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हमारी एकता का संकट

आज बार-बार यह अवाज उठाया जाता है कि पिछड़ा - वंचित वर्ग की समस्या एक सामाजिक समस्या है और इसका समाधान राजनीतिक नहीं है। पर इतना भी सत्य है...

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Wednesday, 18 June 2014

इराक -आतंकियों को अब जनता देगी जवाब! हाथों में उठा हथियार कहा-'बहुत हो चुका'

इराक -आतंकियों को अब जनता देगी जवाब! हाथों में उठा हथियार कहा-'बहुत हो चुका'
आतंकियों को अब जनता देगी जवाब! हाथों में उठा हथियार कहा-'बहुत हो चुका'

(फोटो: सद्र शहर में सेना के साथ हाथों में हथियार लिए सड़कों पर परेड करते वॉलिंटियर।)
        "इराक में खतरनाक हालात पैदा हो रहे हैं। आतंकी पूरी जमीन कब्जाना चाहते हैं। मातृभूमि की रक्षा करने का यही समय है, उठा लो हाथों में हथियार।" ये बातें इराक के शिया संप्रदाय के नेताओं ने यहां की जनता से आतंकवाद का खात्मा करने के मद्देनजर कही है।
बता दें कि बीते दिनों सार्वजनिक उपदेश देते हुए अयातोल्ला अली अल सिस्तानी के प्रवक्ता अब्देल मेहदी अल केरबिलाई ने कहा, "बहुत खतरनाक स्थिति पैदा हो रही है। आतंकी बगदाद पर कब्जा करना चाहते हैं।" आगे कहा, "जो लड़ने योग्य हैं, वे स्वयंसेवक बनें और इराकी सुरक्षा बलों का समर्थन करें।"
आतंकियों को अब जनता देगी जवाब! हाथों में उठा हथियार कहा-'बहुत हो चुका'

 सद्र शहर में अयातोल्ला की तस्वीर साथ लिए आतंकवाद से लड़ने चले स्वयंसेवक।
बगदाद पर नजर!
अयातोल्ला ने कहा, "हर नागरिक का फर्ज बनता है कि वह आतंकवाद का सामना करे। फिर चाहे, वह किसी भी धर्म का क्यों न हो।" इस दौरान अयातोल्ला ने देश के राजनीतिक बलों से मतभेदों को पीछे छोड़ सेना का समर्थन करने की भी अपील की। अयातोल्ला की अपील के बाद जनता बढ़-चढ़ कर सेना का साथ देने के लिए सामने आ रही है। इनमें युवा से लेकर महिलाएं और बुजुर्ग तक शामिल हैं।     
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इराक में इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) कई प्रमुख शहरों पर कब्जा कर चुका है। इनमें मोसुल और बैजी शामिल हैं। आतंकियों की नजर अब राजधानी बगदाद पर है। आतंकी पूरी ताकत के साथ राजधानी की ओर बढ़ रहे हैं।
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इस्लामिक आतंकवाद - मुसलमान नहीं हो , तो मर दी गोली - एक पत्नी की आपबीती

इस्लामिक आतंकवाद - मुसलमान नहीं हो , तो मर दी गोली - एक पत्नी की आपबीती
केन्‍याई महिला की आपबीती: पति से पूछा कि तुम मुसलमान हो और मार दी गोली
(फोटो - हमले के बाद कमरे में पड़े शवों को देखते पत्रकार व स्थानीय निवासी)
नैरोबी। केन्‍या के एक गांव में फुटबाल विश्‍व कप का मैच देख रहे 50 लोगों के कत्‍ल-ए-आम से जुड़ी नई जानकारी सामने आ रही है। हमला करने वाले सोमाली आतंकवादियों ने घर-घर जाकर लोगों से पूछा था कि क्‍या वे मुसलमान हैं या सोमाली भाषा बोलते हैं? इनमें से किसी भी सवाल का जवाब ना में देने वाले को उन्‍होंने गोलियों से उड़ा दिया। यह हमला पेकेटोनी में हुआ। यह जगह देश के प्रमुख पर्यटन केंद्रों में से एक, लामू, से 30 मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। 
प्रत्‍यक्षदर्शियों के मुताबिक 30 हथियारबंद लोगों ने यह कत्‍ल-ए-आम मचाया। ये सभी आतंकी संगठन अल-शबाब के सदस्‍य बताए जाते हैं। ये सभी एक बस में सवार होकर आए थे।
इनके हमलों में पति को खो चुकीं एनी गैथिगी ने बताया, 'रात के करीब आठ बजे वे मेरे घर आए और हमसे पूछा कि क्‍या तुम मुसलमान हो। मेरे पति ने उन्‍हें बताया कि हम ईसाई हैं। इतना सुनते ही उन्‍होंने मेरे पति के सिर और सीने में गोलियां दाग दीं।'
एक शख्‍स ने बताया कि उनके दो भाइयों को केवल इसलिए मार दिया गया क्‍योंकि हमलावरों को उनका सोमाली नहीं बोलना नागवार गुजरा। हमले में कम से कम 48 लोगों की मौत हुई है। आतंकियों ने दो होटलों को भी आग के हवाले कर दिया।
अधिकारियों का कहना है कि रविवार रात से शुरू हुआ हमला सोमवार सुबह तक चला। उन्‍होंने हमले के लिए अल शबाब को जिम्‍म्‍ेदार ठहराया है। यह संगठन अल कायदा से जुड़ा है और सोमालिया में केन्‍या के सैनिकों की मौजूदगी का बदला लेने के लिए हमले करता रहा है। इस संगठन में सोमाली लड़ाकों के साथ कई केन्‍याई लोग भी शामिल हैं। 
आतंकियों ने एक होटल में भी खूनी खेल खेला। एक पुलिस अफसर के मुताबिक ब्रीज व्‍यू होटल में आतंकियों ने महिलाओं को अलग कर दिया और उनसे कहा कि वे पुरुषों को मरते हुए देखें। देश के गृह मंत्री का कहना है कि आतंकियों की सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ भी हुई, जिसके बाद वे पास के जंगल में भाग गए। इससे पहले वे 20 वाहनों को भी आग लगा गए थे। वे दो होटल, एक बैंक और एक पुलिस स्टेशन को भी आग के हवाले कर गए।
केन्‍याई महिला की आपबीती: पति से पूछा कि तुम मुसलमान हो और मार दी गोली
(हमले के बाद पेकेतोनी के जले हुए इक्विटी बैंक के सामने से गुजरते स्थानीय निवासी)
पुलिस महानिरीक्षक डैविड किमाइयो ने बताया कि आतंकवादियों के हमले में 50 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई है। उन्होंने कहा, "हमारे अधिकारी शव तलाश रहे हैं। मृतकों की संख्या बढ सकती है। मरने वालों में शहर के पुलिस प्रमुख का ड्राइवर भी शामिल है। कई लोगों ने जंगल में भाग कर अपनी जान बचाई। फिलहाल हमले के संबंध में किसी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है।"
महिलाओं से कहा, 'देखो जैसा हम कर रहे हैं, वैसा ही केन्याई सैनिक सोमालिया में कर रहे हैं' 
ब्रीज व्यू होटल में लोग टीवी पर विश्व कप फुटबॉल के मजे ले रहे थे। अचानक वहां सोमाली आतंकियों ने धावा बोला। पुरुषों को अलग किया। महिलाओं से कहा, 'देखो तुम्हारे सैनिकों ने हमारे लोगों को कैसे मारा।' इसके बाद पुरुषों पर अंधाधुंध गोलियां चला दीं।  
आतंकी शहर में रातभर मचाते रहे तबाही
आतंकियों की कार्रवाई रविवार शाम से सोमवार सुबह तक चलती रही। आतंकियों ने इस दौरान बाद वहां के तीन होटलों, एक बैंक की इमारत और एक पुलिस स्टेशन और कई गाडिय़ों को आग लगा दी। नैरोबी में गृह मंत्रालय ने बताया, 'ये सोमालिया के अल शबाब से जुड़े आतंकी थे। दो मिनी बसों में भर कर गांव में आए थे।'
केन्‍याई महिला की आपबीती: पति से पूछा कि तुम मुसलमान हो और मार दी गोली
(अज्ञात बंदूकधारियों ने हमले के दौरान कई घरों और वाहनों को आग लगा दी।)

अल शबाब ले रहा है बदला 
2011 -
- सितंबर में आतंकवादियों ने केन्या से दो ब्रिटिश नागरिकों का अपहरण किया। एक की हत्या करने के बाद दूसरे को छह माह बाद छोड़ा। अपहरणकर्ताओं का सोमालिया से संबंध था।
- अक्टूबर में केन्या ने सोमालिया में इस्लामिक चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए सेना भेजी। अलकायदा से जुडे आतंकी संगठन अल शबाब ने बदला लेने की चेतावनी दी।
2013
- सितंबर में केन्या की राजधानी नैरोबी के एक मशहूर शॉपिंग मॉल पर अल शबाब ने हमला किया और 67 लोगों की हत्या कर दी। मरने वालों में भारत, अमेरिका और यूरोप के नागरिक शामिल थे।
2014
- मई में ब्रिटेन ने राजधानी नैरोबी में बड़े आतंकी हमले होने की चेतावनी जारी करते हुए अपने लोगों से केन्या न जाने की अपील की।
- जून में अल शबाब ने एक होटल पर हमला कर 48 लोगों को मौत के घाट उतारा, 25 गंभीर।
केन्‍याई महिला की आपबीती: पति से पूछा कि तुम मुसलमान हो और मार दी गोली
(मोर्चुरी में पोस्टमार्टम के लिए रखे गए शव।)
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Monday, 16 June 2014

Police file cases against Biharis Muslims in Bangladesh

Police file cases against Biharis Muslims in Bangladesh
Biharis Muslims blame Mollah, JL men for arson attack, killings
The police are yet to identify the miscreants who burnt houses of Urdu-speaking people at a relief camp and killed 10 of them at Mirpur in the capital on Saturday morning, instead, they blamed the Biharis for the clashes that led to the killing. Six cases were filed with Pallabi police station in connection with the arson attack and killings. Police filed two of the cases for the arson attack that had killed 10 people, and for assault on policemen. The cases were transferred to the Detective Branch of Dhaka Metropolitan Police. Residents of Kurmitola Pakistani relief camp, better known as Biharis, protested against the cases. They alleged that the police had sided with local lawmaker Elias Uddin Mollah and Juba League and Chhatra League men who, they alleged, had mounted the arson attack. They also demanded immediate withdrawal of Pallabi police officer-in- charge Syed Ziauzzaman. Around 3,000 people were sued in the six cases while police have so far arrested seven people in this connection. The arrested people are – Farid, Azad, Sabbir, Arif, Jewel, Nabin and Badruddin. Most of them are Urdu-speaking people. A Dhaka court remanded four of them in police custody for two days each. At least nine members of a family were burnt to death when eight Bihari homes at the camp were torched after scuffles between Biharis and law enforcers, allegedly accompanied by locals early Saturday. A 10th person was killed reportedly in police firing. The police, however, were yet to identify the people who had torched the houses, said the Pallabi police OC. In the first information reports, police alleged that the stranded Pakistani residents of Kurmitola camp and New Kurmitola camp had locked in clashes with each other blasting crude bombs and crackers. As police reached the spot, the Biharis ringed and attacked them. One of the cases said that around 100-150 Bengalis from slums nearby were injured in attacks by the Biharis. However, New Age could not trace more than 10 Bengali people among the injured. Jabbar Khan, president of Stranded Pakistanis General Repatriation Committee, said that those were ‘false’ cases aimed to harass the Urdu-speaking community there. Jabbar blamed Elias Mollah and his cohorts for the arson attack saying that they were plotting to evict the Urdu-speaking people from the camps to grab the land. Jalaluddin, president of Kurmitola Bihari camp, expressed his anger and frustration. ‘Is it justice? We are the victims and cases have been filed against us. We were not even allowed to file a case.’ A local resident, Mobarak Hossain, filed a case against some unidentified people for vandalising a mosque during the violence. The Urdu-speaking people vandalised vehicles and blocked Kalshi road halting traffic for several hours on Sunday in protest at the arson attack and killings. The stranded Pakistanis in the area blamed Elias Mollah and Juba League men for the attacks. They torched an effigy of the lawmaker and brought out a procession demanding his punishment. Mollah, however, denied the allegation. They alleged that police had intercepted many stranded Pakistanis at different places as they were going to join the Kalshi agitation. At Mohammadpur, police intercepted Biharis at Geneva camp. The stranded Pakistanis alleged that Juba League Pallabi unit secretary Jewel Rana and Chhatra League man Tipu had led the attack. They vandalised the slum, looted houses and set those on fire in presence of the police, the Biharis alleged. Jewel Rana was earlier arrested on charge of harassing a girl that led her to commit suicide. Locals said that they had a quarrel with Elias and his men on June 11. The lawmaker wanted to give power connection to nearby Raju Slum controlled by him. Biharis objected to the move that had led to brief scuffles between the Urdu- speaking people and Mollah’s men. ‘Mollah then threatened the Biharis with consequences,’ said Mannan Hossain, a resident of the relief camp. However, Mollah told New Age that the camp inmates had scuffles among themselves over power supply three days ago and blocked a road. He said he had visited the spot that day to try to calm the situation but returned after having failed to reach a settlement. Teams of Criminal Investigation Department and Detective Branch visited the spot. A team of National Human Rights Commission also visited the spot. Meanwhile, state minister for home affairs Asaduzzaman Khan said that there would be no flaws in the investigation and none would be spared if found guilty. The bodies of the victims were handed over to their families after post- mortem examinations. - See more at: http://newagebd.net/21410/police-file-cases-against-biharis/#sthash.gaVSOjq1.dpuf
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Operation Zarb-e-Azb updates: Potential terrorist bases cordoned off; surrender points established

हालात - ऐ - पाक

Operation Zarb-e-Azb updates: Potential terrorist bases cordoned off; surrender points established

RAWALPINDI: After a long period of speculation, which also included attempts at peace talks, Pakistan on Sunday launched a military operation against militants in the troubled North Waziristan agency of Federally Administered Tribal Areas (Fata).
As the Pakistan Army embarks on this critical mission, get all the updates of the operation, code-named Zarb-e-Azb, here – with links to all our detailed coverage.

June 15, 11:04pm
The defence minister has said that dialogue was not honoured by the Taliban and the government got frustrated by attacks on innocent Pakistanis and national assets.

June 15, 10:26pm
ISPR has also released a detailed statement on the North Waziristan operation. You can read the entire press release here.
“As of now North Wazirastan Agency  has been isolated by deploying troops along its border with neighboring agencies and FATA Regions to block any move of terrorists in and out of the Agency,” said the statement, adding that within the agency, troops have moved and cordoned off all terrorists bases, including in the town of Mirali and Miranshah.
“Announcements will be made for local population to approach designated areas for their orderly and dignified evacuation out of the Agency. Meanwhile, aerial surveillance of the area is being carried out by own aerial surveillance platforms,” the statement added.
Further, the statement added that Afghan security forces have also been requested to seal the border on their side to facilitate the operation. “They have also been requested to initiate immediate measures to eliminate TTP terrorists and their sanctuaries in Kunar, Nuristan and other areas of Afghanistan.”
June 15, 10:19pm
ISPR has given the first two official updates regarding the operation on the ground.
The DG ISPR has tweeted that all potential terrorists bases have been cordoned off and the civilian population will be allowed to leave. Further, an IDP camp has also been established.
June 15, 9:52pm
Prime Minister Nawaz Sharif is expected to take Parliament into confidence on Monday about the government’s decision to launch a military operation in North Waziristan.
June 15, 9:02pm
Information Minister Pervez Rashid has appealed to all political parties to stand by the army during the operation. He went on to add that the militants will either drop their weapons or face defeat, Express News reported.
June 15, 8:45pm
A military official in the main North Waziristan town of Miramshah told AFP that the coordinated operation — involving airforce, artillery, tanks and ground troops — has already started.
After the announcement of the full-scale operation in the North Waziristan area, a security official on ground said that thousands of troops have been moved for action.
“Thousands of troops will participate in this action. You can roughly say 25,000 to 30,000 troops will be involved in the operation,” the official said on the condition of anonymity because he is not allowed to speak to media.
June 15, 7:50pm
Talking to Express News, Defence Minister Khawaja Asif said the government went through with peace talks, but once they failed the government decided to launch military action. He went on to add that civilians residing in that area will face difficulties due to the operation, but the government is prepared to assist them.
“The army is ready and citizens should remain calm army is prepared to deal with difficult situations and will help civilians move,” he said, adding that air and ground forces are fully ready to act and will bring complete peace to the area.
“We will complete the operation as soon as possible,” he added.
Asif said that the decision of the operation against terrorists reflects the wishes of people of the country.
In a statement on Sunday, he said the government fully tried to resolve the issue through dialogue. He said the decision of the operation is taken thoughtfully, keeping in view all options.
The defence minister said the operation is need of the hour and would continue till complete elimination of the enemies.
He said the Pakistani nation is with the armed forces of the country. The minister expressed confidence that the operation will be a success of our armed forces.
June 15, 7:19pm
The meaning of Zarb-e-Azb is sharp and cutting. It’s reportedly the sword used by Prophet Muhammad (pbuh) in the battle of Badar.
June 15, 6:59pm
ISPR press release announces launch of military operation.
“DG ISPR has said that on the directions of the Government, Armed forces of Pakistan have launched a comprehensive operation against foreign and local terrorists who are hiding in sanctuaries in North Waziristan Agency. The operation has been named Zarb-e-Azb,” said the press release.
The ISPR statement went on to add that terrorists in N Waziristan had waged a war against the state of Pakistan and had been disrupting life in all its dimensions, stunting our economic growth and causing enormous loss of life and property. “They had also paralysed life within the agency and had perpetually terrorised the entire peace loving and patriotic local population,” the statement added.
“Our valiant armed forces have been tasked to eliminate these terrorists regardless of hue and colour, along with their sanctuaries. With the support of the entire nation, and in coordination with other state institutions and 
Law Enforcement
 Agencies, these enemies of the state will be denied space anywhere across the country. As always, armed forces of Pakistan will not hesitate in rendering any sacrifice for the motherland,” said the statement.

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Jet bombings kill over 80 terrorists in North Waziristan: ISPR and other site

Jet bombings kill over 80 terrorists in North Waziristan: ISPR and other site
PAF jets bombed targets in Dattakhel area of North Waziristan. PHOTO: PPI/FILE
ISLAMABAD: Over 80 people were killed as Pakistan Air Force (PAF) jets bombed hideouts of suspected militants in Dattakhel area of North Waziristan early on Sunday,Express News reported.
“Today at about 0130 hours (2030 GMT), a number of terrorist hideouts in Dehgan, Datta Khel in North Waziristan were targeted by jet aircraft. The number of terrorists killed in early morning strikes has risen to 80, mostly Uzbeks,” a military statement said.
However local 
security
 officials put the death toll far higher, saying that about 150 militants died in the air strikes.
The air force also carried out shelling late Sunday morning in the Mirali area of North Waziristan.
An Inter Services Public Relations (ISPR) press release confirmed that terrorists linked to planning the attack on Karachi airport were present in the hideouts that were bombed. The mastermind behind the attack - Abu Abdur Rehman Almani - was among the dead, Express News reported.
At least 37 people, including 10 terrorists, were killed in the all-night battle at JinnahInternational Airport that had started on June 8. The Islamic Movement of Uzbekistan (IMU) had claimed responsibility for the attack.
The ISPR stated that mostly Uzbek foreigners were killed in the strikes. An ammunition dump was also destroyed, according to the press release.
Terrorists of East Turkestan Islamic Movement (ETIM) were also allegedly killed in the bombings, Express News reported.
“Up to 150 people were killed during the strikes early Sunday. These strikes were carried out based on confirmed reports about the presence of Uzbek and other militants in the area,” an intelligence official said.
Another security official said that “the number of the killed people was even more than 150″.
The Pakistan military has not confirmed the higher figure.
Following the incident, the local political administration imposed a curfew in the area for an indefinite period.
Previous bombings
On Jun 10, aerial bombing in Tirah valley of Khyber Agency killed at least 25 militants.
On May 23, gunship helicopter and jet planes bombed hideouts of suspected militants in North Waziristan, killing four and injuring three others. 
Other site
BARA: At least 25 suspected militants were killed when Pakistani jet fighters pounded their hideouts in remote Tirah valley of Khyber Agency on Tuesday.
According to an ISPR statement, the attack on the hideouts was carried out in the early hours of the morning, explaining that the jets targeted the remote mountainous regions. Nine of the hideouts were destroyed, it added.
The bombing came two days after gunmen seized the country’s busiest airport and killed 19 people in an all-night battle. Ten Taliban militants disguised as Airport 
Security
 Force (ASF) members and armed with rocket-propelled grenades stormed the Karachi airport on Sunday night. All 10 were killed after a five-hour operation, bringing the total death toll to 29.

The air force has periodically conducted brief raids to bomb Taliban positions in the tribal areas. On May 23, gunship helicopters and jet planes had bombed hideouts of suspected militants in North Waziristan, killing four and injuring three others. The strikes had targeted hideouts in Miranshah, Machis Camp and Mir Ali Bazaar areas of the tribal agency. Two days earlier, jet planes had bombed hideouts of suspected militants in North Waziristan, killing at least 60 people including insurgent commanders. An intelligence official in North Waziristan had said the strikes were carried out in Miramshah, the main town of North Waziristan, Mir Ali, Datta Khel and Ghulam Ali areas.
On April 24, jet fighters had bombed suspected militant hideouts in Bara tehsil and Jamrud areas of Khyber Agency, killing at least 35 suspected militants and injuring 14 others.
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Friday, 13 June 2014

इराक- क्या ऑटोमन साम्राज्य की बुनियाद ही गलत थी

इराक- क्या ऑटोमन साम्राज्य की बुनियाद ही गलत थी
इराक़
आधुनिक मध्य एशिया की सीमा रेखा कमोबेश पहले विश्व युद्ध के दौरान की विरासत है. ऑटोमन साम्राज्य के पराजय और बिखराव के बाद उपनिवेशवादी शक्तियों ने ये सीमाएँ तय की थीं.
प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व जब कभी यूरोप ने इस्लामी अरब साम्राज्य के हिस्से को पराजित कर ऑटोमन साम्राज्य का निर्माण की बुनियाद ही गलत रही|
भूगोल,इतिहास,व समाज के खोने का संकट आज की समस्या है|
अब ये दो कारणों से संकट में है, पहला सीरिया में लगातार जारी हिंसा और विभाजन, दूसरा इराक़ में आईएसआईएस की तरफ़ से किए जा रहे हमले बशर्ते आईएसआईएस को मिली सैन्य बढ़त को पलट नहीं दिया जाता. इराक़ को पहले इतना ख़तरा कभी नहीं था.
इसका इस क्षेत्र की भौगोलिक राजनीति एवं उसके बाहर व्यापक प्रभाव पड़ेगा. इराक़ एक के बाद दूसरे संकट में फंसता जा रहा, लेकिन इसके लिए कौन से कारण ज़िम्मेदार हैं?सीरिया और इराक़ के संयुक्त संकट से एक नए 'राष्ट्र' के उदय की संभावना बन गई है, जो पू्र्वी सीरिया और पश्चिमी इराक़ से बना होगा. यह वह इलाक़ा है जहाँ आईएसआईएस से जुड़े जिहादी का प्रभाव है.

1. बुनियादी गड़बड़

इराक़ सेना के जवान
कुछ लोगों के लिए इराक़ की समस्याओं की शुरुआत आधुनिक इराक़ की स्थापना के साथ हो गई थी. उपनिवेशवादी शक्ति रहे ब्रिटेन ने यहाँ हाशमाइट साम्राज्य की स्थापना की थी. यह साम्राज्य शिया या कुर्द जैसे दूसरे समुदायों के प्रति ज़्यादा ध्यान नहीं देता था. इराक़ के उथलपुथल भरे इतिहास में यह समस्या बार-बार सिर उठाती रही है.
राजशाही का समापन एक सैन्य तख़्तापलट से हुआ. ये तख़्तापलट मिस्र में हुए नासिर के तख़्तापलट जैसा ही था. तख़्ता पलट करने वाले धर्मनिरपेक्ष, राष्ट्रवादी और आधुनिकता के पैरोकार थे.
इसी सिलसिले में अंततोगत्वा सद्दाम हुसैन सत्ता में आए जिनके सुन्नी प्रभुत्व वाले शासन में शियाओं और कुर्दों के साथ कड़ा बर्ताव किया गया.
सद्दाम के शासन काल में हुए ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान पश्चिमी शक्तियों से उन्हें मिले समर्थन ने उनके क्रूर शासन को मज़बूती दी.

2. ऑपरेशन इराक़ी फ्रीडम


एक इराक़ी कुर्द सुरक्षा बल
बाथ पार्टी की सरकार को 2003 में अमरीका और ब्रिटेन की सेना के हमले ने ख़त्म कर दिया. सद्दाम हुसैन को गद्दी से हटा दिया गया, और इराक़ी सरकार ने उनपर मुक़दमा चलाकर उन्हें फांसी दी. इराक़ की सैन्य शक्ति को लगभग विघटित कर दिया गया और उसकी जगह एक नए सुरक्षा बल का गठन किया गया.
इराक़ में हुए युद्ध को कुछ नवरूढ़िवादी अमरीकी इस क्षेत्र में लोकतंत्र बहाल करने के लिए उठाया गया क़दम मानते हैं. लेकिन इस युद्ध ने यहाँ के राजनीतिक समीकरण बदल दिए जिसके तहत सभी समुदायों को एक करने की बात की गई लेकिन असलियत में एक ऐसा राज्य बना जिसमें बहुसंख्यक शिया समुदाय का ज़्यादा प्रभाव हो गया.
कई लोगों को इस बात पर अब संदेह हो गया है कि इराक़ को अखंड राष्ट्र के रूप में बचाया जा सकता है क्योंकि देश के उत्तरी कुर्द बहुल इलाक़े ने काफ़ी हद तक स्वायत्तता हासिल कर ली थी.

3. अमरीकी सेना का जाना

इराक़ में हुआ एक विस्फोट
अमरीकी सेना ने दिसबंर 2011 में इराक़ छोड़ दिया. पहले अमरीका इराक़ी सेना की मदद के लिए कुछ सैन्य टुकड़ियाँ छोड़ने वाला था लेकिन दोनों देशों के बीच इसे लेकर सहमति नहीं बन सकी थी. उसके बाद से इराक़ की सुरक्षा पूरी तरह से इराक़ की सेना के हवाले रह गई जो कि बहुत ज़्यादा सक्षम नहीं है.
अमरीका अल-क़ायदा समर्थक जिहादी चरमपंथ का मुक़ाबला करने के लिए कई सुन्नी समूहों को अपने साथ लाने में सफल रहा था. अमरीकी सेना के जाने के बाद यह व्यवस्था शीघ्र ही समाप्त हो गई.
शिया प्रभुत्व वाली सरकार के शासन में सुन्नियों को सुरक्षा बलों की ज़्यादतियों का शिकार होना पड़ रहा था.
बहुत संभव है कि इराक़ी सेना के दबंग रवैए के कारण ही आईएसआईएस के लिए नए लड़ाकों को शामिल करना आसान बना दिया हो.

4. नए इराक़ में संप्रदायवाद

इराक़ में महिलाएँ
अमरीका के ज़रिए सद्दाम हुसैन को सत्ता से बाहर करने का सबसे बड़ा विद्रूप इस इलाक़े में ईरान के प्रभुत्व में बढ़ोतरी के रूप में सामने आया. ईरान इराक़ के शियाओं को एक व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष में अपने सहयोगी के तौर पर देखने लगा.
संभव है कि ईरान से मिले समर्थन के कारण उपजे इराक़ी प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी के शिया वर्चस्ववादी रवैये ने बहुत से सुन्नियों को नाराज़ किया हो जिससे देश में सुरक्षा व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी.

5. आर्थिक और सामाजिक विफलता

इराक़ी शरणार्थी
अलगाववाद और शिया-सुन्नी विभेद को बहुत से राजनीतिक टिप्पणीकार मुर्ग़ी और अंडे वाली स्थिति मानते हैं.
क्या अलगाववाद के कारण उपजे मतभेद देश की असल समस्या हैं? या इराक़ की आर्थिक और सामाजिक विफलता ने समाजिक विभेद को बढ़ावा दिया है?
तेल के समृद्ध भंडार होने के बावजूद इराक़ी जनता ग़रीबी की मार झेलती रही है. देश में भ्रष्टाचार का स्तर भी काफ़ी ऊपर रहा है.

6. क्षेत्रीय संदर्भ

इराक़ी चुनाव
मध्य एशिया में कुछ भी यूँ ही नहीं होता. इराक़ की जनता अपनी समस्याओं के बीच फंसी रही लेकिन उसने देखा की अरब में आई क्रांति आई भी चली गई, मिस्र की राजनीतिक स्थिती कमोबेश गोल-गोल घूमती रही, और सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसी सीरिया में उथलपुथल मची हुई है. इराक़ में जिहादी उभार का असर उसके पड़ोसी देशों पर भी पड़ना तय है.
खाड़ी देशों के कट्टर सुन्नी लड़ाकों से मिले समर्थन ने आईएसआईएस जैसे संगठन के उभरने और संगठित होने में मदद की और इसे एक व्यापक क्षेत्रीय उद्देश्य उपलब्ध कराया है.

सीरिया की असल सरकार और जिहादियों के बीच सीधी टक्कर को प्रमाणित करना मुश्किल है. ऐसी ख़बरें आती रही हैं कि सीरिया की सेना को ऐसे संगठनों पर कम और अधिक उदार पश्चिमी समर्थक लड़ाकों पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा गया है. इसकी वजह से आईएसआईएस को इस इलाक़ें में अपनी प्रशासकीय व्यवस्था स्थापित करने में मदद मिली है.
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इराक में एक बार फिर नए सिरे से गृहयुद्ध की दस्तक

इराक में एक बार फिर नए सिरे से गृहयुद्ध की दस्तक 
इराक़ में चरमपंथियों का कब्ज़ा
बगदाद पर कब्ज़ा करने की धमकी के बाद इस्लामी चरमपंथी 
देश के उत्तरी भाग में मोसूल और तिकरित पर कब्ज़ा करने के बाद सुन्नी इस्लामी चरमपंथी राजधानी बगदाद और ईरान सीमा के पास स्थित दियाला प्रांत में घुस गए हैं.
सुरक्षा बल इससे पहले इन शहरों को छोड़कर जा चुके थे.चरमपंथियों ने इस प्रांत में सादिया और जलावला और आसपास के क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया है.
अमरीका का कहना है कि क्लिक करेंइराक़ को विद्रोहियों से लड़ने में मदद करने के लिए सैन्य कार्रवाई सहित 'सभी विकल्पों' पर विचार किया जा रहा है.
अमरीका का यह बयान मोसूल और तिकरित शहरों में चरमपंथियों के क़ब्ज़े के बाद आया था, लेकिन इस दिशा में प्रगति धीमी हो गई है.
इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक़ और लेवेंट (आईएसआईएस) के नेतृत्व में विद्रोहियों ने सुदूर दक्षिण में राजधानी बग़दाद और इराक़ के शिया मुस्लिम बहुल वाले इलाकों में घुसने की धमकी दी है. शिया मुस्लिमों को वे 'काफ़िर' मानते हैं.

समर्थन

पड़ोसी शिया बहुल मुल्क ईरान ने इराक़ को समर्थन देने का वादा किया है.
राष्ट्रपति हसन रुहानी ने प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी से वादा किया, "ईरान चरमपंथियों को इराक़ की सुरक्षा और स्थिरता को बाधित करने की अनुमति नहीं देगा."
इराक़ के शहर में चरमपंथियों का कब्ज़ा
वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अज्ञात सू्त्रों के हवाले से बताया कि ईरान ने पहले से ही इराक़ी सरकार की मदद करने के लिए अपने रिवोल्यूशनरी गार्ड के अल कुद्स लड़ाकों की दो बटालियनों को तैनात कर रखा है.
अमरीकी राष्ट्रपति क्लिक करेंबराक ओबामा ने कहा कि "मैंने किसी भी बात से इनकार नहीं किया हैं, लेकिन ये तय है कि हम इन जिहादियों के पैर स्थायी तौर पर इराक़ या सीरिया में नहीं टिकने देंगे.''
व्हाइट हाउस के प्रवक्ता जे कार्नी ने कहा, ''राष्ट्रपति का आशय हवाई हमलों की संभावना से इनकार नहीं है. हालांकि हम मैदानी फ़ौजों के बारे में विचार नहीं कर रहे.''
कुर्दों का लंबे समय से किरकुक को लेकर बग़दाद से विवाद रहा है. वो उसके अपने स्वायत्तशासी क्षेत्र में होने का दावा करते रहे हैं.
इराक़ के उत्तर में कुर्द फ़ौजें पहले ही तेल के शहर किरकुक पर नियंत्रण कर चुकी हैं. उनका दावा है कि सरकारी फ़ौजें वहां से भाग गई हैं.


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राजनीतिक राहत की लालच व भटका हुआ लोभी मुस्लिम समाज

राजनीतिक राहत की लालच व भटका हुआ लोभी मुस्लिम समाज
छोटी -मुज़फ़्फ़रनगर के शाहपुर इलाक़े में दंगों के बाद बनी इस बस्ती में इतनी बेबाकी से बात करने वाली -
19 साल की छोटी उन सैंकड़ों लड़कियों में से है जिनकी शादी मुज़फ़्फ़रनगर और शामली में पिछले साल सितंबर में हुए दंगों के बाद आनन-फ़ानन में कर दी गई. छोटी की मर्ज़ी किसी ने पूछी ही नहीं.

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वो कहती हैं कि पूछते भी तो वो मना नहीं करती. छोटी ने कहा, “हमें तो मां-बाप की ख़ुशी के लिए सब बात माननी पड़ती है, अगर हम ना मानें और अपने मन की करें, तो बिरादरी के लोग कहते कि इस घर में तो लड़की की चलती है तो ये लड़की ज़रूर ख़राब होगी.”
पर शादी के लिए हामी भरना छोटी और उसके मां-बाप, किसी को ख़ुशी नहीं दे पाया. ससुराल में दस दिन ही रहने के बाद छोटी को वापस घर लौटा दिया गया और अब वो तलाक़ चाहती हैं.
दरअसल मुज़फ़्फ़रनगर के दंगा पीड़ितों के लिए बने कुछ शिविरों में जब लड़कियों की शादियां हुईं तो उत्तर प्रदेश सरकार ने उनकी मदद के लिए उस व़क्त एक लाख रुपए दिए.
ये बात जब फैली तो कई परिवारों में बच्चियों की शादी करने की होड़ लग गई. पर सरकार ऐसा किसी नीति के तहत नहीं कर रही थी, लिहाज़ा पैसे कुछ ही परिवारों को मिले.
अब छोटी का आरोप है कि उसके ससुराल वालों ने इसी पैसे की आस में शादी की और जब पैसे नहीं मिले तो लौटा दिया. उन्होंने कहा, “एक दिन तो मेरी मां ने कहा कि हम कुछ सामान दे देते हैं, तो मेरे ससुर बोले कि पैसे ही चाहिए उन्हें, सामान से नहीं होगा.”

पैसे का लालच?

दहेज लेना और देना भारत में क़ानूनन अपराध है, और अपने घर से बेघर हुए इन दंगा पीड़ित परिवारों के लिए दहेज जुटाना बेहद मुश्किल भी, तो छोटी के परिवार ने पुलिस में शिकायत क्यों नहीं की?
मैंने पूछा तो छोटी ने कहा कि उसके परिवार का मानना है कि पुलिस में जाने से बदनामी होगी, इससे बेहतर तो है कि तलाक़ ले लिया जाए.
छोटी कहती है कि जल्दबाज़ी की शादी में उसके साथ धोखा किया गया, “मेरे पति को ख़ून में पीलिया है, पर शादी के व़क्त ये नहीं बताया गया, और जब मैं ब्याह के वहां गई तो मुझसे नौकरों की तरह काम कराया गया. मुझसे बुरा बर्ताव किया गया, मेरी तबीयत इतनी ख़राब हो गई की शरीर में ख़ून की कमी पाई गई है.”
तो अब छोटी वापस अपने मां-बाप के साथ शाहपुर की इस बस्ती में रहने लगी हैं, जहां उसके मुताबिक़ उसकी जैसी लड़कियों की आपबीती अकसर सुनने को मिल जाती है.
वो मुझे उसी के गांव कांकड़ा से भागकर आए एक और परिवार की बेटी सोनिया से मिलाती है. सोनिया की शादी भी राहत शिविर में हुई.
सोनिया भी शादी के बाद ससुराल में क़रीब एक महीना बिताकर वापस भेज दी गईं. हालांकि उन्हें एक लाख रुपए की सरकारी मदद भी मिली थी.

इंतज़ार

पर सोनिया, छोटी से बिल्कुल अलग है. वो तो अपना मुंह भी नहीं खोलती. उसकी आवाज़ उसके भाई और उसकी मां हैं. ऐसे में ये जानना नामुमकिन था कि ये शादी उसकी मर्ज़ी से हुई भी थी या नहीं.
पर ये ज़रूर जान लिया कि ससुराल ने उसे वापस क्यों लौटाया. सोनिया को मिले पैसे उसके परिवार ने ससुराल वालों को नहीं दिए हैं और वो उन पैसों के बिना लड़की को रखने को राज़ी नहीं हैं.
सोनिया के भाई कहते हैं, “जबसे मैं सोनिया को वापस लेकर आया हूं कोई फ़ोन कर उसका हाल तक नहीं पूछता, बस शादी करवाने वाले बिचौलिए ने ही पैसों की बात हमसे की है.”
इस सबके बावजूद सोनिया की मां अपनी बेटी को उसी घर वापस भेजना चाहती हैं. मैंने सोनिया से पूछा वो क्या चाहती है? तो बोलीं, “चली जाऊंगी.”
दंगों के बाद से मुज़फ़्फ़रनगर और शामली ज़िलों में काम कर रहीं समाजसेवी अज़रा बताती हैं कि वो ऐसी कई लड़कियों से मिली हैं और उनके मुताबिक़ तो इनमें से कई लड़कियां नाबालिग़ हैं.
अज़रा कहती हैं, “ये बच्चियां पढ़ी-लिखी नहीं हैं और परिवार में अपनी बात नहीं रख पातीं. हमने शादियों के व़क्त भी कई परिवारों को समझाया की जल्दबाज़ी ना करें, बच्चियां भी छोटी हैं, पर हमें बार-बार सुरक्षा और इज़्ज़त का हवाला दिया जाता रहा.”

चुप्पी

कई परिवार अपनी बच्चियों के ससुराल से वापस लौटने पर बात करने से झिझकते हैं.
परिवारों से उनके फ़ैसले के बारे में बात करना आज भी बहुत मुश्किल है. जिनसे भी बात की उनका यही मानना था कि उस व़क्त शादी करने में ही समझदारी थी.
पर बार-बार ऐसा अहसास हो रहा था कि यहां समाज ने ज़िम्मेदारी निभाने की जगह निबटाने का रवैया अपनाया है.
सरकारी मदद, यौन हिंसा के डर और ससुराल वालों-परिवार वालों के कथित लालच के चक्रव्यूह में ना जाने कितनी जवान लड़कियों की ज़िन्दगी बदल गई है.
18-19 साल की ये लड़कियां क्या करना चाहती थीं और अब क्या सोचती हैं, ना तो ये बताने का हौसला इन लड़कियों में दिखता है और ना ही ये जानने की दिलचस्पी किसी परिवार में.

अफ़सोस ये कि दंगों में जान-माल के नफ़े-नुक़सान का लेखा-जोखा करने वालों को, शायद इन लड़कियों की ज़िन्दगी के दलदल की ख़बर भी ना हो.
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