Translate

Sunday, 13 May 2012

बुद्ध शीतयुद्ध के चपेट में-Buddha in the grip of Cold War



बुद्ध शीतयुद्ध के चपेट में
 हङ्कङ में मई के प्रथम सप्ताह में आयोजित किया गया तीसरा विश्व बौद्ध सम्मलेन में चीन के कम्युनिस्ट पार्टी के स्थायी समिति के सदस्य जिया  चिङलिनदिखाई पड़े।यह चीन के एक नया सांस्कृतिक रूपांतरण की शुरुवात या एक सोची समझी चाल,रणनीति है।
नौ सदस्यीय स्थायी समिति के शक्तिशाली नेता जिया बुद्ध की तीन मूर्तियों और खप्पर के अवशेष के सामने झुककर तीसरे विश्व बौद्ध सम्मलेन का उदघाटन किया, तथा अपना मंतव्य प्रगट किये।"वृहत सामाजिक सदभाव और विश्व शांति के लिए बौद्ध शिक्षा का मूल तात्पर्य खोजना आवश्यक है"के आग्रह हुए उनके बधायी सन्देश में चीन की विस्तारवादी सोच एवं अपने कमजोरियों को छिपाने की बौद्ध रणनीतिक आकांक्षा स्पष्ट झलक रही थी।
दलाई लामा के अभियान को अवरुद्ध करने, तिब्बत की स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता को नकारने, तिब्बत एवं चीन के बौद्ध समुदाय का विश्वास एक छल पूर्वक जीतने तथा विश्व का बौद्ध केंद्र भारत की मान्यता को चुनौती देने के लिए हिमालय क्षेत्र में saft power विस्तार की चीन की एक गहरी योजना साजिश है।इसके साथ ही साथ इसके द्वारा क्रिश्चियन धर्म के मार्फ़त चीन में बढ़ते पश्चिमी प्रभाव को रोकने की रणनीति के तहत माओ का चीन आज बौद्धमत की दुहाई भरे मन से कुटिलतापूर्वक दे रहा है।दलाई लामा के बाद दुसरे धार्मिक नेता चीन द्वारा प्रायोजित कथित पंचेन लामा को इस बौध सम्मलेन के मार्फ़त पहली बार चीन ने सार्वजनिक कराया।एक रणनीति के तहत अब चीन इस कथित पंचेन लामा  की विश्व यात्रा मकाउ,ताइवान,सिंगापुर होते हुए आगे बढ़ाएगा।ताकि उनको विश्व बौद्ध समुदाय में पंचेन लामा की मान्यता दिला सके।
आज तिब्बत के अन्दर अपनी स्वतंत्रता व सार्वभौमिकता को लेकर एक व्यापक संघर्ष चाल रहा है। आये दिन इस विषय से उद्वेलित होकर बौद्ध भिक्षु आत्मदाह कर रहें है।अबी तक तिस से अधिक भिक्षुक आत्मदाह कर चुकें है। इस आन्दोलन को चीन अपने सैन्यबल व तोपों के द्वारा कुचलने का प्रयास कर रहा है।ऐसा वीभत्स दमन भी तिब्बती बौधों को डिगा नहीं पा रही है। चीन के बौद्धमत अनुवायी भी दमन से पीड़ित बौद्धों के प्रति सहानुभूति रख रहें हैं।साथ ही कंफुसस मत वालों की सहानुभूति भी तिब्बती बौद्धों के प्रति बन रहा है। दूसरी तरफ तिब्बत से सटे सुचीयान प्रान्त के उइगर भी अपनी आजादी को लेकर आन्दोलन छेड़ रखा है।इन सारी परिस्थितियों से चीन आज घबडा गया है।अतः छः दशक से कम्युनिष्ट शासन व्यवस्था अपनाने वाला चीन के चौथे शीर्षस्थ नेता के द्वारा "बौद्धदर्शन सामाजिक सदभाव व विश्व शांति का माध्यम बनेगा" का उदगारचीन की कम्युनिष्ट पार्टी का धर्म सम्बन्धी विचार में आनेवाला परिवर्तन का संकेत न होकर एक बहुत बड़ी बाध्यता के रूप में दिखाई पद रहा है।बेजिंग का दर्म के प्रति इस तरह से उदार होना एक असहज , आतंरिक दबाव एवं भूरणनीतिक  बाध्यता है।इसलिए धर्म सम्बन्धी अपनी पुरानी मान्यता को ध्वस्त कर राजनीतिक सुधर के रास्ते पर अग्रसित हो रहा है।
         बौद्धगया में बोध्धित्व को प्राप्त कर सारनाथ में प्रगट होनेवाला यह बौद्धमार्ग विश्व के आबादी में दूसरी बड़ी संख्या द्वारा अपनाये जानेवाला विश्व का दूसरा बड़ा दर्शन है।जिसकी एक बहुत बड़ी संख्या चीन में व्ही है।चीन की एक अरब तीस करोड़ की जनसँख्या में ४०%जनसँख्या बौद्धामार्गी है।चीनी कम्युनिष्ट पार्टी के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र "ग्लोबल टाइम्स"के एक सर्वेक्षण के अनुसार ८५% प्रौढ़ चीनी नागरिक किसी न किसी प्रकार के धार्मिक गतिविधि में संलगन है।परन्तु चीन सरकार की अनुदार धार्मिक निति के कारण उनमे से अधिकांश इसका प्रगटीकरण , खुलासा नहीं करते है।अधिकांश नागरिकों द्वारा अपनी आस्था छुपाने के बाद भी सरकारी आकंडा अनुसार चीन में १० करोड़ बौद्ध अनुवायी है।परन्तु गैर सरकारी तथ्यांक के अनुसार चीन में ४० करोड़ बैद्धामार्गी हैं।चीन के हरुन एंड इंडस्ट्रियल बैंक ने अप्रैल २०१२ में एक अध्ययन प्रतिवेदन में यह सार्वजनिक किया कि धनि एवं निजी चीनी व्यापारियों कि प्रवृति अब कुछ ज्यादे ही आध्यात्मिक बन रही है।पूर्वी चीन का व्यापारिक केंद्र झिजियंग व फुजियान प्रान्त बौद्ध ,क्रिश्चियन धर्म का गढ़ माना जाता है।कतिपय व्यापारी विगत में अपने भ्रष्टाचार के पाप से मुक्त होने के लिए वे बौद्ध पूजा या चर्च में सम्मलित हो रहे है।इस अध्ययन के अनुसार यहाँ का नागरिक जीवन व व्यवसाय में धर्म अभिन्न रूप से जुड़ चूका है।इसा क्षेत्र में ३० वर्ष के उम्र के लोंगों के बिच ११% युवा क्रिश्चियन धर्म के प्रति आकर्षित हुए है।चीनी राष्ट्रपति हु जिन्ताओ ने एक माह पूर्व पार्टी के मुखपत्र में प्रकाशित अपने लेख में यह व्यक्त किया कि "इस प्रकार युवा वर्ग में बढ़ते हुए पश्चिमी प्रभाव चीन के लिए एक चुनौती का सन्देश दे रहा है। इसके लिए एक आह्वान करते हुए  सांस्कृतिक सुधर में कार्यकर्ताओं को केन्द्रित होने का निर्देश दिया ।"
तेजी से निर्माण होते हुए अनेकों बौद्ध स्तूप, बौद्ध - विश्वविदयालय, एवं एक बड़ी संख्या में चीन के अन्दर बन रही बौद्ध मूर्तियों के कारण एक नया बौद्ध जागरण चीन में दिखायी दे रहा है।जो चीनी सरकार के लिए अत्यधिक चिंता का विषय है।बुद्ध की १२८ मीटर ऊँची मूर्ति एवं लगभग ५०० से अधिक गुम्बा के साथ हेनान चीन और पूर्वी एशिया का बौद्ध केंद्र के रूप में विक्सित हो चूका है।
चीन अपने बौद्ध रणनीति के तहत २००६ के अप्रैल में प्रथम बौद्ध विश्व सम्मेलन झेजियांग में आयोजित किया।जो २००० वर्ष पुराने चीन के बौद्ध इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना रही।गैर कम्युनिष्ट विश्व के लिए यह आश्चर्य का विषय रहा। २००९ के मार्च में पूर्वी चीन के जिन्ग्सू में दूसरा और अभी २०१२ के मई में तीसरा विश्व बौद्ध सम्मेलन कर चीन ने सांस्कृतिक आक्रमण के रूप में एक नई रणनीति तैयार किया है।हङ्कङ,सम्मलेन में यह निर्णय लिया गया कि अब पूर्वी चीन के जान्ग्सू प्रान्त स्थित लिंग्सान में स्थायी रूप से विश्व बौद्ध सम्मलेन आयोजित होगा।
हङ्कङ,सम्मलेन में चीन के बौद्ध रणनीति का प्रतीक चीन द्वारा प्रायोजित कथित २२ वर्षीय पंचेनलामा थे।१९८९ में १० वें पंचेनलामा के मृत्यु के पश्चात् दलाई लामा द्वारा घोषित ११ वें पंचेनलामा को अस्वीकार करते हुए , आज से १७ वर्ष पूर्व ६ वर्षीय ग्याल्तसेन नोर्बू को ११ वाँ पंचेनलामा बीजिंग द्वारा घोषित किया गया।यह सर्वविदित है कि दलाई लामा के बाद पंचेन लामा को ही दूसरा शीर्षस्थ तिब्बती धार्मिक बौद्ध नेता मन जाता है।बीजिंग का यह खेल ७६ वर्षीय १४ वें दलाई लामा के मृत्यु के पश्चात् नया दलाई लामा की घोषणा करने का एक अभ्यास के रूप में देखा जा सकता है।बौद्धमत ही नहीं , बल्कि किसी भी धर्म के प्रति अनुदार मत रखने वाला चीन की कम्युनिष्ट सरकार द्वारा इस प्रकार पुनर्जन्म के प्रति अत्यधिक रूचि दिखाते हुए अग्रसर होना,दलाई लामा के अनुवायियो के लिए एक बहुत बड़ा आश्चर्य है।जो तिब्बत के स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता को पूर्ण रूपेण बीजिंग द्वारा डकारने की एक साजिश के रूप में ही सामने दिखायी पद रहा है।यों दलाई लामा के अनुवायी तथा सम्पूर्ण बौद्ध जगत चीन द्वारा प्रायोजित पंचेनलामा को मान्यता नहीं देते है।चीन की यह बौद्ध रणनीति , खासकर तिब्बत सम्बंधित नए दलाई लामा के पुनर्जन्म की पहचान व घोषणा की साजिश को सम्पूर्ण बौद्ध जगत में एक शंका के रूप में देखा जा रहा है।
चीन की इस रणनीति का एक दूसरा पहलू यह भी है कि एशिया ही नहीं पुरे विश्व के बौद्ध जगत में बोद्धागया जो बौद्ध केंद्र के साफ्ट पावर के रूप में देखा और पहचाना जाता है,जिसके विकास के क्रम में ११ वीं शती के नालंदा बौद्ध विश्वविद्यालय की पुनः स्थापना भारत सरकार ने किया है।दलाई लामा,तिब्बत व विश्व के बौद्धमत अनुवायियो के लिए बोद्धगया एवं नालंदा विश्व के बौद्धमत का एक साफ्ट पावर केंद्र है।चीन इसे क्षेत्रीय प्रति स्पर्धा एवं क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के रूप में हेनान को एशिया का बौद्धमत का साफ्ट पावर केंद्र बनाना चाहता है।जिससे तिब्बत के संघर्ष को दबाया जा सके,जो तिब्बत की स्वतंत्रता एवं सुरक्षा पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है।
चीन की इस चुनौती को स्वीकार कर तिब्बत की सार्वभौमिकता को पुनः वापस दिलाने की जबाब देही अब भारत की ही है। जो एक गुरु योजना बनाकर, पडोसी मित्र देश नेपाल के साथ बातचीत कर बौद्धगया,नालंदा,वैशाली,लुम्बनी,कुशीनगर और सारनाथ को एक बृहद बौद्ध सर्किट में जोड़े।इस प्रकार तिब्बत की खोयी हुई स्वतंत्रता को वापस लेन में एक सार्थक पहल होगा।इस प्रकार बौद्धमत के बिच प्रभाव बना, भारत फिर से दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया (आर्यावर्त)में अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संजो सकता है,उसे पुनः एक नयी गरिमा दे सकता है।जो विश्व में सामरिक संतुलन एवं शांति स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा में एक महत्व की भूमिका निभाएगा।जब कि चीन एशिया में अपने प्रभाव और शक्ति विस्तार के बढ़ाने की एक सोची समझी रणनीति के तहत इसमे पहले से ही कूद पड़ा है।जिसका एक पहलू "एशिया पैसफिक एंड कोआपरेसन फाउन्डेशन" (एपेक)के माध्यम से लुम्बनी विकास एवं लुम्बनी विशेष आर्थिक क्षेत्र के सहयोग के नाम पर तीन अरब अमेरिकी डालर का सहयोग की योजना आज से दो वर्ष पहले ही घोषणा कर चूका है।जो चायनीज स्टडी सर्किल के माध्यम से मंदारिन (चीनी ) भाषा की शिक्षा नेपाल के पुरे तराई इलाके में देकर कार्यान्वित करना चाहता है। चीन के द्वारा मंदारिन (चीनी)भाषा की शिक्षा नेपाल के तराई के विकास का माध्यम तो नहीं बन सकता है, बल्कि हाँ वह जरुर ही नेपाल के तराई में एक व्यापक नेटवर्क निर्माण कर भारत की जासूसी की जा सकती है ।जिससे भारत में अस्थिरता फैला कर भारत की शांति में आग अवश्य ही लगायी जा सकती है।भारत में क्षेत्रीय अनैतिक आकांक्षाओं को हवा देकर भारत को तोड़ने का एक तीखी चाल ही दिखाई देगा। इस प्रकार वह लुम्बनी के नाम पर सहयोग कर ,निवेश कर नेपाल की तराई जो भारत की सीमा से जुटता है,में एक साफ्ट पावरखड़ा करना चाहता है।जो भारत की सुरक्षा,शांति एवं विकास पर आसन्न मदराते हुए खतरा का बादल है,जिसमे नेपाल के माओवादी नेता पुष्प कमल दहाल "प्रचंड" और नेपाल की उनकी पार्टी "यूनाइटेड कम्युनिष्ट पार्टी (माओवादी),नेपाल सहयोग कर रही है।

0 comments:

Post a Comment