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Tuesday, 16 May 2017

अरब का इतिहास : अभिजीत

अरब का इतिहास : अभिजीत
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अभिजीत

एशिया महादेश के दक्षिण-पश्चिम में बसे जमीन के एक बड़े टुकड़े को हम अरब प्रायद्वीप नाम से जानतें हैं. अरब नाम की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई मान्यतायें हैं. एक मान्यता कहती है कि सीरिया की प्राचीन भाषा के एक शब्द 'अरबत' से यह नाम निःसृत है.'अरबत' शब्द का मतलब होता था मरुभूमि. अरबी भाषा में यही शब्द'रबबत'नाम से नाम आता है जिसका अर्थ है बलुआ भूमि. कुछ मान्यतायें ये भी कहतीं हैं कि संस्कृत के शब्द 'अर्व' से अपभ्रंश होकर यह शब्द बना है. एक मान्यता कहती है कि इसे ब्रह्मा पुत्र भृगु के दूसरे पुत्र महर्षि च्यवन के पुत्र और्व मुनि ने बसाया था, जिनके नाम पर इसका नाम पड़ा. महाभारत के आदि-पर्व में और्व मुनि का कुछ आख्यान मिलता है. यह भूमि भी हिन्द की तरह तीन तरफ से समंदर से घिरा है. पश्चिम की ओर लाल सागर है, जिसके उस तरफ मिस्र और सूडान बसे हुए हैं, पूरब की ओर से इसे फारस और अम्मान की खाड़ी ने घेर रखा है. इसके पूर्वी किनारे पर संयुक्त अरब अमीरात बसा है. फारस की खाड़ी के उस तरफ ईरान हैं जहाँ से अफगानिस्तान के रास्ते भारतीय उपमहाद्वीप का सड़क मार्ग मिलता है. दक्षिण की ओर से हिन्द महासागर, यमन और ओमान ने इसे घेरा हुआ है, इसके उत्तर में ईराक और जॉर्डन की सीमा लगती है तथा उधर के काफी हिस्से को रेगिस्तान ने घेरा हुआ है. इजरायल और फिलीस्तीन इसके उत्तर में अवस्थित हैं. तीन ओर से समुद्रों से घिरे होने के कारण इसे जजीरातुल-अरब कहतें हैं. यह विश्व का सबसे बड़ा प्रायद्वीप है जिसकी कुल लंबाई लगभग डेढ़ हज़ार मील और चौड़ाई तेरह सौ मील है. पूरे अरब में नदी कहीं भी नहीं है, कई जगह छोटे-छोटे नाले हैं, जिनमें बरसात का पानी बहता है. कर्क रेखा अरब से होकर गुजरती है. यह पूरा भूभाग लगभग रेगिस्तानी है, सिर्फ तायफ़ जैसे एकाध जगहों पर कुछ खेती हुआ करती है, दक्षिण अरब में कुछ नखलिस्तान मिलतें हैं. यमन की तरफ कहीं-कहीं गेहूँ की खेती होती है और जौ ऊपजाया जाता है. फल और सब्जियों के लिये पूरा अरब तायफ़ और लैय्या पर निर्भर है. केवल खजूर है जो पूरे अरब में होती है इसलिये खजूर को अरब की पहचान मानी जाती है, वहां के झंडे पर भी खजूर को स्थान दिया गया है. दुनिया में सबसे अधिक अलग-अलग किस्म की खजूरें अरब में पैदा होती हैं. वहां का भौगोलिक विभाजन अरब को आठ हिस्सों में तकसीम करता है. हिजाज, यमन, हज़रमूत, महरा, बहरीन, नज्द, अहकाफ और अम्मान. अल-हिजाज अरब के पश्चिमी हिस्से में बसा है. मक्का, मदीना, तायफ़, खैबर, उहद, हुनैन, ग़दीरे-ख़ुम और तबूक जैसे इस्लामिक महत्त्व के कई शहर इसी हिस्से में बसे हैं. तायफ की आबोहवा बाकी अरब की तुलना में काफी पसंदीदा मानी जाती है. यहाँ मेवे खूब मिलतें हैं, अरब में इसे जमीन पर स्वर्ग कहा जाता है. हिजाज की सीमायें लाल सागर से छूती हैं. जेद्दाह बंदरगाह भी अरब के इसी हिस्से में है. अरब की प्राचीन जातियों और उनके नगरों के अवशेष इसी हिस्से में मिलतें हैं. कुछ लोगों का ये भी मत है कि दरअसल अरब का मूल नाम हिजाज ही है. अल्ताफ-हुसैन हाली की रचनाओं में ये दिखता भी है, जब वो इस्लाम को दीने-हिजाजी कहते हुए लिखतें हैं, वो दीने-हिजाजी का बेबाक बेड़ा......हिजाज से पूरब की ओर का हिस्सा नज्द कहलाता है जहाँ से इस्लाम का बहाबी मत आरम्भ हुआ था. नज्द का मतलब है ऊँचाई वाली जमीन. करीब 12 लाख वर्गमील में फैले अरब भूमि का लगभग सारा हिस्सा शुष्क पठार और रेगिस्तानी इलाकों से भरा हुआ है. 5 लाख वर्गमील भूमि लगभग मानव-शून्य है. मिट्टी की संरचना के आधार पर अरब भूमि को तीन भागों में तक्सीम किया गया है. उत्तरी अरब सफ़ेद रेत से आच्छादित है, जो नुफूद कहलाता है फिर नूफूद से लेकर सूदूर दक्षिण तक का भाग अल-दहना, अल-धना या अल-रब्बुल-खाली नाम से मशहूर है. ये पूरा क्षेत्र लाल रेत से पटा है जो लगभग ढ़ाई लाख वर्गमील में विस्तारित है. तीसरा हिस्सा भूरे और शुष्क पठारों का इलाका है जिसे अल-हरा कहा जाता है. पूरे अरब में वर्ष भर गर्म हवायें चलतीं रहतीं हैं, ये हवायें लू की शक्ल में होतीं हैं. अरब के कई इलाकों में तो ऐसी लू चलती हैं जिसका एक थपेड़ा भी किसी की जान ले सकता है. अरब इन मौत देने वाली हवाओं को बादे-समूम या जुहैरिया हवा कहतें हैं. हिजाज के इलाके में तीन-तीन, चार-चार साल तक पानी नहीं बरसता. तहामा के इलाके में जब लू के थपेरे चलतें हैं तब ऊंट अपने चारों पैरों को जोड़ कर उसके अंदर अपने मालिक को छुपा लेता है. हिजाज के जुनूबी हिस्से में तहामा का इलाका है. उस इलाके में लगभग हर समय रेतीली आंधी चलती रहती है, इसलिये आतंकी इन इलाकों में अपने ट्रेनिंग कैम्प चलातें हैं ताकि दूसरे देश की निगाहों से बचे रह सके.
अरब में इंसान दो रूपों में आबाद रहे. एक वर्ग बद्दू या देहाती था जो मुख्यतया खेती और पशुपालन से अपनी जीविका चलाता था और दूसरा वर्ग व्यापारी और संभ्रांत था जिसके व्यापारिक रिश्ते दुनिया भर में थे. जिनके अंदर राजनैतिक चेतना थी. ऐसा नहीं है कि अरब के अंदर का यह इंसानी विभाजन इस्लाम के आने के बाद खत्म हो गया. बद्दू अरब आज भी वहां पाये जातें हैं. बद्दू अस्थिर जीवन जीने के आदी थे, आज यहाँ तो कल वहां. उत्तरी अरब में बद्दू अधिक थे और दक्षिण अरब में शहरी. अरब के दोनों श्रेणियों के लोगों में कई बात कॉमन थी और वो ये कि ये लोग अपने वंश, रक्त और कबीले को लेकर बड़े अभिमानी थे. उनके नाम इसकी पुष्टि करते हैं, किसी अरब से उसका नाम पूछिए तो अपने पीछे के कई पूर्वजों का नाम वो झटके में बता देता था. जैसे अली बिन अबू तालिब बिन अब्दुल मुतल्लिब बिन हाशिम बिन अब्दे-मुनाफ. उनके अंदर अपने अतीत गौरव को पहचानने का बोध इतना था कि वो मानते थे कि उनके सिवा दुनिया में और कोई नहीं है जिसके पास अपने पूर्वजों को लेकर ऐसी शानदार जानकारी और गौरव-बोध हो. अरब के इन दोनों श्रेणियों के लोगों में एक बात और कॉमन थी वो थी न हम किसी को अपने अधीन करेंगे और न किसी के अधीन रखेंगे. इसलिये इस्लाम पूर्व अरब में जो जंगे होतीं थी उसका आधार सिर्फ और सिर्फ वंश-गौरव को ऊँचा रखना था. यानि वो लूटेरे नहीं थी, जंग को जीविकोपार्जन और साम्राज्य-विस्तार का साधन नहीं मानते थे.

"हदीसें कहतीं हैं कि इस्लाम पूर्व अरब में 1700 से अधिक युद्ध लडे गये पर इनमें एक भी पानी के लिये नहीं था, ये हैरतनाक इसलिये है क्योंकि पानी रेगिस्तान के लिये अमूल्य संपदा मानी जाती है".

तीसरी बात कॉमन थी कि ये सब ऊंट के ऊपर सबसे ज्यादा निर्भर थे. चाहे वो बद्दू हो या शहरी अरब, हरेक खुद को अहल-अल-जमल यानि ऊँटों वाले कहलाना पसंद करता था. आर्थिक सम्पन्नता का आधार ऊंट ही थे. ऊँटों के अलग-अलग नस्लों के गुणों, कमियों और विशेषताओं पर हर अरब महारत रखता था. ऊँट इनके लिये सबसे मुफीद जानवर इसलिये भी था क्योंकि अरब को सबसे अधिक लाभ इनसे ही पहुँचता था. ये ऊंटनी का दूध पीते थे, उससे सवारी का काम लेते थे, उसका मांस खाते थे, उसके खाल से कपड़े और तम्बू बनाते थे, उसकी मेगनी को ईंधन रूप में इस्तेमाल करते थे, उसके मूत्र का प्रयोग दवा के रूप में करते थे और कई बार पानी का अभाव होने पर उसे मारकर उसके अंदर का पानी इस्तेमाल करते थे. दूसरे पशुओं में इनकी निर्भरता घोड़े पर थी, घोड़ों से इनकी मुहब्बत इतनी थी कि पानी की अनुपलब्धता की स्थिति में ये खुद प्यासे रखकर भी अपने घोड़ों को पानी पिला देते थे.

अरबों के संबंध में दो बात हैरान करने वाली है कि प्राचीन काल में अरबी सम्पूर्ण प्रायद्वीप की भाषा नहीं थी, बल्कि अरबी केवल वहां के बद्दू बोलते थे जो अरब के उत्तरी भाग में आबाद थे, दक्षिण अरब की भाषा हिमारती थी जो अब लुप्तप्राय है. दूसरी हैरान करने वाली बात ये है कि उन अरबों में से कोई भी खुद को आदम का वंशज नहीं मानता था. ये अवधारणा वहां बाद में इस्लाम ने डाली. इस्लामी तारीख लिखने वाले अरब के इतिहास को हजरत इब्राहीम और उनके बड़े बेटे इस्माइल से आरम्भ करते हैं, जबकि अरब की तारीख कहीं दूर से आरंभ होती है. अरब में कुछ मूल निवासी आबाद थे तो कई बार बाहर से आकर भी वहां लोग आबाद होते रहे. वैसे तारीख में अरबों की तीन किस्में मानी जाती है. एक अरब कहलातें हैं, अलअरब-उल-बायदा, दूसरें हैं अलअरब-उल-आरेबा और तीसरें हैं अल-अरब-उल-मुस्तारबा. अरब लोगों की तीन श्रेणियों में विभाजन का एक बड़ा आधार अरबी भाषा भी है. अरबी भाषा के बारे में एक बड़ी गलतफहमी है कि ये केवल मुसलमानों की भाषा है जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है. इस्लाम के साथ इसका संबध मात्र इतना ही है कि कुरान जिस भाषा में उतरा था वो अरबी थी. अरबी संसार की प्राचीनतम भाषाओँ में एक मानी जाती है. सेमेटिक मजहब की भाषाओँ में यह हिब्रू के समकक्ष है. भविष्य पुराण की माने तो नोहा (नूह) के जमाने में भगवान बिष्णु ने भाषा को सहज करने की दृष्टि से एक मलेच्छ भाषा को जन्म दिया था और उसे नोहा (नूह) को सिखाया था, इस भाषा को हिब्रू कहा गया जो दायें से बाईं ओर लिखी जाती है. 'ही' मतलब हरि और ब्रू मतलब बोला गया यानि जो भाषा हरि के द्वारा बोली गई वो हिब्रू कहलाई.

इस्लाम के अहमदिया फिरके के संस्थापक की मान्यता थी कि अरबी भाषा सामी परिवार की दूसरी भाषाओं यथा इब्रानी, आरामी, सबाई, आशूरी, फिनीकी आदि भाषाओँ की जननी है पर उनके दावों को भाषा-विज्ञानियों की सहमति नहीं मिली. भाषा-वैज्ञानिकों के अनुसार अरबी इन भाषाओँ की माँ नहीं बल्कि बहनें हैं क्योंकि अरबी भाषा के बहुत से शब्द तथा व्याकरण के नियम अन्य सामी भाषाओँ से साम्यता रखतें है. कुछ मान्यता ये भी है कि अरबी संस्कृत से जन्मी है. इसके प्रमाण में अरबी के कई शब्द गिनाये जाते हैं जो मूल संस्कृत से निकले हैं. अरबी का संदल शब्द संस्कृत के चन्दन से, तनबूल शब्द ताम्बूल से, करनफल शब्द कर्णफूल से, कर्फास शब्द कर्पास से, नर्जिल शब्द नारिकेल से जन्मे है. कुरान में भी कई शब्द हैं जो संस्कृत से निकले हैं, जैसे कुरआन की सूरह अद-दहर् की 17वीं आयत में आता है- ‘व युस्क़ौ न फ़ीहा कअसन का न मिज़ाजुहा जंजबीला’ अर्थात् और वहां उनको ऐसा जाम पिलाया जायेगा जिसमें सोंठ की मिलावट होगी. इस आयत में अदरक के लिये प्रयुक्त अरबी शब्द है ‘जजंबील’ जिसकी उत्पत्ति संस्कृत शब्द श्रृंगवेर् से हुई है. इसी तरह कुरान की एक आयत में आता है, इन्नल अब्रा र लफ़ी नई म अ़लल अराइकि यन्जु़रुन तअरिफु फ़ी वुजूहिहिम ऩज्रतन्नईम युस्कौ़ न मिर्रहीकि़म मख़्तूम खि़तामुहू मिस्क यानि ‘और उन्हें खालिस शराब पिलाई जा रही होगी जो मुहरबंद होगी, मुहर उसकी मुश्क की होगी, बढ़-चढ़ कर अभिलाषा करने वालों को इसकी अभिलाषा करनी चाहिये.' कस्तूरी को संस्कृत में ‘मुश्क’ कहा जाता है और इसी का अरबीकृत रुप मिस्क है जो जन्नत की नेअमत के रुप में इस आयत में बयान हुआ है. संस्कृत के और शब्द भी कुरान में मिलतें हैं, जैसे, पवित्र कुरआन की एक आयत में आता है- ‘इन्नल अब्रा र यश्रबू न मिन कअसिन कान मिज़ाजुहा काफ़ूरा ।’ ‘बेशक नेक लोग ऐसे जाम से पियेंगें जिसमें काफूर की मिलावट होगी।’ (सूरह अद्-दहर, आयत-5) उपरोक्त आयत में प्रयुक्त ‘काफूर’ शब्द मूल संस्कृत शब्द ‘कर्पूर’ का ही अरबीकृत रुप हैं.

अरब को जो लोग भी झटके में जाहिल कह देतें हैं उन्हें मालूम ही नहीं है कि इस्लाम पूर्व अरब के लोग साहित्य की दृष्टि से कितने ऊँचे थे. अपने भाषा पर उन्हें इतना गुरूर था कि अपने आगे वो शेष विश्व को मूक और गूंगा कहते थे. मक्का में उकाज नाम के जगह पर अरब के तमाम कवि और साहित्यकार इकट्ठे होते थे, उनके बीच काव्य और शेरो-शायरी की प्रतियोगितायें होतीं थी और विजेता के काव्य को मृग-छाले या स्वर्ण-पत्र पर अंकित कर काबे की दीवार में लगाया जाता था. जो उस काव्य-प्रतियोगिता में विजयी होता था उसे उसके कबीले वाले सर-आँखों पर बिठा लेते थे, महिलायें उनकी बलायें लेतीं थीं. ये भाषाविद युद्ध के लिए शौर्य गीत लिखते थे तो ईश्वर की आराधना के पद भी उनके कलम से निकलते थे.
कुरान अरबी भाषा में है महज इसलिये अरबी भाषा से हमारा ताअल्लुक नहीं ऐसी सोच गलत है. इस्लाम पूर्व के कवियों की रचनाओं में महादेव, वेद और भारत भूमि की स्तुति के पद मिलतें हैं. प्राचीन अरबी काव्य-ग्रन्थ सेररूल-ओकुल में अंदर ऐसे कई पद मिलतें हैं. इसी काव्य-संग्रह में अरबी कवि लबी-बिन-ए-अरबतब-बिन-तुर्फा की लिखी महादेव स्तुति मिलती है. दिल्ली के बिरला मंदिर की यज्ञशाला में वो आज भी प्रस्तर पर लिखा हुआ मिलेगा. लबी बिन ए अख़्तब बिन ए तुर्फ़ा की भगवान शिव के लिये लिखी गई स्तुति गूगल पर सहजता से उपलब्ध है. इसी काव्य-संग्रह में उमर-बिन-हशशाम की लिखी कविता भी मौजूद है जो मुहम्मद साहब के समकालीन थे. उमर-बिन-हशशाम अरब के प्राचीन धर्म को बचाने की जंग में बलिदान हुए. इस काव्य-संग्रह में जिन दूसरे कवियों और शायरों की रचनाएं हैं उनके नाम हैं, इम्र-उल-क़ैस, जुहैर, अंतरा, अलकमा, तरफ़ह, लबीद, अम्र-बिन-कुलसूम, अंतरह, नाबिग़्हा, हिम्माद उल राबिया, हारिस बिन हिलिज्ज़ा आदि. इस्लाम के आगमन के पूर्व अरबी भाषा में कई पुराणों का अनुवाद भी हुआ था. अरबी में अनुदित अति-प्राचीन भागवत पुराण का मिलना इसकी पुष्टि करता है. इसका अर्थ ये है कि अरबी लोग अनुवाद की कला में भी महारत रखते थे. अरब में ये खासियत थी कि वहां हर उम्र के लोग शायरी करते थे. काव्य में कसीदाकारी, वीर-रस की कवितायें, ताने देतीं हुई रचनाएं, तुकबंदी करती शायरी ये सब उनकी विशेषतायें थीं. अरब सबसे अधिक सम्मान अपने कवियों और शायरों का करते थे, उनका सम्मान इतना अधिक था कि वो अपने कबीले के लिये परामर्शदाता, मार्गदर्शक, अभिभावक और प्रतिनिधि माने जाते थे.
अरबी की भाषाई श्रेष्ठता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि कुरान कई स्थानों पर अरब वालों को भाषाई शास्त्रार्थ की चुनौती देता दिखता है. अकेला भाषा ही वो आधार है जो इस्लाम पूर्व अरब को जाहिल कहने की सारी गुंजाईशें खत्म कर देता है. अल-दावी का काव्य-संग्रह अल-मुफ़द्दलिआत' 120 मधुर गीतों का संकलन है, अल-दावी की कई रचनाएं काबा की दीवारों पर सुशोभित थीं. किताबुल-अगानी नाम के काव्य-संग्रह में अरब की गौरवशाली वंश परम्परा का वर्णन मिलता है. वहां के अन्य बड़े कवियों में एक नाम अंतरा इब्ने-शद्दार अल अबू का भी है जो शौर्य-गीत रचा करते थे. अरब के ऊपर एक आरोप महिला-विरोधी होने का भी है. जबकि उस समय के बड़े कवियों में कुछ महिलायें भी थीं जिनमें सबसे बड़ा नाम कीर्ति खनसा का है, उसके भाई की निर्मम हत्या कर दी गई थी जिसके बाद उसने अपने दर्द को काव्य रूप में लिखा था. काव्य की मर्सिया विधा ने अरब भूमि से जन्म लिया था. अरब के बारे में एक गलत धारणा डाली गई है कि ये सारे लोग इब्राहीम के बेटे इस्माईल के वंशज हैं. ये अवधारणा सही नहीं है. अरबों का वजूद इस धरती में हजरत नूह (नोहा) से भी काफी पहले का है पर कुछ लोगों के अनुसार अरब में जो आबादी सबसे पहले बसी थी वो नूह के बेटे हाम की औलादों में थी तो दूसरी मान्यता मूल अरबों को नूह के दूसरे बेटे साम की औलाद मानती है.

अरबों की तीन किस्मों में जिन बायदा अरबों का जिक्र पहले किया था ये वो लोग थे जो मूल (original) अरब थे. इनका इतिहास सबसे प्राचीन है और ये अरबी भाषा के जनक माने जातें हैं पर ये वो लोग थे जो आंधी-तूफ़ान, बाढ़, महामारी वगैरह के चलते नष्ट हो गये. इन अरबों में अब कोई भी बाकी नहीं बचा है. इन अरबों से जुड़ी निशानियाँ यशरिब (मदीना) से खैबर और मद्यन के रास्ते में तथा यमन वगैरह में आज भी पाई जाती हैं. बायदा अरबों में पहला नाम आता है आद जाति का. ये जाति लगभग 2500-3000 ईसा पूर्व नष्ट हुई थी और यमन के पास हजरमौत नाम की जगह पर और कुछ ओमान के पास आबाद थी. ये लोग बड़े शक्तिशाली हुआ करते थे, कहतें हैं कि अरब के सर्वप्रथम बादशाह आद जाति से हुए थे, इनका रूतबा आस-पास के तमाम इलाकों में था. आद लोग मूर्तिपूजक और बहुदेववादी थे तथा मुख्यतया तीन तरह की देवियों की उपासना किया करतें थे जिनके नाम समदा, समूदा तथा हरा था. 'आद' इस वंश के मुखिया का नाम था. कुछ मान्यता इन्हें भगवान श्रीकृष्ण से संबद्ध करते हुए कहती हैं कि ये यदुवंश के उन बचे लोगों में से थे जो यादवी संग्राम के दौरान द्वारिका के जलमग्न होने से पूर्व वहां से निकल गये थे. इन लोगों में हूद नाम के सुधारक भेजे जाने का वर्णन मिलता है, हूद को कुछ लोग नूह के बेटे साम का पोता मानतें हैं. हूद के बारे में कहा जाता है कि उनकी कब्र आज भी हजरमौत में मौजूद है, उस जगह पर अब बड़ा मेला लगता है. आद लोगों का एक नाम इरम भी था, इन लोगों ने कई बड़े और भव्य नगर बसाये थे. इब्रानी लोग आद लोगों को रशम कहा करते थे, इब्रानी में रशम का अर्थ है पत्थरों में रहने वाले. आज भी मद्यन इलाके के पहाड़ों में इनके द्वारा बनाये गुफाओं का निशान मिलता है, उन गुफाओं में आरामी और समुदी भाषा में लिखे कई अभिलेख मिले हैं जिन्हें पढ़ने की कोशिश जारी है. एक प्रचंड तूफान में ये जाति नष्ट हुई. कुछ विद्वान ये भी मानतें हैं कि महाभारत युद्ध के पश्चात् हुए विस्थापन ने कई लोगों को अरब और उसके निकटवर्ती प्रदेशों में आबाद कर दिया था. शाम देश (सीरिया) भगवान कृष्ण के नाम श्याम से साम्यता रखता है.
बायदा अरबों में एक नाम समूद जाति का भी है. समूद या समुद्र जाति का वर्णन सबसे पहले अरस्तू आयर बतलीमूस की किताबों में मिलता है, ये लोग हिजाज और तबूक के दरमियान आबाद थे और भवन निर्माण में बड़ी कुशलता रखते थे तथा बड़े कुशल समुद्री व्यापारी थे. सालेह या फल्ज़ नाम के व्यक्ति को इनका सुधारक माना जाता है. सालेह भी नूह-वंशी थे और उनके दादा समूद के नाम पर उनकी जाति का ये नाम था. इनका काल इब्राहीम से 300 से 500 साल पहले का है. सालेह को तौरात में फल्ज़ नाम से बुलाया गया है और उत्पत्ति ग्रन्थ में उनका वर्णन आता है. कुरान इस जाति को मूसा से पहले का बताता है. ये जाति पहाड़ों में मकान बनाकर रहा करती थी और बहुदेवतावादी थी. मूर्तिपूजक भी थी क्योंकि इनके द्वारा बनाये घरों के जो निशान मिले हैं उसमें मूर्ति और देवी-देवताओं की दीवारों पर उकेरी गई तस्वीरें मिली है. इस कड़ी में कौमे-लूत का नाम भी शामिल है जो ओमान के इलाके में आबाद थे, ये जाति भी एक प्राकृतिक आपदा के चलते विनष्ट हुई थी. इसके अलावा अबैल, अमालका, तसम, जदीस जैसी कौमें भी वहां आबाद और विनष्ट होतीं रहीं.
अरब की दूसरी किस्म आरेबा (True Arabs) कहलातीं हैं. इन्हें कहतान की औलाद माना जाता है और कहतानी कहकर भी बुलाया जाता है. इन आरेबा अरबों के बारे में कहा जाता है कि इनमें से कुछ लोग पूरब की ओर काबुल के पास (यानि तब के हिन्द) से भी आये. इनमें से एक का नाम था यारब था. ये लोग कहतान के वंशज थे और सूर्य पूजक थे, इनके वंश में हुए एक शासक का नाम था अब्दुस शम्स (यानि सूर्य का दास). इन बायदा अरबों का काल प्राचीन अरब के लिये स्वर्ण-युग था क्योंकि ये लोग मक्के के दक्षिणी इलाके से निकलकर बेबीलोन, सीरिया और मिस्र तक गये और अपनी संस्कृति का विस्तार किया. बाबिल से ही हम्बूराबी का नाम जुड़ा हुआ है जिसके न्याय-व्यवस्था के बारे में हमलोग इतिहास की किताबों में पढतें हैं. हजरमौत के इलाके से लेकर खलीज-फारस के दरम्यानी इलाके समृद्ध अरब की गवाह थी. ये लोग जलयात्रा में दक्षता रखते थे. इनका निवास यमन के इलाके में भी था. बायदा अरबों के विनाश के बाद इनके बारे में कहा जाता है कि ये मूल अरब थे. लाल सागर से लेकर फारस की खाड़ी के बीच आबाद कई अरबों का आज भी ये दावा है कि वो आरेबा अरब यानि मूल अरब हैं. यमन वगैरह में आज भी कहतान नाम आम है. इस्लामी किताबों के अध्ययन से भी मालूम होता है कि कहतान कबीले के लोग आज भी वजूद में हैं. कयामत से जुड़ी पेशीनगोईयों में कहतान का जिक्र कई दफा आता है. हदीसें कहतीं हैं कि याजुज और माजुज के खातमे के बाद ईसा अपनी हुकूमत कायम करेंगे और फिर उनकी वफात हो जाएगी और मुसलमान उनकी नमाजे-जनाज़ा अदा करेंगे और उनको रसूल के पहलू में दफ़न करेंगे. फिर यमन के कबीले "कहतान" से एक शख्स जिसका नाम जहजाह होगा, खलीफा बनेगा और अद्ल-इन्साफ के साथ हुकूमत करेगा. कहतान कबीले का जिक्र बुखारी और मुस्लिम शरीफ में भी आया है. हजरत अबू हुरैरा से रिवायत एक हदीस में आता है, नबी ने फरमाया कि क़यामत तब तक कायम नहीं हो सकती जब तक यमन के कबीले कहतान से ऐसा शख्स जाहिर न हो जो लोगों को अपने लकड़ी से हांकेगा. यमन का कबीला जुरहम इन्हीं लोगों में आता है.
आरेबा और मुस्तारेबा को सम्मिलित रूप से अरब-बाकिया भी कहा जाता है. अरब की इस तीसरी किस्म मुस्तारेबा और आरेबा में एक मूल अंतर ये है कि जहाँ आरेबा अरबों की मूल जुबान अरबी थी वहीँ मुआतारेबा वो थे जिन्होनें आरेबा लोगों से अरबी जुबान सीखी. मुस्तारेबा मूल अरब नहीं थे. बल्कि ये बाहरी लोग थे जिन्होनें अरबियत की अपनाया था. रोचक बात ये है कि पैगम्बरे-इस्लाम भी इन्हीं मुस्तारेबा अरब में से हैं, यानि पूर्वज परंपरा से वो मूल अरब नहीं थे.
भारत में जो लोग मैकाले द्वारा गढ़े गये आर्य-द्रविड़ के झूठे सिद्धांत का आड़ लेकर यहाँ के हिन्दुओं पर हमले करते हुए उनका ये कहकर मजाक उड़ातें हैं कि तुम्हारा हिन्द से क्या ताअल्लुक ? तुम सब तो बाहरी लोग हो, उन सब लोगों के लिये मुस्तारेबा-अरब का ये सत्य मुंहतोड़ जबाब है.
अरबों की तीसरी किस्म मुस्तारेबा के बारे में समझने के लिये हमें यहूदी इतिहास कथाओं में जाना होगा क्योंकि ये कड़ी वहीँ जाकर जुड़ती है. इब्राहीम से इसका ताअल्लुक है, ये इब्राहीम वहीँ हैं जिनसे हर सेमेटिक मजहब वाला अपना संबंध जोड़ता है और उनको अपना पितृ-पुरुष मानता है. इब्राहीम के बारे में जानने के तीन जरिये हैं, एक है तौरात जिसके पहले अध्याय यानि उत्पत्ति ग्रंथ में उनका बड़ा विशद वर्णन आया है. दूसरा है कुरान, हदीसें और इस्लाम से संबद्ध और दूसरी किताबें और तीसरी है भविष्य पुराण जिनमें उनका 'अविराम' नाम से वर्णन मिलता है. तौरात और इस्लामी ग्रंथों में इब्राहीम का जो वर्णन है उसमें बहुत ज्यादा विभेद है. उदाहरण के लिये तौरात में इब्राहीम के पिता का नाम तेरह (तारा) आया है तो वहीं कुरान कहता हैं कि उनके पिता का नाम आज़र था परन्तु कुरान से यह बात साबित है कि इब्राहीम जिस शहर में पैदा हुए थे वो प्रकृति पूजक और मूर्ति में ईश्वर देखने वाले लोग थे. उनके लोग चाँद और नक्षत्र की पूजा करते थे. तौरात और इस्लामी ग्रंथों के अनुसार इब्राहीम इराक के शहर उर में पैदा हुए थे जबकि दूसरी मान्यता कहती है कि वो पैदा तो इराक में ही हुए थे पर शहर का नाम कोशा था न कि उर. उनकी पैदाइश में बारे में कहा जाता है कि वो ईसा से करीबन 2000 साल पहले पैदा हुए थे. इब्राहीम का पहला निकाह सारा नाम की लड़की से हुआ था जो उनकी चचाजाद बहन थी. तौरात कहती है कि दमिश्क के पास के एक शहर हारान से वो अपने पिता की मृत्यु के पश्चात निकल गये और कनान देश में जाकर बस गये. वहां उनके साथ उनके भाई हारान का बेटा यानि उनका भतीजा लूत भी था. फिर वहां से अब्राहम (इब्राहीम) मिस्र चले गये. सारा की खूबसूरती पर लट्टू होकर वहां के बादशाह ने सारा का अपहरण कर लिया पर इब्राहीम ने उससे ये कहकर कि 'ये मेरी बहन है' किसी तरह मुक्त कराया. मिस्र से कनान लौटते हुए इब्राहीम और सारा ने एक लौंडी भी साथ लिया जिसका नाम हाज़रा था. विवाह के अनेक वर्ष के पश्चात् भी जब सारा से इब्राहीम की कोई औलाद नहीं हुई थी तो औलाद के लालच में सारा ने इब्राहीम से कहा कि तू उस लौंडी के पास जा, संभव है कि मेरा घर उसके द्वारा बस जाये. फिर इब्राहीम को हाज़रा से इस्माइल नाम का पुत्र हुआ.
ये कथा मुस्लिम और यहूदी के बीच झगड़े की सबसे बड़ी वजह है. इसका कारण ये है कि इब्राहीम और हाजरा के ताअल्लुक को लेकर यहूदी ग्रन्थ तौरात और इस्लामी ग्रंथों में बड़ा जबरदस्त मतभेद है. तौरात में ऐसा कोई वर्णन नहीं है कि इब्राहीम ने हाजरा से निकाह किया था जबकि इब्ने-हजर जैसे इस्लामी विद्वान कहतें हैं कि हाजरा लौंडी नहीं थी बल्कि मिस्र के राजा के बेटी थी और उनका इब्राहीम के साथ निकाह हुआ था. बाद में बीबी सारा से भी इब्राहीम को एक औलाद हुई जिसका नाम इसहाक था. अब झगड़ा ये है कि पूरा अरब जगत इस्माइल को अबू अरब यानि अरबों के पितामह के रूप में जानता है और पूरी उम्मते-मुस्लिमा खुद को इस्माइल वंशी कहता है और इधर यहूदी जगत खुद को इसहाक वंशी मानतें हैं. अब अपने ग्रन्थ के आधार पर यहूदी इस्माइल वंशियों को ये कहते हुए हेय समझतें हैं कि जरखरीद दासी से पैदा हुई औलाद के वंशज सम्मान के लायक कैसे हो सकतें हैं जबकि इधर मुस्लिम दावा इसके बरअक्स है.
अब्राहम के संबंध में दो बातें बड़ी मशहूर है. एक ये कि ये नाम हिन्दुओं के त्रिदेवों में एक ब्रह्मा के नाम हिब्रू रूपांतरण है. ऐसा कहने वालों का तर्क है कि अब्राहम का मूल नाम अब्राम था जो बाद में यहोवा के साथ वाचा बाँधने के कारण अब्राहम हो गया. तौरात के उत्पत्ति ग्रन्थ के अनुसार अब्रहाम का अर्थ है 'कई कौमों का बाप'. भारतीय परंपरा में भी ब्रह्मा को सभी देवताओं, दानवों और मानवों का पितामह माना जाता है. अब्राहम को ही अरबी में इब्राहीम कहा गया है. ब्रह्मा और अब्राहम में साम्यता ढूँढने वालों का एक तर्क ये भी है कि कुरान में इब्राहीम के बारे में आता है कि सबसे पहले उन्हें ही सहीफे (किताब) दिए गये थे और इसी तरह भारतीय परंपरा में भी ये माना जाता है भगवान विष्णु की प्रेरणा से सरस्वती ने सर्वप्रथम ब्रह्मा जी को सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान कराया. साम्यता ढूँढने वालों का तर्क ये भी कि ब्रह्मा की पत्नी सावित्री और अब्राहम की पत्नी सारा के नाम में भी समानता है, वो ये भी कहतें हैं कि ब्रह्मा के मानस पुत्र अंगिरस ही उनके बेटे इसहाक थे. अब्राहम के जुड़ी दूसरी महत्वपूर्ण, रोचक और हैरान करने वाली बात है कि उनकी कथा और हमारे यहाँ के भक्त प्रहलाद की कथा में काफी कुछ साम्यता है. प्रहलाद का अपने पिता हिरण्यकश्यप के साथ ईश्वर की अवधारणा को लेकर मतभेद था और इब्राहीम की कथा में भी ऐसा ही कुछ है. प्रहलाद के ऊपर उसके पिता यानि उस वक़्त के शासक हिरण्यकश्यप ने बड़े अत्याचार किये थे, उनको जीवित ही अग्नि में झोंक दिया था, ऐसा ही इब्राहीम के साथ भी उस वक़्त के बादशाह नमरूद ने भी किया. इब्राहीम को भी आग में डाला गया था पर दोनों ही ईश्वर की कृपा से बचा लिए गये. नमरूद और हिरण्यकश्यप दोनों का अंत ईश्वर के दंड के परिणामस्वरुप हुआ था.

तौरात के उत्पत्ति ग्रन्थ से हमें जो जानकारी मिलती है उसके अनुसार जब हाजरा हामिला हुई थी तबसे ही दोनों सौतनों में झगड़े होने लगे थे. सारा इब्राहीम के पास शिकायत लेकर पहुँच गई कि अब चूँकि ये लौंडी गर्भ से है और मैं नहीं हूँ, इसलिये वो मुझे हकीर (कमतर) समझती है. इसपर इब्राहीम ने सारा से कहा, वो तेरी लौंडी है उसपर तेरा हक़ है, तू उसके साथ जो चाहे कर. उसके बाद सारा उसके ऊपर सख्ती दिखाने लगी जिससे आजिज आकर हाजरा घर छोड़ कर भाई गई. फिर किसी फ़रिश्ते के समझाने के बाद वो वापस सारा के पास आ गई और उसे इस्माइल नाम का पुत्र हुआ. इब्राहीम जब पिता बने उनकी उम्र छियासी साल की थी. जब इब्राहीम सौ साल के हुए तो उनका खुदा के साथ संवाद हुआ और उन्हें और उनकी बूढ़ी पत्नी सारा को एक औलाद की खुशखबरी दी गई. फिर इब्राहीम को सारा से इसहाक नाम का एक और पुत्र हुआ. जब सारा भी औलाद वाली हो गई तो दोनों सौतनों में फिर से क्लेश बढ़ गया और सारा ने इब्राहीम से साफ़ कह दीजिये कि इस लौंडी के बेटे को मैं तेरा वारिस नहीं बनने दूँगी. सारा के दबाब में इब्राहीम ने अपनी लौंडी और उससे हुए बच्चे इस्माइल को घर से निकाल दिया. घर से निकालते वक्त इब्राहीम ने उन्हें बस कुछ रोटी और पानी का मश्क ही दिया. बेचारी हाजिरा अपने बेटे को लेकर बियाबान में भटकने लगी. जब रोटी और पानी दोनों खत्म हो गये तो वो अपने बेटे को एक झाड़ी के पास रखकर वहां से दूर जाकर बैठ गई ताकि पानी के अभाव में बेटे को तड़प-तड़प कर मरते हुये न देख सके. फिर कोई फ़रिश्ता आता है और उसे एक कुआँ दिखाता है है जिससे दोनों की जान बचती है, बाईबल के अनुसार हाजिरा और इस्माइल जहाँ आबाद हुए थे वो फारान का बंजर, बियाबान और रेगिस्तानी इलाका था. इस्माइल और हाजिरा को लेकर इस्लामिक और यहूदी मान्यताओं में बड़ा फ़र्क है पर तमाम अंतरों के बाबजूद एक बात दोनों में समान है कि इब्राहीम ने अपने बच्चे और बीबी को घर से निकाल दिया था और वो भी उनके राशन-पानी और सुरक्षा का इंतज़ाम किये बिना. उन दोनों को बियाबान रेगिस्तान में खूंखार जंगली जानवरों के बीच भूखा-प्यासा छोड़ दिया गया.
इस्माइल और हाजिरा के बारे में इस्लामिक मान्यता क्या है इसकी चर्चा आगे होगी पर एक बात यहाँ तवज्जो-तलब है और वो ये कि अपने अतीत में इब्राहीम द्वारा अपने बच्चे और बीबी/लौंडी के परित्याग का इतिहास रखने वाले जब राम द्वारा सीता के परित्याग पर प्रश्न उठाते हैं तो बड़ी हैरत होती है वो भी तब जबकि राम ने सीता को किसी रेगिस्तान में नहीं बल्कि ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में छोड़ा था.
सामी मजहबों के आदि पुरुष इब्राहीम द्वारा अपनी बीबी/लौंडी हाजरा को घर से निकालने को लेकर तौरात और इस्लामी ग्रंथों में बड़ा मतभेद है. यहूदी मान्यता कहती है कि जब इब्राहीम के बड़े बेटे इस्माइल तेरह साल के थे तब उन्हें माँ समेत घर-निकाला दिया गया था पर इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार जिस समय इब्राहीम ने अपनी बीबी/लौंडी हाजरा को घर से निकाला था उस समय उनके बेटे दूध पीते बच्चे थे. कुरान के सूरह इब्राहीम और बुखारी शरीफ के किताबुल-अंबिया में इसका वर्णन विस्तार से आया है. जब इब्राहीम हाजरा और इस्माइल को छोड़ कर जा रहे थे वो हाजरा उनके पीछे दौड़ती हुई आई और बड़े कातर स्वर में अपने पति से कहा, मेरे पास बस थोड़ी सी रोटी है, पानी खत्म होने वाला है, साथ में दूध पीता बच्चा है और सामने ये चटियल मैदान और पहाड़ों से घिरी हुई वादी है, जंगली जानवर चारों ओर घूम रहें हैं और आप हमें छोड़कर वापस जा रहें हैं? इब्राहीम ऊंटनी पर सवाल होकर लौट रहे थे, उन्होंनें पत्नी के सवाल पर मौन धारण कर लिया. निराश हाजरा वापस लौट आयीं और इब्राहीम उन्हें छोड़कर वहां से चले गये. इब्राहीम ने अपनी बीबी/लौंडी हाजरा तथा अपने दूध पीते बच्चे इस्माइल को जिस जगह पर छोड़ा था उसको लेकर भी यहूदी और इस्लामिक मान्यता में बड़ा मतभेद है. तौरात कहती है कि हाजरा और इस्माइल को फारान के पहाड़ों में छोड़ा गया था. यहूदी और ईसाई विद्वानों के अनुसार फारान का इलाका सीना के रेगिस्तान के पास है. इधर कुरान कहता है कि इब्राहीम ने अपनी बीबी/लौंडी हाजरा और इस्माइल को काबे के पास यानि मक्के में बसाया था. चूँकि मुस्लिम जगत ये मानता हैं कि हाजरा और इस्माइल को इब्राहीम ने मक्के में छोड़ा था इसलिये हम आलेख माला को इसी मान्यता पर आगे बढायेंगें. जब रात हुई तो बीबी हाजरा बड़ी परेशान हुईं क्योंकि पास में न खाने को कुछ था न पीने को. जंगली जानवरों की ओर से लगातार हमले का खतरा बना हुआ था और उन जानवरों की आवाजों से बच्चा डर कर न सो रहा था न ही हाजरा को सोने दे रहा था. सुबह हुई तो भूख और प्यास से दोनों की हालत खराब. अब हाजरा के पास बचा सारा पानी खत्म हो गया और उनका दूध-पीता बच्चा इस्माईल प्यास से तड़पने लगा. माँ उठ खड़ी हुई, चारों ओर देखा. कहीं से भी पानी मिलने की गुंजाईश न देख कर वो पास के एक पहाड़ सफा पर चढ़ गईं पर वहां पानी न मिला तो वो एक वादी में उतर गईं और भागती हुई वहां से एक दूसरी पहाड़ी मरवा पर चढ़ गई ताकि वहां कोई पानी का सोता मिल सके मगर पानी वहां भी न था. इस क्रम में उन्होंने सात बार दोनों पहाड़ी के दरम्यान चक्कर लगा लिये. (आज भी जब मुस्लिम जब हज करने जातें हैं तो हाजरा के इन्हीं चक्करों की याद में सात दफ़ा सफा और मरवा पहाड़ी के बीच चक्कर लगातें हैं) मुस्लिम कथाएं कहतीं हैं कि बुरी तरह थक के जब हाजरा मरवा पहाड़ी से उतर रहीं थीं तो उन्हें अपने बेटे के पैरों के पास पानी का एक चश्मा बहता नज़र आया जिसे एक फ़रिश्ते जिब्रील ने अपने परों (पंखों) से खोदा था. ये पानी ही आज आबे-जमजम नाम से मशहूर है. हर हाजी इसका सेवन जरूर करता है.

(पानी वाली कथा में भी इस्लामिक और यहूदी मान्यता में विभेद है. तौरात के अनुसार मश्क का पानी ख़त्म होने के बाद जब हाजरा बैरसबा के इलाके में भटक रही थी तब उसने देखा कि उसका बच्चा प्यास से तड़प रहा है तब उसने अपने बेटे को किसी झाड़ी के किनारे डाल दिया और खुद वहां से दूर चली गई ताकि प्यास से तड़प-तड़प कर अपने बच्चे को मरता हुआ न देख सके. वो बेचारी वहां दहाड़े मार-मार का रो रही थी तभी एक फ़रिश्ता प्रकट हो गया और उसने दोनों को एक कुआँ दिखाया. हाजरा ने बेटे को पानी पिलाया और वहीं उसकी परवरिश शुरू कर दी).

पानी मिला तो फिर दोनों माँ-बेटे वहीं आबाद हो गये. इसी क्रम में यमन से निकला जुरहम नाम का एक कबीला पानी की तलाश में भटक रहा था. जब ये कबीला मक्के के पास पहुँचा तो उन्होंनें वहां कुछ पक्षी उड़ते देखे. रेगिस्तानी इलाकों में पक्षियों के उड़ने का अर्थ है कि आसपास कहीं पानी मौजूद है. वो लोग बड़े अचम्भित हुए कि इन इलाकों में तो कभी कोई जल-स्रोत नहीं था फिर अचानक ये परिंदे यहाँ कैसे उड़ रहे हैं और फिर वो उन पक्षियों की निशानदेही करते हुए उस जगह तक पहुँच गये जहाँ जमजम का कुआँ जाहिर हुआ था. वहां पहुँचे तो देखा कि वहां एक बूढी महिला अपने एक बेटे के साथ हैं. वो वहां आयें और आकर हाजरा से कहा कि हमारा ये कबीला यमन से चला है, कई महीनों से पानी की तलाश में निकला हुआ है. अब हमारी हालत पस्त है इसलिये अगर आप हमें अनुमति दें तो हम यहाँ आबाद हो जायें. हाजरा ने उनको ये कहते हुए जमजम के पास आबाद होने की इजाजत दी कि पानी पर मिल्कियत आपलोगों की नहीं बल्कि मेरी, मेरे बेटे की और हमारी आने वाली नस्ल की होगा और पानी इस्तेमाल करने के एवज में आप हमें कुछ मुआवजा भी देंगे. जो लोग इस्लाम पूर्व अरब को जाहिल कहतें हैं, उपरोक्त घटना उनके झूठे दावों का मुंहतोड़ जबाब है. जुरहम कबीले में सैकड़ों लोग रहे होंगें और इधर एक अकेली बूढी औरत अपने छोटे बेटे के साथ थी. जुरहम कबीले वाले चाहते तो उन्हें वहां से मारकर भगा देते और पानी पर कब्ज़ा कर लेते पर इसके विपरीत उन्होंने जो सभ्य आचरण प्रदर्शित किया उसकी मिसाल अन्यत्र मिलनी मुश्किल है. खैर, जुरहम कबीला वहां आबाद हुआ फिर उसी कबीले के एक लड़की के साथ इस्माइल का विवाह हुआ. बाद में इस्माइल ने जब दूसरा विवाह किया तो उसके लिये भी उन्होंने जुरहम कबीले से ही लड़की ली. यानि इस्माइल की दोनों ही पत्नियाँ यमन के कबीले जुरहम से थी. इस्लामिक इतिहासकार तबरी ने अपने इतिहास ग्रन्थ तारीखे-तबरी में बताया है कि इस्माइल की दूसरी पत्नी जुरहम कबीले के सरदार मजाज़-बिन-अम्र की बेटी थी जिससे उन्हें 12 बेटे हुए थी. इन्हीं के बारह बेटों से जो खानदान आगे बढ़ा वो मुस्तारेबा-अरब कहलाये. इसी वंश में पैगम्बरे-इस्लाम मुहम्मद साहब भी पैदा हुये. यानि आप इस्माइल वंशी होने के चलते मुस्तारेबा-अरब थे. मुस्तारेबा का अर्थ है कि वो लोग जो मूल अरब नहीं थे और जिन्होनें दूसरों के संसर्ग से अरबी सीखी. उपरोक्त तथ्य हम हिन्दुस्तान के लोगों के लिये इसलिये तवज्जो-तलब है क्योंकि यहाँ हम हिन्दुओं के पूर्वजों के बारे में बड़ा शोर बरपा किया जाता है कि तुम लोग तो भारत के मूल निवासी हो हीं नहीं क्योंकि तेरे पूर्वज तो कहीं कैश्पियन सागर या मध्य-पूर्व से आने वाले प्रवासी थे जिन्होंने यहाँ कब्ज़ा कर लिया था. आर्य-द्रविड़ मिथक के पर्दाफ़ाश करने वाले लोग इस जानकारी का समुचित उपयोग कर सकतें हैं.

~ अभिजीत
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Wednesday, 3 May 2017

ट्रिपल तलाक मुद्दे पर समाज में झूठ फैलाकर लोगों को गुमराह कर रहा है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड: प्रो. मोहम्‍मद शब्‍बीर

ट्रिपल तलाक मुद्दे पर समाज में झूठ फैलाकर लोगों को गुमराह कर रहा है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड: प्रो. मोहम्‍मद शब्‍बीर 


फोरम फॉर अवेयरनेस ऑफ नेशनल सिक्योरिटी (दिल्ली चैप्टर) की ओर से 24 अप्रैल, 2017 को कृष्ण मेनन भवन, भगवान दास रोड (सुप्रीम कोर्ट) में ट्रिपल तलाक, श्री राम जन्‍मभूमि मंदिर और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर दोहरे मापदंड को लेकर एक सेमिनार का आयोजन किया गया।
इस सेमिनार को संबोधित करते हुए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति और विधि विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. मोहम्मद शब्बीर ने ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर प्रमुखता से अपनी राय रखी। उन्‍होंने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर इस मसले को लेकर समाज में झूठ फैलाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि बोर्ड ट्रिपल तलाक का झूठ के सहारे बचाव कर रहा है ताकि महिलाओं का शोषण जारी रहे।
ट्रिपल तलाक पर पूरे देश में छिड़ी बहस के बीच प्रो. शब्बीर ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर कई सवाल खड़े किए। उन्होंने बोर्ड पर समाज में झूठ फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि बोर्ड तीन तलाक के झूठ के सहारे मुस्लिम महिलाओं पर हो रहे अत्याचार का बचाव कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि वह मुस्लिम महिलाओं पर होने वाले अत्याचार को जारी रखने के ख्याल से ऐसा कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में ट्रिपल तलाक मसले पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से पेश किए गए हलफनामे को प्रो. शब्बीर ने गुमराह करने वाला बताया। उन्‍होंने कहा कि बोर्ड का हलफनामा गुमराह और कुरान के खिलाफ है। पाकिस्तान व दूसरे कई मुस्लिम देशों में तलाक व हलाला पर पाबंदी है। मुस्लिम पर्सनल बोर्ड को इन मुस्लिम देशों से सीख लेनी चाहिए और तीन तलाक मसले पर कानून बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखना चाहिए। प्रो. शब्बीर ने कहा कि शाफई, मालकी व हंबली स्कूल ऑफ थॉट में तीन तलाक मान्य नहीं है। शियाओं में भी तीन तलाक मान्य नहीं है। उन्होंने कहा कि ट्रिपल तलाक पर रोक के लिए पाकिस्तान में फैमिली ऑर्डिनेंस एक्ट पारित हुआ। ट्रिपल तलाक और हलाला पर रोक लगी। कोर्ट के मार्फत ही तलाक मान्य होते हैं ना कि तीन बार तलाक कह देने से तलाक हो जाता है। उन्होंने कहा कि तीन तलाक सुन्नी स्कूल ऑफ थॉट में जायज है।
उन्‍होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान, ट्यूनीशिया, मोरक्को, ईरान और मिस्र जैसे एक दर्जन से ज्यादा इस्लामी देशों ने एक साथ तीन तलाक का रेगुलेशन किया है। अगर इस्लामिक देश कानून बनाकर तीन तलाक को रेगुलेट कर सकते हैं और इसे शरिया के खिलाफ नहीं पाया गया है, तो यह भारत में कैसे गलत हो सकता है, जो धर्मनिरपेक्ष देश है।
उन्‍होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समाज में कोई अच्छा संदेश नहीं दे सकता है, क्योंकि उसके पास तर्क के नाम पर झूठ के सिवाय कुछ नहीं है। इसका प्रमुख कारण यह है कि उसके पास तर्क के आधार पर बचाव करने के लिए कुछ है ही नहीं। उन्‍होंने कहा कि कुरान में तलाक की व्‍याख्‍या पूरी तरह दी गई है। इस्‍लाम में नितांत जरूरी होने पर ही तलाक की इजाजत की बात कही गई है। इसके पीछे के कारणों का विस्‍तार से इसमें उल्‍लेख किया गया है। उन्‍होंने कहा कि अल्‍लाह की नजरों में भी तलाक को सबसे घृणास्‍पद चीज माना गया है। कुरान में तलाक को लेकर वर्णित कुछ बिंदुओं के आधार पर इस निष्‍कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि जायज कारणों के आधार पर ही तलाक दिया जाना चाहिए। इसे अंजाम देने से पहले सुलह की कई प्रयास होने चाहिए। यदि ये सारे प्रयास विफल हो जाते हैं, तभी इसे अमल में लाना चाहिए। विदेशों में बैठकर कहीं से तीन तलाक कह देना, ऐसा किसी नियम का इसमें उल्‍लेख नहीं है। ट्रिपल तलाक को मुस्लिमों के प्रमुख वर्ग के द्वारा भी पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। इन हालातों में कोई भी मुस्लिम महिला अपने पति के आचरण से संतुष्‍ट नहीं हैं तो वह कानून का सहारा ले सकती है। अपनी धार्मिक आजादी को बचाए रखने का अब यह सही समय है। मुस्लिम समाज के भी बुद्धिजीवी लोग इस मसले को लेकर सामने आने लगे हैं।
प्रो. शब्‍बीर ने कहा कि अब यह ट्रिपल तलाक का मसला बहुत हो गया, इसका हल निकलना चाहिए। इसके लिए अब यह सही समय है। मुस्लिम वर्ग के नेता मौजूदा सरकार से संपर्क करें और इस विषय में संविधान के अनुसार उचित प्रावधान किए जाएं।
सेमिनार के दौरान राममंदिर निर्माण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी चर्चा की गई। सभी वक्ताओं ने एक सुर में सहमति से मंदिर निर्माण पर जोर दिया। साथ ही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर राष्ट्र विरोधी गतिविधियों की आलोचना की।
इस समारोह में माननीय श्री इंद्रेश कुमार जी (सदस्‍य, राष्‍ट्रीय कार्यकारी मंडल, राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ) बतौर मुख्‍य अतिथि मौजूद रहे।
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ट्रिपल तलाक जैसी बीमारी का इलाज अब बेहद जरूरी, इसे पूरी तरह खत्‍म किया जाए: शहनाज अफजल

ट्रिपल तलाक जैसी बीमारी का इलाज अब बेहद जरूरी, इसे पूरी तरह खत्‍म किया जाए: शहनाज अफजल 


फोरम फॉर अवेयरनेस ऑफ नेशनल सिक्योरिटी (दिल्ली चैप्टर) की ओर से 24 अप्रैल, 2017 को कृष्ण मेनन भवन, भगवान दास रोड (सुप्रीम कोर्ट) में ट्रिपल तलाक, श्री राम जन्‍मभूमि मंदिर और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर दोहरे मापदंड को लेकर एक सेमिनार का आयोजन किया गया।
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (आरआरएम) की शहनाज अफजल ने इस सेमिनार को संबोधित करते हुए ट्रिपल तलाक से मुस्लिम महिला को हो रही दुश्‍वारियों को लेकर जमकर प्रहार किए। उन्‍होंने कहा कि ट्रिपल तलाक पर आज पूरे देश में महसूस किया जा रहा है कि इसे जल्‍द खत्‍म किया जाए। ये सभी लोगों की चाहत है। इसकी पीड़ा हजारों मुस्लिम महिलाओं ने अब तक झेली हैं और मौजूदा समय में बड़ी तादाद में मुस्लिम महिलाएं इसे झेल रही हैं। शहनाज ने कहा कि इस बीमारी (ट्रिपल तलाक) का इलाज अब बेहद जरूरी है। वैसे भी महिलाएं अपनी आजादी विशेषकर धार्मिक आजादी के प्रति खासा जागरुक हो रही हैं। धार्मिक आजादी होनी चाहिए लेकिन महिलाओं की नैतिकता को ठेस पहुंचे तो ये गलत है।
शहनाज अफजल ने कहा कि तीन तलाक का मुद्दा इन दिनों लगातार चर्चा में है और इसकी जमकर खिलाफत शुरू हो गई है। कई इस्लामिक देशों में भी इस प्रथा पर प्रतिबंध है और अब भारत में भी इस प्रथा पर रोक के लिए अब आवाज बुलंद होने लगी है। लेकिन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस मामले में बेवजह अड़ा हुआ है। बोर्ड तीन तलाक के मुद्दे पर अनर्गल तर्क गढ़ रहा है। बोर्ड को मुस्लिम महिलाओं की दशा को लेकर झूठे तर्क गढ़ने की बजाय इस मुद्दे के निराकरण के लिए गंभीर प्रयास करने चाहिए। यदि बोर्ड की मंशा यही रहेगी तो मुस्लिम महिलाओं की स्थिति में सुधारीकरण के प्रयास को ठेस पहुंचेगी। धार्मिक आधार पर ट्रिपल तलाक को बेवजह तूल देने से इन महिलाओं की स्थिति और बदतर होगी। जबकि कुरान में भी तलाक को लेकर स्‍पष्‍ट व्‍याख्‍या है, तो ऐसे में क्‍यों नहीं बोर्ड को सदाशयता का परिचय देकर इस मामले में गंभीरता से चिंतन करना चाहिए। यदि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ट्रिपल तलाक को खत्म करने की बात से गुरेज करता है तो इसका समाधान कानून के जरिये होना जरूरी है।
उन्‍होंने बोर्ड पर जमकर निशाना साधा और कहा कि बोर्ड ने अपने दरवाजे ट्रिपल तलाक से पीडि़त मुस्लिम महिलाओं के लिए क्यों नहीं खोले?  यहां सवाल कुरान शरीफ में वर्णित किसी कानून के विरोध का नहीं है बल्कि इसका दंश झेल रही मुस्लिम महिलाओं के हक का है।
आज गांवों, शहरों में कई ऐसे परिवार हैं, जो इस बात को लेकर परेशान हैं कि वो अपनी तलाकशुदा बेटियों-बहनों का अब क्या करें? उनकी जिंदगियां बद से बदतर हो रही हैं और मुश्किल हालात के चलते उनका जीना दूभर हो गया है। ऐसे में मुस्लिम महिलाओं के हितों के आधार पर निश्चित ही कानून बनाए जाएं।
शहनाज अफजल ने यह भी कहा कि आज मैं इस विषय पर श्री इंद्रेश जी की हौसला-आफजाई के चलते ही कुछ कहने का साहस जुटा पाई हूं। उन्‍होंने सवालिया लहजे में कहा कि इस गंदी रवायत (ट्रिपल तलाक) को क्‍यों चलाया जा रहा है? यह अल्‍लाह-नबी को भी पसंद नहीं है। पूर्व की रवायत को आज के दौर में काफी बदल दिया गया है। उन्‍होंने उत्‍तर प्रदेश का हवाला देते हुए कहा कि यूपी में भारतीय जनता पार्टी ने ट्रिपल तलाक के मसले पर काफी गंभीरता के साथ स्‍टैंड लिया, चूंकि यह राज्‍य इससे सबसे ज्‍यादा प्रभावित है। ट्रिपल तलाक के सबसे अधिक मामले इसी राज्‍य से सामने आए हैं। झारखंड, मध्‍य प्रदेश समेत कई राज्‍यों में ट्रिपल तलाक से पीडि़त महिलाओं की संख्‍या में खासा इजाफा होता जा रहा है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में तीन तलाक का दंश झेलने वाली महिलाएं अब शासन-प्रसाशन को पत्र लिखकर मदद की गुहार लगा रही हैं। मुस्लिम महिलाएं अब खुलकर सामने आने लगी हैं और अपनी पीड़ा व्‍यक्‍त कर रही हैं। हालांकि, इससे पहले भी ये महिलाएं अपनी आवाज उठाती रही हैं, लेकिन इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। लेकिन अब ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर इन महिलाओं की बेबाक अभिव्‍यक्ति के चलते इसे मजबूती मिली है। इस जुल्‍म के खिलाफ मुस्लिम संगठनों ने कभी फतवा नहीं दिया। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कानून के अनुसार गलत काम करने वाले को तलाक देने के मामले में कभी सजा नहीं दी। और न ही इस मामले में कभी कोई अनुकरणीय उदाहरण प्रस्‍तुत किया। आज हालात यह हैं कि मुस्लिम महिलाएं अवसाद, तनाव में जी रही हैं।
उन्‍होंने कहा कि अब ये मामला कोर्ट पहुंच गया है और आगामी दिनों में इस पर ठोस निदान होने की हमें उम्‍मीद है। इस मामले का निदान कोर्ट के जरिये होना मुस्लिम महिलाओं के हक में साबित होगा। ट्रिपल तलाक नामक इस बीमारी का इलाज अब बेहद जरूरी हो गया है। मेरा यह मानना है कि ट्रिपल तलाक को पूरी तरह खत्‍म किया जाना चाहिए। अब ये समाजिक सुधार का समय है। साथ ही, पूरा न्‍याय तभी होगा, जब पीडि़त महिलाओं को संबंधित प्रोपर्टी का आधा हिस्‍सा दे दिया जाए ताकि वह अपना जीवन बिना किसी कठिनाई के गुजार सकें।

इस समारोह में माननीय श्री इंद्रेश कुमार जी (सदस्‍य, राष्‍ट्रीय कार्यकारी मंडल, राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ) बतौर मुख्‍य अतिथि मौजूद रहे।
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ट्रिपल तलाक से पीडि़त मुस्लिम महिलाओं तक न्‍याय पहुंचना जरूरी: : सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एमवाई इकबाल

ट्रिपल तलाक से पीडि़त मुस्लिम महिलाओं तक न्‍याय पहुंचना जरूरी: : सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एमवाई इकबाल


फोरम फॉर अवेयरनेस ऑफ नेशनल सिक्योरिटी (दिल्ली चैप्टर) की ओर से 24 अप्रैल, 2017 को कृष्ण मेनन भवन, भगवान दास रोड (सुप्रीम कोर्ट) में ट्रिपल तलाक, श्री राम जन्‍मभूमि मंदिर और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर दोहरे मापदंड को लेकर एक सेमिनार का आयोजन किया गया।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्‍यायाधीश एमवाई इकबाल ने समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि ट्रिपल तलाक एक ज्‍वलंत मुद्दा है और इस पर गंभीर चर्चा जरूरी है। ट्रिपल तलाक से पीडि़त मुस्लिम महिलाओं तक सामाजिक न्‍याय पहुंचना जरूरी है।

एमवाई इकबाल ने कहा कि तीन तलाक के नाम पर मुस्लिम महिलाओं का शोषण हो रहा है। तलाक के इस्तेमाल से महिलाओं के साथ उनके बच्चों के भविष्य को अंधेरे में डाल दिया जाता है। अधिकांश मामलों में गुजारे भत्ते और संपत्ति में से हक नहीं मिलता। यह मुस्लिम महिलाओं की दयनीय हालत के लिए जिम्मेदार है।

उन्‍होंने कहा कि ट्रिपल तलाक के खिलाफ मामला अब सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। कोर्ट के वृहद् पीठ के अधीन इस मामले में सुनवाई होनी है। ऐसे में इस मामले के शीर्ष कोर्ट में होने के चलते उन्‍होंने इसके प्रावधानों को लेकर कोई टिप्‍पणी करने से इनकार किया और कहा कि इस पर कोई प्रतिक्रिया देना अभी उचित नहीं होगा।

हालांकि, पूर्व जज ने यह जरूर कहा कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस मामले का विरोध कर रहे हैं। बोर्ड का यह कहना है कि ये उनका संवैधानिक अधिकार है और बाहरी तत्‍व इसमें हस्‍तक्षेप न करें। शरीयत और शरिया लॉ का हवाला देकर इसे वह जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि केंद्र सरकार ट्रिपल तलाक से पीडि़त मुस्लिम महिला का समर्थन कर रही है। प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि ट्रिपल तलाक से पीडि़त मुस्लिम महिलाओं तक सामाजिक न्‍याय पहुंचना जरूरी है। हालांकि, उन्‍होंने इशारों में यह कहने की जरूर कोशिश की कि ट्रिपल तलाक से महिलाओं के समानता सहित दूसरे अधिकारों का हनन होता है और इसमें सुधार जरूरी है।

अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता विषय पर उन्‍होंने कहा कि संविधान के तहत सभी को बोलने की आजादी है लेकिन इसकी एक मर्यादा और सीमा होनी चाहिए। उन्‍होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर राष्ट्र विरोधी गतिविधियों की आलोचना की और कहा कि देश की एकता, अखंडता को धार्मिक आधार पर नुकसान नहीं पहुंचने देना चाहिए।

इस समारोह में माननीय श्री इंद्रेश कुमार जी (सदस्‍य, राष्‍ट्रीय कार्यकारी मंडल, राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ) बतौर मुख्‍य अतिथि मौजूद रहे।
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मुस्लिम महिलाओं के साथ बड़ी ज्यादती और गुनाह है ट्रिपल तलाक, इसे समाप्‍त करना जरूरी: श्री इंद्रेश कुमार

मुस्लिम महिलाओं के साथ बड़ी ज्यादती और गुनाह है ट्रिपल तलाक, इसे समाप्‍त करना जरूरी: श्री इंद्रेश कुमार  


ट्रिपल तलाक, श्री राम जन्‍मभूमि मंदिर और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर दोहरे मापदंड को लेकर एक सेमिनार का आयोजन 24 अप्रैल, 2017 को कृष्‍ण मेनन भवन, भगवान दास रोड (सुप्रीम कोर्ट) किया गया, जिसमें माननीय श्री इंद्रेश कुमार जी (सदस्‍य, राष्‍ट्रीय कार्यकारी मंडल, राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ) बतौर मुख्‍य अतिथि मौजूद रहे।

श्री इंद्रेश कुमार ने समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि ट्रिपल तलाक मुस्लिम महिलाओं पर एक तरह का अत्याचार है और ये पाप के समान है। ट्रिपल तलाक हर तरीके से गुनाह है। देश व समाज के हित के मद्देनजर मुस्लिम समाज के सुधारीकरण के लिए जरूरी है कि इसे समाप्त किया जाए और हमने इसे समाप्त करने का संकल्प लिया है। मुस्लिम महिलाओं के साथ तलाक और ट्रिपल तलाक बहुत बड़ी ज्यादती है। ट्रिपल तलाक से मुस्लिम महिलाओं को हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति दिलवाने का अब सही मौका है। इस पाप और अत्याचार को हर हालत में समाप्त किया जाएगा।

कुरान शरीफ और हदीस के अनुसार तलाक खुदा को नापसंद है। कुरान शरीफ में भी तलाक एक गुनाह है। निकाह खुदा के घर में तय होते है और धरती पर सजाए और नवाजे जाते हैं। तलाक एक गुनाह है इसे नहीं करना चाहिए। मुस्लिम विद्वानों ने भी तलाक का विरोध किया है। ट्रिपल तलाक की इजाजत ना कुरान शरीफ देता है ना ही हदीस ने इसे सही माना हैं। ट्रिपल तलाक गैर इस्लामिक है, गैर कानूनी है और अमानवीय भी है। उन्‍होंने ट्रिपल तलाक को एक बुराई करार देते हुए इसे पैगम्बर साहब की शिक्षा के भी खिलाफ बताया और कहा कि तलाक एक बुराई है और पैगम्बर की शिक्षा भी इसे नकारती है। उन्‍होंने कहा कि तलाक कुरान में नापसंदीदा अमल है। जब तलाक होता है तो अर्श हिलता है। फिर भी यदि तलाक हो तो कुरान और हदीश की रोशनी में हो। गुस्‍से में आकर एक ही जगह तीन बार तलाक देना नाजायज है। खुदा को सबसे नापसंद चीजों में तलाक भी शामिल है। गुस्‍सा, जल्‍दबाजी, घृणा, नशे आदि में यदि तलाक कहा गया है तो यह अस्‍वीकार्य है। इतिहास को देखें तो यह साफ है कि किसी नबी-पैगम्‍बर ने अपनी बीवी को तलाक नहीं दिया।

बाद के कालखंड में कुरान और हदीश को अपनी सुविधानुसार व्‍याख्‍या कर मुस्लिम समाज के कुछ वर्ग ने शरिया को अपने अनुसार तैयार किया। इसके अनुसार, ट्रिपल तलाक को जानबूझकर स्‍वार्थवश अपनी सुविधा के अनुसार तैयार किया, जो पूरी तरह गैर इस्‍लामी और अनैतिक है। इस्‍लाम में जिनके दिमाग में शैतान था, उनके दिमाग की उपज है ट्रिपल तलाक और हलाला। इसे समाप्‍त किए जाने का मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड विरोध करता रहा है, लेकिन मेरा मानना है कि इस मुद्दे पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को मान्‍यता ही नहीं देना चाहिए।

 आज मुस्लिम समाज में इस मसले के निराकरण को लेकर हलचल मची है। आज जरूरत है सत्‍य और सही को समझने की। हम सभी का प्रयास यह होना चाहिए कि मुस्मिल समाज की महिलाओं पर होने वाले अत्‍याचारों से उन्‍हें निजात दिलाया जाए। भारत के लिए यह सुअवसर है कि देश को हिंसामुक्‍त और अत्‍याचार मुक्‍त बनाएं। हम सभी धर्मों का सम्‍मान करने वाले लोग हैं।

उन्‍होंने कहा, ‘इस संबंध में वह अब तक दर्जनों मुस्लिम देशों में समारोह को संबोधित कर चुका हूं, हजारों मुस्लिम बुद्धिजीवियों और इस समाज के लोगों के साथ वैचारिक विमर्श कर चुका हूं। अपने इस अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि इस्‍लाम की कट्टरता और हिंसा के खिलाफ एक सुधारवाद शुरू हो गई है। मुस्लिम समाज के बीच उकसावे व भड़काऊ कृत्‍य को अंजाम देने वालों को अब बदलना होगा। हमारी ये मुहिम व्‍यापक हो गई है।

श्री रामजन्‍मभूमि मंदिर मामले को लेकर इंद्रेश कुमार ने कहा कि अयोध्‍या में राममंदिर एक विवाद न होकर लोगों की भावनाओं का सवाल है। उन्‍होंने कहा कि बाबरी मस्जिद का निर्माण लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके किया गया है। इतिहास गवाह है कि आजतक मुस्लिम समुदाय ने कभी भी वहां नमाज अदा नहीं की। कुरान में भी यह बात स्‍पष्‍ट है कि किसी भी विवादित स्‍थान पर की गई इबादत को खुदा भी स्‍वीकार नहीं करता है। इस मामले में सत्‍य तो आखिर सत्‍य है, असत्‍य से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता है। मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड की ओर इशारा करते हुए उनहोंने फिर कहा कि वे कुराफात से बाज आएं और देश के मुसलमानों को भड़काने की बजाय प्‍यार व भाईचारा को बढ़ाएं। अब सवाल यह है कि लोगों को पाक मस्जिद की जरूरत है या फिर नापाक मस्जिद की। उन्‍होंने यह भी कहा कि समय, इतिहास व सत्‍य के साथ कभी समझौता नहीं किया जा सकता है। यह मुद्दा सुलझना है और इसे हल होने से कोई नहीं रोक सकता। अब तो कुछ मुस्लिम संगठन भी राम मंदिर के निर्माण के समर्थन में उतर आए हैं। एक दिन मंदिर बनेगा और पूरा देश इसे देखेगा। मानवता और राष्‍ट्र से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता है।

उन्‍होंने कहा कि हम अभिव्यक्ति की आजादी में भरोसा रखते हैं, पर यह सब कानूनी दायरे में होना चाहिए। देश में सभी लोगों को बोलने की आजादी है, लेकिन मारपीट, हिंसा, गलतबयानी की आजादी नहीं है। हर समस्या का समाधान संवाद से निकल सकता है। लेकिन समझने और समझाने के लिए हम तैयार नहीं हैं। इस देश को अब स्‍वाभिमान से जीने की आदत डालनी चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कट्टरता फैलाने वाले का विरोध न करना अपराध है, पाप है। जेएनयू, हैदराबाद यूनिवर्सिटी में घटी घटनाएं एंटी डेमोक्रेट, एंटी सेक्‍युलर और एंटी नेशनल है। ये कतई स्‍वीकार्य नहीं है।

 चीन ने भारत के अंदरुनी मामलों में दखल देकर दलाई लामा के अरुणाचल दौरे पर रोक लगाने की बात कही। चीन ने रिश्‍ते बिगड़ने की धमकी दी। चीन ने सुरक्षा परिषद में स्‍थायी सदस्‍यता का विरोध किया और पाक आतंकी मसूद अजहर का पक्ष लिया। भारत ने इसे हस्‍तक्षेप करार दिया। अब दोहरा रवैया नहीं चल सकता है। दोहरे मापदंड से न कानून चल सकता है और न समाज।

समारोह के अंत में उन्‍होंने कहा कि अब इस मिशन को वहां तक ले जाना है, जब तक भारत विश्‍व शक्ति न बने। हम विश्‍व शांति के पुरोधा हैं, मिलकर चलेंगे और मिलकर बनाएंगे।
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