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दीवाली की खुशियाँ तो एक पक्ष है जीवन का होना और चलना भी एक पक्ष है खुद को यादों से परहेज कर के खुद को खुद में जीना होता है जब बूं...

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Saturday, 17 October 2015

आरपी परशुराम द्वारा गांधी को लिखे गए 16 पन्नों के खत का एक सार यह जाहिर करता है कि गांधी औरतों का यौनिक शोषण कैसे करते थे

































आपको इस बात पर भी विचार करना होगा कि मुझे किस चीज ने मुंहफट बनाया और किस वजह से मैं इतना खुलकर बोला। यह इसलिए था क्योंकि मुझे लगता है कि मैं एकदम सही हूं और आप एकदम गलत हैं। यही वो वजह है जिसने मुझे हिम्मत दी।
ऐसा नहीं है कि मैं ये सब पहले नहीं जानता था। मैं जानता था पर मैं चुप रहा। मैंने सोचा “मैं क्यों ये सब उन्हें बताऊं?” यहां पर कनु (गांधी), किशोरीलाल-भाई (मश्रुवाला) जैसे कई तजुर्बेकार व आपको अच्छी तरह जानने वाले कई लोग हैं। और तब मुझमें हिम्मत भी नहीं थी। आपके साथ रहकर मैं अपने शर्मीलेपन से बाहर निकला…
जब मैं पहली बार आश्रम में आया था तो मैं आश्रम व इसके वाशिंदों व इसकी जीवनशैली के प्रति अगाध सम्मान लेकर आया था। यहां पर आने के बाद 24 घंटों में ही जो बात मुझे खटकी… वह यह थी कि मुझे यह कबूल कर लेना चाहिए था कि मैंने आपके प्रति सम्मान का कुछ हिस्सा गवां दिया था… आप हमारे राष्ट्र के पिता हैं… आप हमें आज़ादी व आत्मनिर्भरता के पथ पर काफी दूर तक ले आए… आप को इस बात में भगवान की कृपा देखनी चाहिए… कि मैं अपने शर्मीलेपन से पार पा चुका हूं।
विपरीत लिंग के सदस्यों संग एक ही बिस्तर में आपके सोने पर मुझे एतराज है। फरवरी 1945 या ऐसे ही किसी वक्त, मुझे टाइप करने के लिए एक ब्यान का मसौदा दिया गया। मैं उसके मजमून से हैरान रह गया… मैं आपको बता देना चाहता हूं कि इससे पहले भी मैं इसके बारे में जानता था। एक दिन अमीन-भाई आए और मुझसे बोले कि वे मनु (मनु गांधी – गांधी की अपनी पौत्र भतीजी) को आपके बिस्तर में देखकर हैरान रह गए।
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उन दिनों मैं अब के मुकाबले ज्यादा शर्मीला था। आश्रम में मेरा एकमात्र दोस्त अमीन था। तब भी मैं इस मामले पर होने वाली बातचीतों को जानता था क्योंकि आश्रम के लोग एकदम लापरवाह थे और वे अपनी बोलती बंद नहीं रख सकते थे। हरेक ने आपकी इस करतूत पर एतराज जताया था…
आप पर पड़ने वाले असर के सवाल के अलावा लड़कियों पर पड़ने वाले असर का क्या?
यहां पर उनके (वे औरतें जो गांधी संग नंगी सोती थी) साथ कुछ और ही गलत हो रहा था। माटुंगा में मेरे कमरे के सामने जो पंजाबी लड़की रहती थी… वह अक्सर फूटफूट कर रोती थी और इस बात की भी परवाह नहीं करती थी कि उसे दूसरे देख रहे हैं या नहीं। वह हंसती भी बेहिसाब थी… और फिर यहां पर डॉक्टर सुशीला-बहन भी हैं (आश्रम में कार्यरत 24 साल की चिकित्सक इसे भी गांधी अपने प्रयोगों के लिए इस्तेमाल करते थे)। ऐसे कितने दिन गुजरे जब वह रोई न हों? वह एक डॉक्टर हैं मगर फिर भी वह हमेशा एक मरीज ही रहती हैं, हमेशा बीमार रहती हैं। एक डॉक्टर जो रात में चिल्लाती है उसकी पुकार किसने सुनी?
फिर भी दुनिया वाले इस पूरे मामले को ही गलत मान लेते हैं। मुझे यह बात पसंद नहीं है। निर्मल बाबू (बोस) को भी नहीं। सुचेता-बहन इसे पसंद नहीं करती और वे कहती हैं “वे भले कितने ही महान क्यों न हों, वे ऐसी चीजें नहीं कर सकते। यह सब क्या है?” आपको यह कबूलना होगा कि हमारे एतराजों में कुछ तो दम है। आप इन्हें एक तरफ नहीं धकेल सकते।
जहां तक खून के रिश्तों (मनु गांधी) की बात है, दुनिया वाले अब भी शक्की मिजाज हैं। यहां पर बाप और बेटी, भाई और बहन के बीच अनैतिक रिश्तों के कई मामले रहे हैं…
मुझे इस बात से भी एतराज है कि आप लड़कियों से मालिश करवाते हो। जब मैं कॉलेज में पढ़ रहा था तब मैंने एक रिपोर्ट पढ़ी थी जिसमें कहा गया था कि सुशीला-बहन आपकी मालिश करती थीं… और अब मैंने पाया कि आप खुद ही लड़कियों से मालिश करवाते हो।
जो लोग यह जानते हैं कि मालिश के वक्त आप नंगे होते हैं, वे कहते हैं कि आप कम से कम उस (अपने गुप्तांग) के ऊपर एक कपड़ा तो डाल ही सकते हैं…
यही एतराज मुझे इस बात से भी है कि जब भी आप शौचालय जाते थे तो लड़कियां भी आपके साथ जाती थीं। रामाचंद्रन ने आपको उन हालातों में देखा और उसने बताया कि आप उसकी उम्मीदों से थोड़ा गिर चुके थे। फिर भला आप कितने ही महान क्यों न हों, आप ये हरकतें नहीं कर सकते।
आप लड़कियों के कंधों पर अपने हाथ रखते हैं। आपने एक बार लिखा था कि आपने यह प्रथा छोड़ दी क्योंकि दूसरों ने आपको बदनीयती के बारे में सूचित किया था। मुझे दूसरा कोई भी ऐसा लेख नहीं मिला जिसमें यह कहा गया हो कि आप इसे फिर से शुरू कर सकते थे। इसलिए मेरे लिए यह हैरत की बात है कि आपने इसे फिर से शुरू क्यों किया… जिन दो सालों के दौरान मैं आपके साथ रहा, उनमें आपके प्रशंसकों व आलोचकों द्वारा लिखे गए लगभग 50 या इतने ही खत इस प्रथा पर एतराज जताने के लिए आए थे। उनमें से किसी का भी जवाब नहीं दिया गया…
आपको (अपने स्नान व मालिश के दौरान) नंगा देखा जाता रहा, इस बात ने अजनबियों, व प्रशंसकों के दिमागों को हिला दिया, हालांकि उन्हें हिलना भी चाहिए था। रामचंद्रन को यह सब पसंद नहीं था। उसने कहा था कि यह तो हद हो गई…
17 दिसंबर (1946) की उस सुबह-सवेर से लेकर जब आप डरावनी आवाजें निकाल रहे थे, डरावनी इसलिए क्योंकि ये आप जैसे महान इंसान के मुंह से निकली थी, जो बेमतलब ही एक समझदार या उम्रदराज इंसान का चोगा उतार रहा था, मेरा दिमाग शांत नहीं था। ऐसा ही एक और मामला मैंने ए.पी.आई (एसोसिएटेड प्रैस ऑफ इंडिया) के श्रीमान रामचंद्रन से भी सुना जब आप सुशीला-बहन को खुद से दूर जाने के लिए कह रहे थे। ऐसा ही एक और मामला मैंने दिल्ली में देखा था… मगर इस मामले ने मुझे अंदर तक हिला दिया। मैंने खुद से ही कहा कि भगवान और राष्ट्र मुझे माफ नहीं करेंगे अगर मैं चुप रहा तो…
आपने हिमालय जैसी विशाल भूलें की हैं। मगर आप इनको मानने से ही मना करते हैं और जब आपको ये बताई जाती हैं, तो आप चिढ़ जाते हैं… मैं कहता हूं कि आप घमंडी हैं और खुद को दुनिया के समस्त ज्ञान का भंडार घोषित करते हैं…
और अब मेरे आरोप। जबतक (मेरी मांगे) पूरी नहीं होती मैं इस्तीफा देता हूं… मैं असहमति व दूर जाने की इजाजत मांगता हूं… मुझे आपकी निम्न करतूतों पर एतराज है:
1.विपरीत लिंग के किसी भी सदस्य के साथ आपका सोना।
2.विपरीत लिगं के किसी भी सदस्य से मालिश करवाना।
3. विपरीत लिंग के किसी भी सदस्य को खुद का नंगापन दिखाना।
4.अजनबी व अपनी पार्टी के लोग जो आपके इतने करीबी नहीं हैं, उनको खुद का नंगापन दिखाना।
5.चलते वक्त लड़कियों के कंधों पर अपने हाथ रखना।

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