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Thursday, 4 February 2016

तिखतता के साथ

तिखतता के साथ
आज सींचेवाला से गाड़ी से लौट रहा था।  रास्ता पूछने के क्रम में गाड़ी सुल्तानपुर लोधी रुकी। गाड़ी मालिक चालक के कुछ लापरवाही पर बिगड़ी हुई थी। उसे कुछ तीखा बोल रही थी।उसी समय गाड़ी के अंदर एकाएक 50-60 मधुमख्खियों का झुण्ड खुले दरवाजे और गिरे कांच से प्रवेश कर गया। मधुमख्खियां भी कुछ ज्यादे ही बड़ी बड़ी।और मधुमख्खियां भी प्रवेश करती ही जा रही थी।बचाव में तेजी से गाड़ी भगाना पड़ा। पर शुक्र कि किसी को भी एक भी मधुमख्खी नहीं काटी।और सभी धीरे धीरे बाहर निकल गयी। इसी पर एक रचना.......


तिखतता के साथ
उखड़े हुए मन से
जब कर के दरवाजे
खट से बंद होते हैं
तभी मधुमख्खियां
दौड़ के आ जायेगी

जब उखड़ी उखड़ी
रूखी बाणी मुख से
निकलने लगती है
तभी मधुमख्खियां
दौड़ के आ जाती है

पता नहीं
मधुमख्खियां दौड़ के आयी
मुझे डराने के लिए कि
मेरे किये पर पछतावे के लिए
कि मेरी बाणी में
मधु विखरने के लिए

पर यह
नानक की लीला भूमि
मेरे वाणी को सरस
मधुर बनाये गी ही
गुरु नानक की चेतना से
मेरी भी चेतना जगाएगी ही

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