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Sunday, 9 August 2015

हिंदुस्तान का संघर्ष --अर्नेस्ट जोन्स



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लेख
हिंदुस्तान का संघर्ष
अर्नेस्ट जोन्स

5 सितंबर , 1857 के 'पीपुल्स' पेपर में प्रकाशित। भारतीय विद्रोह मई , 1857 में शुरू हुआ। 1857 की दूसरी छमाही में अर्नेस्ट जोन्स ने भारत में ब्रिटिश शासन का विश्लेषण करते हुए अनेक लेख लिखे जिनमें उन्होंने अंग्रेजी अखबारों में प्रकाशित हो रही प्रतिहिंसा और प्रतिरोध की उन्मादी माँगों का बेहिचक विरोध किया। भारत में ' सिपाहीवाद ' ( अर्थात विद्रोह के दौरान भारतीय सिपाहियों द्वारा किए गए अनाचार जिनसे जोन्स को इन्कार नहीं था) के विरुद्ध उन्होंने आयरलैंड और भारत में ' ब्रिटिश सिपाहीवाद का चिट्ठा प्रस्तुत किया।
पूरे यूरोप में हिंदुस्तान के विद्रोह के बारे में केवल एक ही राय होनी चाहिए। अब तक दुनिया में जितने भी न्यायपूर्ण, नेक और अनिवार्य विद्रोह हुए हैं, यह विद्रोह भी उन्हीं में से एक है। हमने हाल ही में इंग्लैंड के हिंदुस्तानी शासन के चरित्र का विश्लेषण और पर्दाफाश किया है। इस हफ्ते एक दूसरे स्तंभ में हम एक घटना का वर्णन कर रहे हैं जो अवध में ब्रिटिश आधिपत्य के घृणित और गर्हित आचरण को दर्शाता है। अपना पक्ष चुनने में किसी को हिचक हो सकती है, यह हमारी समझ के बाहर है। इंग्लैंड - जनता, अंग्रेज जनता - की सहानुभूति स्वाधीनता से रही है। जब रूस के खिलाफ पोलैंड संघर्ष कर रहा था तब वह किसके पक्ष में थी? पोलैंड के पक्ष में। जब हंगरी अपने अधिकारों के लिए आस्ट्रिया से लड़ रहा था तब वह किसके साथ थी? हंगरी के साथ। अभी वह किसके पक्ष में है जब इटली अपनी जिंदगी के लिए जर्मन, फ्रांसीसी और पोपवादी अत्याचारियों के विरुद्ध संघर्ष कर रहा है? इटली के पक्ष में। क्या पोलैंड सही था? तब हिंदुस्तान भी सही है। क्या हंगरी न्याय के रास्ते पर था? तब हिंदुस्तान भी है। पोलैंड, हंगरी और इटली जो पाना चाहते थे हिंदुस्तान भी उसी के लिए संघर्ष कर रहा है। नहीं! ज्यादा के लिए। पोलैंड, हंगरी और इतालवी अभी भी अपनी धरती के मालिक हैं। पर हिंदुस्तानी नहीं। उनके शासक भी अपने ही लोग हैं, एक ही धर्म के। पर हिंदुस्तानी के साथ ऐसा नहीं है। उधर अब भी कुछ कानून है, उन नौकरों का कानून जो अपने मालिक के प्रति जवाबदेह हैं। पर हिंदुस्तानी को वह भी मयस्सर नहीं। नेपल्स और फ्रांस, लोंबार्डी और पोलैंड, हंगरी और रोम के जुल्म भी उतने कुत्सित नहीं जितने कि हिंदुस्तान के लेडनहॉल स्ट्रीट और व्हाइटहॉल के जुल्म। ताज्जुब यह नहीं कि सत्रह करोड़ लोग अब उठ खड़े हुए हैं - ताज्जुब यह है कि वह कभी गुलाम कैसे हो गए? वे कभी गुलाम नहीं होते अगर उनके अपने ही राजाओं ने गद्दारी न की होती जिन्होंने एक दूसरे को विलायती के हाथ बेच दिया। नीच, चापलूस घुसपैठियों के हाथ, ताकि उसकी मदद से एक-दूसरे का गला काट सकें। हर जमाने में राजे, रजवाड़े और जमींदार अपनी मातृभूमि के शत्रु और शाप साबित हुए हैं।
हम हिंदुस्तानी भाइयों के लिए अंग्रेज जनता के समर्थन और सहानुभूति की घोषणा करते हैं। उनकी लड़ाई तुम्हारी लड़ाई है - उनकी सफलता तुम्हारी भी सफलता है। जो भयानक वारदातें हुई हैं उनका मुख्य उद्देश्य पवित्र और शानदार है। इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और आयरलैंड के निवासियों, अगर डच यहूदियों की एक टुकड़ी यहाँ आवे और वुलविच मार्श पर फैक्ट्री लगाने की अनुमति माँगे तब तुम क्या कहोगे; अगर सालाना किराया देने के वादे पर अनुमति मिलने के बाद वे फ्रांसीसियों या रूसियों के साथ षड्यंत्र करके उन्हें भी भीतर घुसा लें; अगर, उसके बाद, उनको भगाने के वादे पर तुमसे आधा केंट माँग बैठें; अगर जमीन मिलने के बाद वे दोनों पक्षों को धोखा देकर सर्रे के एक टुकड़े के बदले तुम्हें यांकियों को बेच दें; अगर सभी पक्षों द्वारा शांति की कसम खाने के बाद वे सबको लड़ा दें और इस अफरातफरी का फायदा उठाकर वे खुद कब्जा पर कब्जा जमाते जाएँ; अगर, प्रोटेस्टेंट होकर भी, वे पोपवादियों को खुश करने के लिए खुद प्रोटेस्टेंटों पर वार कर दें; और फिर प्रोटेस्टेंटों को खुश करने के लिए पोपवादियों को बर्बाद कर दें; अगर खतरा लगे और कमजोर पड़ें तो तुरत नतमस्तक हो सुलह कर लें और जब तुम सत्ता में हो तो तुमसे माफी झटक लें; और इस तरह ताकत और सत्ता बटोरने की मोहलत पाकर अचानक तुम पर टूट पड़ें, तुम्हारे शहरों को जला दें, तहस-नहस कर दें, तुम्हारी स्त्रियों की इज्जत लूटें, तुम्हारी आबादी का कत्ल करें और इस तरह तुम्हारी हैरत, निराशा और कमजोरी के वातावरण में तुम्हें और तुम्हारे देश को गुलाम बना लें - तब तुम क्या कहोगे और क्या करोगे? और आगे भी अगर तुम्हें इस तरह गुलाम बनाकर वे तुम्हारी धरती का एक-एक बिस्वा हड़प कर लें; अगर इस तरह हड़प के वे तुम्हीं से उस जमीन का किराया वसूलें जहाँ कभी तुम्हारी अपनी खेती थी; और फिर उस पर इतना टैक्स ठोंक दें कि पूरी पैदावार उसका आधा भी अदा न कर पाए; और जब तुम चुका न पाओ तब वे तुम्हारे ढोर-डाँगर, तुम्हारे हल-कुदाल और बिजड़ा भी जब्त कर लें; और इस तरह तुम्हारे उत्पादन के सारे साधन छीन वे अगले साल भी तुमसे उतना ही टैक्स और मालगुजारी माँगें, और न देने पर अगर वे तुम्हें उल्टा लटका कर तपती धूप में कोड़े मारें यातना दें, तुम्हारी औरतों के स्तनों से बिच्छू बाँध दें, हर तरह का नृशंस अत्याचार और अपराध करें - तब तुम, मैं फिर से पूछता हूँ, तब तुम क्या बोलोगे, तब तुम क्या करोगे? तुम उठ खड़े होगे - विद्रोह के पवित्र अधिकार से, और पूरे यूरोप और दुनिया को पुकारोगे, धरती और आसमान को पुकारोगे कि वे आवें और तुम्हारे पक्ष के इन्साफ के गवाह बनें।
साथी देशवासियो! इंग्लैंड के हाथों हिंदुस्तानियों के साथ ऐसा ही सलूक हुआ है; यही उनके विद्रोह का कारण है, और हरेक ईमानदार आदमी, पूरी दुनिया का हरेक ईमानदार आदमी इस पर एक ही फैसला देगा और इस मामले पर एक ही आकांक्षा व्यक्त करेगा - सबकी साँस एक ही होगी।
हिंदुस्तान में इंग्लैंड का शासन और प्रतिशोध की माँग
('पीपुल्स' पेपर में 31 अक्टूबर , 1857 को प्रकाशित)
वर्तमान विद्रोह में शरीक हिंदुस्तानी सिपाहियों से प्रतिशोध की भीषण चीख हमारे कानों में डर और चेतावनी भर रही है। गंभीर 'टाइम्स' से लेकर हास्यास्पद 'पंच' तक - सार्वजनिक मंचों से लेकर पादरी के प्रवचनों तक - चाहे जिधर भी नजर दौड़ाएँ (कुछेक अपवादों को छोड़) हर जगह एक ही माँग है - विद्रोही सिपाहियों का कत्लेआम और पूरी कौम का पक्का सफाया।
कानपुर में नाना साहब के कृत्यों के नाटकीय वर्णनों और दूसरी जगहों पर हुए अत्याचारों से हम इतने स्तब्ध थे कि अगर हम उन्हें ब्रिटिशों की उतनी ही बर्बर और दहलानेवाली करतूतों के लंबे इतिहास से उत्पन्न न मानते होते तो हमें भी 'टाइम्स' की वहशी, गैरजिम्मेदाराना और क्रूर माँग - 'नेटिवों का खून चाहिए' - का समर्थन करने में हिचक न होती।
स्वाभाविक ही है कि आदमी अपने पूर्वजों के कुकृत्यों को भूल जाए, और अपनी झूठी शान में उनसे होने वाले असर-असरात का ठीक-ठीक हिसाब न रखे। लेकिन धोखेबाजों, लुटेरों और जरायमपेशा लोगों की नस्ल ने वहाँ के बाशिंदों के दिमाग पर क्रूरता और यंत्रणा के जो दाग दागे और जुल्म के जो बीज बोए आज वे उसी की खूनी फसल काट रहे हैं।
सिपाही धोखेबाज और क्रूर हैं, हमने माना, लेकिन यह शिक्षा उनको दी किसने? बहुत संक्षेप में हम अपने हिंदुस्तानी शासन के इतिहास को पढ़कर देखें और अपनी 'नम्र दयालु कृपा' की कुछ बानगी पर नजर डालें जिसका गुणगान करते वे थकते नहीं जो 'ब्रिटिश सिपाहीवाद' में विश्वास करते हैं, जबकि वे नेटिवों के वैसे ही बर्ताव का ख्याल आते ही काँप उठते हैं...।
इस तरह की ज्यादतियों को कोई भी राष्ट्र अपने अंतिम क्षण तक नहीं भूल सकता, और जब दुख भोगने वाले बदला लेने को उठ खड़े होते हैं तो उनको धिक्कार है जो इस बदले के भागी हैं।
और अब वे दो शब्द 'विद्रोहियों' से बदला लेने के बारे में और हमारी बात पूरी हो जाएगी।
बेबाक अखबार 'सिपाहियों' के खून से रंजित अपनी कुल्हाड़ी चमकाता है और उसी खून से मुख्य समाचार लिखता है। इसका अंतिम लहरा :
'सीधे-सीधे फाँसी एक और जीत के बराबर होगी। हर पेड़ और हर छप्पर पर विद्रोही की लाश का बोझ होना ही चाहिए।'
कृपालु टाइम्स। पूरे बंगाल में हर पेड़ पर कटी-फटी लाश - और घरों के छप्पर लाशों के टुकड़ों से पटे हुए - गर्जक संपादकों की मानवीय सुरुचि को यह दृश्य तुष्ट कर देगा। और उन ईसाई पादरियों की सुरुचि को भी तुष्ट करेगा जो अपनी शांति की वेदी से नरसंहार और प्रतिहिंसा का प्रवचन बघारते रहे जो ईसा मसीह की शिक्षाओं के ठीक उलट है - और मनुष्य की सामान्य क्रिश्चियनिटी के संदेशों के भी मेल में नहीं है।
पूरे विद्रोह के दौरान 'विद्रोहियों' का आचरण अपने सभ्य शासकों के आदर्श उदाहरण से पूरी तरह मिलता है।

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