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Thursday, 19 November 2015

"गीता" : एक "मानवीय ग्रन्थ".....एक "समग्र जीवन दर्शन" व मानव समाज की धरोहर.

"गीता" : एक "मानवीय ग्रन्थ".....एक "समग्र जीवन दर्शन"  व मानव समाज की धरोहर.

           "गीता" का शाब्दिक अर्थ केवल गीत अर्थात् जो गाया जा सके से लिया जाता है । किन्तु आतंरिक रूप से इसका अर्थ है कि जिसने अपने गीत को पा लिया है, स्वयं के छन्द को जान लिया है, स्वच्छंद हो गया है । माना जाता है कि पूर्व अध्यात्म की यात्रा पर ध्यान केन्द्रित करता है और पश्चिम विज्ञान की । किन्तु सत्यता इससे भी गूढ़ है । गीता के द्वारा मनुष्य अध्यात्म और विज्ञान, दोनों ही की पराकाष्ठा को प्राप्त कर लेता है ।
           
'गीता' किसी विशेष धर्म या संप्रदाय की पुस्तक नहीं है ।अपितु यह एक एक जीवंत ग्रन्थ है। जिसका दृष्टिकोण विश्चजनीन है| ज्ञान-यज्ञ का यह ग्रन्थ मानव-मात्र के हित के लक्ष्य से प्रेरित है। आज 'योग' जिस तरह पतंजलि के सूत्रों के कारण,भारत और हिन्दू धर्म की परिधि में सीमित न रहकर सम्पूर्ण संसार में ग्राह्य हो गया है, उसी तरह 'श्रीमद्भगवद्गीता' भी अपने देश-काल को लाँघकर सम्पूर्ण विश्व की वैचारिक संपत्ति बन गई है । अध्यात्म और कर्म अथवा निवृत्ति एवम् प्रवृत्ति के द्वंद को समाहित करनेवाली यह कृति मानव-जीवन की चरितार्थता की खोज करती है । चतुर्दिक व्याप्त संघर्ष और दिग्भ्रम के वातावरण में इसकी उपयोगिता एक औषधि की तरह है।
         महाभारत के अंत में एक विशेष प्रसंग आता है जहाँ अर्जुन कृष्ण से पुनः गीता सुनाने को कहते हैं, क्योंकि जो ज्ञान दिया गया था, अर्जुन को उसकी विस्मृति हो गई थी । तब कृष्ण कहते हैं-
‘‘न शक्यं तन्मया भूयस्तथा वक्तुमषेशत: ।
परं हि ब्रह्म कथितं योग युक्तेन तन्मया ॥
(महा/अश्‍वमेधिकपर्व/अनुगीता/अध्याय १६)
अर्थात् वह उपदेश, उसी रूप में दोहराना मेरे वश में नहीं; क्योंकि उस समय, योगयुक्त होकर मैंने उस ब्रह्मविद्या का वर्णन किया था|
इस वक्तव्य से स्पष्ट होता है कि गीता का सम्पूर्ण ज्ञान ध्यान की उच्च अवस्था में प्रदान किया गया था । अतः ध्यान के द्वारा प्राप्त गीता का ज्ञान मानव कल्याण के लिए ही उत्पन्न हुआ है ।

     कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में विषादग्रस्त अर्जुन को मोह और अवसाद से मुक्त किया था। आज भी 'महाभारत' चल रहा है । लोग किंकर्तव्य विमूढ़ हैं । वे कर्म और उद्देश्य से कटकर निरर्थक विचारों के ऊहापोह में डूब गए हैं । ऐसे संशयग्रस्त समय में 'गीता' मार्गदर्शिका के रूप में सामने है । अनिर्णय में झूलनेवाले का व्यक्तित्व खंडित हो जाता है । मानसिक दृष्टि से टूटे हुए लोग समाज, देश और संसार का कल्याण नहीं कर सकते हैं । 'गीता' उन भग्नचित व्यक्तियों का उपचार करने में समर्थ है।
         
     
        'महाभारत' का 'अन्धायुग' अभी समाप्त नहीं हुआ है । सत्तासीन जन धृतराष्ट्र की तरह बेचारे हैं।वे केवल निष्क्रिय बुद्धिजीवी संजय से 'कुरुक्षेत्र' की कथा पूछते हैं।नारी-शक्ति के नेत्रों पर गांधारी की पट्टी बँधी हुई है।अनेक झंडे उड़ रहे हैं।वाहनों की विपुलता है।विविध शंखध्वनियाँ गूँज रही हैं।गांडीव का गौरव गल रहा है।अर्जुन अवसन्न है। द्वापर का यह दृश्य सर्वत्र देखा जा सकता है।मनुष्यता को मार्ग नहीं मिल रहा है।ऐसी स्थिति में 'गीता' के संदेशों की प्रासंगिकता सभी देशों में अनुभूत ही रही है।

      'गीता' आकारतः छोटी पुस्तक है, किन्तु उसकी लपेट में सम्पूर्ण त्रिलोक और त्रिकाल है। जिस तरह कृष्ण की विभूतियॉं सर्वत्र फैली हुई हैं और उनके विराट रूप में सब-कुछ समाविष्ट है उसी तरह 'गीता' विविध विचारों के बीच संतुलन के उस सेतु की प्रतीति कराती है, जिस पर सभी रंगों, नस्लों, और राष्ट्रों के लोंगों को चलने की स्वतंत्रता है।

        'गीता' जहाँ एक ओर काव्य प्रतीत होती है वहीँ दूसरी ओर समाज के यथार्थ को संबोधित भी करती है | सभी के प्रश्नों की उत्तर-कुंजिका है यह । प्रश्न चाहे निजी हो, सत्ता का हो, विज्ञान का हो, आधुनिकता का हो, श्रद्धा व विशवास का हो अथवा अध्यात्म के रस से परिपूर्ण हो- उत्तर गीता में दृष्टव्य है । इसी कारण से यह ग्रन्थ किसी कवि के द्वारा लिखी गई निजी संपत्ति नहीं है अपितु मानव सभ्यता की सम्पति होती है । जिस तरह शेक्सपियर केवल इंगलैण्ड के नहीं हैं और तुलसीदास पर हिन्दी का ही हक़ नहीं है उसी तरह 'व्यास' एवम् 'गीता' को हम केवल संस्कृत तथा भारत से जोड़ने का अपराध नहीं कर सकते हैं । विश्व की साझी विरासत के रूप में 'गीता' की महत्ता अक्षुण्ण है । अध्यात्म के फलक पर लोक-शिक्षण की इस रचना में उपनिषदों का पोषक दुग्ध संचित है । इस वैचारिक आहार पर हिन्दू,जैन,बौद्ध, यहूदी, मुस्लिम, ईसाई, सिख आदि सभी समुदायों का अधिकार है।इसका काव्यत्व सबके लिए आधारक और तोषप्रद है। निश्चय ही पूरी मानवता इससे प्रेरणा ले सकती है।

      अल्प शब्दों में कहें तो 'गीता' एक "मानवीय-ग्रन्थ" है और एक सार्वजनीन "समग्र मानवीय जीवन-दर्शन" भी है।

यद्यपि "गीता" की व्यापकता, प्रभाव व संस्कार मानव जीवन में असीमित व अनन्त है ।"गीता" की सार्वभौमिकता व सर्वव्याप्तता को ध्यान में रख आज एक सीमित परिचर्चा निम्नांकित विषयों पर की जा सकती है।
राष्ट्रिय / सामाजिक / वैयक्तिक जीवन के विभिन्न पहलुओ पर चंद निम्न श्लोक पूर्ण मार्ग दर्शन करते है जो हर स्तर के प्रबंधन की सम्पूर्ण कुंजी है.
Geeta is a management gospel covering every aspect of life, be it national level, society level or individual level. It gives the direction to handle various aspects of life and provides guidelines for every individual in respect of his duties and rights.

1. Good Governance and social setup
सुसाषन वैयक्तिक लक्ष्य और सामाजिक व्यवस्था - गीता  श्लोक 3.21
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥३- २१॥

2 . Duties of state towards law and order for the benefit of society
समाज विधायक निति और उसका उद्देश्य
गीता  श्लोक 4.8
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥

3 . Self-development and its role in social order
नागरिक जीवन का चरमोत्कर्ष एवं सामाजिक व्यवस्था में उसका योगदान  - गीता 6.5
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥६- ५॥

4. Doctrine of right to act and concept of freewill
स्वतन्त्र समाज में वैयक्तिक अधिकार - गीता 2.47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥२- ४७॥
5. Philosophy of detachment in life as attachment leads to unrest
तृष्णा एवं लालसा से सामाजिक अव्यवस्था व असहिष्णुता का जन्म - गीता  2.62
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥२- ६२॥
6.– Fallacy in change of religion – clear guideline
धर्मं परिवर्तन एक अनावश्यक व अवनति का मार्ग - गीता  3.35
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥३- ३५॥

7. Law of co-existence and concept of brotherhood - Live and let live
वसुधैव कुटुम्बकम का सिद्धांत - गीता  6. 30
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६- ३०॥

8. No place for ill will in society
भारतीय सामाजिक व्यवस्था ईर्ष्या व द्वेष का स्थान नहीं - गीता  5.3
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥५- ३॥

9. Ideal living order for individuals
आदर्श जीवन व्यवस्था - गीता 2.38
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥२- ३८॥

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