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Wednesday, 16 October 2013

क्या इस्लाम अमन,मिल्लत, भाईचारे का दीन मज़हब) कहा जा सकता है?


क्या इस्लाम अमन,मिल्लत, भाईचारे का दीन मज़हब) कहा जा सकता है?

दुनिया के मुसलमानों की दुसरे नंबर की यूनिवर्सिटी दारुल-उलूम-देवबंद से एक फतवा आया|आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फर के बंशज़ नबाब शाह मो. शुएब खान के इस सवाल कि - क्या कहते है उलामादीन मुफ्त्यान निम्न मसले में (१) मालूम हो कि गाय की कुर्बानी जाईज हुक्मे शरीअत में से है| किन्तु हिंदुस्तान में इस जानवर की श्रद्धा की नज़र से देखा जाता हैऔर हिन्दू भाइयों के ह्रदय को ऐसा करने से दुःख होता है और वह इस पर शिकायत करते है , तो क्या इस हालत में शरियत कोई अन्य हुक्म सुझाती है| दारुल-उलूम देवबंद की तिन सदस्यीय समिति के सदस्य मुफ़्ती हबीबुर्रहमान, मुफ़्ती ज़फरउल्लाह और एक अन्य मुफ़्ती ने इस पर फतवा देते हुए कहा -" निःसंदेह गाय की क़ुरबानी मुबाह (करने अथवा न करने योग्य) है| किन्तु एक बहुसंख्यक समुदाय की दिले - आजारी (दिल दुखाना) व उनके धर्म एहतराम करना मकरूह  (बुरा) है|हुजुरपाक हज़रत मुहम्मद साहब) ने फरमाया है कि` अगर किसी मुसलमान  ने किसी मज़हब  के इन्सान को नाहक तकलीफ पहुंचाई तो मैं उस गैरमुस्लिम की तरफ से क़यामत के दिन उस खुदा के सामने उस मुसलमान के विरुद्ध खड़ा हूँगा ,इंसाफ दिलाऊंगा| किसी का दिल दुखाना यों भी शरियत में गुनाह है और गाय की कुरबानी करना वाजिब नहीं है,जरुरी नहीं है|"
एक हदीश है जो अबू हुरैरा से रिवायत है|इसमें आता है कि एक आदमी रसूल के पास आकर कहता है कि हुजुर फलां औरत नफ्ल नमाज़ पढ़ने,नाफली रोज़ा रखने और सदका करने के लिए बहुत मशहूर है,परन्तु वो अपने पड़ोसियों को बहुत सताती है, उसके बारे में क्या हुक्म है| रसूल ने फरमाया - उसे बता दो कि वो जहन्नमी है| उस आदमी ने कहा एक और औरत है जो नमाज़ बहुत कम पढ़ती है, रोज़े भी कम रखती है और सदाका - खैरात भी ज्यादा नहीं कराती, परन्तु वो अपने जुबान से भी पड़ोसियों को नहीं सताती,उसके बारे में क्या हुक्म है| रसूल ने फरमाया - उसे जन्नती होने की बशारत(खुशखबरी) दे दो|
हज़रत आएशा से रिवायत एक हदीश है जिसमें वो कहती है कि मैंने अल्लाह के रसूल से पूछा , या रासुल्लाह मेरे दो पडोसी है , उनमें से किसके यहाँ मैं कोई चीज तोहफे में भेजूं? रसूल ने कहा - उस पडोसी के यहाँ जिसका दरवाजा तेरे घर के सबसे करीब है|
इसी से  मुतल्लिक  एक और हदीश है, एक बार नबी ने फरमाया , खुदा की कसम वह मोमिन ही नहीं है, खुदा की कसम वह मोमिन ही नहीं है, खुदा की कसम वह मोमिन ही नहीं है| सहाबियों ने पूछा, या रासुल्लाह! कौन मोमिन नहीं है?रसूल ने फरमाया - वो जिसका पडोसी उसके शरारत से महफूज़ न हो|
इसलिए अपने रसूल के सुन्नत को मानाने वाले और पाक कुरान की आज्ञानुसार ज़िन्दगी गुजारने  वाले हर मुसलमान का कर्तव्य है कि इस बुराई को रोके| क्यों कि पवित्र कुरान भी उनसे यही अपेक्षा करता है _ "तुम सबसे बेहतरीन लोग हो जो लोगों में हिंदायत के वास्ते पैदा किये गए हो|तुम उन्हें भले कामों का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो|..(पाक कुरान, सुरह आले - इमरान , आयत - ११०)
यदि आज बकरा - ईद पर आज मुसलमान गौ कशी कर अपने पडोसी हिन्दू के दिल को दुःख पहुचता है और चिढाता है तो यही मन जायेगा कि वह अपने इमां व दीं पर कायम नहीं है था अपने नबी व पाक कुरान की नाफ़रमानी कर रहा है|तब तो यह प्रश्न चिन्ह उठेगा ही कि - "क्या इस्लाम अमन,मिल्लत, भाईचारे का दीन मज़हब) कहा जा सकता है?"

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