभाव और विश्व शांति के लिए बौद्ध शिक्षा का मूल तात्पर्य खोजना आवश्यक है"के आग्रह हुए उनके बधायी सन्देश में चीन की विस्तारवादी सोच एवं अपने कमजोरियों को छिपाने की बौद्ध रणनीतिक आकांक्षा स्पष्ट झलक रही थी।
दलाई लामा के अभियान को अवरुद्ध करने, तिब्बत की स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता को नकारने, तिब्बत एवं चीन के बौद्ध समुदाय का विश्वास एक छल पूर्वक जीतने तथा विश्व का बौद्ध केंद्र भारत की मान्यता को चुनौती देने के लिए हिमालय क्षेत्र में saft power विस्तार की चीन की एक गहरी योजना साजिश है।इसके साथ ही साथ इसके द्वारा क्रिश्चियन धर्म के मार्फ़त चीन में बढ़ते पश्चिमी प्रभाव को रोकने की रणनीति के तहत माओ का चीन आज बौद्धमत की दुहाई भरे मन से कुटिलतापूर्वक दे रहा है।दलाई लामा के बाद दुसरे धार्मिक नेता चीन द्वारा प्रायोजित कथित पंचेन लामा को इस बौध सम्मलेन के मार्फ़त पहली बार चीन ने सार्वजनिक कराया।एक रणनीति के तहत अब चीन इस कथित पंचेन लामा  की विश्व यात्रा मकाउ,ताइवान,सिंगापुर होते हुए आगे बढ़ाएगा।ताकि उनको विश्व बौद्ध समुदाय में पंचेन लामा की मान्यता दिला सके।
आज तिब्बत के अन्दर अपनी स्वतंत्रता व सार्वभौमिकता को लेकर एक व्यापक संघर्ष चाल रहा है। आये दिन इस विषय से उद्वेलित होकर बौद्ध भिक्षु आत्मदाह कर रहें है।अबी तक तिस से अधिक भिक्षुक आत्मदाह कर चुकें है। इस आन्दोलन को चीन अपने सैन्यबल व तोपों के द्वारा कुचलने का प्रयास कर रहा है।ऐसा वीभत्स दमन भी तिब्बती बौधों को डिगा नहीं पा रही है। चीन के बौद्धमत अनुवायी भी दमन से पीड़ित बौद्धों के प्रति सहानुभूति रख रहें हैं।साथ ही कंफुसस मत वालों की सहानुभूति भी तिब्बती बौद्धों के प्रति बन रहा है। दूसरी तरफ तिब्बत से सटे सुचीयान प्रान्त के उइगर भी अपनी आजादी को लेकर आन्दोलन छेड़ रखा है।इन सारी परिस्थितियों से चीन आज घबडा गया है।अतः छः दशक से कम्युनिष्ट शासन व्यवस्था अपनाने वाला चीन के चौथे शीर्षस्थ नेता के द्वारा "बौद्धदर्शन सामाजिक सदभाव व विश्व शांति का माध्यम बनेगा" का उदगारचीन की कम्युनिष्ट पार्टी का धर्म सम्बन्धी विचार में आनेवाला परिवर्तन का संकेत न होकर एक बहुत बड़ी बाध्यता के रूप में दिखाई पद रहा है।बेजिंग का दर्म के प्रति इस तरह से उदार होना एक असहज , आतंरिक दबाव एवं भूरणनीतिक  बाध्यता है।इसलिए धर्म सम्बन्धी अपनी पुरानी मान्यता को ध्वस्त कर राजनीतिक सुधर के रास्ते पर अग्रसित हो रहा है।
         बौद्धगया में बोध्धित्व को प्राप्त कर सारनाथ में प्रगट होनेवाला यह बौद्धमार्ग विश्व के आबादी में दूसरी बड़ी संख्या द्वारा अपनाये जानेवाला विश्व का दूसरा बड़ा दर्शन है।जिसकी एक बहुत बड़ी संख्या चीन में व्ही है।चीन की एक अरब तीस करोड़ की जनसँख्या में ४०%जनसँख्या बौद्धामार्गी है।चीनी कम्युनिष्ट पार्टी के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र "ग्लोबल टाइम्स"के एक सर्वेक्षण के अनुसार ८५% प्रौढ़ चीनी नागरिक किसी न किसी प्रकार के धार्मिक गतिविधि में संलगन है।परन्तु चीन सरकार की अनुदार धार्मिक निति के कारण उनमे से अधिकांश इसका प्रगटीकरण , खुलासा नहीं करते है।अधिकांश नागरिकों द्वारा अपनी आस्था छुपाने के बाद भी सरकारी आकंडा अनुसार चीन में १० करोड़ बौद्ध अनुवायी है।परन्तु गैर सरकारी तथ्यांक के अनुसार चीन में ४० करोड़ बैद्धामार्गी हैं।चीन के हरुन एंड इंडस्ट्रियल बैंक ने अप्रैल २०१२ में एक अध्ययन प्रतिवेदन में यह सार्वजनिक किया कि धनि एवं निजी चीनी व्यापारियों कि प्रवृति अब कुछ ज्यादे ही आध्यात्मिक बन रही है।पूर्वी चीन का व्यापारिक केंद्र झिजियंग व फुजियान प्रान्त बौद्ध ,क्रिश्चियन धर्म का गढ़ माना जाता है।कतिपय व्यापारी विगत में अपने भ्रष्टाचार के पाप से मुक्त होने के लिए वे बौद्ध पूजा या चर्च में सम्मलित हो रहे है।इस अध्ययन के अनुसार यहाँ का नागरिक जीवन व व्यवसाय में धर्म अभिन्न रूप से जुड़ चूका है।इसा क्षेत्र में ३० वर्ष के उम्र के लोंगों के बिच ११% युवा क्रिश्चियन धर्म के प्रति आकर्षित हुए है।चीनी राष्ट्रपति हु जिन्ताओ ने एक माह पूर्व पार्टी के मुखपत्र में प्रकाशित अपने लेख में यह व्यक्त किया कि "इस प्रकार युवा वर्ग में बढ़ते हुए पश्चिमी प्रभाव चीन के लिए एक चुनौती का सन्देश दे रहा है। इसके लिए एक आह्वान करते हुए  सांस्कृतिक सुधर में कार्यकर्ताओं को केन्द्रित होने का निर्देश दिया ।"
तेजी से निर्माण होते हुए अनेकों बौद्ध स्तूप, बौद्ध - विश्वविदयालय, एवं एक बड़ी संख्या में चीन के अन्दर बन रही बौद्ध मूर्तियों के कारण एक नया बौद्ध जागरण चीन में दिखायी दे रहा है।जो चीनी सरकार के लिए अत्यधिक चिंता का विषय है।बुद्ध की १२८ मीटर ऊँची मूर्ति एवं लगभग ५०० से अधिक गुम्बा के साथ हेनान चीन और पूर्वी एशिया का बौद्ध केंद्र के रूप में विक्सित हो चूका है।
चीन अपने बौद्ध रणनीति के तहत २००६ के अप्रैल में प्रथम बौद्ध विश्व सम्मेलन झेजियांग में आयोजित किया।जो २००० वर्ष पुराने चीन के बौद्ध इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना रही।गैर कम्युनिष्ट विश्व के लिए यह आश्चर्य का विषय रहा। २००९ के मार्च में पूर्वी चीन के जिन्ग्सू में दूसरा और अभी २०१२ के मई में तीसरा विश्व बौद्ध सम्मेलन कर चीन ने सांस्कृतिक आक्रमण के रूप में एक नई रणनीति तैयार किया है।हङ्कङ,सम्मलेन में यह निर्णय लिया गया कि अब पूर्वी चीन के जान्ग्सू प्रान्त स्थित लिंग्सान में स्थायी रूप से विश्व बौद्ध सम्मलेन आयोजित होगा।
हङ्कङ,सम्मलेन में चीन के बौद्ध रणनीति का प्रतीक चीन द्वारा प्रायोजित कथित २२ वर्षीय पंचेनलामा थे।१९८९ में १० वें पंचेनलामा के मृत्यु के पश्चात् दलाई लामा द्वारा घोषित ११ वें पंचेनलामा को अस्वीकार करते हुए , आज से १७ वर्ष पूर्व ६ वर्षीय ग्याल्तसेन नोर्बू को ११ वाँ पंचेनलामा बीजिंग द्वारा घोषित किया गया।यह सर्वविदित है कि दलाई लामा के बाद पंचेन लामा को ही दूसरा शीर्षस्थ तिब्बती धार्मिक बौद्ध नेता मन जाता है।बीजिंग का यह खेल ७६ वर्षीय १४ वें दलाई लामा के मृत्यु के पश्चात् नया दलाई लामा की घोषणा करने का एक अभ्यास के रूप में देखा जा सकता है।बौद्धमत ही नहीं , बल्कि किसी भी धर्म के प्रति अनुदार मत रखने वाला चीन की कम्युनिष्ट सरकार द्वारा इस प्रकार पुनर्जन्म के प्रति अत्यधिक रूचि दिखाते हुए अग्रसर होना,दलाई लामा के अनुवायियो के लिए एक बहुत बड़ा आश्चर्य है।जो तिब्बत के स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता को पूर्ण रूपेण बीजिंग द्वारा डकारने की एक साजिश के रूप में ही सामने दिखायी पद रहा है।यों दलाई लामा के अनुवायी तथा सम्पूर्ण बौद्ध जगत चीन द्वारा प्रायोजित पंचेनलामा को मान्यता नहीं देते है।चीन की यह बौद्ध रणनीति , खासकर तिब्बत सम्बंधित नए दलाई लामा के पुनर्जन्म की पहचान व घोषणा की साजिश को सम्पूर्ण बौद्ध जगत में एक शंका के रूप में देखा जा रहा है।
चीन की इस रणनीति का एक दूसरा पहलू यह भी है कि एशिया ही नहीं पुरे विश्व के बौद्ध जगत में बोद्धागया जो बौद्ध केंद्र के साफ्ट पावर के रूप में देखा और पहचाना जाता है,जिसके विकास के क्रम में ११ वीं शती के नालंदा बौद्ध विश्वविद्यालय की पुनः स्थापना भारत सरकार ने किया है।दलाई लामा,तिब्बत व विश्व के बौद्धमत अनुवायियो के लिए बोद्धगया एवं नालंदा विश्व के बौद्धमत का एक साफ्ट पावर केंद्र है।चीन इसे क्षेत्रीय प्रति स्पर्धा एवं क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के रूप में हेनान को एशिया का बौद्धमत का साफ्ट पावर केंद्र बनाना चाहता है।जिससे तिब्बत के संघर्ष को दबाया जा सके,जो तिब्बत की स्वतंत्रता एवं सुरक्षा पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है।
चीन की इस चुनौती को स्वीकार कर तिब्बत की सार्वभौमिकता को पुनः वापस दिलाने की जबाब देही अब भारत की ही है। जो एक गुरु योजना बनाकर, पडोसी मित्र देश नेपाल के साथ बातचीत कर बौद्धगया,नालंदा,वैशाली,लुम्बनी,कुशीनगर और सारनाथ को एक बृहद बौद्ध सर्किट में जोड़े।इस प्रकार तिब्बत की खोयी हुई स्वतंत्रता को वापस लेन में एक सार्थक पहल होगा।इस प्रकार बौद्धमत के बिच प्रभाव बना, भारत फिर से दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया (आर्यावर्त)में अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संजो सकता है,उसे पुनः एक नयी गरिमा दे सकता है।जो विश्व में सामरिक संतुलन एवं शांति स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा में एक महत्व की भूमिका निभाएगा।जब कि चीन एशिया में अपने प्रभाव और शक्ति विस्तार के बढ़ाने की एक सोची समझी रणनीति के तहत इसमे पहले से ही कूद पड़ा है।जिसका एक पहलू "एशिया पैसफिक एंड कोआपरेसन फाउन्डेशन" (एपेक)के माध्यम से लुम्बनी विकास एवं लुम्बनी विशेष आर्थिक क्षेत्र के सहयोग के नाम पर तीन अरब अमेरिकी डालर का सहयोग की योजना आज से दो वर्ष पहले ही घोषणा कर चूका है।जो चायनीज स्टडी सर्किल के माध्यम से मंदारिन (चीनी ) भाषा की शिक्षा नेपाल के पुरे तराई इलाके में देकर कार्यान्वित करना चाहता है। चीन के द्वारा मंदारिन (चीनी)भाषा की शिक्षा नेपाल के तराई के विकास का माध्यम तो नहीं बन सकता है, बल्कि हाँ वह जरुर ही नेपाल के तराई में एक व्यापक नेटवर्क निर्माण कर भारत की जासूसी की जा सकती है ।जिससे भारत में अस्थिरता फैला कर भारत की शांति में आग अवश्य ही लगायी जा सकती है।भारत में क्षेत्रीय अनैतिक आकांक्षाओं को हवा देकर भारत को तोड़ने का एक तीखी चाल ही दिखाई देगा। इस प्रकार वह लुम्बनी के नाम पर सहयोग कर ,निवेश कर नेपाल की तराई जो भारत की सीमा से जुटता है,में एक साफ्ट पावरखड़ा करना चाहता है।जो भारत की सुरक्षा,शांति एवं विकास पर आसन्न मदराते हुए खतरा का बादल है,जिसमे नेपाल के माओवादी नेता पुष्प कमल दहाल "प्रचंड" और नेपाल की उनकी पार्टी "यूनाइटेड कम्युनिष्ट पार्टी (माओवादी),नेपाल सहयोग कर रही है।
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Sunday, 6 May 2012

भगवान पशुपतिनाथ का भारत भ्रमण--पशुपतिनाथ यात्रा पशुपति से तिरुपति की कैलास से अनुराधापुरम


भगवान पशुपतिनाथ का भारत भ्रमण--पशुपतिनाथ यात्रा
पशुपति से तिरुपति की कैलास से अनुराधापुरम
           हिन्दुओं का प्रसिध्द तीर्थस्थल पशुपति क्षेत्र,काठमांडू से पशुपतिनाथ की प्रतिमूर्ति की झांकी भारत भ्रमण को आने वाली है।दो महिना पूर्व फाल्गुन,२०६८ वि० संओ को पशुपति विकास क्षेत्र कोष,काठमांडू द्वारा सुप्रसिध्द तीर्थस्थल बालाजी तिरुपति से बालाजी की मूर्ति नेपाल दर्शनार्थ लाया गया।और अब पशुपति विकास क्षेत्र कोष, काठामांडू द्वारा पशुपतिनाथ की मूर्ति भारत के विभिन्न तीर्थस्थलों और नगरों के भ्रमण की योजना तैयार कर ली गयी है।
हिन्दुओं का प्रसिध्द तीर्थस्थल पशुपति क्षेत्र,काठमांडू से पशुपतिनाथ की प्रतिमूर्ति की झांकी भारत भ्रमण को आने वाली है।दो महिना पूर्व फाल्गुन,२०६८ वि० संओ को पशुपति विकास क्षेत्र कोष,काठमांडू द्वारा सुप्रसिध्द तीर्थस्थल बालाजी तिरुपति से बालाजी की मूर्ति नेपाल दर्शनार्थ लाया गया।और अब पशुपति विकास क्षेत्र कोष, काठामांडू द्वारा पशुपतिनाथ की मूर्ति भारत के विभिन्न तीर्थस्थलों और नगरों के भ्रमण की योजना तैयार कर ली गयी है|
तिरुपति बालाजी की मूर्ति नेपाल आने के अवसर में काठमांडू में तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट के अध्यक्ष कानुमुरी बापिरा एवं प० वि० क्षे० कोष के सदस्य सचिव नाहटा के बीच पशुपतिनाथ के भारत भ्रमण की बातचीत हुई।पशुपतिनाथ के भारत भ्रमण की व्यवस्था तिरुपति देवस्थानम द्वारा करने के विषय में सविस्तार निरंतर बातचीत चल रही है।इस प्रकार काठमांडू पहुचने में असमर्थ हिन्दुओं की पशुपति दर्शन की इच्छा पूर्ण होगी।
इसके लिए पशुपति मंदिर का सम्पूर्ण प्रारूप तैयार किया जा रहा है।जिसमे भगवान पशुपतिनाथ की प्रतिमा स्थापित रहेगी।जिसको एक विशाल सुसज्जित रथ पर स्थापित कर सम्पूर्ण भारत भ्रमण कराया जायेगा।
                  प्रथम चरण में इस रथ की यात्रा पटना,बाराणसी, मथुरा,वृन्दावन,दिल्ली,मुंबई,सिध्दी- विनायक, तिरुपति बालाजी, कन्याकुमारी,रामेश्वरम,भुवनेश्वर,कोलकत्ता,एवं कामाख्या का भ्रमण संपन होगा।इसके बाद दुसरे चरण की यात्रा की योजना की जाएगी, जिसमे विश्व के अन्य देशों में भ्रमण का भी विचार किया जायेगा।इस यात्रा के सञ्चालन हेतु अनेक स्तरों पर मूर्तिकारों एवं संस्कृतिविदों के साथ बातचीत का क्रम जारी है|
           नाहटा के अनुसार भाद्रपद तक रथ का प्रारूप तैयार कर लिया जायेगा और इस वर्ष के अन्दर ही पशुपतिनाथ की भारत भ्रमण यात्रा संपन्न हो जाएगी।
       पर दुर्भाग्यवश इस गुरु-महत्ति यात्रा पर प्रारंभ होने से पहले ही काले बदल मडराने लगे। वरिष्ठ माओवादी नेता एवं नेपाल सरकार के संस्कृति मंत्री गोपाल किराती का विरोध का स्वर फुट पड़ा। एक साजिश के तहत वे नाहटा को कार्यकाल समाप्ति से पूर्व ही उनको पदभार से मुक्त करा देने का अभियान छेड़ दिया है।
         पर यह पूर्ण विस्वास के साथ कहा जा सकता है कि भगवान पशुपतिनाथ, तिरुपति-बालाजी एवं श्री रामेश्वरम की कृपा से पशुपति से तिरुपति ही नहीं, बल्कि कैलाश (ल्हासा) से अनुराधापुरम तक फिर एक बार अपने पूर्व सांस्कृतिक व सामाजिक एकता के रंग में रंगा लहलहाएगा, दिखाई पड़ेगा।
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Friday, 4 May 2012

Afghan museum highlights country's Buddhist heritage


Afghan museum highlights country's Buddhist heritage



Afghanistan, which achieved global notoriety for cultural barbarism when the Taliban blew up the ancient Bamiyan Buddhas, this week opened an exhibition highlighting the country's rich Buddhist heritage.

In sharp contrast to the religious intolerance behind the destruction of the Buddhas 11 years ago, the immaculate exhibition is on display in the National Museum, itself rebuilt with international aid after being destroyed by civil war.

Overlooked by living history represented by the ruins of the neoclassical Darulaman Palace on a neighbouring hill -- also a victim of war -- the interior of the museum is a sanctuary of quiet arches and marble floors in a violent land.

In the entrance hall is a replica of the Great Buddha of Bamiyan, one of two giant standing statues carved into Bamiyan cliffs in Afghanistan's central highlands in the sixth century.

But the polyurethane copy is a poor substitute -- unlike the surviving treasures dating from the second century AD that dedicated museum staff managed to hide and protect through 30 years of conflict and turmoil.

One statue shows a lean-torsoed Buddha, reflecting the art of the ancient Greeks introduced by Alexander the Great, who staged one of the many invasions of Afghanistan over the centuries, said museum curator Surkh Kotal.

Others show damage inflicted by Taliban fanatics who destroyed many of the museum's artefacts before their regime was overthrown by US-led troops in 2001 for harbouring Al-Qaeda leader Osama bin Laden.

Among the items spared -- many hidden in secret vaults outside the museum -- are relief carvings depicting the Buddha's life and other artefacts from former Buddhist monasteries in Afghanistan, mainly south of the Hindu Kush mountains.

One of those behind the protection of the treasures is museum director Omarakhan Massoudi, who joined the museum 34 years ago.

"I'm happy we preserved some masterpieces through a difficult time in our country," Massoudi told AFP, recounting how a decision was made to move major works to secret locations in 1989 as Soviet forces withdrew and civil war loomed.

During that war, some 70 percent of the museum's artefacts were looted and smuggled into neighbouring countries to find their way onto the black market, he said.

The museum, along with the palace on the hill, was largely destroyed as rival warlords unleashed artillery and rocket fire on the capital in a brutal struggle for power.

Then came the Taliban, Islamic hardliners who swept to power in 1996. Towards the end of their rule they destroyed more than 2,000 artefacts, Massoudi said, and blew up the Bamiyan Buddhas as "idols" in March 2001.

"We have repaired more than 300 statues. Some are on display and we will continue this activity in the future," said Massoudi.

The destruction of the Bamiyan Buddhas was "a big tragedy because they were a part of our history, a part of our culture", he said.

Afghanistan, lying on the famed Silk Road trading route connecting east and west, absorbed Buddhism from India and the religion flourished for hundreds of years before the arrival of Islam in the eighth century.

Now, the practice of Buddhism has virtually disappeared from a country where more than 99 percent of the population proclaim themselves to be Muslim. But the museum is dedicated to keeping the nation's history alive.

"We have to be proud about this very rich heritage of Afghanistan, and we need to transfer it to the next generations," said Massoudi.

In a country still at war, with 130,000 US-led NATO troops helping the government of President Hamid Karzai fight a Taliban insurgency, it is still unsafe for the museum to display some of its most important possessions.

The famed and priceless 2,000 year-old Bactrian Gold collection of more than 20,000 gold ornaments, hidden by museum staff during the civil war, has been touring the world since 2006.

But closer to home, the ruined grandeur of the Darulaman Palace -- clearly visible from the museum -- stands as an enormous exhibit reflecting a less than glorious period in the nation's history
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