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“गीता” : एक ‘मानवीय ग्रंथ’ … एक ‘समग्र जीवन दर्शन’ … व ‘मानव समाज की अप्रतिम धरोहर’

            "गीता” का शाब्दिक अर्थ केवल गीत अर्थात् जो गाया जा सके से लिया जाता है । किन्तु आतंरिक रूप से इसका अर्थ है कि जिस...

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Saturday, 30 November 2013

हिंदुस्तानी तहजीब औरैर भारतीय मुसुसलमान

Avz, Muzaffarpuri

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हिंदुस्तानी  तहजीब औरैर भारतीय मुसुसलमान
                      वह दीने-हिजाजी का बेबाक बेड़ा । निशां जिसका अक्साए-आलम में पहुँचा।।
                       मजाहम हुआ कोई खतरा न जिसका, न अम्मां में ठटका, न कुल्जम में झिझका।।
                      किये पै सिपर जिसने सातों समंदर। वह डूबा दहाने में गंगा के आकर।।
अर्थात्, अरब देश का वह निडर बेड़ा, जिसकी ध्वजा विश्वभर में फहरा चुकी थी, किसी प्रकार का भय जिसका मार्ग न रोक सका था, जो अरब और बलूचिस्तान की मध्य वाली अम्मान की खाड़ी में भी नहीं रुका था और लालसागर में भी नहींझिझका था, जिसने सातों समंदर अपनी ढ़ाल के नीचे कर लिये थे, वह श्रीगंगा जी के दहाने में आकर डूब गया था।
                 मौलाना अल्ताफ हाली की इन पंक्तियों को पढ़ने से ये लगेगा कि वह इस्लाम जिसने सारी दुनिया पर अपनी विजय पताका फहराई थी वह भारत में आकर पराजित हो गया। हाली की इन पंक्तियों पर लोग सवाल खड़े कर सकते है कि आज भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमानों की भारी तादाद है, जो अरब और मध्यपूर्व के दर्जनों मुस्लिम देशों की कुल आबादीसे भी ज्यादा है, यानि आबादी के लिहाज से तो इस्लाम सबसे ज्यादा इस महाद्वीप में ही फैला तो फिर इस्लाम यहां पराजित कैसे हुआ? मौलानी हाली की लिखी इन पंक्तियों का अर्थ क्या है?इसका जबाब भारत पर आक्रमणकारी के रुप में आये मुस्लिम और इस देश की सर्वसाधारण जनता जो इन विदेशियों केकारण इस्लाम में दीक्षित हो गई थी, के आचार-व्यवहार, रहन-सहन,परंपरा और संस्कृति का भारतीय हिंदू जीवन के साथ एकरुपता दे देती है। अरब और दूसरे मध्य एशियाई देशों से आये हमलावरों और सूफी संतों ने यहां के सामान्य जनमानस की पूजा-पद्धति को बदलने में तो कामयाबी हासिल कर दी पर इनका दिल न जीत सके और न ही पूरी तरह उनकी परंपराओं और रीति-रिवाजों को अरबी सभ्यता के अनुरुप बना सके। दूसरे शब्दों में कहें तो अरब की सरजमीं से उठे इस्लाम मत में इनका मतांतरण तो हुआ पर अरब संस्कृति में आत्मसातीकरण न हुआ। इतना ही नहीं आक्रमणकारियों में से जो भारत में रह गये और जो उनके माध्यम से इस्लाम में दीक्षित हुये वो भी हिंदू संस्कृति के रंग में सराबोर हो गये। इतने की हिंदुओं के लिये अमृततुल्य गंगा जल को मुसलमान भी अपनी नसों में धुलता हुआ महसूस करने लगे। राही मासूम रजा की ‘गंगा और महादेव‘ शीर्षक से लिखी पंक्तियां इसी बात को तो बयां कर रही हैः-
                ‘मेरा नाम मुसलमानों जैसा है, मुझको कत्ल करो और मेरे धर में आग लगा दो।
                 लेकिन मेरी रग-2 में गंगा का पानी दौड़ रहा है, मेरे लहू से चुल्लू भरकर महादेव के मुंह पर फेंको।
                 और उस योगी से कह दो महादेव, अब इस गंगा को वापस ले लो।
                 ये जलील तुर्कों के बदन में गढ़ा गया, लहू बनकर दौड़ रही है।।
मुसलमान जब भारत आये यहां की मूत्र्तिपूजा की चर्चे उसके मन में थे, इसी आधार पर भारत को वो जाहिलों का मुल्क समझ रहे थे पर यहां आने के बाद उन्हें पता लगा कि यहां के लोगों को जो तौहीद वो सिखाने आये हैं वो तो यहां तब से है जब दुनिया की बाकी सम्यतायें नींद में थी। यहां आकर उन्हें लगा कि जिन भारतीयों को ये हेय समझतें हैं वो तो ज्ञान-विज्ञान के हर क्षेत्र में उनसे मीलों आगें हैं। बगदाद के खलीफाओं ने अपने दरबार में कई हिंदू विद्वानों को बुलाकर सम्मान दिया था तथा उनकी मदद से संस्कृत के कई ग्रंथों का अनुवाद अरबी और फारसी में करवाये थे। मध्य एशिया के बर्बर हमलावर महमूद गजनवी के साथ आये विद्वान विद्वान अलबरुनी ने कश्मीर में संस्कृत सीखी थी, हिंदू धर्मशास्त्रों का
अध्ययन किया था और इसके पश्चात् उसने एक किताब लिखी थी जिसमें उसने भारत और भारत के निवासियों की बड़ी प्रशंसा की है। आक्रमणकारी अरब और मध्य एशियाई थे, इस्लाम का प्रचार उनके अंदर जुनून की तरह छाया हुआ था, गैर-मुस्लिमों और बिशेषकर वो जो अहले-किताब की श्रेणी में नहीं आते, के लिये उनके मन में गहरी नफरत थी पर ये सारी चीजें मिलकर भी हिंदुत्व की सर्वसमावेशी शक्ति के आगे नहीं टिक सकी। उनका दैनिक नित्य कर्म, बात-व्यवहार, आचार सबकुछ हिंदुस्तानी तहजीब के ताबे हो गई। चिश्तिया संप्रदाय के महान सूफी संत निजामुद्दीन औलिया ने तो ये तक कहा कि, मीसाक के रोज अल्लाह मुझसे हिंदी जबान में हमकलाम हुये। जब मुसलमान भारत आये और यहां आकर राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर जैसे महापुरुषों की गाथायें पढ़ी तथा यहां के जनमानस में उनका मकाम देखा तब उन्हें अपने नबी करीम (सल्ल0) की मुबारक जुबान से निकले इस अल्फाज कि ‘हिंद से मुझे वलियों की खूश्बू आती है‘ का मतलब समझआया।
             जैसे-जैसे वक्त गुजारता गया ,शक, हूण, यवन, पारसी, आदि समुदायों की तरह इस विदेशी मुसलमान भी पूरी तरह यहीं के होकर रह गये थे। विशाल और सर्वसमावेशी और सबको आत्मसात करने वाली हिंदुस्तानी संस्कृति ने इस्लाम के प्रचारकों का हृदय बदलकर रख दिया था। बर्बरता और असहिष्णुता हिंदुस्तान की सर्वग्राह्य संस्कृति में विलीन में हो गया।
          एक या दो नहीं बल्कि सैकड़ों मिसालें हैं जो भारतीय मुसलमानो और आक्रांता के रुप में आये मुसलमानों के हिंदुस्तानी तहजीब से जुड़ जाने और उनके हृदय परिवत्र्तन का गवाह है। मुगल बादशाहों के काफी पहले यानि इस्लाम के भारत में आगमन के आरंभिक काल से आरंभ हुआ यह पविवत्र्तन बहादुरशाह जफर के काल तक पूरी तरह परवान चढ़ गया था। गाय  को अवध्या मानने की वेदकालीन परंपरा का सम्मान अपने पुत्र हूमायूँ को दी गई नसीहत में बाबर ने और अंग्रजों से अपने वतन को मुक्त कराने को कमर कस चुके बहादुरशाह जफर ने भी किया था जब उन्होंनें बकरीद के अवसर पर गोहत्यारों के लिये मृत्युदंड की धोषणा की थी। इतिहास में बहुत कम हिंदू राजा होंगें जिन्होंनें गोहत्यारे के लिये ऐसी कठोर सजा का
प्रावधान किया हो।
* अलबरुनी को संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञान था जो उन्होंनें यहां के ब्राह्मणों से सिखा था। अलबरुनी ने कई संस्कृत ग्रंथों का भारसी भाषा में अनुवाद किया था।
* फिरोज तुगलक ने जब अमरकोट पर आक्रमण किया था जब वहां के एक पुस्तकालय में उसे हिंदू दर्शन शास्त्रों के ऊपर संस्कृत में लिखी कुछ पुस्तके मिली थी। उसने अपने दौर के विद्वान इजुद्दीन धलीदखानी को इन किताबों का फारसी में अनुवाद करने का आदेश दिया और इनका नाम रखा दलायत-ए-फिरोजशाही।
* सिंकंदर लोदी ने अपने शान काल में भारतीय आयुर्वेद पर लिखी एक किताब का अनुवाद तिब्बे-सिंकंदरी नाम से फारसी में फरमाया था।
* होली के अवसर पर हास्य कला का प्रदर्शन अपने देश में प्राचीन काल से होता आ रहा है। मिर्जा संगीन बेग ने अपनी पुस्तक सैर-उल-मजाजिल में लिखा है कि बहादुर शाह जफर अपने महल के छत पर इन हास्य काव्य सम्मेलनों का आयोजन करवाते थे तथा उसमें से सर्वश्रेष्ठ टोली को सम्मानित किया करते थे। अवध के नबाब वाजिद अली शाह के समय तो होली का उत्सव तेरह दिन तक मनाया जाता था।
* इस तहजीब के साथ एकाकार हो जाने वालों में सबसे पहला नाम अमीर खुसरो का है। अमीर खुसरो ने खुद को हिंदुस्तानी तहजीब के साथ एकरस कर लिया था। 1253 ईसवी में उत्तर प्रदेश के एटा में जन्मे खुसरो पितृ पक्ष से तुर्क और मातृपक्ष से हिंदी थे। भारत की भाषा, बोली, संगीत, प्राकृतिक सौंदर्य सबकुछ खुसरो का मन मोहता था। उनका काव्य भारत के बिशेषताओं के किस्से सुनाता है। अपनी पुस्तक आशिका में उन्होंनें लिखा कि भारत एक ऐसा मुल्क है जिससे वह मुहब्ब्त करता है, जो इस्लाम का गौरव है, जहां शरीयत का सम्मान है और जहां वह बेहद सुरक्षित है। खुसरो ने भारतभूमि को धरती का स्वर्ग कहा तथा इसको साबित करने के लिये सात तर्क दिये। यहां तक खुरासान पर भारत की श्रेष्ठता साबित करने के लिये भी खुसरो ने 10 कारण बताये। भारतीय संगीत के बारे में उन्होंनें कहा था, यहां का संगीत मनुष्यों को ही नहीं, पशुओं तक को प्रभावित कर लेता है। भारतीय संगीत से हरिण कृत्रिम निद्रा में निमग्न होकर शिकारी का शिकार बन
जातें हैं। यदि कोई अरब संगीत से भारतीय संगीत की तुलना करे तो मैं कहूँगा कि संगीत के सहारे यात्रा करने वाले ऊँट को चलने का तो होश रहता है, परंतु भारतीय संगीत द्वारा मोहित हरिण तो सर्वथा चेतनाहीन हो जातें हैं। हिंदी से खुसरो को बेपनाह मुहब्बत थी जिसका इजहार फारसी भाषा में लिखे अपने एक शेर में उन्होंनें किया हैः-
                    चु मन तूतिए-हिन्दम, अर रास्त पुसी।
                    जे मन हिंदुई पुर्स, ता नग्ज गोयम।।
अर्थात्, मैं हिंदुस्तान की तूती हूँ, अगर तुम वास्तव में मुझसे कुछ पूछना चाहते हो तो हिंदी में पूछो, जिससे कि मैं तुमको अनुपम बातें बता सकूं।
* बहमनी राज्य के बीजापुर में आदिलशाही वंश का शासन था। इसी वंश में इब्राहीम आदिलशाह द्वितीय भी हुये थे जिन्हें भारतीय संगीत में निपुणता हासिल थी। भारतीय संगीत पर उनके द्वारा लिखा गया एक काव्य संग्रह ‘नवरस‘ नाम से विख्यात है, दक्षिण भारत के होते हुये भी उन्होंनें इसे ब्रजभाषा में लिखा। यह पुस्तक आज भी भारतीय संगीत के ऊपर लिखी गई बेहतरीन पुस्तकों में शुमार होती है। इसी वंश के शासक अली आदिलशाह ने हिंदू देवी सरस्वती और देवता गणेश को समर्पित भक्ति के कई पद लिखे थे। जब उस जमाने के मुल्ला-मौलवियों ने उसके इस काम को कुफ्र बताया तो उसने जबाब दिया कि इन देवी-देवताओं की प्रेरणा से ही वह ऐसा काव्य लिखने में सक्षम हो सकें है। इस वंश के शासक शाह मीरानजी ने अपनी कई रचनायें भारतीय तहजीब को जेहन में रखकर की। वो अपनी भाषा हिंदी बताते हुये कहते थे
कि मेरी रचनायें उन लोगों के लिये है जो अरबी-फारसी नहीं जानते। मीरानजी के पुत्र बुरहानउद्दीन जानम साहब अपनी रचनाओं में हिंदी छंदों का प्रयोग करते थे।
* गोलकुंडा में शासन करने वाले कुतुबशाही वंश के 5वें बादशाह कुली कुतुबशाह 1580 में सिंहासन पर बैठे थे। कुली कुतुब उर्दू के बहुत बड़े लेखक थे। उनकी रचनाओं में हिंदुस्तानी तहजीब का असर स्पष्ट दिखता है जिसमें उन्होंनें खुलकर दीवाली, होली, बसंत आदि भारतीय त्योहारों का वर्णन किया है।
* एलफिंस्टम के अनुसार जब बहमनी राज्य पर मालवा की मुस्लिम सेना ने हमला किया था तो उनकी सैन्य टुकड़ी में अफगान सैनिकों के साथ-2 राजपूत भी थे वहीं कृष्णदेवराय की तरफ से लड़ने वालों में मुस्लिम भी शामिल थे। बाबर की जंग जब राणा सांगा के साथ हुई थी तो राणा के पक्ष में लड़ने वालों में हसन खां मेवाती और इब्राहीम लोदी का बेटा भी शामिल था।
* मध्यकालीन भारत के मुस्लिम कवि अपने काव्यों में श्रीराम, सीता, गणेश आदि शब्दों का बेखटके प्रयोग करते थे। लगभग 1500 साल पहले हुये मुस्लिम कवि कुतबन ने मृगावती नाम से लिखी अपनी अजेय कृति हिंदी में लिखी था। यह पूर्णरुप से हिंदू मूल का प्रेम काव्य था जिसकी कथा कुछ-2 सीता माता की कथा से साम्यता रखती है। 1424-25 में लिखित जरनामा में हिंदी का प्रयोग किया गया था। मंझन, जायसी, नूर मुहम्मद आदि विद्वान अपनी रचनायें अवधी में करते थे।
* महमूद गजनवी जैसे बर्बर शासक ने अपने सिक्के पर संस्कृत के शब्दों को जगह दी थी।
* मुहम्मद तुगलग बर्बर होने के बाबजूद भारतीय संगीत का प्रेमी था। मुल्ला-मौलवियों के विरोध करने के बाबजूद उसने अपने दरबार में 1200 गायकों को नियुक्त कर रखा था।
* टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली ने बहुत से हिंदू मंदिरों की स्थापना अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम में करवाई थी। उन्होंनें कर्नाटक के नंदनगुंजा में नंजनदेशवरा की मूत्र्ति स्थापित करवाई थी जिसके बाद उस मंदिर का नाम हैदरअली लिंगम् रख दिया गया था।
* कश्मीर के शासक जैनुल आबदीन तो पूरी तरह हिंदुस्तानी तहजीब में रच-बस गये थे। जैनुल ने अपने असहिष्णु पिता के कोप का भाजन बने हिंदुओं को अपना वरदहस्त दिया और कश्मीर छोड़कर जा चुके हिंदुओं को वापस बुलबाकर उन्हें फिर से कश्मीर में बसाया था। जैनुल ने तोड़ें गये मंदिरों का जीर्णोधार कराया था और ब्राह्मणों को अभय देते हुये उन्हें उनके रिवाजों के पालन की पूरी छूट दे दी थी। उसने पूरी तरह गोवध का निषेण किया था। वो खुद हिंदू पर्व-त्योहारों और उत्सवों में बड़े आनंद से शरीक होतें था। झेलम उत्सव को उन्होनें फिर से शुरु करवाया था। सारी जिंदगी उन्होंनें केवल एक ही शादी की और कभी किसी पराई स्त्री की तरफ नजर तक उठा कर नहीं देखा। मांस और मदिरा दोनों से उन्हें परहेज था। खाली वक्त में वो नीलमत पुराण, दशावतार और दूसरे अन्य हिंदू ग्रंथों का अध्ययन करते था। अपने दरबार में श्रीभट्ट नाम के एक हिंदू वैध को रखा हुआ था जो उनका निजी चिकित्सक भी था। राजतरंगिणी और महाभारत का उन्होंनें फारसी भाषा में अनुवाद करवाया और कल्हण रचित राजतरंगिणी को विस्तार दिलवाई। मुल्ला अहमद नाम के मुस्लिम विद्वान से उन्होंनें महाभारत, दशावतार, राजतरंगिणी आदि ग्रंथों का फारसी रुपांतरण कराया था। अपनी जीवनी यदु भट्ट नाम के हिंदू से लिखवाई जो जैन प्रकाश नाम से मशहूर है।
* खान देश के शासक महमूद बीगड़ के शासन में उच्चतम पदों पर हिंदू नियुक्त थे। एक ब्राह्मण मलिक गोपी उसका मुख्यमंत्री था। बीगड़ ने अपने राज्य में संस्कृत और इसके विद्वानों को संरक्षण दिया था। इसी के वंश में मुजफ्फरशाह द्वितीय भी थे। उनके दरबार में बाई झाऊ नाक की एक नर्तकी थी जो सरस्वती नृत्य के लिये मशहूर थी। उसके अनुरोध पर सुल्तान ने पूर्ण स्वर्णनिर्मित और बहुमूल्य आभूषण जड़ित हंस बनबाया था जो माँ सरस्वती का वाहन है।
* हिंदुस्तानी तहजीब ने बंगाल के मुसलमान शासकों को भी प्रभावित किया। गौड़ के सुल्तान नुसरात ने महाभारत का अनुवाद बंगला में करवाया था। कृतिवास नामक विद्वान को अपने राज्य में पूरा संरक्षण देकर उसने उसे रामायण का बंगाली अनुवाद करने का हुक्म दिया था। बंगाल के एक दूसरे मुसलमान शासक सुल्तान हुसैन शाह ने भी महाभारत का बांग्ला में अनुवाद कबिंदु परेश्वर से करवाया।
* मशहूर सूफी संत बाबा फरीद हिंदी में कलाम करते थे और पंजाबी पर भी उन्हें महारत थी। पंजीबी साहित्य को उनकी कई अमूल्य देनें हैं। सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरुग्रंथ साहिब में उनके पदों को स्थान दिया गया।
Û शेख निजामुद्दीन औलिया को हिंदी गीतों में बड़ा आनंद मिलता था, शमा में वो हिंदी गीतों को सुनना पसंद करतें थे। हिंदू गीतों के बोल पर ये कई बार झूमने लग जाते थे। कहा जाता है कि एक बार फारसी गीत इनपर कोई असर नहीं डाल पा रही थी तो कव्वाल हसन मैसांदी ने हिंदी में गाना शुरु किया जिसे सुनकर वो भावविभोर हो गये। शेख निजामुद्दीन हिंदू योगियों से भी संपर्क रखते थे और इन योगियों से ही इन्होंनें ध्यान आदि की विधि सीखी थी।
* हिंदी से मुहब्ब्त करने वाले सूफी संतों में शेख गेसूदराज का नाम भी प्रमुख है। एक बार उनसे किसी ने उनसे पूछा कि फारसी के गीत, गजल की अपेक्षा लोग हिंदी को क्यों प्रमुखता देतें हैं? इस पर गेसूदराज ने फर्माया, इनमें से प्रत्येक अपना बिशिष्ट गुण रखता है पर हिंदी मधुर और हृदयग्राही है जिसमें मृदुलता, कोमलता तथा सुझावात्मक तीनों गुण एक साथ है जिसे केवल अनुभव से जाना जा सकता है।
* बाबा बुल्लेशाह का नाम भी हिंदी से मुहब्बत करने वालों में शुमार है।
* सूफी मत का एक उपखंड सत्तारी ने हिंदू रहस्यवाद तथा योग को अपना लिया था। इस मत के संत जंगलों में चले जाते थे तथा वहां हिंदू संतों की भांति कंद, मूल खाकर गुजारा करते थे और उनकी ही तरह हठयोग करते थे।
* मुसलमानों ने ईश्वर का नाम जपने के लिये माला का इस्तेमाल हिंदू और बौद्धों से सीखी थी।
* अकबर के काल में जन्मे अब्दुर्ररहीम खानखाना भारतीय तहजीब को प्रस्तुत करने वालों में एक ऊँचा स्थान रखतें हैं। मुसलमान होते हुये भी अपने काव्य में उन्होंनें महाभारत, रामायाण, पुराण और गीता जैसे गं्रथों के कथानकों का प्रयोग किया है। हिंदू देवी-देवताओं और भारतीय परंपराओं को भी प्रमुखता से इन्होंनें अपने काव्य में स्थान दिया है। रहीम के काव्य का आज भी हिंदू बड़े भक्ति-भाव से पारायण करतें हैं। श्रीकृष्ण के लिये लिखे इनके पद लोगों को भाव विभोर कर देतें हैं।
* सोलहवीं सदी में दिल्ली के एक समृद्ध पठान परिवार में जन्में रसखान का सारा जीवन भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित था। गोविंदविट्ठल दास जी ने उन्हें कृष्णभक्ति की दीक्षा दी थी। रसखान इस्लाम धर्म में पैदा हुये थे जहां पुर्नजन्म की अवधारणा नहीं हैं पर वो यही कामना करते थे कि अगले जन्म उनका कृष्ण चरणों में हो। मथुरा के यमुनातट पर इनकी समाधि है। रसखान के लिखे पद श्रीकृष्ण की भक्तिभावना से ओत-प्रोत हैः-
       मानस हौं तो वही रसखान, बसौं बृज गोकुल गाँव के ग्वारन। जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चैरों नित नंद की धेनु मंझारन। पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धरयो कर छत्र पुरंदर धारन। जो खग हौं तो बसैरो करो,नित कालिंदी कूल कदंब की डारन।
एक दूसरे पद में उन्होंनें लिखा:-
      मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी। ओढ़ी पीतंबरी लै लकुटी , बन गोधन ग्वारन संग फिरौगी। भावतो मोहि मेरो रसखान, सो तेरे कहे सब स्वांग भरौंगी। या मुरली मुरलीधर की , अधरान धरी अधरा न धरौंगी।।
* राजस्थान के अलवर में जन्में संत लालदास भी मुसलमान थे पर हरि भक्ति में वो लीन हो गये थे। गांव-2 धूम कर हरि भक्ति का प्रचार करते थे। उन्होंनें लालपंथी संप्रदाय की नींव डाली थी।
* औरंगजेब को मुगल बादशाहों में सबसे अधिक धर्मांध माना जाता है पर उसके वक्त में हिंदुस्तानी तहजीब अपनाने वाले और उससे मुहब्बत करने वाले उसके अपने धर में मौजूद थे। उसके भाई दारा शिकोह हिंदू विद्वानों की संगति में रहते थे, उन्हें हिंदू ग्रंथों के अध्ययन में बड़ा आनंद मिलता था। 52 उपनिषदों का अनुवाद उन्होंनें सिर्रे-अकबर नाम से किया था तथा मजमा-अल-बहरीन नामक अपनी किताब में वैदिक धर्म और इस्लाम में समन्वय का रास्ता बताया था। औरंगजेब की बेटी जैबुन्निसा और भतीजी ताज बीबी के कृष्णभक्ति ने तो दिल्ली के मुसलमानों के बीच कोहराम मचा दिया था। ताजबीबी के गीतों में तो मीराबाई के पदों की झलक दिखती थी। ताजबीबी का बड़ा मशहूर पद है:-
            छैल जो छबीला, सब रंग में रंगीला, बड़ा चित्त का अड़ीला, कहूँ देवतों से न्यारा है।
            नंद के कुमार कुरबान तेरी सूरत पे, हूँ तो मुगलानी हिंदुआनी बन रहूँगी मैं।
* कृष्णभक्त मुसलमानों में कारे खाँ का नाम भी प्रमुखता से आता है। श्रीकृष्ण के मंदिर की दर पर भक्तिपद गाते-2 वो भाव-विभोर हो जाते थे और उनकी आँखो से अश्रु धारा बहने लगती थी।
* गुरु नानक के आरंभिक शिष्यों में भाई मरदाना का नाम प्रमुखता से आता है, जो एक मुसलमान थे। मरदाना हर वक्त उनके साथ रहते थे और रकाब बजाया करते थे।
* ये हिंदुस्तानी तहजीब का ही असर है कि एक मुसलमान होते हुये भी नजीर अकबराबादी ने होली पर ग्यारह नज्में, दीपावली पर दो, राखी पर एक और कन्हैया पर तो कई-2 नजमें लिखी है। कन्हैया जी शीर्षक से लिखी अपनी नज्म में तो नजीर ने पूरी कृष्ण कथा उतार कर रख दी। इस नज्म की कुछ पंक्तियां:-
है रीत जनम का यूँ होती जिस गर में बाला होता है, उस मंडल में हर मन भीतर सुख चैन दोबाला होता है।
सब बात तबहा की भोले हैं जब भोला भाला होता है, आनंद मदीले बाजत है जब नित भवन उजाला होता है।
यूँ नेक पिचहत्तर लेते हैं इस दुनिया में संसार जनम, पर उनके और ही लछछन है जब लेतें हैं अवतार जनम।।
होली पर नजीर की लेखनी कुछ यूं चली:-
           जब खेली होली नंद ललन हँस हँस नंद गांव बसैयन में,
           नर नारी को आनंद हुये खुशवक्ती छोड़ी छैयन में।
           होरी खेले हँस हँस मनमोहन और उनसे राधा प्यारी भी
           यह भीगी सर ये पांव तलक और भीगे किशन मुरारी भी।
* उर्दू के प्रख्यात शायर हसरत मोहानी जब हज करके लौटते थे तो कृष्ण दरबार में हाजिरी लगाने जरुर जाते थे। उनकी ये पंक्तियां कृष्ण के प्रति उनकी भक्ति भावना बता रही हैः-
           कबूल हो दर पर तेरे हसरत की हाजिरी
            कहतें हैं करम आशिकों पर आपका है खास।
* भागलपुर दंगे के बाद हिंद की तहजीब पर अंगुली उठाने वाले एक विदेशी चैनल की प्रतिक्रिया ने डाॅ0 अब्दुल अहद रहबर को इतना व्यथित कर दिया कि उन्होंनें हिंदुस्तानी तहजीब की प्रतिष्ठा की खातिर भगवान श्रीराम पर शोध करने का इरादा कर लिया और रहबर रामायण की रचना कर डाली। श्रीराम के ऊपर लिखने के बाद उन्होंने श्रीकृष्ण और भगवान बुद्ध पर भी लिखने की शुरुआत की है। रहबर भगवान राम को मानवता, दया, करुणा का प्रतीक मानतें हैं।
* उत्तरप्रदेश शाहजहांपुर के एक मुस्लिम विद्वान मौलाना बशीरउद्दीन कादरी को भगवत् गीता कंठस्थ थी और संस्कृत पर महारत हासिल थी। इतनी महारत कि इन्होंनें पवित्र कुरान का संस्कृत में अनुवाद तक किया था।
* हिंदुस्तान के अजीम संगीतकार नौशाद अली मुसलमान थे लेकिन हिंदू देवी देवताओं पर लिखे गीतों पर उनकी संगीत ऐसा शमां बांधता है कि लोग मंत्रमुग्ध हो जाया करते हैं। फिल्म बैजू बाबरा के गीत ‘मन तरपत हरि दर्शन‘, मुगले-आजम का ‘मोहे पनधट पर नंदलाल छेड़ गयो रे‘ कोहिनूर फिल्म का मधुबन में राधिका नाचे रे‘ आज भी लोगों के जेहन में ताजा है।

मजहब बदला : नही  बदली तहजीब

इस बिषय पर शोध करने वाले एक विद्वान लेखक डाक्टर टाईटस के अनुसार भारत जैसे देश में जहां पर मुसलमानों का बहुसंख्यक भाग हिंदुओं से मतांतरित होकर बना था, ने अब भी हिंदू बातों को धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में नहीं छोड़ा था। मूर्तिपूजक वातावरण जिससे वह धिरा हुआ था, का उसपर बहुत दबाब था, केवल पड़ोसी ही नहीं बल्कि उसके बहुत से संबंधी अब भी हिंदू ही थे। इसमें बहुत कम आश्चर्य है कि गांव की देवी की पहले की भांति अब भी पूजा होती थी और आस्तिकतापूर्ण पुराने विचार अब भी चलते रहे। ब्राह्मण पुजारियों को अब भी नियुक्त किया जाता रहा और हिंदू त्यौहार भी उसी तरह मनाये जाते रहे।
            इसी की पुष्टि श्री एम0 मुजीब ने अपनी पुस्तक ‘दी इडियन मुस्लिम‘ में कई उदाहरण देते हुये किया है और विस्तार से बताया है कि धर्म बदलने के बाबजूद मुसलमानों ने अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों में हिंदू तहजीब को अपनाये रखा। उन्होंनें लिखा है-‘ करनाल में 1865 तक बहुत से मुस्लिम किसान अपने पुराने गांवों के देवताओं की पूजा करते थे और साथ ही मुसलमान होने के कारण कलमा भी पढ़ते थे। इसी तरह अलवर और भरतपुर के मेव और मीना मुसलमान तो हो गये थे पर उनके नाम पूर्णरुपेण हिंदू होते थे और अपने नाम के साथ वो खान लगाते थे। ये लोग दीपावली, दुर्गापूजा, जन्माष्टमी तो मनाते ही थे साथ ही कुएं की खुदाई के वक्त एक चबूतरे पर हनुमान की पूजा करते थे। उनके पूजा के स्थान पंच, पीर, मोमिया या चहुंडा थे। मेव भी हिंदुओं की तरह अपने गोत्र में शादी नहीं करते। मीना जाति वाले मुस्लिम भैरो (शिव) तथा हनुमान की पूजा करते थे और (क्षत्रिय हिंदुओं की तरह) कटार से शपथ लेते थे। बंदी राज्य में रहने वाले
परिहार मीना गाय और गोश्त दोनों के गोश्त से परहेज करते थे। रतलाम से लगभग 50 मील दूर जाओरा क्षेत्र में कृषक मुसलमान शादी के समय हिंदू रीति-रिवाज को मानतें हैं, चेचक की देवी की पूजा करतें हैं और शादी के समय तोरण लगातें हैं।
             भारत में शिया समाज कई फिरकों में बंटा हुआ है। इसी में एक इस्माईली खोजा, आगा खाँ के अनुयाई हैं तथा वे अली को बिष्णु का अवतार मानतें हैं और इनकी प्रार्थना में हिंदू तथा इस्लाम दोनों की बातों का सम्मिश्रण होता है। इनके जन्म और मृत्यु के कई संस्कार हिंदुओं से मिलतें हैं। इसी तरह खदराज देवल देवी की आराधना करतें हैं, उनकी मूर्ति की स्थापना करतें हैं तथा आटा, मीठा और गुड़ का भोग लगातें हैं। बिहार के पूर्णियां जिले में हिंदू धर्म के और इस्लाम के निचले वर्गों की विश्वास और मान्यतायें आपस में मिलती है। प्रत्येक गांव में काली का स्थान है जहां काली देवी कर पूजा की जाती है। हरेक मुसलमान के धर के पास ‘खुदा का धर‘ नाम का छोटा सा स्मारक बना होता है जहां पर अल्लाह और काली दोनों के नाम से प्रार्थना की जाती है। शादी के वक्त इन स्ािानों पर भगवती देवी की पूजा की जाती है। ‘देवता महाराज‘ नाम के
देवता हिंदू और मुसलमानों दोनों के आराध्य हैं। पूर्णियां से हटे किशनगंज के बंगाली मुसलमानों की उपजाति में ‘खुदा का धर‘ तथा बसीहारी ‘मां का धर‘ दोनों की पूजा की जाती है।
       पश्चिम बंगाल के उत्तर चैबीस परगना जिले के बारासात और बशीरहाट क्षेत्र में मुबारक गाजी की पूजा की जाती है। इसमें फकीर जंगल में जाकर कुछ स्थान साफ करके एक धेरा बनातें हैं जिसमें महादेव और मंशा देवी की पूजा की जाती है। भारतीय मुसलमानों के विवाह और अन्य मांगलिक उत्सवों पर संपन्न होने वाले रिवाजों में हिंदुस्तानी संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट झलकता है। बिहार के वैशाली जिले के वैसे मुस्लिम परिवार जहां उनके परिवार से हर बर्ष कोई न कोई हज या उमरा करने जाता है, की शादी में आज भी सिंदूर प्रथा कायम है। लड़की भले बाद में सिंदूर न लगाये पर विवाह के दिन उसकी मांग में लड़का सिंदूर भरता है। इसी तरह बहुत मुस्लिम परिवारों में मंगल सूत्र पहनाये जाने का भी रिवाज हैं। विवाह के अवसर पर वधू पक्ष की महिलाओं द्वारा भोजन के वक्त वर पक्ष वालों के लिये गाली भरे गीत गाने का रिवाज अगर हिंदुओं में है तो यह परंपरा कई मुस्लिम परिवारों में भी है। बंगाल की अधिकांश मुस्लिम महिलायें सिंदूर लगाती हैं और सुहाग का
प्रतीक शंखा धारण करतीं है। हिंदू विवाह के अन्य कई संस्कार और रिवाज मसलन हल्दी लगाना, न्योतना, मामा का भात, मढ़ा गाड़ना, धर में रंग-रोगन करवाना, तोरण द्वार बनबाना, दूल्हे की आरती की थाली से नजर उतारना लड़की का कंगना, पायल, मंगलसूत्र पहनना, विदाई और बारात आने के वक्त गाना गाना आदि का चलन मुसलमानों में भी उतनी ही प्रमुखता से है। गर्भधारण की स्थिति में मुस्लिम महिलाओं को भी उन निषेधों का पालन करना पड़ता है जिनका पालन सामान्यतया हिंदू महिलाये करतीं हैं। दीपावली के अवसर पर आज भी कई मुस्लिम धरों में कुंवारी लड़कियों द्वारा धरौंदा बनाने तथा द्वार पर दीप जलाने का रिवाज कायम है। बिहार के कई इलाकों में मुस्लिम महिलायें पूरी निष्ठा और पवित्रता से छठ व्रत संपन्न करतीं हैं।
        बंगाल के मुसलमान दुर्गापूजा और शीतला माता (हिंदुओं में चेचक की देवी के रुप में मशहूर) की पूजा में बड़ी निष्ठा और उल्लास से सम्मिलत होते है, बहाबी विचारधारा के प्रचार के कारण इसमें कमी आई है पर आज भी दुर्गापूजा में भाग लेने वाले मुस्लिमों की संख्या बहुत है, इतना ही नहीं शुभ कार्यों के लिये वो ब्राह्मणों से मुर्हूत पूछतें हैं।
      भारत के ग्रामीण इलाकों के मुसलमानों पर (जो अभी कट्टरपंथी विचारों से प्रभावित नहीं हुये हैं) तो हिंदुस्तानी तहजीब का बहुत ज्यादा असर है। महिलायें बच्चों के चेचक होने के बाद सारे विधि-विधान उसी तरह संपादित करतें हैं जैसे आम हिंदू महिलाओं द्वारा किया जाता है मसलन इस दौरान वो भी अपने बच्चों को चमड़े की बनी चीजों से दूर रखती हैं, नीम के पत्ते का झाड़ देतीं हैं और बड़ी माता से चेचक मुक्ति के लिये मन्नतें मांगती हैं।
       मुसलमानों के लिये तीर्थ की नीयत से मक्का मदीना की ही इजाजत है पर तीर्थों की पुनीत परंपरा रखने वाले भारत के मुसलमानों में कई अन्य जगहों की तीर्थयात्रा का चलन है मसलन वो बहराईच में स्थित संत मसूर सालार गाजी की मजार या अजमेर स्थित ख्वाजा गरीबनवाज के मजार समेत सैकड़ो अन्य वलियो और दरवेशों के मजारों की जियारत करने जातें हैं। नबी करीम (सल्ल0) की सुन्नत में केवल दो ईदें (ईद-उल-फित्र और ईद-उल-अजहा) मनाने की ही अनुमति थी पर भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान श्रीरामनवमी, कृष्णाष्टमी और बुद्धपूर्णिता की तर्ज पर एक और ईद ‘ईद-मिलाद-उल-नबी‘ नाम से मनातें हैं।
       इस्लाम में ये मान्यता है कि गैब की बातें केवल अल्लाह जानता है पर भारतीय तहजीब में आकर यहां के मुसलमान ज्योतिष के माध्यम से भबिष्य जानने में बड़ी रुचि लेतें हैं। कई मुस्लिम परिवारों में तो बिना पंडित या ज्योतिष के सलाह के कोई बड़ा काम शुरु नहीं किया जाता। इतना ही नहीं मुहम्मद तुगलग से लेकर बाबर तक भारतीय ज्योतिष विधा पर बहुत यकीन रखते थे। मुहम्मद बिन तुगलग ने तो अपने दरबार में हिंदू राजाओं की तरह राज-ज्योतषियों को स्थान दे रखा था। बंगाल के मुस्लिम तो विवाह का मुर्हूत पंडितों से पूछकर निकालतें हैे। आज भी भारत के कई गांवो के मुसलमान पुरुष धोती पहनतें हैं जो विशुद्ध हिंदू रिवाज है।
शियाओं के उपखंड खोजा के सिद्धांतों में तो हिदू दर्शन की स्पष्ट छाप दिखाई देती है, ये लोग अली को बिष्णु का अवतार मानतें हैं इनकी कई सारी धार्मिक सिंद्धांत और क्रियायें हिंदुओं से मिलते हैं। झेलम नदी के पश्चिमी तट पर रहने वाली मुस्लिम खोज के लिये तो भगवद्गीता बड़े आदर की किताब है, ये लोग आगा खाँ को ब्रह्मा, बिष्णु और महेश का अवतार मानतें हैं। गुजरात के कच्छ जिले में आबाद मीजोनज शिया गोश्त नहीं खातें हैं, न ही खतना करवातें हैं, अपने वली हजरत इमामशाह को ब्रह्मा का अवतार मानतें हैं।
        मृत संतों की पूजा और मजार पर फूल चढ़ना, लोबान का धूप देना, लंगर का आयोजन करना भारतीय तहजीब के चलते ही इस्लाम में शामिल हो गई है, इस्लाम में इसका कोई विधान नहीं था।

मजहब बदला : नही  बदलीी जाति

भारत के मुसलमानों के बारे में ये कहा जाना जाएज है कि इस्लाम ग्रहण करने से केवल उनकी पूजा पद्धति बदली न उनकी जाति बदली, न रीति-रिवाज बदले और न पूर्वज बदले। जाएज इसलिये है कि आज भी मुसलमान अपनी मजहब तब्दील करने की पूर्व की अपनी जाति के नाम से न केवल जाने जाते हैं बल्कि उनके जीवन-यापन का जरिया भी पूर्ववत्र्ती जातियों के अनुरुप ही है। मसलन मजहब तब्दील करने से पूर्व अगर वो नाई, लोहार या धोबी का काम करते थे तो मजहब बदलने के बाद भी वो उन्हीं कामों में संलग्न हैं। हिंदुस्तानी तहजीब का सबसे बड़ा प्रभाव जो मुसलमानों पर पड़ा वो ये था कि इसके कारण इस्लाम का सबसे प्रमुख भ्रातृत्व भाव सिद्धांत यहां के मुसलमान न अपना सके। यहां के हिंदू, जिन्होनें हिंदू जाति व्यवस्था (जो उस समय भेद का बिषय बन गया था) से निजात पाने के लिये मजहब बदला, इस्लाम में जाकर भी
इससे मुक्त न हो सके। अरब, तुर्क, ईरानी आदि विदेशी मुसलमान जो यहां शासकवर्ग थे, ने अपने शासन की सुविधा के लिये उन्हें इस्लाम में तो अपना लिया पर सामाजिक रुप से न अपना पाये। वो खुद को श्रेष्ठ और मतांतरित भारतीय मुसलमानों को तुच्छ समझते हुये हेय दृष्टि से देखते थे। ऐसे में उनको अपनापन और सहारा उसी समाज से मिला जहां से वो आये थे और इस कारण जाति-व्यवस्था उनके साथ बनी रही।
           नवभारत टाईम्स के 22 जनवरी 1948 के अंक में लिखे अपने एक आलेख (जिसका शीर्षक था मुसलमान समाज भी जातीय समाजों में बंटे हैं) में इन्हीं बातों की पुष्टि करते हुये महरउद्दीन खँा ने लिखा था, ‘मुसलमान भी जातीय समाज में बंठे हैं‘। उसने उन्होंने लिखा-‘बहुत से अन्य धर्माबलंबी यही समझते हैं कि ऊपरी तौर पर मुसलमानों में सिर्फ शिया और सुन्नी दो ही वर्ग हैं। मगर ऐसी बात नहीं है, भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमान भी हिंदुओं की भांति कई जातियों में बंटा हुआ है और यह सिर्फ सुन्नियों में ही नहीं है वरन् शियाओं में भी विधमान है। यहां तक कि मुसलमानों में भी जाति का निर्धारण जन्म से ही होता है न कि कर्म से। किसी एक जाति का मुसलमान अपनी जाति बदलने में उतना ही असमर्थ है जितना कि हिंदू अपनी जाति बदलने में। विवाह संबंध भी हिंदुओं की भांति जाति के अंदर ही स्थापित किये जातें हैं।‘
                 ये हिंदुस्तानी तहजीब के सम्मान की ही परंपरा है कि इस्लामिक शिक्षा केंद्र के रुप में सारी दुनिया में मशहूर दारुल उलूम देबबंद ने अपने फतवे में मुसलमानों से कहा, ‘हालांकि इस्लाम एक मुसलमान को चार शादी करने की इजाजत देता है पर इस मुल्क की तहजीब में ऐसा नहीं है इसलिये मुसलमानों को चाहिये कि वो एक शादी पर ही बस करें। इस तरह के एक और फतवे में यहां की तहजीब का सम्मान करते हुये मुसलमानों को गोहत्या से परहेज करने की सलाह दी। भारतीय मुसलमानों पर हिंद की तहजीब का इतना असर है कि आज भी मुसलमान उन धरों में विवाह संबंध करने से परहेज करतें हैं जहां किसी ने दो शादी की होती है। यही नहीं हिंदू तहजीब के असर के कारण दुनिया के बाकी मुस्लिम मुल्कों के मुकाबले भारत में तलाक की दर कम है।
           आज भारत दुनिया में सबसे अधिक सांप्रदायिक दंगों का दाग अपने ऊपर रखने वाला मुल्क है।
हिंदू मुस्लिम रिश्तांे मे जितनी दरारें आज हैं, उतनी पहले कभी न थी। दुनिया के बाकी मुल्कों की तुलना में भारत का मुसलमान आज मुख्यधारा से कटा हुआ है और बाकी समाज से अलग-थलग है। इस मुल्क की तरक्की का राज इसी में पिन्हां है कि इस देश के दो बड़े तबके के बीच सामंजस्य हो। हिंदुस्तानी तहजीब में रंगकर भारत का मुस्लिम समाज यहां के बाकी लोगों के साथ मध्यकाल से ही एकात्म होना शुरु हो गया था पर बीच के कालखंड में अंग्रेज और उसके बाद में यहां के राजनेताओं ने एकात्मता की इस धारा को तोड़ दिया।
                   हिंदुओं और मुसलमानों की बीच एकात्मता की यह धारा फिर ये प्रवाहित हो, इसके लिये
आवश्यक है कि यहां का मुस्लिम समाज हिंदुस्तान की तहजीब के साथ एकात्म होना शुरु करे क्योंकि सारी दुनिया जिस हिंदुस्तानी तहजीब का अनुसरण करने के लिये आज लालायित है वो मुसलमानों की भी उतनी ही है जितनी हिंदुओं की। दुनिया के कई इस्लामी देशों का उदाहरण है जो बतलाती है अपनी तहजीब और परंपराओं से जुड़ना और उसे आत्मसात करना इस्लाम के तालीमों की अवज्ञा नहीं है। खुसरो, जायसी, कुतबन, दारा, रहीम, रसखान, ताजबीबी, जैबुन्निसा, नजीर अकबराबादी और हसरत मोहानी जैसे भारतीय तहजीब से प्रेम करने वालों की संख्या बढ़े और सनातन काल से अपनी तहजीब के कारण सारी दुनिया का सिरमौर बने भारत भक्तों की संख्या बढ़े यही भारत के उज्जवल भबिष्य और आपसी सद्भाव का सर्वश्रेष्ठ रास्ता होगा।
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Monday, 25 November 2013

Pakistan just doesn’t feel like home

The Way I See It -

Pakistan just doesn’t feel like home

by - Hajra Hassnain
I was awoken from my dreamy haze by my husband, creating a hue and cry about how he would get to work during the 8th Muharram processions. PHOTO: MOHAMMAD NOMAN/EXPRESS
“I have and always will live in Canada.”
Well, that was the plan until two years ago when all my plans, my vision for life – everything changed suddenly and rapidly. Quite unexpectedly, I had to make new plans, which included living in Pakistan.
My eyes still closed I enjoyed the crisp, cool weather and tried to decipher whether the heating was on or not. As I pulled the pillow over my face to block the sunlight, I decided that the heating had to be on. After all, November in Toronto was never cool; it was freezing.
This thought led me to the far less pleasant one of me having to scrape the ice off my car and shovelling the snow off the driveway. Boy was it cold and painfully so.
“Maybe I’ll get a nice hot cup of cappuccino on the way.”
Before I could decide if I felt like full cream or regular coffee, I was awoken from my dreamy haze by my husband, creating a hue and cry about how she would get to work since there were road blocks because of the 8th Muharram processions. Confused and annoyed, I sat up and snapped back to reality.
With a cheeky smile, he pulled me to the window at the end of the hall in our apartment. I was dismayed to see two containers and a truck guarded by police officers blocking the only exit of our building. Then, I noticed two officers with snipers on the roof of the opposite building, which was just too close for comfort. The main road leading to our building was eerily empty, with the exception of police patrolling each side.
With a smug smile on his face, my husband said,
Suddenly, all the grogginess and confusion vanished, and the only concern on my mind was how I was going to get to work.
Out of nowhere the image of Ismail popped into my head. Ismail is an elderly rickshaw driver, who does not own a cell phone in this day and age.
“Mein darakht ke neechay hota hoon, agar kabhi bhi zaroorat ho.”
(I am usually standing under the tree, if you ever need me.)
Of course as my luck would have it, today of all days, he was nowhere to be seen.
So, I frantically began to make phone calls. The first call was to my office to see if the company could arrange a pick-up, then I called the cab service; but as expected there was no one available. With a heavy sigh, my husband claimed he had an idea.
Although the main road was completely blocked, there was one other way out – the dump.
There is a hill behind our building which has been made larger over time by the mound of trash piled up on it.
We got the bike out of the garage and headed out. After accelerating as much as he could, we only managed to get up to a third of the hill. Then, we got off and my husband pulled the bike up the steeper part of the hill and rode through a football field-sized field of trash!
The stench of trash still in our nostrils, we navigated through numerous narrow gullis (streets) until we emerged onto a wider road to my office. As we got closer to my office, it seemed like any other day. There was nothing out of the ordinary; no road blocks or containers. There just seemed to be little more policemen than usual. I entered my office, realising that I did not need that cappuccino anymore.
I was wide awake.
I have never really felt Pakistani. I am not saying that I am ashamed of my heritage but I always felt that Pakistan had more to do with my ethnicity than my nationality. I was born in Pakistan. I have vague memories of the places I visited when I was 11 and 14 years old.
Pakistan was my grandparents’ home. It was an all-inclusive resort for me with family, good food and all sorts of help available from cooks, maids, drivers and the ironing lady. Pakistan was long road trips from Lahore to Hyderabad; it was visiting the village where my grandfather grew up
Yet, it simply never felt like home.
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इस्लाम धर्म में रैहान (तुलसी) की महत्ता

Author - Avz Muzaffarpuri

इस्लाम धर्म में  रैहान (तुलसी) की महत्ता

इस्लामी विश्वासों के अनुसार कुरान ईश्वर की तरफ से भेजी गई आखिरी किताब है और हजरत मोहम्मद नबियों के क्रम में आखिरी भेजे जाने वाले नबी (सल्ल0) हैं। कुरान के सूरह अहजाब में हजरत मोहम्मद के बारे में आता है कि वो अल्लाह के द्वारा भेजे गये आखिरी नबी (सल्ल0) हैं यानि उनके बाद नबूबत का सिलसिला खत्म कर दिया गया। इसका अर्थ ये है कि कुरान और हजरत मोहम्मद की शिक्षायें कयामत तक के लिये काम आने वाली है। तो यकीनन इनकी शिक्षाओं और संदेशों में वैसी बातें या सुझाव भी हैं जो उस जमाने के लिये भले उतनी प्रासंगिक न रही हो पर आज बड़े महत्व की है। इन्हीं तालीमों और संदेशों में पर्यावरण के बारे में प्रदत्त शिक्षायें भी हैं जो उस जमाने में उतनी प्रासंगिक नहीं थी क्योंकि तब हमारी पृथ्वी , जल और वायु प्रदूषित नहीं थे पर आज सारा विश्व भीषण पर्यावरण प्रदूषण और मानव समाज इस पर्यावरण संकट के परिणामस्वरुप पैदा हुये विभिन्न तरह-2 के रोगों से जूझ रहा है और ऐसे में कुरान और हजरत मोहम्मद की तालीमों पर अमल करना इसके समाधानार्थ तथा रोगों से बचाव के लिये कारगर उपाय हो सकता है।

हजरत मोहेहम्मद औरैर पर्यार्ववरण

आज से तकरीबन 1400 साल पहले हुये हजरत मोहम्मद (सल्ल0) समझ गये थे कि आने वाले समय में प्रदूषण और उससे जनित विभिन्न तरह के रोग मानव जाति के लिये सबसे बड़ी समस्या बनने वाली है, इसलिये उन्होनें इसके समाधानार्थ उपाय भी बताये थे और ऐसे सुझाव दिये थे जो इस संकट में निवारण में तथा उससे जनित रोगों के उपचार में सहायक हो। ईश्वर ने मनुष्यों के लिये यह धरती बनाई है जिससे हमें कई तरह के फल, फूल, खनिज पदार्थ, अन्न, जल आदि प्राप्त होतें हैं। इतनी चीजे प्रदान करने वाली इस धरती के प्रति हमारा भी ये कत्र्तव्य बनता है कि हम इसकी हिफाजत करें और इसे स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त रखें। सहीह मुस्लिम की एक हदीस में आता है- श्ज्ीम ूवतसक पे हतममद ंदक इमंनजपनिसए ंदक
ळवक ींे ंचचवपदजमक लवन ीपे हनंतकपंद वअमत पजण्श् यही कारण है कि नबी (सल्ल0) ने अपने उम्मतियों को ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने ,वृक्षों को अनावश्यक न काटने तथा औषधियों गुणों से भरपूर पौधों के इस्तेमाल करने का निर्देश दिया है। बुखारी शरीफ की एक हदीस के अनुसार पेड़ लगाना भी एक प्रकार का दान है क्योंकि वृक्ष पक्षियों और कई दूसरे जीवों के लिये आश्रय स्थली बनती है, इसके पत्ते कई जीवों के आहार के काम में आतें हैं और इसकी छाया राहगीरों को शीतलता प्रदान करती है। मस्नदे-अहमद की एक हदीस में वृक्षारोपण की फजीलत बताते हुये रसूल (सल्ल0) ने तो ये तक कहा कि ‘अगर कयामत आ जाये और उस समय किसी के हाथ में कोई बीज हो जो उसे चाहिये कि वह उसे बो दे।‘ हो सकता है कि उसका यह अमल कयामत के रोज उसके लिये मग्रिफत का जरिया बन जाये।

पवित्र कुरान में रैहान (तुलसी)

पवित्र कुरान में अनेक ऐसे वृक्ष, पौधे और फल इत्यादि का वर्णन आता है जिसमें इंसानों के लिये फायदे ही फायदे हैं। कुरान में वर्णित इन बहुपयोगी पौधों में ‘तुलसी‘ का भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। कुरान में तुलसी का वर्णन दो स्थानों पर आया है, सूरह रहमान की 11वीं और सूरह वाकिया की 89 वीं आयत में।
           सूरह रहमान की आयत में इस धरती पर पाये जाने वाले अल्लाह की नेमतों में तुलसी का नाम है तो सूरह वाकिया में इसका वर्णन जन्नती पौधे के रुप में हुआ है। यानि तुलसी उन बिशिष्ट पौधों में शामिल है जो इस धरती पर भी है और जन्नत में भी है। इसी से इस पौधे की फजीलत का पता चलता है। तुलसी को यह आला मुकाम हासिल हो भी क्यों न, क्योंकि इससे इंसान को तो हर तरह का फायदा तो पहुँचता ही है साथ ही यह पर्यावरण को भी स्वच्छ रखने में कारगर है।
कुरान के सूरह रहमान में इस पवित्र पौधे का जिक्र इस तरह आया है-
‘वल्अर्-ज व-ज-अहा लिल अनामि, फीहा फाकि हतुंव् वन्नख्लु जातुल् अक्मामि, वल्हब्बु जुल्-अस्फि वर्-रैहान, फबि-अय्यि आलाई रब्बिकुमा तुकज्जिबान !‘ यानि ‘और उसी ने खल्कत के लिये जमीन बिछायी, उसमें (धरती) मेवे और गिलाफ वाली खजूरें हैं, और भुस के साथ अनाज और रैहान (तुलसी), तो ऐ जिन्न और इंसान तुम दोनों अपने रब की कौन-2 सी नेमतों को झुठलाओगे?‘ (सूरह रहमान, 10-12)
          इसी तरह सूरह वाकिया में तुलसी का वर्णन जन्नती पौधे के रुप में है। ‘‘अम्मा इन् का-न मिनल मुकर्रबीन, फरौहुव्-व रैहानु व्-व जन्नतु नअीम।‘‘ अर्थात्, ‘‘तो जो खुदा के निकटवत्र्ती हैं (उनके लिये) आराम, खुश्बूदार फूल और रैहान (तुलसी) है।‘‘ (सूरह वाकिया, 88-89)

         सूरह रहमान में जहां इसे धरती पर अल्लाह की नेमतों में बताया गया है तो सूरह वाकिया में जन्नती पौधे के रुप में बताते हुये कहा गया है कि यह उन लोगों को प्राप्त होगा जिन्हें खुदा की निकटता हासिल होगी।
हजरत मोहेहम्मद साहब की नजर में  रैहान (तुलसी)

तुलसी द्विबीजपत्री औषधीय पौधा है, जिसकी लंबाई 1 से तीन फीट तक होती है। इसकी पत्तियां बैगनी आभा वाली तथा हल्के रोयें से ढ़की होती है। पत्तियों का आकर 1 से 2 इंच तक होती है। पुष्प मंजरी बहुरंगी छटाओं वाली होती है जिसपर बैगनी और गुलाबी आभा वाले बहुत से पुष्प लगतें हैं। तुलसी की दो प्रधान प्रजातियंा है, श्रीतुलसी जिसकी पत्तियां हरी होती है और कृष्णा तुलसी जिसकी पत्तियंा नीलाभ और कुछ-2 बैगनी रंग की होती है। अंग्रेजी में इसे भ्वसल ठंेपस नाम दिया गया है। अरबी में इसे रैहान नाम से पुकारा जाता है। सामान्यता लोगों में ये धारणा है कि तुलसी को केवल हिंदू धर्म में महत्ता दी गई है पर कुरान, हदीस और कई अन्य इस्लामी ग्रंथों का अध्ययन करने से ये पता चलता है कि इस्लाम धर्म मेंभी तुलसी की अनेक फजीलतें बताई गई हैं।
          हजरत मोहम्मद (सल्ल0) को चिकित्साशास्त्र का भी बेहतरीन ज्ञान था, हदीसों और इस्लामी तारीखी किताबें पढ़ने से ये बात मालूम होती है। नबी (सल्ल0) के चिकित्सीय ज्ञान पर डाॅ0 खालिद गजनवी ने ‘तिब्बे नबबी और जदीद साइंस‘ नाम से एक
किताब भी लिखी है। नबी (सल्ल0) यकीनन तुलसी की बेहतरीन खूबियों से न सिर्फ वाकिफ थे बल्कि वो इसके गुणों के कारण इसके कायल भी थे। नबी (सल्ल0) को तो तुलसी इतनी अजीज थी कि उन्होनें अपने प्यारे नवासों से अपनी मोहब्बत की मिसाल भी तुलसी से देते हुये फरमाया था, ‘‘अलहसन व हुसैन हमा रैहानी मिनदुनिया‘‘ अर्थात् हसन और हुसैन इस दुनिया में मेरे रैहान (तुलसी वृक्ष) है। यभ्ंकपजी दंततंजमक इल प्इद ।इप छनउए च्तवचीमज ेंपकए श्भ्ंेंद - भ्नेेंपद ंतम उल जूव ेूममजे इंेपसे पद जीपे ूवतसकश् ैंीपी ।स.ठनाींतपए ब्वउचंदपवदे व िजीम च्तवचीमजए ठववा. 5ए टवस.57ए भ्ंकपजी.
96द्ध तिर्मिजी शरीफ में हजरत अबी उस्मान अल हिंदी रिवायत करतें हैं कि नबी (सल्ल0) ने फरमाया, जब तुममें से किसी को रैहान दिया जाये तो इंकार न करो क्योंकि यह पौधा जन्नत से आया है। इस हदीस में न केवल नबी (सल्ल0) ने तुलसी से इंकार करने से मना फरमाया बल्कि ये भी फरमाया कि ये पौधा जन्नती है।

हदीसों  में  रैहान

Û तिर्मिजी शरीफ की एक हदीस में आता है कि एक वलीउल्लाह की जान निकालने मलकुलमौत 500 फरिश्तों के साथ आया और हर फरिश्ते के साथ में रैहान की डालियंा थी। इस हदीस से मुस्लिम विद्वानों ने ये भी मसला निकाला है कि अगर मरने वाले व्यक्ति के रुह को कब्ज करने आने वाले फरिश्तों के हाथ में रैहान की डालियां हैं तो इसका अर्थ है कि वो व्यक्ति जन्नती है। इस्लामी विद्वान् अबुल आलिया का भी यही अकीदा है कि खुदा के करीबियों में से अगर कोई मरने वाला होता है तो उसके पास रैहान लाया जाता है वह उसकी खुश्बू लेता है और उसकी रुह कब्ज ली जाती है।
Û इब्ने माझा में हजरत उसामा से रिवायत एक हदीस है। वो कहतें हैं नबी (सल्ल0) ने फरमाया, क्या जन्नत के लिये कोई तैयार है? बेशक जन्नत में नूर और चमकती रौशनी है तथा वह रैहान (तुलसी) की डालियां है जो लहलहातीं हैं।
Û सही बुखारी की एक हदीस में नबी (सल्ल0) ने फरमाया कि जब किसी को रैहान पेश किया जाये तो वह उसे लेने से इंकार न करे क्योंकि यह अपनी खुश्बू में निहायत उम्दा और वजन में हल्का होता है। यही हदीस तिरमिजी शरीफ में हजरत अबी उस्मान अलहिंदी से भी रिवायत है जिसमें आता है कि नबी (सल्ल0) ने फरमाया, जब किसी को रैहान पेश किया जाये तो वह उससे इंकार न करे क्योंकि यह पौधा जन्नत से आया है।
Û नबी (सल्ल0) के हदीसों में तुलसी का बड़ा बिशिष्ट स्थान है। इब्ने अब्बास से रिवायत एक हदीस है जिसमें नबी (सल्ल0) फरमातें हैं कि जलप्लावन की धटना के बाद जब हजरत नूह नाव से बाहर आये तो सबसे पहले उन्होंनें जो पौधा लगाया वो तुलसी का था।
Û अबू नुईम से रिवायत एक हदीस है जिसमें नबी (सल्ल0) फरमातें हैं कि हजरत आदम जन्नत से जब निकाले गये थे जो उनके साथ तीन तरह के महकदार पौधे थे जिसमें एक तुलसी था जो दुनिया की तमाम खुश्बूदार बूटियों की रानी है। (यानि इस धरती पर जितनी भी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां है उसमें तुलसी का आला मुकाम है और इसी लिये हदीस में इसे बूटियों की रानी लकब दिया गया)

रैहान के शाब्दिक अर्थ को लेकर आपत्तियां व उसका निवारण

कई मुसलमान रैहान को तुलसी कहे जाने पर आपत्ति करते हुये कहतें हैं कि रैहान का अर्थ तुलसी नहीं वरन् खुश्बूदार फूल है। जहां तक रैहान के शाब्दिक अर्थ का सवाल है तो इसके ऊपर इस्लामी विद्वानों में मतभिन्नता है पर एकाध को छोड़कर कुरान में सबने इसका अर्थ ‘सुगंधित बेल-बूटा‘ से ही किया है। परंतु नबी (सल्ल0) की एक हदीस इसका अर्थ स्पष्ट कर देती है। ये हदीस सहीह अल बुखारी में आया है और अबू मूसा अशअरी से रिवायत है। नबी (सल्ल0) ने फरमाया, कुरान पढ़ने वाले मुनाफिक की मिसाल रैहान (तुलसी) की तरह है जिसकी खुश्बू तो उम्दा होती है पर उसका जाएका कड़वा होता है। (Narrated Abu Ashri,Prophet said,"Example of a hypocrite who recites the Quran is like a Raihaan(Sweet Basil) which small good but tastes bitter."-- Bukhari, Virtue of Quran, Book No-6, Vol-61 Hadith-579) यह हदीस अबू दाऊद और मुस्लिम शरीफ में भी आई है। इस हदीस का सीधा मतलब तुलसी ही है क्योंकि तुलसी पत्र की बिशेषता भी ठीक ऐसी ही है जो नबी (सल्ल0) की इस हदीस में आई है। नबी ने जो कहा उससे किसी ऐसी चीज का पता चलता है जिसे खाया भी जा सकता हो। कोई किसी चीज की मिसाल तभी देता है जब वो चीज उस रुप में प्रयुक्त की जाती हो अथवा वो गुण उसकी बिशिष्टता हो। उदाहरणार्थ कोई यह नहीं कहता कि फ्लां चीज का स्वाद गेंदे या गुलाब जैसा है क्योंकि स्वाद गेंदे या गुलाब की बिशेषता नहीं है। गुलाब और गेंदें की मिसाल सुगंध के लिये दी जा सकती है, स्वाद के लिये नहीं। रसूल (सल्ल0) ने उक्त हदीस में सुगंध और स्वाद दोनों की बात कि और तुलसी में सुगंध और स्वाद दोनों बिशेषतायें एक साथ है। स्पष्टतः रैहान से तात्पर्य कोई और बेल-बूटा न होकर तुलसी ही है।                                                                                                                                                                            रैहान का अर्थ तुलसी है, इसके पक्ष में कई विद्वान है। इस्लाम और इस्लामी तिब्ब (चिकित्सा) की कई किताबों में रैहान का अर्थ तुलसी माना गया है। उर्दू शब्दकोशों में रैहान का अर्थ प्रायः खुश्बूदार फूल दिया जाता है, इसी तरह कई मुस्लिम विद्वान ये मानतें हैं कि रैहान से मुराद सभी खुश्बूदार फूल या पौधें हैं। मगर इसका अर्थ ये नहीं है क्योंकि नबी (सल्ल0) की उक्त हदीस से ये बात साबित है कि उन्होंनें एक बिशिब्ट पौधे का जिक्र किया था जिसकी खुश्बू उम्दा है और स्वाद कड़वा। अगर रैहान से मुराद तमाम खुश्बूदार फूल-पत्ते होंतें तो नबी (सल्ल0) उसके स्वाद का कभी जिक्र न करतें क्योंकि हो सकता है कि कई खुश्बूदार पत्तों का स्वाद मीठा भी हो।

दुबई के कुरान पार्क में तुलसी

प्रसिद्व शहर दुबई में पवित्र कुरान पार्क बनाये जाने की योजना है। इस पार्क के बनाये जाने की योजना की धोषणा दुबई नगरपालिका की तकनीकी समिति की 1000 वीं बैठक के अवसर पर परियोजना के महानिदेशक मो0 नूर मशरुम ने की। यह पार्क 60 हेक्टेयर क्षेत्र में दुबई के अल-खवानीज इलाके में बनाया जायेगा और इसमें कुरान की बिशेषतायें और कुरान में वर्णित चीजों को दिखाया जायेगा। इस पार्क की एक खासियत ये भी होगी कि इसमें वो पौधे भी लगाये जायेंगें जिसका जिक्र कुरान शरीफ में आया है। इस पार्क की स्थापना व उसकी बिशेषताओं को बताते हुये परियोजना के निदेशक ने कहा कि पवित्र कुरान में जिन 54 पौधों का जिक्र आया है उसे इस पार्क में लगाया जायेगा और लोगों को ये जानकारी दी जायेगी कि आखिर इस पौधे की ऐसी कौन सी फजीलत है जिसके चलते इसे पवित्र कुरान मंे स्थान दिया गया है। इस धोषणा में कुरान में वर्णित जिन पेड़ांे का नाम बताया गया जिन्हें इस पार्क में लगाया जाना है उनमें रैहान यानि पवित्र तुलसी ;भ्वसल ठंेपसद्ध का भी नाम है। दुबई के कुरआनी पार्क में तुलसी को लगाया जाना स्पष्ट करता है कि पवित्र कुरान में
प्रयुक्त रैहान शब्द का वास्तविक अर्थ तुलसी ही है। इस पार्क की स्थापना की खबरें और उसमें तुलसी को स्थान दिये जाने की खबरे भारतीय अखबार नवभारत टाइम्स के 21 जून 2013 के अंक में, प्दजमतदंजपवदंस ठनेपदमेे ज्पउमे के 5 अगस्त, 2013 के अंक में तथा कई अन्य प्रमुख अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित किया गया था। रैहान का अर्थ तुलसी ही है यह दलील उक्त उदाहरण से भी साबित है।

इंटरनेट पर उपलब्ध अरबी शब्दकोशों और बेबसाइटों  में  रैहान

इंटरनेट पर उपलब्ध कई प्रतिष्ठित व लोकप्रिय इस्लामी बेबसाइटों पर मौजूद अरबी-अंग्रेजी अथवा अरबी-हिंदी शब्दकोशों में रैहान का अर्थ तुलसी या Holy Basil ही बताया गया है। उदाहरणार्थ ,
Û प्रसिद्ध इस्लामी साइट searchtruth.com पर उपलब्ध अरबी-अंग्रेजी शब्दकोश में रैहान का अर्थ भ्वसल इंेपस यानि तुलसी बताया गया है।
Û Google Translator  पर भी तुलसी का अरबी नाम रैहान ही मिलता है।
Û एक प्रमुख इस्लामी साइट chisti.org के Foods of the Prophet section में रैहान का अर्थ तुलसी ही बताया गया है और कहा गया है कि तुलसी दिल को मजबूत करता है और अगर इसके पत्ते को पानी में मसल पर सर पे मालिश की जाये तो बड़ी अच्छी नींद आती है।
Û Islamic Research Foundation International संस्था के साइट पर ख्वाजा जाकिर हुसैन ने अपने आलेख Quranic' Botany  में कुरआन में वर्णित पौधों में रैहान का अर्थ तुलसी बताये हुये कुरआनी पौधों में तुलसी का नाम भी लिखा है।
Û jeepakistan.weebly.com  नामक एक इस्लामी साइट पर भी अर-रैहान का अर्थ तुलसी बताया गया है।
Û इसी तरह Almiskeenah नामक एक इस्लामी साइट पर भी रैहान का अर्थ तुलसी बताया गया है और इसकी कई फजीलतें बयान की गई।
Û www.learnquranonline.com पर भी रैहान का अर्थ तुलसी बताया गया है।

विद्वानों की राय

रैहान का अर्थ तुलसी ही है ये स्वीकारोक्ति ‘तिब्बे नबबी और जदीद सांइस‘ के लेखक और प्रख्यात इस्लामिक विद्वान् डाॅ0 खालिद गजनवी ने भी किया है। अपनी किताब में न सिर्फ उन्होंने रेहान का अर्थ तुलसी बताया है बल्कि ये तक लिखा है कि ‘‘कुरान मजीद ने जन्नत में मिलने वाले बेहतरीन चीजों में तुलसी को शामिल फरमाया है जिससे जाहिर ये होता है कि ये लजीज, मुफीद तथा अपने फवायद में यक्ता है।‘‘ ये आगे लिखतें हैं कि ‘‘हिंदू मजहब में तुलसी को बड़ी अहमियत हासिल है, हर वह हिंदू जिसके धर में खुली जगह मयस्सर है, तुलसी का पौधा लगाकर बाइसे बरकत इसका ख्याल रखता है। इस पौधे की परवरिश बड़ी अकीदत से की जाती है। धर के बुर्जुग सुबह उठकर इसको बड़ी अकीदत के साथ पानी देतें हैं। गुमान किया जाता है कि तुलसी जो कि अहले-खाना की मां है उनकी हिफाजत करती है और उस धर में रहमत के फरिश्ते आतें हैं। कतअ नजर अकीदत या बरकत के तुलसी का पौधा अपनी खुश्बू बिखेरता रहता है। अरबी में हम इसे रैहान कहना पसंद करतें हैं।‘‘
        इसी तरह इस्लामी विद्वान सरफराज खान मारवत-(Wensum College, Gomal University, Pakistan ) मोहम्मद (सल्ल०) असलम खान  (Arabic Deptt, Islamic studies & Research, Gomal University, Pakistan )
अब्दुल हकीम अकबरी ( Faculty of Pharmacy, Gomal University, Pakistan), मोहम्मद शोएब ( Faculty of  Agriculture, Gomal University, Pakista) एवम् मो0 अनवर शाह (Arbic Deptt., Islamic Studies & Research, Gomal University, Pakistan) ने रैहान के अर्थ को लेकर " Interpretation and Medicinal Potential of Ar- Rehan (Ocimum Basilicium) -A Review  नाम से एक संयुक्त Research Paper प्रस्तुत किया। इसमें इन लोगों ने कई आलेखों के हवाले से ये साबित किया है रैहान का अर्थ तुलसी ही है। इन्होंनें अपने शोध पत्र में भी लिखा है कि कुरान में रैहान शब्द दो बार आया है और इसके अनुवादकों ने इसका अर्थ खुश्बूदार फूल, सुगंधित बेल-बूटा आदि किया है पर किसी ने भी रैहान का शाब्दिक अर्थ नहीं लिखा।ये लिखतें हैं- " Islamic Scholar have different view regarding the interpretation of Ar - Rehan. They have interpreted it in the meaning of fragrance , fragrant plant scented herb and livelihood in their commentaries on the Holy Quran, but they did not specify the plant species . According to the traditional healrs ( Hakeen ) Rehan refers to sweet - basil ( Ocimum Basilicum ). तुलसी
                     इन्होनें अपने Research Paper में विभिन्न इस्लामी विद्वानों द्वारा लिखे गये कई किताबों और आलेखों का हवाला दिया है जिसमें रैहान का शाब्दिक अर्थ तुलसी ( Holy Basil ) बताया गया है।
Name of the Book Meaning of Rehan : References
1 A Flash of Kohl Basil www.apexstuff.com under section Natural Omani Cosmetics
2 Ahadith mein Mazkur Nabatat , Adbiya aur Ghizain , Sweet Basil Farooqi, Ilm-o-Irfan publishers, Published from Urdu , Bazar, Lahore, Pakistan ,                                                                                         3 Al Qamus-Al-Madarrasi, Basil The Dictionary of English-Arabic & Arabic-English by Elias, Darul Ishaat , Karachi, Pakistan
4 Economic Botony Common Basil, Sweet Basil , Ghazanfar & Al-Sabani in 1993 in his article Medicinal
Plant of Northern & Central Oman (Arabic) in magazine Economic Botony
5 Booti Prakash Sweet Basil Quereshi, Sheikh Mohd Bashir & Sons. Publishers, Lahour , Pakistan
6 Firozullughat (Urdu) Sweet Basil & its seeds , Firozuddin , Firoz Sons Ltd Private, Lahore, Pakistan
7 Ijazullughat Scented Plant & Sweet Basil , Tabish, Sang-e-Mail Publishers,Urdu Bazar, Lahore ,Pakistan
8 Ilmi Urdu Lughat Scented Plant &Sweet Basil , Sarhindi, Ilmi Kutub Khana, Kabir Street LahourPakistan
9 International Journal of Botony . Basil or Sweet Basil , In a article named “A Voyage in the world of plants            as mentioned in the Holy Quran” in year 2006
10 Journal of Medicinal plants Research , Sweet Basil In a article named “Some medical plants of Arabian
       Penisula” by Saganuwan
11 Kitabul Mufir-e-dat Sweet Basil Seikh Gulam Ali & Sons Publication Ltd, Lahore Pakistan
12 Multilingual Multiscript , Plant Name databasew , Sweet Basil From    Site,                    http//:plantname.unimelb.edu.au/sorting/ocimum.html
13 Nabatate-e-Quran Sweet Basil Farookhi, Sheikh Mohd Bashir & Sons publishers ltd, Lahour, Pakistan
14 Nabatate-e-Quran and Jadid Science , Sweet Basil Chughti, Darul Isshat, M.A Jinnah Road, Karachi ,
      Pakistan
15 Pak wa Hind Ki Jari Butiyan , Sweet Basil Prasad, Published from Sheikh Mohd Bashir & Sons
       publishers, Lahour, Pakistan
16 Plants of the Noble Quran , Sweet Basil From Website, ummah.com
17 Popular Jadeed Urdu Lughat Sweet Basil Oriental Book Society, Gunbat Road, Lahore, Pakistan
18 Saudi J. BiologicalnScience , Sweet Basil Rahman , M.S Al-said, Al-Yahya & J.S Mossa in their
      article named “Medical Plant Diversity in the Flora of Saudi Arabia: A report on 7 plant Families ”          published in Saudi J. Biological Science.
19 Tajul Mafr-e-Dat Sweet Basil By Tariq in Tahqikat-e-Khawasul Adwia published from Maktaba    Damniyal. Lahore, Pakistan
20 Tibbe-Nababi & Jadid Science , Tulsi Dr. Khalid Ghaznavi published by Al- Faisal Naseem wa
    Tajeran-e-Kutub, Ghazni Street, Lahore , Pakistan
21 World Spice Plants Sweet Basil Seidemann, Springer-Verlag Berlin Heidelberg, New York
22 Zipcodezoo.com Sweet Basil , http://zipcodezoo.com/Plants/O/Oscimum_basiclicum

औषधीय  गुणों  से भरपूर है तुलुलसी

हिंदू धर्म और इस्लाम दोनों ही धर्मों में तुलसी को अत्यंत बिशिष्ट स्थान प्राप्त है। इस्लाम में जहां इसे खुदा की नेमत और जन्नती पौधा बताया गया है वहीं हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि जिस धर में तुलसी का पौधा नहीं होता वहां ईश्वर आना पसंद नहीं करते। तुलसी को पूजनीया माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अलावे तुलसी आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र में भी बिशिष्ट स्थान रखता है। भारतबर्ष समेत दुनिया के तमाम हिस्सों में रोगोपचार और उससे बचाव के लिये सदियों से तुलसी का इस्तेमाल किया जाता रहा है। प्राचीन तथा आधुनिक चिकित्सा शास्त्र की कोई भी विधि हो (एलोपैथी, होमियोपैथी, आयुर्वेद या यूनानी) तुलसी सभी में प्रयुक्त की जाती है। सामान्यतया हिंदू अपने गले में तुलसी की माला धारण करतें हैं परंतु इसका माला धारण करने की परंपरा अवश्य ही इस्लामी मान्यताओं में भी है तभी तो अपनी किताब ‘तिब्बे नबबी और जदीद साइंस‘ में डाॅ0 खालिद गजनवी ने लिखा है, ‘यकीन किया जाता है कि तुलसी के पत्तों व शाखों का हार बनाकर अगर इसे मुस्तकिल पहना जाये तो जरासीम से होने वाली अक्सर बीमारियां नहीं होंगी बल्कि इसकी खुश्बू से कई तरह की बीमारियां भी ठीक हो जायेगी।‘

अंत में-

इस धरती पर तो पेड़-पौधों की हजारों किस्में है पर अल्लाह ने उनमें से सिर्फ कुछ को ही अपने किताब में स्थान दिया है तो निःसंदेह इनकी फजीलत बहुत ज्यादा होगी। इसलिये खुदा के इस देन की देखभाल करना ,उसे अपने धरों में स्थापित करना और उसका इस्तेमाल करना ईश्वर को खुशी देगा। कुरआन में वर्णित पौधों में तुलसी का एक अति बिशिष्ट मुकाम है, क्योंकि कुरान ने और खुद नबी (सल्ल0) ने अपनी पाक जुबान से इसकी फजीलतें बयान की है, अपने प्यारे नवासे की इससे मिसाल दी है, ये भी फरमा दिया है कि जन्नतुल-फिरदौस में नूर और रौशनी रैहान (तुलसी) की चमकती डालियों से होंगी और तो और मलकुलमौत और रुह कब्ज करने वाले फरिश्तों के हाथ में इस पवित्र पौधे का होना जन्नती होने की बशारत (खुशखबरी) होगी। इतनी बिशेषतायें वाले इस पौधे जिसके चिकित्सीय और औषधीय गुणों का चिकित्सा शास्त्र भी कायल है,
को अपने धर में स्थान देना और माला के रुप में अपने गले में धारण करना न केवल एक जन्नती पौधे को स्थापित करना है वरन् अपने धर के वातावरण को स्वच्छ रखना और रोगों के निवारणकत्र्ता के रुप में एक वैध को रखना भी है। रसूल (सल्ल0) ने इसके बारे में फरमाया था कि जब किसी को रैहान पेश किया जाये तो उसे चाहिये कि वह उसे लेने से इंकार न करे यानि तोहफे के रुप में अपने मित्रों और नाते-रिश्तेदारों को तुलसी का पौधा या माला भेंट करना रसूल (सल्ल0) को खुशी देगा।





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Saturday, 23 November 2013

हमारे पूर्वज : हमारा अभिमान - हिन्दुस्तानी इस्लाम

by - Az. Muzaffarpuri

हमारे पूर्वज  : हमारा अभिमान - हिन्दुस्तानी इस्लाम 

इंसान अपनी हर चीज बदल सकता है, वह अपनी राष्ट्रीयता बदल सकता है, प्रांतीयता बदल सकता है, अपना मजहब बदलसकता है, अपना नाम बदल सकता है पर चाहकर भी अपने पूर्वज और अपने बाप-दादों को नहीं बदल सकता। इस कथनको साबित करने के लिये कर्इ दिलचस्प उदाहरण दिये जा सकते हैं। उदाहरणार्थ ,
1. एक इंसान जनवरी, 1947 में वत्र्तमान बांग्लादेश के खुलना जिले में पैदा हुआ था। अगर उस समय उसे अपनी राष्ट्रीयता लिखनी होती तो वो हिंदुस्तानी या भारतीय लिखता। 1947 मे देश का विभाजन हुआ और पूर्वी बंगाल का खुलना जिला पाकिस्तान में चला गया। अब उस आदमी की राष्ट्रीयता बदल कर पाकिस्तानी हो गर्इ। 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग हुआ और खुलना बांग्लादेश मे आ गया और उस इंसान की राष्ट्रीयता बदलकर बांग्लादेशी हो गर्इ। इस 25 साल कीअवधि में उसकी राष्ट्रीयता तीन बार बदली।
2. इसी तरह एक आदमी वत्र्तमान झारखंड के रांची में उस समय पैदा हुआ जब बंगाल, बिहार और उड़ीसा एक प्रांत थे,इसलिये उस समय उसकी प्रांतीयता बंगाली थी। फिर बिहार के बंगाल से अलग होने के बाद उसकी प्रांतीयता बदल करबिहारी हो गर्इ और झारख्ांड बनने के बाद फिर से उसकी प्रांतीयता बदली और वो झारखंडी हो गया। यानि उसकी प्रांतीयता तीन बार बदली।
3. राम एक हिंदू परिवार में पैदा हुआ। बाद में उसने मजहब तब्दील कर ली और र्इसार्इ हो गया और उसने अपना नामबदलकर पीटर रख लिया। बाद में किसी ने उससे कहा कि इस्लाम धर्म ज्यादा बेहतर है और इस मजहब में भी हजरत र्इसा को अत्यंत बुलंद दर्जा प्राप्त है तो उसने इस्लाम ग्रहण कर लिया और अपना नाम बदल कर रहीम खान रख लिया।यानि तीन बार मजहब और नाम दोनों बदला।
पहले उदाहरण में राष्ट्रीयता तीन बार बदली, दूसरे में प्रांतीयता तीन बार बदली और तीसरे मे नाम और मजहब दोनों तीनबार बदला पर इन तीनों ही परिसिथतियों में इंसान अपने बाप-दादाओं को या पूर्वजों को नहीं बदल सका। पूर्वज नहीं बदलेजा सकते, ये निर्विवाद सत्य है। रामलाल भले रहीम खान बन जाये या पीटर मसीह पर यदि उसके बाप का नाम श्यामलाल और दादा का नाम मनोहर लाल था तो वो नाम वही रहेगा, उसमें परिवत्र्तन की कोर्इ गुंजार्इश नहीं है।
हजरत मोहम्मद साहब के जाने के बाद उनके अनुयायी दुनिया भर में उनके द्वारा स्थापित दीन को फैलाने निकल पड़े।अरब के समीपवत्र्तीं देश, अफ्रीका आदि के साथ-2 भारतीय उपमहाद्वीप पर भी भले आक्रांता के रुप में सही पर वोदीने-इस्लाम का संदेश लेकर आये। उसके बाद भारतबर्ष पर लंबे समय तक विभिन्न मुसिलम आक्रमणकारी आते रहे, कर्इसूफी संत भी आये और इस उपमहाद्वीप में इस्लाम विस्तारित होता चला गया। भारतबर्ष में इस्लाम तलवार के जोर से फैलाया सूफियों के प्रेम, भार्इचारा और बराबरी के संदेश से, ये एक अलग अनुसंधान का बिषय हो सकता है पर ये हकीकत हैकि भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम स्वीकार करने वालों में अधिकांश के पूर्वज हिंदू थे। इस देश पर शासन करने वालों नेऔर इस्लाम की शिक्षाओं को गलत रुप में प्रस्तुत करने वाले मौलानाओं ने इन मतांतरित हुये मुसलमानों को ये समझाना शुरु किया कि तुम्हारा मूल इस देश में नहीं है वरन तुम्हारे पूर्वज अरब और मध्य एशिया के थे। जिन लोगों को अपने हिंदूमूल का पता था उनको मौलानाओं ने यह कहकर बरगलाया कि अपने काफिर पूर्वजों से किसी भी तरह का संबंध जोड़नातो दूर उन्हें स्मरण करना भी तुम्हें जहन्नमी बना देगा। इन सब बातों का परिणाम ये हुआ कि इस उपमहाद्वीप में इस्लाममत में दीक्षित हुये लोगों ने खुद को इस देश की मूल परंपराओं से और अपने पूर्वजों से काट लिया और खुद को विदेशी समझने लगे और अपना भावात्मक संबंध अरब से जोड़ लिया। जिन परंपराओं, रीति-रिवाजों और विरासतों पर उन्हें गर्व करना था उसे वो हेय समझने लगे। भारत में रहकर भारतीय परंपराओं और पूर्वजों के प्रति नफरत भाव और इस देश के राष्ट्रनायकों के प्रति अश्रद्धा भाव की इस मानसिकता ने देश के शेष समाज की नजरों में उनकी निष्ठा को संदिग्ध बना दियाऔर उस समय से जो हिंदू-मुसिलम संबंधों में दरार बननी शुरु हुर्इ वो आज तक कायम है।
                अगर इन मतांतरित लोगो को कोर्इ ये समझाता कि अरब से उन्होनें सिर्फ एक पूजा-पद्धति ली है वरन संस्कृति, भाषा, वर्ण और नस्ल से वो इस देश के बाकी लोगों जैसे ही हैं तो ये समस्या आज नहीं रहती।काश कोर्इ उन्हें ये भी समझाता कि धर्म-परित्र्तन अपनी परंपराओं और पूर्वपुरुषों से कटना नहीं है तो भी ये समस्या नहीं रहती। इस संबंध में 1948 में अलीगढ़ मुसिलम युनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में नेहरु जी द्वारा दिया गया भाषण इसे पूरी तरह स्पष्ट कर देता है। नेहरु जी ने अपने इस ऐतिहासिक भाषण में कहा था- ''मुझे अपनी विरासत और उन पूर्वजों पर गर्व है, जिन्होनें भारत को एक बौद्धिक और सांस्कृतिक सर्वश्रेष्ठता प्रदान की। आप इस अतीत के बारे में कैसा महसूस करतें हैं? मेरी तरह ही आप भी स्वयम को इसमें साझीदार महसूस करतें हैं कि नहीं? मेरी तरह ही आप भी इस विरासत को स्वीकार करते और इस पर गर्व करतें हैं
या नहीं? या आप स्वयं को इससे अलग मानतें हैं और आप इस विरासत को समझे बिना ही इसे अगली पीढ़ी को सौंप देंगें? क्या आप यह सोचकर रोमांचित नहीं होते कि हम इस विशाल संपदा के न्यासी हैं? मैं आपसे ये प्रश्न पूछ रहा हूँ क्योंकि हाल के बर्षों में अनेक शकितयां लोगों का मन गलत रास्तों की ओर मोड़ने और इतिहास की धारा को विकृत करने के प्रयास में लगी हुर्इ है। आप मुसलमान हैं और मैं एक हिंदू हूँ। हम भिन्न-2 धार्मिक आस्थाओं का पालन कर सकतें हैं या हम नासितक भी हो सकतें हैं। मगर इसके कारण हम उस सांस्कृतिक विरासत से दूर नहीं जा सकते, जो उतनी ही आपकी है जितनी मेरी है। जबकि हमारा अतीत हमें एक साथ जोड़ता है, तो हम अपने वत्र्तमान या भबिष्य को हमें विभाजित करने की अनुमति क्यों दे? अत: चाहे हमारे इष्टदेव कहीं भी हों, मगर भारत में हम ऋषियों की ही परंपरा के वाहक हैं। हमारी धार्मिक आस्था चाहे कोर्इ भी हो, लेकिन हम सभी आध्यातिमकता की उनकी परंपरा के उत्तराधिकारी हैं। आध्यातिमकता का
अर्थ क्या है? यह रिवाजों या सिद्धांतों का जमधट या पारलौकिकता नहीं है, बलिक यह एकता के दृषिटकोण पर शाश्वत सिद्धांतों पर आधारित एक जीवन पद्धति है। अपनी शकित को संगठित करने के लिये हमें इन शाश्वत सिद्धांतों को जानना होगा, जो हमारी भिन्न धार्मिक आस्थाओं के बाबजूद हम सभी को संगठित कर सकतें हैं।''
वास्तव में भारतीय उपमहाद्वीप के दो बड़े समुदायों के बीच एकता का सबसे बड़ा आधार यही है जिसे जवाहरलाल नेहरु ,पूज्य गुरुजी से लेकर मौलाना वहीउद्दीन खान सभी ने माना है।

पूजा-पद्धति बदलने से पूर्वज  नही बदलते 

भारतबर्ष में इंडोनेशिया के बाद सबसे ज्यादा मुसलमान रहतें हैं। भारत से अलग हुये पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी मुसलमानों की भारी तादाद है। इन लोगों ने कुछ सौ-दो सौ-पांच सौ साल पहले अपनी पूजा पद्धति बदल ली थी पर इनका मूल तो हिंदू ही था। ये भी उन्हीं हिंदुओं की संतानें हैं जिनके वंशज होने का दावा यहां के सनातन धर्माबलंबी करतें हैं। सवाल ये है कि क्या पूजा-पद्धति की तब्दीली से पूर्वज भी बदल जातें हैं इस्लाम धर्म का कट्टर  से कट्टर  मताबलंबी भी इस सवाल का जबाब न में देगा पर जाहिल मौलवियों के द्वारा गुमराह किये जाने के कारण इस उपमहाद्वीप के बहुसंख्यक मुसिलमों ने खुद को अपने पूर्वजों और पूर्व की परंपराओं से काट लिया है। भारत के विभाजन और सैकड़ों बर्षों से चली आ रही हिंदू-मुसिलम वैमनस्यता के जड़ में यही बातें हैं। समान पूर्वज और समान संस्कृति एकता का सबसे बड़ा आधार है जिसकी पुषिट पवित्र कुरान भी करता है। सूरह इमरान की 64 वीं आयत में एकता का मंत्र बताते हुये कहा गया है कि 'आओ उस बात की तरफ जो हमारे और तुम्हारे बीच समान है।' और भारतीय उपमहाद्वीप के हिंदुओं और मुसलमानों के
बीच समानता का सबसे बड़ा आधार ये है कि हमारे पूर्वज समान हैं ,हम सबकी धमनियों में समान रक्त प्रवाहित हो रहा है।

पूर्वजों  का सम्म्मान :: इस्स्लाम आौर रसूल (सल्ल0) की तालीम

जाहिल मौलवी भले ही बहकातें हो कि चूंकि तुम्हारे पूर्वज काफिर थे इसलिये उनके साथ किसी भी तरह का संबंध रखना कुफ्र है पर ये बात रसूल (सल्ल0) की सुन्नत से भी साबित है कि पूर्वजों के साथ संबंध विच्छेद करना जायज नहीं है। ये धटना हजरत मोहम्मद (सल्ल0) साहब के जमाने की है। जब उन पर कुरान उतरना शुरु हो गया तो उन्होनें अपने मानने वालों से कहा कि वो खुद कुरान को समझें और दूसरों को भी समझाये। एक शख्स जो रोज उनके पास कुरान सीखने आता था एक दिन उनसे पास आया तो उसका चेहरा उतरा हुआ था। रसूल (सल्ल0) ने कारण पूछा तो उसने कहा, या रसूल(सल्ल0)! आपको तो पता ही है कि मेरा बाप इस्लाम पर नहीं है। रसूल (सल्ल0) ने फरमाया, हाँ, मुझे पता है। उसने कहा, मैं जब घर पर कुरान की तिलावत करने जाता हूँ तो वह मुझे रोकतें हैं और हमारी तकरार हो जाती है। कल रात भी हमारी इसी बात को लेकर तकरार हो गर्इ और मैनें उनपर हाथ उठा दिया। ये सुनते ही रसूल (सल्ल0) ने उससे कहा, तुम मेरी नजरों के सामने से हट जाओ और जाकर अपने बाप से माफी मांगो। उस शख्स ने कहा, या रसूल (सल्ल0) वो तो काफिर है, मैं क्यों उससे माफी मांगू? रसूल (सल्ल0) ने फरमाया, वो इस्लाम पर हो या किसी भी मजहब पर तुझे इससे कोर्इ फर्क नहीं पड़ना चाहिये, क्योंकि वो तेरा बाप है और उसे तफलीफ देना इस्लाम के खिलाफ है। इस संबंध में केवल एक नहीं और भी कर्इ उदाहरण हैं। हजरत मोहम्मद की शादी उम्मे हबीबा बिन अबू सूफियान से हुर्इ थी और अबू सूफियान उस वक्त इस्लाम नहीं लाये थे यानि काफिर थे और काफिर ही नहीं हजरत मोहम्मद (सल्ल0) के सबसे बड़े दुश्मन थे। एक बार जब वो मदीना आये तो अपनी बेटी के पास गये। जमीन पर एक चादर बिछा था। अबू सूफियान को देखते ही उनकी बेटी ने उसे जल्दी से हटा लिया। अबू सूफियान उस समय मक्का के सबसे बड़े सरदार थे, बेटी को ऐसा करते देख उन्होंनें उससे पूछा, तुम ये चादर शायद इसलिये हटा रही हो क्योंकि ये पुराना, फटा हुआ और पैबंद लगा हुआ है? बेटी ने कहा, नहीं बलिक इसलिये हटा रही हूँ कि एक काफिर कहीं रसूल (सल्ल0) के पाक बिस्तर पर न बैठ जाये और उसे नापाक न कर दे। इसके बाद उन्होंनें अबू सूफियान से कहा कि आप बाहर ही रहें क्योंकि जब तक मैं रसूल (सल्ल0) से हुक्म न ले लूं आप अंदर नहीं आ सकते। उम्मे हबीबा ने जब नबी (सल्ल0) के पास जाकर सारा किस्सा उन्हें सुनाया कि कैसे मैनें अपने काफिर बाप को धर में धुसने और आपके पाक चादर पर बैठने नहीं दिया। रसूल (सल्ल0) ये सुनकर अपनी बीबी पर बहुत नाराज हुये और फरमाया, भले अबू सूफियान काफिर और मुशिरक है पर वो तुम्हारे बाप है और बाप को सम्मान देना तुम्हारे ऊपर फर्ज है। खुद नबी (सल्ल0) की सुन्नत से ये बात साबित है कि उन्होंनें भी अपने गैर-मुसिलम रिश्तेदारों और बुजर्ुगों का हमेशा एहतराम किया और उनको सम्मान देने के कभी कोर्इ कमी नहीं की। जब नबी (सल्ल0) गारे-हिरा में थे और उनपर पहली वह्य नाजिल हुर्इ थी तो वो बहुत धबरा गये थे और इस आलम में अपनी बीबी खदीजा के पास गये और उनसे सारा किस्सा बयान कर पूछा कि मेरे जैसा कमजोर आदमी इस बोझ को कैसे उठा सकेगा? तो वो बोलीं ,खुदा की
सौगंध, यह कलाम अल्लाह ने आप पर इसलिये नहीं उतारा कि आप नाकाम और नामुराद हों और खुदा आपका साथ छोड़ दे। खुदा तआला ऐसा कब कर सकता है, आप तो वह हैं जो रिश्तेदारों के साथ नेक व्यवहार करतें हैं और असहायों का बोझ उठातें हैं। वह चरित्र जो देश से मिट चुके थे, आपके द्वारा स्थापित हो रहें हैं। अतिथि की सहायता करतें हैं, मुसीबतजदा लोगों की मदद करतें हैं। कया ऐसे व्यकित को खुदा परीक्षा में डाल सकतें हैं? बुखारी शरीफ में इस धटना का वर्णन है। ये रसूल (सल्ल0) द्वारा अपने रिश्तेदारों और बुजर्ुगों के एहतराम करने के उनके गुणों की प्रशंसा है। गौरतलब है कि उस वक्त रसूल (सल्ल0) के तमाम रिश्तेदार मुशिरक थे पर बाबजूद इसके रसूल (सल्ल0) के रिश्तेदारों के एहतराम के गुणों की प्रशंसा ही की गर्इ है।
               नबी के पिता उनके विलादत से पहले फौत हो गये थे और जब वो महज छह साल के थे तो उनकी वालिदा भी फौत हो गइ थी। वो अपने दादा अब्दुल मुत्तलिब के संरक्षण में रहे और उनकी आयु के आठवें साल में अब्दुल मुत्तलिब का भी इंतकाल हो गया। जिसके बाद उनका लालन-पालन उनके चाचा अबू तालिब ने किया। अबू तालिब के रहते हुये मक्का के बड़े-2 सरदारों की हिम्मत नहीं थी कि वो खुलकर रसूल (सल्ल0) की मुखालफत करें पर जब अबू तालिब का निधन हो गया तो मक्के के लोगों की हिम्मत बढ़ गर्इ और वो रसूल (सल्ल0) को इतना सताने लगे कि उन्हें अपना जन्मस्थान तक छोड़ के मदीना हिजरत करना पड़ गया। ये बात गौरतलब है कि हजरत मोहम्मद (सल्ल0) के चाचा अबू तालिब ने इस्लाम कबूल नहीं किया था, यहां तक कि जब वो मरणशैय्या पर थे तब भी हजरत मोहम्मद (सल्ल0) ने उनसे कहा कि चाचा आप इस्लाम कबूल कर लो पर उनका जबाब था कि मैं अब्दुल मुत्तलिब के दीन पर ही इस दुनिया से जाता हूँ। (इससे यह बात
भी साबित हुआ कि हजरत मोहम्मद (सल्ल0) के दादा भी इस्लाम पर नहीं थे) उनके ऐसा कहने और इस्लाम न लाने के बाबजूद उनके प्रति मोहम्मद साहब के सम्मान में कोर्इ कमी नहीं आर्इ। उनकी मौत से वो बहुत दु:खी रहने लगे और उस साल का नाम ही उन्होंनें गम का साल रख दिया। रसूल (सल्ल0) की एक नहीं वरन अनेकों हदीस हैं जिसमें उन्होंनें पूर्वजों के प्रति सम्मान दिखाने का आदेश दिया है।
              इतना ही नहीं रसूल (सल्ल0) की सीरत से ये भी पता चलता है कि आदमी भले ही अपने मजहब तब्दील कर ले पर पूर्वजों का अंश अपने वजूद से दूर नहीं कर सकता। जो बात भारत में मुसलमानों और हिंदुओं के बीच समानता स्थापित करने के प्रयासों में कही जाती है कि 'हमारी पूजा-पद्धति भले ही भिन्न हो पर हमारे रगों में एक ही पूर्वज का समान रक्त प्रवाहित हो रहा है' ठीक वही भाव रसूल (सल्ल0) की इस हदीस से भी निकल कर आता है। अबू हुरैरा से रिवायत एक हदीस है जिसमें वो फरमातें हैं कि एक देहाती नबी (सल्ल0) की खिदमत में आकर कहने लगा, मेरी बीबी को बच्चा हुआ है पर वह बच्चा काला हैे, इसलिये मैनें उसके बारे में कह दिया कि चूंकि वह मेरे रंग और मेरी शक्ल पर नहीं है इसलिये ये मेरी औलाद नहीं बलिक इसका बाप कोर्इ और है जिसकी शक्ल पर यह पैदा हुआ है। इस पर नबी (सल्ल0) ने फरमाया, तुम्हारे
पास ऊँटें हैं? उसने फरमाया, जी है। इस पर आपने उससे पूछा, उसका रंग क्या है? उसने जबाब दिया, लाल! आपने फिर फरमाया उसमें कोर्इ भूरे रंग का भी है? उसने कहा, है। आपने पूछा, यह रंग कहां से आया जबकि उसके माँ-बाप इस रंग के नहीं? इस पर उस देहाती ने कहा, इसकी नस्ल में कोर्इ ऊँट इस रंग का रहा होगा जिससे यह रंग उसे मिला है। यह सुनकर आपने फरमाया, तो तुम्हारे बाप-दादाओं में भी कोर्इ काले रंग का होगा जिसके कारण लड़के को ऐसा रंग मिला। फिर नबी (सल्ल0) ने उस बद्दू से कहा कि वह उस लड़के का बाप होने से इंकार न करे। ये हदीस इस बात को साबित करने के लिये पर्याप्त है कि मजहब की तब्दीली पूर्वजाें से संबंध खत्म नहीं करती।

पूर्वजों का  एहतराम न करना गुनाहे--कबीरा

हजरत मोहम्मद की सीरत से तो ये बात साबित हैं ही कि पूर्वजों का सम्मान हम पर फर्ज है पर इस्लाम के इतिहास में एक और धटना है जो बताती है कि पूर्वजों का सम्मान न करना गुनाहे-अजीम है। इस्लाम में एक मुसलमान के लिये यह फर्ज है कि वह हजरत मोहम्मद से पूर्व भेजे गये सभी नबियों के ऊपर र्इमान लाये और उनके प्रति श्ऱद्धाभाव रखे। इस्लाम के बारे में सामान्य जानकारी रखने वाला भी ये बात जानता है कि हजरत इब्राहीम के दो बेटे थे , हजरत इस्माइल और हजरत इसहाक। बनी-र्इसरायल में जितने नबी (सल्ल0) भेजे गये सभी हजरत इसहाक की औलादों में से थे जबकि हजरत इस्माइल की औलादों में केवल हजरत मोहम्मद को पैगंबर (सल्ल0)ी दी गर्इ। इस्लाम के बारे में जानकारी रखने वाले ये भी जानतें हैं कि हजरत यूसूफ के खानदान में पैगंबर (सल्ल0)ी परंपरा विरासत की तरह चली आ रही थी । उनके बाप, दादा सभी पैगंबर (सल्ल0) थे पर हजरत यूसूफ के बाद उनके खानदान से पैगंबर (सल्ल0)ी छीन ली गर्इ। इसकी वजह ये थी कि जब यूसूफ के बाप हजरत याकूब अपने बेटे से मिलने मिश्र पहुँचे तो यूसूफ उस समय शाही लिबास पहने तख्त पर बैठे हुये थे। दरअसल वो अपने बाप को अपना शानो-शौकत दिखाना चाह रहे थे ताकि बेटे को अपने बेटे का वैभव और रुतबा देखकर सुकून हो। इसी क्रम में उन्हें ये ध्यान न रहा कि बाप के आने के बाद उनके सम्मान में खड़ा होकर तख्त से नीचे उतरा जाता है। तभी फरिश्ते जिब्रील नाजिल हुये और यूसूफ (अलैहि0) से कहा, ऐ यूसूफ (अलैहि0)! अपना हाथ उठाओ। यूसूफ (अलैहि0) ने जैसे ही हाथ उठाया, उनके हाथ से एक प्रकाश किरण निकल कर ऊपर चली गर्इ। यूसूफ (अलैहि0) ने जिब्रील (अलैहि0) से पूछा, ये क्या था? जिब्रील (अलैहि0) ने कहा, चूंकि तूने अपने बाप की ताजीम में कोताही की कि इसलिये तेरे खानदान से अल्लाह ने पैगंबरी उठा ली है और अब से तेरे बाद तेरे खानदान में कोर्इ पैगंबर न होगा। जिब्रील (अलैहि0) ने यूसूफ (अलैहि0) से ये नहीं कहा कि तुमने अल्लाह के एक नबी की इज्जत नहीं की बलिक ये कहा कि तू अपनी बाप के सम्मान में खड़ा नहीं हुआ इसलिये तेरे नस्ल से पैबंगरी छीन ली गर्इ। यानि बाप का अपमान किसी भी हालत  में जायज नहीं है।

हमारे पूर्वज  :: हमारा अभिमान

हमारे पूर्वज हमारा अभिमान हैं, हमारी पहचान है। इस बात को इंडोनेशिया, र्इरान, तुर्की आदि देशों ने साबित कर दिया है। इंडोनेशिया, र्इरान आदि मुसिलम राष्ट्र हैं जहां मुसलमानों के अलावा दूसरे मताबलंबियों की तादाद नगण्य है। इंडोनेशिया तो विश्व का सबसे बड़ा इस्लामी मुल्क है। कुछ सौ साल पहले इंडोनेशिया इस्लाम में इस्लाम मत में दीक्षित हो गया पर वहां के लोगों ने भारतीय मुसलमानों की तरह खुद को अपने पूर्वज, परंपरा व संस्कृति से नहीं काटा। भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी जब विश्व सिंधी सम्मेलन में भाग लेने के लिये अफगानिस्तान गये हुये थे तो विश्व के इस सबसे बड़े इस्लामी मुल्क में हिंदुत्व का प्रभाव देखकर चकित रह गये। वहां के आने के बाद आडवाणी ने बताया कि वहां के स्थलों , संस्थानों और लोगाें के नामों पर संस्कृत का स्पष्ट प्रभाव झलकता है। वहां के लोग रामायण और महाभारत के कथानक से भलीभांंति
परिचित हैं। अपनी इस यात्रा में आडवाणी जी बाली की राजधानी डेनपासर भी गये। वहां एक मूत्र्ति की तरफ इशारा करते  हुये उनके ड्राइवर ने बताया कि ये धटोत्कच की मूत्र्ति है। धटोत्कच को तो हिंदुस्तान के बहुत सारे लोग नहीं जानते पर मुसिलम इंडोनेशिया का एक सामान्य ड्राइवर उससे भलीभांति परिचित है और सिर्फ परिचित ही नहीं है वरन अपने देश में धूमने आने वाले पर्यटकों को गर्व से अपनी प्राचीन विरासत और धरोहर दिखाता है। इसी तरह की एक और धटना है। प्रख्यात साहित्यकार विधानिवास मिश्र एक बार इंडोनेशिया की यात्राा पर थे। वहां इंडोनेशिया के कला विभाग के निदेशक सुदर्शन के साथ जब वो इंडोनेशिया के प्राचीन स्थलों का निरीक्षण कर रहे थे तो रास्ते में उन्होनें देखा कि कुछ संगतराश पथ्थरों पर कुछ अक्षर उकेर रहें हैं। विधानिवास मिश्र ने सुर्दशन से जानना चाहा कि इन पथ्थरों पर क्या उकेरा जा रहा है? तो सुर्दशन ने (जो इस्लाम मत के मानने वाले थे) ने बताया कि यहां के मुसिलमो में रामायण और महाभारत के प्रति अतिशय
भकित भावना है इसलिये कुछ लोग अपने कब्र पर लगाये जाने वाले पथ्थर पर जावार्इ भाषा में महाभारत और रामायण की कोर्इ पंकित खुदवातें हैं। यह सुनकर विधानिवास मिश्र स्तंभित रह गये कि एक ऐसे मुल्क में जहां 98 फीसदी से अधिक मुसलमान हैं पर फिर भी अपने पूर्वजों की विरासत के प्रति इतना सम्मान भाव है। यह कहानी केवल इंडोनेशिया के आम जनों की नहीं है वरन वहां की राज्यव्यवस्था और राजकीय प्रतीकों में भी पूर्वजों के प्रति सम्मान झलकता है। इंडोनेशिया के मिलिट्री इंटिलेजेंस का आधिकारिक शुभंकर वीर बजरंग वली हैं, वहां के एयरवेज का नाम गरुड़ है जो भगवान बिष्णु का वाहन हैं।
                   तुर्की एक समय सारे इस्लामी मुल्कों पर हुकूमत करता था। मुस्तफा कमाल पाशा के आगमन के बाद उनमें भी राष्ट्रीय जागरण भाव आया। मुस्तफा कमाल पाशा और उनके साथियों ने कहा कि 'हमारी उपासना पद्धति नहीं बदलेगी, हम कुरान, हदीस और हजरत मोहम्मद साहब के प्रति भी अपने श्रद्धा भाव को खत्म नहीं करेंगें, हमारा मजहब इस्लाम रहेगा पर अपने राष्ट्रजीवन का निर्माण हम अपनी संस्कृति के आधार पर करेंगें।' तुर्की के मुसलमानों ने अपनी पूजा-पद्धति भले अरबों से ली पर इस्लाम के नाम पर उनकी भाषा, उनके पूर्वज, उनकी संस्कृति को अपनाने से इंकार कर दिया। पूर्वजों के प्रति अभिमान का यह भाव मिश्र में भी आया जब मिश्र के युवकों ने फराओ राजाआें की उपलबिधयों पर गर्व करना शुरु किया और उनके बनाये पिरामिडों को मिश्र के राष्ट्रीय गौरव और प्रतीक से जोड़ना शुरु किया। उनकी इन कोशिशों ने कÍरपंथियों को नाराज कर दिया और वो कहने लगे कि काफिर पूर्वजों का सम्मान करना कुफ्र है। पर मिश्र के नवजागृतों ने उनकी दलील को यह कहकर ठुकरा दिया कि जो हजरत मोहम्मद से पहले पैदा हुआ वो कैसे काफिर हो सकता है? पूर्वजों को सम्मान देने और उनकी उपलबिधयों पर अभिमान करने का यह भाव मिश्र में आज भी है। जागरण की इस लहर से र्इरान भी अछूता नहीं रहा। वहां भी रजाशाह पहलवी के नेतृत्व में सुधारों का अभियान चला और वो र्इरान के पूर्वजों और राष्ट्रपरुषों को उनका . उचित स्थान दिलवाने में जुट गये। र्इरान के प्राचीन गौरव, मजूसी राजाओं के वीरतापूर्ण अभियानों और रुस्तम, सोहराब, जमशेद आदि पूर्वजों और राष्ट्रनायकों के प्रति सम्मान भाव रखने की परंपरा शुरु हो गर्इ। इतना ही नहीं अपने महान पूर्वजों के नाम पर उन्होंनें सड़कों, भवनों आदि के नाम रखने भी आरंभ कर दिये। आश्चर्यजनक रुप से यह जागृति पाकिस्तान में
भी आर्इ। वहां भी पाणिनी की पांच हजारवीं जयंती मनार्इ गर्इ, इन बातों पर चर्चायें आरंभ हुर्इ कि झेलम के तट पर सिकंदर से लोहा लेने वाला राजा पोरस भी उन्हीं के पूर्वज हैं। दुर्भाग्य से भारतीय मुसलमानों में यह जागृति अभी आनी बाकी है। यहां के मुसलमानों के मन में अगर पूर्वजों और अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान भाव आ जाये तो रामजन्मभूमि जैसे विवादित मसले चुटकियों में हल हो सकतें हैं।

.पूर्वजों से खुद को काटना कुफ्र 

      भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों की समस्या यह है कि इन लोगों ने अपनी पूजा-पद्धति तो बदली ही साथ ही खुद को अपने अतीत, अपनी संस्कृति और अपने पूर्वजों से भी काट लिया और खुद को अरब से जोड़ लिया। हजरत सर्इद इब्न अबी वक्कास रिवायत करतें हैं, नबी (सल्ल0) ने फरमाया कि जिसने अपनी जात बदल ली, हालांकि उसको ये इल्म है कि ये मेरी जात नही तो जन्नत उसपर हराम है। (बुखारी व मुसिलम) भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों में कर्इ लोग हैं जो खुद को कुरैशी, शेख, सैयद, अब्बासी आदि वंश के बतलातें हैं जबकि ये तो अरब के कबीलों के नाम हैं। डा0 हम्जा अहमद अज-जियान ने हिमायतुल अंसाब फी शरीयतील इस्लामिया नाम से एक किताब भी लिखी है। इस किताब में उन्होंनें कर्इ हदीसो का हवाला देते हुये लिखा कि अपने पूर्वजों से खुद को काट लेना कुफ्र है। उन्होंनें अपनी किताब में न केवल पूर्वजों से संबंध विच्छेद करने वाले को हदीसों के हवाले से काफिर कहा है बलिक उन लोगों के लिये भी इस वाक्य का इस्तेमाल किया है जो खुद को उस वंश से जोड़ लेता है जिस वंश का वो है ही नहीं। भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले हिंदुओं और मुसलमानों के पूर्वज समान है, ये निर्विवाद सत्य है। इसलिये अपनी वंश-परंपरा यहां से जोड़ना इस्लाम का हुक्म है।
              यहां के मुसलमान मजहब तब्दील करने के साथ एक काम ये भी करतें हैं कि वो अपना नाम भी बदल कर लेतें हैं जबकि अपना नाम अपने पूर्वजों के नाम पर रखना और अपने नाम में पूर्वजों के नाम को शामिल रखना भी रसूल (सल्ल0) के सुन्नतों में हैं और कुरान का हुक्म है। सही बुखारी और सही मुसिलम में हजरत अबू हुरैरा से रिवायत एक हदीस है जिसमें नबी (सल्ल0) फरमातें हैं, जिसने मुँह मोड़ा अपने बाप-दादा से तो उसने काफिर का काम किया और कुफ्र किया। यानि इंसान को अपनी निस्बत अपने बाप-दादाओं की तरफ करनी चाहिये। इतना ही नहीं है एक हदीस में नबी ने फरमाया, बेशक तुम कयामत के दिन अपने नाम और बापों के नाम से पुकारे जाओगे (इमाम अहमद, अबू दाऊद, जिल्द- 3, बाब- 485, हदीस- 1513,सफा-550) यानि हमारा मजहब कोर्इ भी हो पर कयामत के दिन हमारा नाम हमारे बाप-दादाओं के साथ ही लिया जायेगा। महज इसलिये अपना नाम अपने बाप दादा के नाम पर नहीं रखना कि वो हिंदू थे या गैर-मुसिलम थे गलत है। हजरत मोहम्मद (सल्ल0) ने अपने एक गुलाम जैद को अपना मुँहबोला बेटा बना लिया था। सही बुखारी में
अब्दुल्ला बिन उमर से रिवायत एक हदीस है जिसमें वो फरमातें हैं कि जैद बिन हारिसा को हमलोग हमेशा जैश बिन मुहम्मद कहा करते थे जब कुरान की ये आयत नाजिल हो गर्इ कि 'उनके बाप के नाम से ही पुकारो यह सबसे उत्तम है' तो हम उसके बाद जैद को जैद बिन हारिसा नाम से ही बुलाने लगे। इससे ये साबित हुआ कि भले हजरत मोहम्मद (सल्ल0) ने जैद को अपना बेटा बना लिया पर कुरान ने लोगों को मना फरमाया कि जैद को जैद बिन मुहम्मद कहकर बुलाया जाये, कुरान ने यही हुक्म दिया कि जैद को उनके हकीकी बाप के नाम से ही पुकारना बेहतर है। हजरत मोहम्मद की पतिनयों और कर्इ बड़े सहाबियों के नामों को देखने से भी ये बात साबित हो जाती है कि पूर्वजों के काफिर या इस्लाम के इंकारी
होने के बाबजूद भी नाम में उनके नाम को शामिल किया जा सकता है। इसके कर्इ उदाहरण हैं-
1. इक्रमा बिन अबू जहल- ये मोहम्मद साहब और इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन अबू जहल के बेटे थे। इन्होंनें फतह मक्का के बाद र्इमान लाया था। अपने इस्लाम लाने के पूर्व ये भी रसूल (सल्ल0) और उनके दीन के सबसे बड़े मुखालिफों में थे। सहाबियों के बीच इनका स्थान काफी ऊँचा था। रसूल (सल्ल0) ने कभी भी इनसे ये नहीं कहा कि चूंकि तुम्हारा बाप काफिर था इसलिये तुम अपना नाम बदल लो। वो तो खुद भी इन्हें इक्रमा बिन अबू जहल कहकर पुकारते थे।
2. उम्मे-हबीबा बिन अबू सूफियान- ये अबू सूफियान की बेटी थीं। अबू सूफियान भी इक्रमा की तरह बहुत बाद में र्इमान लाने वाले थे और जिस समय उम्मे हबीबा से रसूल (सल्ल0) का निकाह हुआ था उस समय अबू सूफियान ने इस्लाम नहीं लाया था। पर रसूल (सल्ल0) ने कभी भी अपनी बीबी को अपना नाम नाम बदलने को नहीं कहा।
3. सफिया  बित हुयिय ंिबंत अख्तब- ये यहूदियों के कबीले से थीं और बाद में इस्लाम लार्इ तथा हजरत मोहम्मद से इनका निकाह हुआ। इनके पति, वालिद, चचा और भार्इ सभी खैबर की जंग में मारे गये। मतलब ये कि इनका पूरा खानदान और इनके परिवारजन रसूल (सल्ल0) के मुखालिफ थे पर निकाह के बाद कभी भी रसूल (सल्ल0) ने इनसे ये नहीं कहा कि तुम अपने नाम से अपने बाप-दादाओं के नाम को निकाल दो।
4. उमर बिन खत्ताब- ये भी रसूल (सल्ल0) के बड़े सहाबियों में एक थे और दूसरे खलीफा थे पर रसूल (सल्ल0) ने इन्हें भी कभी इन्हें अपना नाम बदलने को नहीं कहा।
5. अली बिन अबू तालिब- ये हजरत मोहम्मद के चचाजाद भार्इ थे और अबू तालिब के बेटे थे। अबू तालिब ने इस्लाम कबूल नहीं किया था पर नबी (सल्ल0) ने अली को कभी नाम बदलने को नहीं कहा।
                 इस तरह के एक नहीं वरन अनेकों उदाहरण इस बात को साबित करने के लिये काफी हैं कि इस्लाम में महज इसलिये अपना नाम तब्दील कर लेना कि ये उनके काफिर पूर्वजों के नाम पर है जायज नहीं है। और ऐसा हो भी क्यों न जबकि खुद रसूल (सल्ल0) का ये फरमान था। इब्ने अब्बास से रिवायत एक हदीस है जिसमें रसूल (सल्ल0) ने फरमाया, जिसने अपना नाम अपने बाप के नाम पर नहीं रखा उसपर खुदा, फरिश्ते और तमाम इंसानों की लानत है। (इब्ने माजह, इमाम अमहद) इस संबंध में एक और हदीस है, तुम्हारा अपनी बाप की तरफ से निस्बत हटाना कुफ्र है। यह भी फरमाया कि अपने बाप की तरफ से अपने नसब का सिलसिला खत्म न करो क्योंकि यह कुफ्र है। यह हदीस हजरत उमर से रिवायत है।
                  नाम बदलने और अपने पूर्वजों को विस्मृत करने का चलन अफगानिस्तान और भारतीय उपमहाद्वीप में ज्यादा है। दुनिया के बाकी इस्लामी देशों में ऐसा नहीं है। मजहब के रुप में इस्लाम को चुनने के बाबजूद उन्हानें अपने पूर्वजों को विस्मृत नहीं किया है। इस मामले में इंडोनेशिया एक मिसाल है। बहुसंख्यक मुसिलम आबादी वाले इस देश के लोगों के नामों को देखकर हैरानी होती है पर इंडोनेशियार्इ लोगों ने अपने पूर्वजों को स्मरण करने का एक ये भी उत्कृष्ट चलन कायम रखा है। इस्लाम के आने से पूर्व इंडोनेशिया में हिंदू धर्म का बोलबाला था इसलिये वहां के मुसिलमों के नामों में संस्कृत शब्द देखने को मिलते हैं। सुहार्तो, सुकर्ण, मेधावती सुकर्णोपुत्री आदि वहां के राष्ट्राध्यक्षों के नाम रहें हैं। वहां के मुसलमानों के संस्कृतनिष्ठ नामों को देखकर दुनिया के दूसरे देशों के मुसलमान जब उनसे पूछतें हैं कि ये काफिरों वाला नाम क्यों रखा? तो उनका जबाब होता है, 'कुछ पीढ़ी पहले हमने उपासना पद्धति बदला होगा। परंतु इससे बाप-दादा तो नहीं बदलते है, बाप-दादाओं की स्मृति और परंपरा को कायम रखने का यह सर्वोत्कृष्ट पद्धति है।' वहां के राष्ट्रपति सुकर्ण से जब बीजू पटनायक ने पूछा कि आपका नाम सुकर्ण क्यों रखा गया? तो उन्होंनें कहा कि उनके पिता महाभारत का नियमित पारायण करते थे और उनका प्रिय पात्र कर्ण था पर चूंकि वह युद्ध में असत्य और अधर्म के साथ खड़ा हुआ था इसलिये मेरे पिता ने कर्ण के नाम में सुकर्ण लगाकर मेरा नाम रख दिया। इस मामले में अहमदिया मुसलमानों भी इंडोनेशियार्इ मुसलमानों की तरह ही हैं। इन्होनें भी अपने नामों के द्वारा अपने पूर्वजों की स्मृतियों को अपने जेहन में बनाय रखा है। अहमदी मुसलमानों के नामों में नानक, राम, मीरा, कृष्ण, गौतम आदि जुड़े होतें हैं।                                                                                                                                           सबित ये हुआ कि अगर कोर्इ महज इसलिये अपने पूर्वज से निस्बत तोड़ लेता है कि वो मुसलमान नहीं थे तो वो खुदा और उसके रसूल (सल्ल0) के हुक्म का नाफरमान है।

पूर्वजों  के लिये दुआायें

अपने पूर्वजों को याद करने व उनके लिये दुआयें करने की परंपरा दुनिया के प्राय: हर मजहब में है। हिंदू अपने पूर्वजों के लिये पिंड दान करता है तो मुसलमाल शबे-बरात में कबि्रस्तान जाकर उनके मगिरफत के लिये दुआयें करतें हैं। पूर्वज काफिर हो या मोमिन, वो तो बदला नहीं जा सकता और अगर पूर्वजों की मगिरफत की दुआ मांगी जायेगी तो उसमें गैर-मुसिलम पूर्वज आयेंगें ही। अगर कोर्इ शबे-कद्र की रात की दुआओं में सिर्फ अपने मुसलमान पूर्वजों की मगिरफत चाहता है तो वो कुरान और हदीस का अवज्ञाकारी है। अपने काफिर बाप आजर के लिये तो कयामत के दिन सेमेटिक मजहबों के जनक इब्राहीम भी पैरवी करेंगें भले ही उनकी इबादत कबूल हो या न हो। यह बात भी तो समझने की है कि आज अगर कोर्इ मुसलमान है जो अपने पूर्वजों की वजह से है। अपने जिन पूर्वजों को मुसिलम काफिर समझकर हेय समझतें हैं , उन्हीं की बदौलत वो इस दुनिया में आयें है उसे इस्लाम की दौलत मिली है। और यह बात तो रसूल (सल्ल0) की सीरत से भी साबित है। मस्नदे-अहमद में आता है कि एक जिहाद में सहाबियों ने छोटे-2 बच्चों को भी कत्ल किया। जब नबी (सल्ल0)
को ये पता चला तो बहुत नाराज हुये और फरमाया, क्या बात है कि लोग हद से आगे निकलने लगे और बच्चों को भी कत्ल करने लगे। इस पर एक सहाबी ने की, रसूल (सल्ल0) वो तो मुशिरकों की औलादें थीं। नबी (सल्ल0) ने फरमाया, तो क्या हुआ? याद रखो कि तुममे से बेहतरीन लोग भी मुशिरकों की ही औलादें हो। पढ़े-लिखे मुसलमान इस बात को समझतें हैं और इसलिये उनकी मगिरफत की दुआओं में उनके सारे पूर्वज शामिल होतें हैं। महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल मोहम्मद फजल का उदाहरण तो अधिक पुराना नहीं है। एक बार श्री फजल क्षिप्रा नदी के तट पर पिंड दान करने गये तो उन्हें पत्रकारों ने धेर लिया। पूछा, आप तो मुसलमान है फिर ये गैर-इस्लामी काम क्यों कर रहें हैं? मोहम्मद फजल ने इसपर जबाब दिया कि मैं शबे-बरात के दिन कबि्रस्तान जाता हूँ अपने उन पूर्वजों की आत्मा की शांति की दुआ करने जो आज से ढ़ार्इ सौ-तीन सौ साल पहले के थे, जो मुसलमान थे और यहां आया हूँ अपने उन पूर्वजों की आत्मा की शांति की प्रार्थना करने जो उन
ढ़ार्इ सौ-तीन सौ साल पहले से लेकर हजारों-लाखों बर्ष पहले के थे, जो हिंदू थे। अगर पूर्वजों की स्मृति के लिये
कबि्रस्तान को रोशन किया जा सकता है तो श्मशानों पर दीपक क्यों नहीं जलाया जा सकता? यह कितना बड़ा अपराध है कि अपने जिन पूर्वजो के कारण आज हम इस दुनिया में हैं, जिन पूर्वजों ने हम आने वाली पीढ़ी के लिये अपना पेट काटकर संपत्ति और जमीन अर्जित की, हमारे जन्म से पहले हमारे लिये धर बनबा कर रखा, अपने उन्हीं पूर्वजों को हम अपनी दुआओं में भूला देतें हैं। अगर मगिरफत की अपनी दुआओं में हम अपने पूर्वजों को छोड़ सकतें हैं तो फिर उनके द्वारा सहेजी गर्इ जमीन और अर्जित संपत्ति लेने से भी हमें परहेज करनी चाहिये। नैतिकता का तकाजा तो यही कहता है कि अगर सिर्फ गैर-मुसिलम होने की वजह से वो हमारी दुआओं में शामिल नहीं हो सकते तो फिर उन गैर-मुसिलमों के द्वारा अर्जित जमीन पर भी हमारा कोर्इ हक नहीं होना चाहिये। अपने हिंदू पूर्वजों की मगिरफत के लिये दुआयें कर रहें मो0 फजल कोर्इ इस्लाम विरुद्ध काम नहीं कर रहे थे वरन वो वही कर रहे थे जो रसूल (सल्ल0) की परंपरा था। नबी (सल्ल0) ने अपनी एक हदीस में फरमाया था, कयामत के रोज एक हाफिज अपनी तीन पीढि़यों को तथा एक आलिमे-दीन अपनी सात पीढि़यों को बख्शवायेगा। इस हदीस का एक मतलब ये भी है कि अगर कोर्इ मुसिलम आलिमे-दीन है तो कियामत के रोज दीन से मोहब्बत करने की इस वजह से उसके सात पीढ़ी तक के पूर्वज भी बख्शे जायेंगें।
मोहम्मद फजल इसलिये भी गैर-इस्लामी काम नहीं कर रहें थे क्योंकि उन्होंनें जो काम एक दिन किया वही काम तो दुनिया के सारे मुसलमान हर रोज करतें हैं। एक मुसलमान नमाज के बाद की अपनी दुआओं में अपने पूर्वजों की मगिरफत की ही तो दुआ मांगता है। वो कहता है-''ऐ अल्लाह! बख्श मुझको और मेरे माँ-बाप को और मेरे उस्ताद को !' और बखिशश की इस दुआ में मोमिन मां-बाप की कोर्इ शत्र्त नहीं है।

अंत में 

इस संबंध में एक बहुत ही प्रेरक उदाहरण नागालैंड के दो अफसरों का है। ये दोनों अधिकारी की परीक्षा उत्र्तीण करने के बाद ट्रेनिंग करने गये। उस टे्रंनिंग कैंप में देश के विभिन्न हिस्सों से अधिकारी परीक्षा में उत्र्तीण युवक आये हुये थे। संध्याकाल की सांस्कृतिक सत्र के दौरान सबसे कहा गया कि यदि आप किसी बिशिष्ट इलाके से अथवा किसी बिशेष जाति, जनजाति वर्ग से आतें हैं जिससे हममें से अधिकांश लोग परिचित नहीं हैं तो उसकी परंपरा, संस्कृति, रीति-रिवाजों के बारे में हमें बतायें ताकि हम सभी को एक दूसरे को जानने का मौका मिले। जब नागालैंड के युवकों की बारी आर्इ तो ये जिस जनजाति से आते थे उसकी परंपरायें, त्योहार, खान-पान, पूजा-पद्धति आदि के बारे में बताने को कहा गया। नागालैंड की अधिकांश आबादी मिशनरियों के चलते र्इसार्इ मत में दीक्षित हो चुकी है और मिशनरियों ने वहां के भोले-भाले लागों को उनकी परंपराओं और संस्कृतियों से काट दिया है। उन दोनों युवकों ने तो जब से आंखें खोली थी, अपने चारों तरफ र्इसार्इ संस्कृति, भाषा-भूषा और त्योहारों को ही देखा था। उनलोगों ने वही बताना शुरु कर दिया। सभा के संचालक ने उनसे कहा, ये तो आप हमें र्इसार्इ धर्म के बारे में बता रहे हो, हमें आपके कबीले के बारे में जानना है। तो उन युवकों ने कहा कि हमें तो यही बता है जो हम बता रहें हैं। इसपर प्रबंधक ने उन्हें डांट कर ये कहते हुये मंच से उतार दिया कि अगर र्इसार्इयत के बारे में ही हमें सुनना है तो क्या इस शहर में र्इसार्इ पादरी नहीं है? हम भारत से बाहर जातें हैं तो दुनिया हमसे वेद के बारे में पूछती है, उपनिषदों के बारे में पूछती है, योग और अध्यात्म पर सवाल करती है , हड़प्पा , मोहनजोदड़ो और वैदिक संकृति के बारे में जानना चाहती है, राम, कृष्ण , बुद्ध ,महावीर और आर्यभÍ के बारे में पूछती है क्योंकि ये चीजें हमारी राष्ट्रीय संस्कृति का आधार है, हमारी धरोहर है। योग, अध्यात्म, गीता, रामायण, महाभारत और राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर से इस देश की पहचान है और चूंकि हमारी पहचान हमारे वतन के साथ जुड़ी हुर्इ है इसलिये इन चीजों का जानना और अपने पूर्वपुरुषों के प्रति सम्मान भाव रखना हमें दुनिया में प्रतिष्ठा दिलायेगा। हमारी पूजा-पद्वति भले ही भिन्न-2 हो पर हम सब उन महापुरुषों के वंशज हैं जिन्होंनें दुनिया को वसुधैव-कुटुंबकम का अभिनव मंत्र दिया, हजारों साल तक विश्वगुरु बन कर दुनिया का मार्गदर्शन किया, दुनिया को शून्य की खोज करके दी (जो कंप्यूटरों के आबिष्कार का आधार है), अंक दिये, शल्य-चिकित्सा सिखार्इ और न जाने कर्इ ऐसे ज्ञान दिये जिसे आधुनिक विज्ञान आज जान पा रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप का मुसलमान रंग, नस्ल और पूर्वज परंपरा से सिर्फ और सिर्फ भारतीय
है। इस्लाम कबूल करने से वो न तो अरब हो सकता है, न तुर्क और न ही र्इरानी और न ही अपना पूर्वज बदल सकता है। मुसलमान अगर इन बातों को समझे और तदनुरुप व्यवहार करे तो निशिचत रुप से आपसी मतभेद दूर होगें और परस्पर एकात्मता भाव सुढ़ृढ़ होगा।
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