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“गीता” : एक ‘मानवीय ग्रंथ’ … एक ‘समग्र जीवन दर्शन’ … व ‘मानव समाज की अप्रतिम धरोहर’

            "गीता” का शाब्दिक अर्थ केवल गीत अर्थात् जो गाया जा सके से लिया जाता है । किन्तु आतंरिक रूप से इसका अर्थ है कि जिस...

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Monday, 2 January 2012

आर्यावर्त

आर्यावर्त  
       समाज  निर्माण के प्रारंभ से ही जो ब्यक्तियों का समूह समुन्नत हुआ , जो पृथ्वी के जम्बूद्वीप के भारत वर्ष क्षेत्र में निवास करता था ,वे ज्ञान विज्ञान कृषि के क्षेत्र में अत्यधिक समुन्नत हुए !उनके अन्दर एक सामाजिक, राष्ट्रिक, एवं सांस्कृतिक भावना का विकास हुआ | विकास की यह कालांतर में  धारा सनातन- सनातन समाज -सनातन धर्मावलम्बी के नाम से जाना जाने लगा ! जिसने वेदों सहित समाज के नियमन के लिए अनेकानेक संहिताओं की रचना की|यह कार्य एक व्यवस्थित समाज जीवन में बैठ कर किया गया|भले ही आधुनिक अल्प बुद्धि मूर्खों ने इसे आज अरण्य साहित्य के नाम से पुकारते है|यह एक विडम्बना ही है|इस विकाश की धारा को सनातन धर्म एवं सनातन संस्कृति या भारतीय संसकृति के नाम की संज्ञा उसी कल खंड में मिल चुकी थी|क्यों कि यह विकास की धारा भारत वर्ष खंड में हुई |वास्तव में वे लोग सम्पूर्ण दुनिया , एवं उसके एक द्वीप जम्बूद्वीप के अन्दर श्रेष्ठ थे , आर्य थे|श्रेष्ठता का दूसरा नाम ही, पर्यायवाची "आर्य" है इ अतः उन्हें शेष दुनिया ने आर्य कह संबोधित किया|इस ज्ञान - विज्ञान , कृषि  व विकास की धारा को वह विकसित समाज एवं उस समाज के जनक ऋषि मुनिओं ने हिमालय का उलंघन न करते हुए हिमालय से दक्षिण के भूभाग या हम जिसे यों कह सकते है कि भारत वर्ष के पूर्व एवं पश्चिम के क्षेत्रों में फैलाया|या उस पूर्व पश्चिम के क्षेत्रों में रहने वाले मानव एवं मानव को सुसंस्कृत एवं सुशिक्षित किया|भारत के पूर्व एवं पश्चिम का यह क्षेत्र पारस (इरान) से लेकर थाईलैंड इंडोनेशिया तक के फैलाव के साथ है ! इस कार्य को सनातन समाज के लोंगो ने किया , जो श्रष्ट - आर्य मने जाते थे !जिन्होंने इस पूरे क्षेत्र में एक "एक सामान जीवन दर्शन , सनातन जीवन दर्शन" का फैलाव किया एवं इसे दुनिया तथा सृष्टि का श्रेष्ठ हिस्सा आर्यावर्त के नाम से पुकारा | जिसे आर्यावर्त के नाम से दुनिया जानती थी ! बारहवी शदी के पूर्वाद्ध तक इसी नाम से जाना जाता था |
                         आर्यावर्त का फैलाव दक्षिण एशिया , एवं दक्षिण - पूर्व एशिया यानि इरान (पारस), अफगानिस्तान, भारत, नेपाल, तिब्बत, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, मालदीप, सिंगापुर, पूर्वी तिमोर, थाईलैंड, फिलिपिन्स,इंडोनेशिया, वियतनाम, कम्बोडिया, लाओस तक था | दूसरी शदी में पल्लव वंश  ने जावा और सुमात्रा में हिन्दू राज्य स्थापित किया|आठवी शदी में कम्वोडिया , थाईलैंड पर उसी वंश का राजा याशोवार्मा ने शासन किया जिसके राज्य को कम्बोज कहा जाता था|कन्नौज के शासक यशोवर्मन एवं गुप्त वंशीय  समुद्र गुप्त का शासन सेन्ट्रल एशिया तुर्की, बल्तिस्तान, एवं दर्दिस्तान  तक फैला हुआ था | वही मौर्य वंशीय सम्राट अशोक का राज्य तिब्बत तक था |
           कालिदास कुमार सम्भव में इसके फैलाव, क्षेत्र , सीमा का वर्णन करते हुए कहते है कि ...............................
                                   अस्त्युत्तरस्याम दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः !
                                     पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानंदः !!
     

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