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“गीता” : एक ‘मानवीय ग्रंथ’ … एक ‘समग्र जीवन दर्शन’ … व ‘मानव समाज की अप्रतिम धरोहर’

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Friday, 6 November 2015

" देशेर कथा " के कुछ अंश भाग-2

गणेश सखाराम देउसकर की "देशेर कथा " से 

 भाग -2

भारत में अकालों का इतिहास देखने से अचछी तरह मालूम हो जाएगा कि अकाल के साथ हमारा सम्बन्ध दिन -ब - दिन गहरा ही होता जा रहा है । अंग्रेजो के लिखे इतिहास के अनुसार 18वीं शताब्दी के 100 वर्षों में मात्र 4 बार ही अकाल पड़ा था। और वो अकाल भी किसी एक ही प्रदेश में होते थे।19वीं शताब्दी में अंग्रेजों का इस देश में धीरे धीरे राज्य फैला । दुर्भाग्यवश उसी समय अकाल - राक्षस ने भी यहाँ अपना अधिकार जमा लिया। 1801 से 1825 के बीच पिछले 25 वर्षों में भारतवर्ष में 10 लाख आडमी अकाल में भूंख से मर गए । दूसरे 25 वर्षों में और 5 लाख अभागे उक्त राक्षस की बलि चढ़े। उसी शताब्दी के तीसरे चरण (1857) में सिपाही युद्ध हुवा ।उसका परिणाम यह हुवा कि अंग्रेजों का राज्य भारत में जम गया।उन्ही 25 वर्षो में अकाल ने भी यहाँ अपना शासन मजबूती से जमा लिया । सरकारी रिपोर्ट से पता चलता है कि सन् 1850 से 1857 के बीच ब्रिटिश भारत में छ बार अकाल पडा । उसमे पचास लाख भारतवासी पेट की ज्वाला से काल के कवल हुए।
पेज - 20

 उन्नीसवी सदी के आखिरी चरण के अकालों की हालात तो और भी भयंकर है । इन पचीस वर्षों में भारत में अठारह बार अकाल की आग जल उठी। इस भयंकर आग में ----2 करोड़ 60 लाख महाप्राणी खाक हो गए । इनमे केवल गत दस वर्षों में 1 करोड़ 90 लाख भारत के लाल 'हा अन्न ! हा अन्न! कर भूंख की घोर यंत्रणा से छटपटा - छटपटा कर मर गए ! इस ह्रदय विदारक दुर्घटना का वर्णन करते हुए ' दुर्भिक्ष - निहत' हतभागों को महामति विलिएम डिगबी सी . आई. ई . अत्यंत खेद के साथ कहते हैं ----
'You have died . You have died usslessly.
तुम मर गये ! तुम बिना कारण मर गए।'


 पाठक पूँछ सकते है कि 'अकालों के साथ अंग्रेजों की वाणिज्य नीति का क्या सम्बन्ध है ? इंद्रदेव के जल न बरसाने से खेत की फसल खेत में ही जल जाती है । देवताओं के विरुद्ध होने से अकाल का रुकना असंभव हो जाता है ।"
लोग इस तरह के विचार करते हैं , उन्हें इस विषय 
के गूढ़ तत्व अच्छी तरह पता नहीं हैं। इस विशाल भारतवर्ष में एक साथ सब जगह अनावृस्टि नहीं होती ----अंततः गत दो हजार वर्षों में ऐसी अभावनीय घटना कभी नहीं हुयी है। भारत के एक भाग में अनावृस्टि होने पर भी दूसरे भागों में सुवृस्टि होती ही है। सुवृस्टि होने से भारत की एक चौथाई जमीन में ही इतनी फसल होती है कि उससे अकाल पीड़ित प्रदेश के वासियों की अनशन मृत्यु सहज में रोकी जा सकती है।देश में सर्वत्र रेल से एक प्रदेश का अन्न थोड़े ही समय में दूसरे दूसरे प्रदेशो में बिना कष्ट के पहुँचाया जा सकता है। सरकरी ऑफिसर बराबर कहते हैं कि अकाल के समय अन्न वहन करने की सुविधा के लिए ही इतना खर्चकर और हानि उठाकर देश में सब जगह रेल बनायीं जा रही है।पर दुर्भाग्य की बात है कि इसके होते हुए भी दुर्भिक्ष- राक्षस का प्रभाव बढ़ा ही जा रहा है । पेज - 21



 फसल का उत्पन्न न होना अकाल का असली कारन नहीं है । पृथ्वी पर बहुत देश है जो जहा आबादी के हिसाब से उपजाऊ जमीन नहीं है। विलायत में ही खेती लायक जमीन बहुत कम है ।वहां साल भर की उपज से वहां के लोगों का भरण पोषण मात्र 91 दिन से ज्यादा नहीं हो सकता ।तो भी साल के 274 दिन अंग्रेजों को फांका नहीं करना पड़ता। जर्मनी का भी वही हाल है ।वहां के लोगों को भी यदि देश से उत्पन्न अन्न पर निर्भर रहना पड़े तो 102 दिन उपवास करना पड़े। तब भी इन देशों में अकाल की बात कभी सुनी नहीं जाती। यह सुशासन का फल है।

 देश में शस्यभाव होना ही अकाल का कारन नहीं है । प्रकृति की निष्ठुरता और भाग्यदोष से फसल न होने के लक्षण दिख पड़ते ही सभ्य जातियां दूसरे देशों से अन्न मगाकर अपना काम चला लेती हैं ।हमारे भारतवर्ष से ही हर साल प्रायः साढ़े सोलह करोड़ रुपये का गेहूं और चावल उन देशों में भेज जाता है।यूरोप के लोग हजारों कोस दूर से धान्य मगाकर सुख से दिन काटते हैं , और भारत की संताने पड़ोस में ही विशाल हरे भरे खेतों के रहते भूंख से प्राण त्याग करते हैं ।इसका कारण क्या है ??

 भारत में धन -बल का आभाव ही यहाँ के दुर्भिक्षों का प्रधान कारण है भारत में अन्नाभाव की अपेक्षा धनाभाव अधिक है । यहाँ अन्न है, पर खरीदकर खाने के लिए पैसा नहीं है। अंग्रेजों के साथ वाणिज्य --संग्राम में जर्जर हम लोग इस प्रकार कौड़ी के तीन हो गए हैं कि एक वर्ष भी फसल न हो तो हमारे लिए प्राणों की रक्षा करना मुश्किल है। पेज-22

 देश का शिल्प और वाणिज्य मर जाने के कारण अब 85 प्रतिशत आबादी खेती पर ही उदर - निर्वाह करते हैं ।अनवृस्टि के कारन फसल न होने से भारतवासी निरुपाय हो जाते हैं। दूसरी जगह से धान्य खरीदने के लिए जिस धन की आवशयकता होती है वह धन अब किसी के पास नहीं है। देशवासियों के पास यदि अनाज खरीदने लायक पैसा होता तो , घोर दुर्भिक्ष के दिनों में भी हमारे देश से लाखों मन गेहूं चावल परदेश क्यों जाता ?
 पहले देश में शिल्प और वाणिज्य की अच्छी चलती होने के कारण लोगों के धन कमाने के लोगों के धन कमाने के बहुत से मार्ग खुले थे।उस समय कृषकों की संख्या कम और खेती के योग्य जमीन अधिक होने खेती में भी खूब पैसा मिलता था । इन्ही कारणों से उन दिनों अकाल पड़ने पर भी उसका परिणाम ऐसा नहीं होता था।

( N॰ B ॰ - 
उस समय भारत की आबादी लगभग 20 करोड़ थी ।
19वीं शताब्दी के अंतिम 25 वर्षो में भारत की 10 प्रतिशत आबादी अन्न के आभाव में भूंख के कारन मर जाती है । कितनी बड़ी विडम्बना है।
जो बची होगी वो आने वाले समयकाल में कितने मरे होंगे ?

इस नंगी सच्चाई को अनदेखा कर माइथोलॉजी से इतिहास रचा गया भारत का ?
आंबेडकर अगर उस खड्यंत्र का हिस्सा नहीं भी होंगे तो कम से कम उनकीं अक्ल को तो ईसाई विद्वानो ने चाट ही डाला होगा तभी तो ये बहकी बहकी बात इतने वर्षो तक होती रही । )

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